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Naxalwad Kya Hai: नक्सलवाद क्या है, नक्सलबाड़ी में 1967 में क्या हुआ? माओवादी और नक्सली में अंतर
Naxalwad Kya Hai: नक्सल शब्द की शुरुआत कैसे हुई? 1967 में नक्सलबाड़ी में क्या हुआ था? जानिए नक्सलवाद का इतिहास, माओवादी विचारधारा, CPI (माओवादी), अर्बन नक्सल और माओवादी व नक्सली के बीच का अंतर।
Naksalwad Kya Hai
Naxalwad Kya Hai: इस बार लाल क़िले के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो ऐसी बातें भी कहीं जिन पर गर्व व जिज्ञासा आकार लेने लगा। पहली बात यह कि केंद्र की सरकार ने लंबे समय से देश के सुदूर इलाक़ों में फैले नक्सलवाद को समाप्त कर दिया। दूसरी बात, ये कि प्रधानमंत्री ने इस पर चिंता जताई कि इसके बाद भी ‘दिमाग़ी नक्सल’ कम नहीं हो रहे हैं। ‘अर्बन नक्सल’ के बाद प्रधानमंत्री की ओर से नक्सलवाद को लेकर यह दूसरे किसी शब्द का अभिनव प्रयोग कहा जा सकता है। ऐसे में नक्सलवाद, अर्बन नक्सल और दिमाग़ी नक्सल पर ज़िक्र होना लाज़िमी हो जाता है।
‘ नक्सल’,’ नक्सली’, ‘नक्सलवाद’ और ‘माओवादी’ - भारत की राजनीति और आंतरिक सुरक्षा में ये शब्द इतने लंबे समय से इस्तेमाल होते रहे हैं कि अक्सर इन्हें एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है। लेकिन इनके बीच इतिहास, विचारधारा और संगठन के स्तर पर महत्वपूर्ण फर्क है। सबसे पहले मूल बात समझ लें - ‘नक्सल’ शब्द किसी विचारक, जाति, संगठन या विदेशी भाषा से नहीं आया। यह पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से क्षेत्र ‘नक्सलबाड़ी’ के नाम से निकला है। 1967 में वहां एक उग्र किसान विद्रोह हुआ, जिसने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की एक क्रांतिकारी धारा को जन्म दिया। उसी जगह के नाम पर विद्रोहियों को पहले ‘नक्सलबाड़ी वाले’ फिर ‘नक्सलाइट’ और अंततः हिंदी में ‘नक्सली’ कहा जाने लगा। नक्सलबाड़ी पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी उपखंड के तराई क्षेत्र में, नेपाल सीमा के निकट स्थित है। ये मेनलाइन पर एक रेलवे स्टेशन है।
जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार
लेकिन इस कहानी की शुरुआत 1967 से कुछ पहले करनी होगी। आज़ादी के बाद भारत में भूमि सुधार एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न था। जमींदारी उन्मूलन के बावजूद कई क्षेत्रों में भूमिहीन किसान, बटाईदार और आदिवासी भूमि-अधिकार की गंभीर समस्याओं से जूझ रहे थे। पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं। किसान खेती करते थे। लेकिन भूमि पर अधिकार, फसल का हिस्सा, कर्ज, जमींदार-जोतदार व्यवस्था और बेदखली के प्रश्न लगातार संघर्ष पैदा करते थे। कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर इस बात पर गहरा मतभेद था कि इन समस्याओं का समाधान संसदीय लोकतंत्र, चुनाव और क्रमिक भूमि सुधार से होगा या सशस्त्र किसान क्रांति से।
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी टूटकर दो प्रमुख हिस्सों में बँट चुकी थी - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)। लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी एक अतिवामपंथी धारा मौजूद थी, जो मानती थी कि केवल चुनाव लड़कर और सरकार में जाकर भारतीय सामाजिक व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता। इस धारा पर चीन की कम्युनिस्ट क्रांति और विशेष रूप से माओ त्से तुंग की रणनीति का गहरा प्रभाव था।
