TRENDING TAGS :
जिस जनता ने बनाया बीजेपी का कवच, क्या अब वही उससे दूर हो रही है? SIR पर क्यों सड़क पर उतरी पार्टी?
BJP SIR Campaign: SIR को लेकर बीजेपी के देशव्यापी अभियान के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी के पुराने समर्थक उससे दूर हो रहे हैं? यूजीसी विवाद और एससी-एसटी एक्ट को लेकर असंतोष के बीच समझिए बीजेपी के बदलते राजनीतिक समर्थन की कहानी।
BJP SIR Campaign: 2014 के बाद देश में एक ऐसा राजनीतिक दौर शुरू हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में सिर्फ पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक ही नहीं, बल्कि ऐसे लोग भी खड़े दिखाई देते थे, जिनका बीजेपी से कोई सीधा राजनीतिक संबंध नहीं था। वे किसी पार्टी के पदाधिकारी नहीं थे, किसी संगठन के जिम्मेदार सदस्य नहीं थे, लेकिन सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक बीजेपी के पक्ष में मोर्चा संभालते दिखाई देते थे। आज सवाल यह है कि आखिर उस समर्थन में कमी क्यों दिखाई देने लगी है ?
2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, तब देश की राजनीति में सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ था, बल्कि एक नया राजनीतिक और सामाजिक विमर्श भी खड़ा हुआ था। मोदी के साथ देश का एक बड़ा वर्ग खड़ा दिखाई दे रहा था। इस समर्थन की सबसे खास बात यह थी कि इसमें केवल बीजेपी का परंपरागत वोटर शामिल नहीं था। इसमें ऐसे लोग भी थे, जो न तो बीजेपी के सदस्य थे और न ही कभी पार्टी की राजनीति का हिस्सा रहे थे ।
लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे अपने ऊपर एक ऐसी जिम्मेदारी ले ली, जो शायद किसी राजनीतिक दल के आधिकारिक प्रवक्ता की भी नहीं होती। वे सरकार के हर फैसले का बचाव करने लगे। सरकार के खिलाफ उठने वाले हर सवाल का जवाब देने लगे। सोशल मीडिया पर बहस हो, टेलीविजन की चर्चा हो, यूट्यूब हो या सड़क का कोई सार्वजनिक मंच, हर जगह ऐसे लोग मौजूद थे, जो बीजेपी के पक्ष में तर्क लेकर खड़े हो जाते थे।
इसे बीजेपी का वैचारिक समर्थन कहें या सरकार के प्रति एक विशेष प्रकार की प्रतिबद्धता, लेकिन यह भारतीय राजनीति की एक बड़ी ताकत बनकर उभरा था।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो लोग कभी बीजेपी के हर फैसले के लिए ढाल बनकर खड़े रहते थे, आज उसी पार्टी को अपने फैसलों के समर्थन में खुद सड़क पर उतरना पड़ रहा है?
इस सवाल को समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों की राजनीतिक घटनाओं को क्रमवार देखना जरूरी है।
2015 : असहिष्णुता का विमर्श और बीजेपी के समर्थन में खड़ा एक बड़ा वर्ग
2015 में देश में असहिष्णुता को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और बौद्धिक विमर्श खड़ा हुआ। लेखकों, कलाकारों और साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने की घटनाएं सामने आईं। देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक माहौल को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए।
उस समय बीजेपी के समर्थन में एक ऐसा वर्ग सामने आया, जो खुद को किसी पार्टी की राजनीति से जुड़ा हुआ नहीं मानता था। उसने इन आरोपों का जवाब दिया। उसका तर्क था कि भारत जैसे विविधता वाले देश को अचानक असहिष्णु बताना राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश है।
यहां एक बात महत्वपूर्ण थी। बीजेपी के समर्थन में खड़े सभी लोग बीजेपी के सदस्य नहीं थे, लेकिन वे सरकार के पक्ष में वैचारिक लड़ाई लड़ रहे थे।
2016 : जेएनयू विवाद और नोटबंदी, दोनों पर सरकार को मिला समर्थन
फरवरी 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कथित देशविरोधी नारों को लेकर बड़ा विवाद हुआ। अफजल गुरु की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम और उसके बाद सामने आए नारों ने देशभर में बहस छेड़ दी।
