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1 करोड़ युवाओं का नशा मुक्त संकल्प: क्या 100 हफ्तों का यह अभियान बदल पाएगा भारत की तस्वीर?
PM मोदी 2 अगस्त को 'नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान' की शुरुआत करेंगे। जानिए 100 सप्ताह का प्लान, 1 करोड़ युवाओं की भागीदारी और इस अभियान का उद्देश्य।
Nasha Mukt Bharat Campaign
दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल भारत आज एक ऐसी चुनौती से जूझ रहा है, जो केवल स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गई है। नशे की बढ़ती लत युवाओं के भविष्य, सामाजिक संरचना, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार अब देशव्यापी जनभागीदारी का सबसे बड़ा अभियान शुरू करने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 अगस्त को 'नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान' का शुभारंभ करेंगे, जिसमें एक ही दिन देशभर के एक करोड़ से अधिक युवा नशा मुक्त भारत का संकल्प लेंगे।
सरकार का दावा है कि यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि अगले 100 सप्ताह तक चलने वाला ऐसा सामाजिक अभियान होगा, जिसमें युवाओं को स्वयं परिवर्तन का वाहक बनाया जाएगा।
2 अगस्त को देशभर में 10 हजार से अधिक केंद्रों पर युवाओं को डिजिटल माध्यम से जोड़ा जाएगा। केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के 'माय भारत (MY Bharat)’ प्लेटफॉर्म के जरिए आयोजित इस कार्यक्रम में एनसीसी, एनएसएस, नेहरू युवा केंद्र संगठन, स्कूल-कॉलेजों के छात्र, विभिन्न स्वयंसेवी संगठन और 125 से अधिक आध्यात्मिक संस्थाएं भाग लेंगी।
कार्यक्रम में शामिल होने वाले युवाओं को केवल शपथ दिलाकर नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उन्हें 'नशा मुक्त स्वयंसेवक' के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे अपने गांव, कस्बे, कॉलेज और शहर में जागरूकता अभियान चलाकर अन्य युवाओं को भी नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित कर सकें।
100 सप्ताह तक चलेगा अभियान
सरकार ने इस अभियान को केवल उद्घाटन तक सीमित नहीं रखा है। इसकी पूरी कार्ययोजना लगभग दो साल यानी 100 सप्ताह के लिए तैयार की गई है।
इसके तहत हर रविवार को देशभर में फिटनेस गतिविधियां, मैराथन, वॉकथॉन, खेल प्रतियोगिताएं, योग, ध्यान, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर प्रतियोगिता, संगीत कार्यक्रम और सांस्कृतिक आयोजन किए जाएंगे। उद्देश्य केवल नशे के खिलाफ संदेश देना नहीं, बल्कि युवाओं को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना भी है। इसके अलावा अभियान के 50वें, 75वें और 100वें सप्ताह पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले स्वयंसेवकों, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाएगा, ताकि अभियान की निरंतरता बनी रहे।
पुरानी नीतियों से कैसे अलग है नया मॉडल?
भारत में नशे के खिलाफ अभियान पहले भी चलाए जाते रहे हैं। लेकिन अधिकांश प्रयास पुलिस कार्रवाई, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की छापेमारी, ड्रग्स जब्ती और नशा मुक्ति केंद्रों तक सीमित रहे हैं। नया अभियान इस सोच से आगे बढ़कर नशे को सामाजिक आंदोलन के जरिए रोकने का प्रयास करता है। इसका फोकस इलाज से पहले रोकथाम पर है। सरकार का मानना है कि यदि युवाओं को नशे से दूर रखा जाए तो भविष्य में इलाज और कानून-व्यवस्था पर होने वाला भारी खर्च भी कम किया जा सकता है। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसका पीयर नेटवर्क मॉडल है, जिसमें युवा ही दूसरे युवाओं को जागरूक करेंगे। यह मॉडल सरकारी प्रचार से आगे बढ़कर सामाजिक भागीदारी पर आधारित है।
भारत क्यों बना तस्करों के निशाने पर?
दरअसल, भारत की भौगोलिक स्थिति भी इस समस्या को जटिल बनाती है। भारत पश्चिम में गोल्डन क्रीसेंट (अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान) और पूर्व में गोल्डन ट्रायंगल (म्यांमार, लाओस और थाईलैंड) के बीच स्थित है। ये दोनों क्षेत्र दुनिया में अफीम, हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स के सबसे बड़े उत्पादन केंद्र माने जाते हैं। इसी वजह से भारत न केवल ड्रग्स की तस्करी का ट्रांजिट रूट है, बल्कि धीरे-धीरे एक बड़ा उपभोक्ता बाजार भी बनता जा रहा है।
पारंपरिक तस्करी के अलावा अब ड्रग सिंडिकेट डार्क वेब, क्रिप्टोकरेंसी, अंतरराष्ट्रीय कूरियर सेवाओं और सीमा पार ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
देश में कितना बड़ा है नशे का संकट?
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और एम्स द्वारा कराए गए राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत में करोड़ों लोग किसी न किसी प्रकार के नशे की चपेट में हैं। देश में लगभग 16 करोड़ लोग शराब का सेवन करते हैं, जिनमें से करीब 5.7 करोड़ लोगों को डाक्टरी सहायता या काउंसलिंग की आवश्यकता है।
करीब 2.26 करोड़ लोग ओपियोइड्स, जैसे कि अफीम, हेरोइन और स्मैक का सेवन करते हैं, जबकि 3.1 करोड़ से अधिक लोग गांजा और भांग का उपयोग करते हैं। इसके अलावा लगभग 1.18 करोड़ लोग चिकित्सकीय दवाओं का दुरुपयोग कर रहे हैं। चिंताजनक बात यह भी है कि लाखों बच्चे और किशोर व्हाइटनर, थिनर और अन्य इनहेलेंट्स जैसे पदार्थों का सेवन कर रहे हैं। करीब 8.5 लाख लोग इंजेक्शन के माध्यम से नशा करते हैं, जिससे एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
सिर्फ कानून नहीं, सामाजिक सोच बदलने की कोशिश
विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि केवल तस्करों को पकड़ने से नशे की समस्या खत्म नहीं हो सकती। जब तक समाज में नशे के प्रति स्वीकार्यता कम नहीं होगी और पीड़ित व्यक्ति को अपराधी नहीं बल्कि उपचार योग्य व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है। इस अभियान में सरकार भी इसी सोच पर जोर दे रही है। यदि परिवार, स्कूल, कॉलेज और समाज मिलकर युवाओं को नशे से दूर रखने का प्रयास करें तो इसकी सामाजिक स्वीकार्यता कम की जा सकती है।
किसी भी सामाजिक अभियान की सफलता केवल उसके उद्घाटन से नहीं, बल्कि उसके निरंतर क्रियान्वयन से तय होती है। यदि 100 सप्ताह तक गतिविधियां नियमित रूप से चलती हैं, स्थानीय समुदायों की भागीदारी बनी रहती है और जागरूकता के साथ-साथ उपचार एवं पुनर्वास सेवाओं को भी मजबूत किया जाता है, तो यह पहल नशे की मांग कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल जनजागरूकता पर्याप्त नहीं होगी। इसके साथ सीमाओं पर कड़ी निगरानी, अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क पर कार्रवाई, आधुनिक साइबर निगरानी, बेहतर पुनर्वास केंद्र और युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार तथा खेल जैसी सकारात्मक संभावनाओं का विस्तार भी समान रूप से आवश्यक होगा।