यहीं तीन नाम सामने आते हैं : चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल। चारु मजूमदार आंदोलन के प्रमुख वैचारिक सूत्रधार बने; कानू सान्याल महत्वपूर्ण संगठक और नेता थे। जंगल संथाल स्थानीय आदिवासी-किसान आधार से जुड़े सबसे प्रभावशाली नेताओं में थे। चारु मजूमदार ने उस दौर में लेखों की एक श्रृंखला लिखी, जिसे बाद में उनके समर्थकों ने ‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’ कहा। इनमें भारतीय परिस्थितियों में सशस्त्र क्रांति और माओवादी रणनीति की वकालत की गई।
1967 में नक्सलबाड़ी में वास्तव में हुआ क्या
1967 में पश्चिम बंगाल में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी, जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भी शामिल थी। इसी समय नक्सलबाड़ी क्षेत्र में भूमि और फसल अधिकार को लेकर किसान संघर्ष तेज होने लगा। स्थानीय किसान संगठनों के उग्र हिस्से ने यह कहना शुरू किया कि भूमिहीन और बटाईदार किसान भूमि पर कब्जा करें। पुराने भूमि अभिलेखों और जमींदार-जोतदार व्यवस्था को चुनौती दें और फसल तथा जमीन का नियंत्रण स्वयं लें।
मार्च, 1967 के आसपास किसान कार्रवाइयाँ तेज हुईं। किसानों ने कई जगह जमीन पर कब्जे की कोशिश की। फसल और अनाज अपने नियंत्रण में लिया और जमींदारों तथा उनके प्रतिनिधियों को चुनौती दी। संघर्ष केवल धरना या ज्ञापन नहीं रहा। हथियार के रूप में तीर-कमान, भाले और परंपरागत हथियारों का इस्तेमाल हुआ। पुलिस और प्रशासन के साथ टकराव शुरू हो गया। नक्सलबाड़ी विद्रोह को इतिहास में इसी कारण ‘सशस्त्र किसान विद्रोह’ के रूप में दर्ज किया जाता है।
पुलिस अधिकारी की ह्त्या और फायरिंग
24 मई, 1967 को एक पुलिस अधिकारी की हत्या हुई। उसके अगले दिन, 25 मई 1967, प्रसादुजोत क्षेत्र में पुलिस गोलीबारी में महिलाओं और बच्चों सहित कई ग्रामीण मारे गए। यही घटना नक्सलबाड़ी आंदोलन का निर्णायक प्रतीक बन गई। इसके बाद किसान विद्रोह तेजी से फैलने लगा। सरकार ने पुलिस कार्रवाई तेज कर दी। कुछ महीनों में स्थानीय विद्रोह दबा दिया गया। लेकिन जिस विचार को उसने जन्म दिया वह दबाया नहीं जा सका। इसलिए नक्सलबाड़ी आंदोलन का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व यह नहीं था कि वहाँ विद्रोह कितने दिन चला। असली महत्व यह था कि एक छोटे ग्रामीण संघर्ष ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर यह प्रश्न स्थायी रूप से खड़ा कर दिया कि सत्ता चुनाव से बदली जाएगी या सशस्त्र क्रांति से।
चीन ने भी दिया नक्सलबाड़ी को महत्व
1967 का समय चीन की सांस्कृतिक क्रांति का दौर था। चीनी कम्युनिस्ट नेतृत्व भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के उस हिस्से को प्रोत्साहित करता था जो माओ की क्रांति-रणनीति को सही मानता था। नक्सलबाड़ी विद्रोह को चीनी कम्युनिस्ट प्रचार माध्यमों ने उत्साह से देखा और इसे भारतीय क्रांति के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया।