इस मामले में भी बीजेपी के समर्थकों ने सरकार का बचाव किया। राष्ट्रवाद, देशभक्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर लंबी बहस चली। सरकार के पक्ष में खड़ा एक बड़ा वर्ग इस मुद्दे को राष्ट्रवाद के नजरिये से देख रहा था।
इसी वर्ष 8 नवंबर 2016 को नरेंद्र मोदी सरकार ने नोटबंदी का ऐलान किया। देश में लंबी कतारें लगीं, लोगों को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। छोटे कारोबारियों से लेकर आम नागरिकों तक को मुश्किलें हुईं।
लेकिन उस समय भी सरकार के समर्थन में खड़े लोगों ने नोटबंदी को काले धन, भ्रष्टाचार और नकली मुद्रा के खिलाफ बड़ी लड़ाई बताया।
यानी सरकार के फैसले से परेशानी होने के बावजूद उसके पक्ष में एक बड़ा वैचारिक समर्थन मौजूद था।
2018 : एससी-एसटी एक्ट में संशोधन और एक अलग सामाजिक असंतोष
मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत गिरफ्तारी और प्रक्रिया को लेकर कुछ सुरक्षा उपाय निर्धारित किए। इसके बाद केंद्र सरकार ने अगस्त 2018 में संसद से संशोधन पारित कराकर इन प्रावधानों को प्रभावहीन करते हुए तत्काल एफआईआर और गिरफ्तारी से जुड़ी व्यवस्था बहाल की। 20 अगस्त 2018 से संशोधन लागू हुआ।
इस फैसले को लेकर देश के एक हिस्से में नाराजगी सामने आई। खासकर सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों और लोगों ने इसका विरोध किया।
यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल पैदा हुआ। बीजेपी को परंपरागत रूप से समर्थन देने वाले समाज के एक हिस्से में यह धारणा बनने लगी कि सरकार उनके सवालों और चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है।
हालांकि एससी-एसटी एक्ट का मूल उद्देश्य अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को अत्याचार से सुरक्षा देना है, लेकिन इसके प्रावधानों और उनके क्रियान्वयन को लेकर समाज में एक बहस लगातार बनी रही।
2019 : अनुच्छेद 370, राम मंदिर और सीएए-एनआरसी का विवाद
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त करने और राज्य के पुनर्गठन का फैसला किया।
इस फैसले को लेकर देश में राजनीतिक बहस हुई। विपक्ष ने सवाल उठाए, लेकिन सरकार के समर्थन में खड़ा बड़ा वर्ग इसे राष्ट्रीय एकता और अखंडता से जोड़कर देख रहा था।
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इसके बाद 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ और 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा हुई।
दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA संसद से पारित हुआ। इसके बाद एनआरसी और सीएए को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।
सरकार ने अपने फैसले का बचाव किया। उसके समर्थकों ने भी मोर्चा संभाला। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक बहसों तक सरकार के पक्ष में तर्क दिए गए।
उस समय भी बीजेपी को अपने समर्थन में खड़े होने वाले हर व्यक्ति को पार्टी का सदस्य बनाने की जरूरत नहीं थी। उसके पास एक ऐसा वैचारिक समर्थन था, जो बिना किसी आधिकारिक निर्देश के सरकार का बचाव करता था।
2020-21 : किसान आंदोलन और सरकार के पक्ष में खड़ा समर्थन
सितंबर 2020 में तीन कृषि कानून संसद से पारित हुए। इसके बाद किसानों का आंदोलन शुरू हुआ, जो लंबे समय तक चला।
आंदोलन के दौरान सरकार के खिलाफ कई आरोप लगाए गए। किसान संगठनों ने कानून वापस लेने की मांग की। सरकार के समर्थन में खड़े लोगों ने इन कानूनों को कृषि क्षेत्र में सुधार की दिशा में बड़ा कदम बताया।
आखिरकार नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।
इस पूरे घटनाक्रम में भी सरकार के पक्ष में एक बड़ा वैचारिक वर्ग मौजूद रहा।
और फिर आया 2026 का यूजीसी विवाद...
अब आइए उस घटना पर, जिसे मैं बीजेपी के परंपरागत समर्थन तंत्र में दरार के एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखता हूं।
13 जनवरी 2026 को यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से नए नियम अधिसूचित किए।
इन नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों और संगठनों ने आपत्ति जताई। उनका आरोप था कि नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा और शिकायत निवारण की व्यवस्था में असमानता है तथा सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के साथ अन्याय की आशंका है।
इसका विरोध केवल विपक्षी दलों तक सीमित नहीं रहा। बीजेपी से जुड़े कुछ पदाधिकारियों ने भी विरोध जताया और इस्तीफे तक दिए।
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी और 2012 के नियमों को फिलहाल प्रभावी रखने का आदेश दिया। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह इन नियमों पर पुनर्विचार कर रही है।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस बार विरोध का एक हिस्सा उस सामाजिक दायरे से भी आया, जो लंबे समय से बीजेपी का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है।
यानी पहली बार बीजेपी के सामने ऐसा सवाल खड़ा हुआ, जिसका जवाब केवल विपक्ष पर आरोप लगाकर देना आसान नहीं था।
अब SIR पर बीजेपी को खुद सड़क पर क्यों उतरना पड़ा?
अब आते हैं मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम पर।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर लोगों के मतदान के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। चुनाव आयोग और सरकार की तरफ से इन आरोपों का खंडन किया गया है और प्रक्रिया को मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़ा बताया गया है।
लेकिन इस बार राजनीतिक घटनाक्रम में एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दिया।
विपक्ष सड़कों पर था। इंडिया गठबंधन ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ा प्रदर्शन किया। राहुल गांधी समेत विपक्ष के नेताओं ने चुनाव आयोग और SIR पर सवाल उठाए।
इसके जवाब में बीजेपी ने भी देशव्यापी अभियान शुरू किया। वरिष्ठ नेताओं, केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को पदयात्राओं के माध्यम से जनता तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी गई।
उत्तर प्रदेश में भी 3 से 5 नवंबर तक अलग-अलग क्षेत्रों में पदयात्राओं की योजना बनाई गई। 6 नवंबर तक बीजेपी का यह अभियान और तेज होता दिखाई दिया।
अब सवाल यह है कि आखिर इस बार बीजेपी को इतना बड़ा राजनीतिक अभियान क्यों चलाना पड़ रहा है?
इससे पहले भी देश में कई ऐसे फैसले हुए, जिन पर विपक्ष ने सवाल उठाए। अनुच्छेद 370, राम मंदिर, सीएए, नोटबंदी, किसान कानून, जेएनयू विवाद और असहिष्णुता जैसे मुद्दों पर बीजेपी को लगातार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
लेकिन उस दौर में बीजेपी के समर्थन में खड़ा एक बड़ा गैर-राजनीतिक वर्ग भी मौजूद था। वह सोशल मीडिया पर सरकार का बचाव करता था, यूट्यूब चैनलों के जरिए अपना पक्ष रखता था और विपक्ष के आरोपों का जवाब देता था।
आज परिस्थितियां कुछ बदली हुई दिखाई दे रही हैं।
बीजेपी को अपने राजनीतिक और वैचारिक समर्थन के अलावा अब अपने संगठनात्मक ढांचे को भी ज्यादा सक्रिय करना पड़ रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि बीजेपी का पूरा समर्थक वर्ग उससे दूर हो गया है या पार्टी की लोकप्रियता समाप्त हो गई है। लेकिन यह जरूर सवाल खड़ा करता है कि क्या उसके पुराने समर्थक वर्ग में असहजता और नाराजगी बढ़ रही है?
आखिर इसके पीछे दो बड़े कारण क्या हो सकते हैं?