यहीं से ‘माओवाद’ और ‘नक्सलवाद’ का वैचारिक संबंध स्पष्ट होता है। नक्सलबाड़ी विद्रोह के कट्टरपंथी नेतृत्व का विश्वास था कि भारत में क्रांति का रास्ता चीन की तरह ग्रामीण क्षेत्रों में किसान आधार बनाकर, सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से और धीरे-धीरे शहरों को घेरते हुए सत्ता पर कब्जा करने से निकलेगा।
यह विचार माओ त्से तुंग के उस क्रांतिकारी मॉडल से प्रभावित था, जिसमें लंबे जनयुद्ध, ग्रामीण गुरिल्ला क्षेत्र और अंततः राज्य सत्ता पर कब्जे की रणनीति शामिल थी। माओवाद स्वयं मार्क्सवाद-लेनिनवाद की चीनी परिस्थितियों में विकसित क्रांतिकारी धारा था।
नक्सलबाड़ी दब गया, लेकिन नक्सलवाद फैल गया
1967 का विद्रोह पुलिस कार्रवाई से दब गया। लेकिन उसके बाद नक्सलबाड़ी एक प्रतीक बन गया। भारत के विभिन्न हिस्सों के कट्टर वामपंथी कार्यकर्ता वहाँ की घटनाओं से प्रभावित हुए। पश्चिम बंगाल से आंदोलन बिहार, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों और दूसरे राज्यों में अलग-अलग रूपों में फैलने लगा। 1969 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी), यानी CPI(ML) का गठन हुआ। चारु मजूमदार इसके प्रमुख वैचारिक नेता बने। इस नई धारा ने भारतीय संसदीय लोकतंत्र को मूल सामाजिक परिवर्तन का रास्ता मानने से इनकार किया और सशस्त्र क्रांति को प्राथमिकता दी।
कुछ क्षेत्रों में इस रणनीति ने अत्यधिक हिंसक रूप लिया। जमींदार, कथित वर्ग-शत्रु, पुलिसकर्मी और राजनीतिक विरोधी निशाना बनाए जाने लगे। चारु मजूमदार की रणनीति में ‘वर्ग-शत्रुओं के विनाश’ की धारणा बहुत विवादास्पद बनी। इस नीति पर स्वयं नक्सली आंदोलन के भीतर बाद में तीखे मतभेद पैदा हुए।
1970 के दशक की शुरुआत तक राज्य की कठोर कार्रवाई, गिरफ्तारियों, मुठभेड़ों, नेताओं की मौत और आंतरिक वैचारिक संघर्षों से मूल नक्सली आंदोलन टूटने लगा। चारु मजूमदार का 1972 में पुलिस हिरासत में निधन हो गया। इसके बाद आंदोलन अनेक छोटे गुटों में बँट गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के अपने विश्लेषण में भी कहा गया है कि नक्सली आंदोलन जन्म के लगभग पाँच वर्षों के भीतर अनेक गुटों में विखंडित हो गया था।
लेकिन ‘नक्सली’ शब्द गायब नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे उन सभी अतिवामपंथी समूहों के लिए व्यापक राजनीतिक शब्द बन गया जो नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी परंपरा से स्वयं को जोड़ते थे और सशस्त्र संघर्ष को राज्य सत्ता बदलने का रास्ता मानते थे।
तो नक्सलवाद किसे कहते हैं?
सख्त ऐतिहासिक अर्थ में नक्सलवाद उस भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धारा को कहा जाता है जिसका राजनीतिक-सांकेतिक जन्म 1967 के नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह से हुआ। इसकी वैचारिक जड़ें मार्क्सवाद, लेनिनवाद और विशेष रूप से माओवादी क्रांतिकारी रणनीति में थीं। इसके मुख्य ऐतिहासिक तत्व रहे - भूमि और वर्ग संघर्ष, किसान तथा आदिवासी क्षेत्रों में संगठन, भारतीय राज्य व्यवस्था को मूल रूप से शोषक वर्गों की व्यवस्था मानना, संसदीय लोकतंत्र से क्रांति संभव न मानना और सशस्त्र संघर्ष को सत्ता परिवर्तन का माध्यम समझना।
लेकिन ‘नक्सलवाद’ शब्द का इस्तेमाल समय के साथ इतना व्यापक हो गया कि सभी समूह एक जैसे नहीं रहे। कुछ नक्सल परंपरा से निकले संगठन बाद में संसदीय लोकतंत्र में शामिल हो गए। चुनाव लड़ने लगे। हिंसक क्रांति छोड़ दी। दूसरी ओर कुछ समूहों ने सशस्त्र संघर्ष जारी रखा। इसलिए आज किसी भी उग्र वामपंथी व्यक्ति या गरीबों के आंदोलन को ‘नक्सली’ कह देना ऐतिहासिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से गलत होगा। नक्सलवाद का एक विशिष्ट वैचारिक और संगठनात्मक इतिहास है।
नक्सलवाद और आदिवासी प्रश्न कैसे जुड़े
नक्सलबाड़ी का मूल संघर्ष किसान और भूमि प्रश्न से जुड़ा था। लेकिन आगे चलकर नक्सली-माओवादी आंदोलन का सबसे मजबूत आधार मध्य और पूर्वी भारत के आदिवासी तथा वन क्षेत्रों में बनने लगा। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ जंगलों में आंदोलन ने लंबे समय तक आधार बनाया।
इसके पीछे केवल एक कारण नहीं था। भूमि से बेदखली, वन अधिकार, खनन, विस्थापन, गरीबी, सरकारी सेवाओं की कमी, स्थानीय प्रशासन की अनुपस्थिति, पुलिस अत्याचार के आरोप और ठेकेदार-साहूकार व्यवस्था जैसी शिकायतें कुछ क्षेत्रों में वास्तविक थीं। माओवादी संगठनों ने इन्हीं असंतोषों में संगठनात्मक आधार बनाया।
लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर रखना जरूरी है। आदिवासी होना नक्सली होना नहीं है। किसी क्षेत्र में माओवादी प्रभाव का अर्थ यह नहीं कि वहाँ रहने वाली पूरी आदिवासी आबादी माओवादी है। अनेक आदिवासी स्वयं माओवादी हिंसा के शिकार हुए हैं। और बड़ी संख्या में आदिवासी सुरक्षा बलों तथा लोकतांत्रिक राजनीति का भी हिस्सा हैं। भारत सरकार इस समस्या को आधिकारिक रूप से वामपंथी उग्रवाद कहती है और गृह मंत्रालय में इसके लिए अलग प्रभाग है। सरकार सुरक्षा कार्रवाई के साथ सड़क, दूरसंचार, शिक्षा, बैंकिंग और विकास योजनाओं को भी इससे निपटने की रणनीति का हिस्सा मानती है।
माओवादी और नक्सली में फर्क
दोनों शब्दों का संबंध है। लेकिन दोनों बिल्कुल समान नहीं हैं।’नक्सली’ एक ऐतिहासिक-भारतीय नाम है। ‘माओवादी’ एक वैचारिक नाम है। नक्सली शब्द नक्सलबाड़ी नामक स्थान से निकला। माओवादी शब्द माओ त्से तुंग की विचारधारा से निकला। इसलिए कोई व्यक्ति या संगठन माओवादी विचारों से प्रभावित हो सकता है। लेकिन उसका नक्सलबाड़ी के भारतीय आंदोलन से प्रत्यक्ष संबंध न हो। दुनिया के दूसरे देशों में माओवादी आंदोलनों के साथ ऐसा हुआ। नेपाल का माओवादी आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। उसे भारतीय अर्थ में ‘नक्सली’ कहना सही नहीं होगा क्योंकि उसका उद्गम नक्सलबाड़ी से नहीं हुआ।
भारत में स्थिति उलटी दिशा में भी जटिल है। नक्सलबाड़ी से निकली राजनीतिक परंपरा के अनेक समूह समय के साथ अलग हुए। उनमें से कुछ ने चुनावी राजनीति स्वीकार कर ली। ऐसे समूह ऐतिहासिक अर्थ में नक्सल परंपरा से निकले हैं। लेकिन आज उन्हें सीपीआई (माओवादी) के सशस्त्र माओवादियों के बराबर रखना गलत होगा।
यानी एक उपयोगी सूत्र है: नक्सलवाद = 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह से निकली भारतीय क्रांतिकारी वाम परंपरा।
माओवाद = माओ त्से तुंग से प्रेरित मार्क्सवादी-लेनिनवादी क्रांतिकारी विचारधारा और उसकी जनयुद्ध रणनीति।
लेकिन भारत में आज जब समाचारों या सरकारी भाषा में ‘माओवादी’ और ‘नक्सली’ शब्द आते हैं, तो बहुत बार दोनों से सीपीआई (माओवादी) तथा उससे जुड़े सशस्त्र कैडरों की ओर संकेत किया जाता है। इसलिए व्यवहार में दोनों शब्द काफी हद तक एक-दूसरे पर चढ़ गए हैं।
आज का सीपीआई (माओवादी) कहाँ से आया?