मेरी राजनीतिक समझ में इस बदलाव के पीछे दो महत्वपूर्ण कारण दिखाई देते हैं।
पहला कारण : यूजीसी के नए नियम
यूजीसी के नए नियमों ने बीजेपी के सामने एक ऐसा सामाजिक और राजनीतिक सवाल खड़ा किया, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सामान्य वर्ग के एक हिस्से में यह धारणा बनी कि सरकार उनके हितों और आशंकाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है।
इसका राजनीतिक असर केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रह सकता। क्योंकि राजनीति में समर्थन केवल चुनाव के दिन वोट देने से नहीं बनता। समर्थन तब बनता है, जब किसी व्यक्ति को यह महसूस हो कि जिस राजनीतिक दल के साथ वह खड़ा है, वह भी उसकी चिंताओं को समझता है।
दूसरा कारण : एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों को लेकर पैदा हुआ असंतोष
2018 में एससी-एसटी एक्ट में किए गए संशोधनों को लेकर सामान्य वर्ग के एक हिस्से में नाराजगी रही है। इसके बाद यूजीसी विवाद ने उस पुराने असंतोष को फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया।
यहां यह समझना जरूरी है कि एससी-एसटी एक्ट का उद्देश्य कमजोर और वंचित वर्गों को अत्याचार से सुरक्षा देना है। सवाल उसके मूल उद्देश्य पर नहीं, बल्कि उसके प्रावधानों, क्रियान्वयन और समाज के अलग-अलग वर्गों में पैदा होने वाली आशंकाओं पर राजनीतिक संवाद का है।
इन दोनों मुद्दों ने बीजेपी के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी की है, जिसमें उसका अपना समर्थक वर्ग भी सवाल पूछता दिखाई दे रहा है।
बीजेपी के सामने असली चुनौती विपक्ष नहीं, अपने समर्थकों की बदलती मनःस्थिति है!
भारतीय राजनीति में विपक्ष का विरोध कोई नई बात नहीं है। हर सरकार को विरोध का सामना करना पड़ता है। लेकिन किसी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती तब पैदा होती है, जब उसके समर्थन में खड़ा रहने वाला व्यक्ति भी सवाल पूछने लगे।
2014 के बाद बीजेपी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत केवल उसका संगठन, चुनावी मशीनरी या नेतृत्व नहीं था। उसकी ताकत वह बड़ा सामाजिक और वैचारिक वर्ग भी था, जो बिना किसी राजनीतिक पद या जिम्मेदारी के उसके पक्ष में खड़ा रहता था।
वह व्यक्ति किसी पार्टी कार्यालय में नहीं बैठता था, लेकिन सोशल मीडिया पर पार्टी का पक्ष रखता था। वह किसी चुनावी सभा में मंच पर नहीं होता था, लेकिन सार्वजनिक बहसों में सरकार की नीतियों का बचाव करता था।
आज उसी वर्ग के एक हिस्से में असहजता दिखाई दे रही है।
और शायद यही वह राजनीतिक बदलाव है, जिसे बीजेपी को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
क्योंकि चुनाव केवल बूथ मैनेजमेंट से नहीं जीते जाते। चुनाव केवल रैलियों में भीड़ जुटाने से नहीं जीते जाते। चुनाव उस भरोसे से भी जीते जाते हैं, जो जनता और राजनीतिक दल के बीच बनता है।
एक समय था जब बीजेपी के खिलाफ विपक्ष सड़क पर उतरता था और बीजेपी के समर्थन में जनता खुद तर्क लेकर खड़ी हो जाती थी। आज बीजेपी को अपने समर्थन में जनता तक पहुंचने के लिए खुद सड़क पर उतरना पड़ रहा है।
यह बदलाव महज एक राजनीतिक कार्यक्रम का विस्तार है या बीजेपी के सामाजिक समर्थन में आई किसी बड़ी दरार का संकेत, इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा।
लेकिन एक सवाल जरूर है, जिसका जवाब भारतीय जनता पार्टी को अपने भीतर तलाशना चाहिए।
जिस जनता ने 2014 के बाद हर मुश्किल राजनीतिक फैसले पर बीजेपी का बचाव किया, क्या बीजेपी ने कभी उस जनता की नाराजगी और असहजता को भी उतनी गंभीरता से सुना, जितनी गंभीरता से वह अपने राजनीतिक विरोधियों के आरोपों का जवाब देती रही?
क्योंकि राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती, जब विरोधी आपके खिलाफ बोलने लगें।
सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है, जब आपके अपने लोग चुप होने लगें !