यह समझना जरूरी है क्योंकि 1967 के नक्सलबाड़ी और आज के माओवादी संगठन के बीच लगभग चार दशक की जटिल कहानी है। मूल सीपीआई (एमएल) के विखंडन के बाद अनेक गुट बने। इनमें दो महत्वपूर्ण सशस्त्र धाराएँ आगे चलकर प्रमुख हुईं - पीपुल्स वार समूह और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर। पहला विशेष रूप से आंध्र प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में मजबूत हुआ, जबकि दूसरा बिहार-झारखंड के इलाकों में सक्रिय था।
2004 में इन दोनों का विलय हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) बनी। यही संगठन बाद में भारत के वामपंथी उग्रवाद का सबसे प्रमुख सशस्त्र संगठन बन गया। भारत सरकार ने सीपीआई (माओवादी) को गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम के तहत प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों की सूची में रखा है। गृह मंत्रालय की प्रतिबंधित संगठनों की सूची में सीपीआई (माओवादी) दर्ज है। इसलिए वर्तमान भारतीय संदर्भ में जब सरकार ‘माओवादी हिंसा’ की बात करती है, तो मुख्यतः इसी संगठन और उससे संबद्ध संरचनाओं की बात होती है। क्या हर नक्सली माओवादी है?
आज सक्रिय सशस्त्र सीपीआई (माओवादी) स्वयं को नक्सलबाड़ी की विरासत का उत्तराधिकारी मानता है और माओवादी विचारधारा का पालन करता है। इसलिए उसके लिए दोनों शब्द लागू होते हैं। लेकिन नक्सली धारा से निकले कुछ दूसरे कम्युनिस्ट संगठनों ने संसदीय राजनीति स्वीकार कर ली। उदाहरण के लिए विभिन्न सीपीआई (एमएल) धाराओं ने समय के साथ अलग रास्ते अपनाए। कुछ चुनाव लड़ते हैं और लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय हैं। उन्हें केवल ऐतिहासिक स्रोत समान होने के कारण आज के सशस्त्र माओवादियों के साथ मिला देना गलत होगा। और विश्व स्तर पर हर माओवादी नक्सली नहीं है, क्योंकि नक्सल शब्द भारतीय स्थान-विशेष से निकला है।
नक्सलबाड़ी नाम कैसे बना?
नक्सलबाड़ी मूल रूप से उस भौगोलिक क्षेत्र का स्थानीय नाम था। आंदोलन के कारण उसका नाम प्रसिद्ध नहीं हुआ। बल्कि पहले से मौजूद नक्सलबाड़ी ने आंदोलन को अपना नाम दिया। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में सिलीगुड़ी उपखंड का यह तराई क्षेत्र नेपाल सीमा के पास है। चाय बागान, कृषि भूमि, जंगल और छोटे गांव इसकी भौगोलिक विशेषताओं में रहे हैं।
स्थानीय बोली में ‘नक्सल’ शब्द कहाँ से उपजा इसके बारे में विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज बहुत कम हैं। लोकप्रिय लेखों में विभिन्न कथाएँ मिलती हैं, लेकिन बिना ठोस स्रोत के किसी एक कथा को तथ्य कहना उचित नहीं होगा।
क्या नक्सलबाड़ी आंदोलन गरीब किसानों की स्वतःस्फूर्त बगावत था?
ये कहना पूरी तरह ठीक नहीं है। उसमें वास्तविक स्थानीय भूमि और किसान असंतोष था। लेकिन साथ ही एक संगठित क्रांतिकारी कम्युनिस्ट नेतृत्व और स्पष्ट वैचारिक कार्यक्रम भी मौजूद था। यदि केवल गरीबी विद्रोह का कारण होती तो भारत के सभी गरीब क्षेत्र नक्सलबाड़ी बन जाते। इसीलिए नक्सलवाद के उदय को दो स्तरों पर समझना चाहिए - नीचे वास्तविक सामाजिक-आर्थिक शिकायतें थीं और ऊपर एक संगठित क्रांतिकारी विचारधारा थी जिसने उन शिकायतों को राज्य सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में बदलने की कोशिश की।
यही कारण है कि नक्सलवाद पर दो परस्पर विरोधी व्याख्याएँ लंबे समय से चली आ रही हैं। एक दृष्टिकोण कहता है कि यह भूमि, गरीबी, आदिवासी अधिकार और सामाजिक अन्याय से पैदा हुआ विद्रोह था। दूसरा दृष्टिकोण कहता है कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसक क्रांति से उखाड़ने वाली माओवादी विचारधारा का परिणाम है। वास्तविक इतिहास में दोनों तत्वों को देखना पड़ता है। सामाजिक शिकायतों ने आधार उपलब्ध कराया। लेकिन माओवादी क्रांतिकारी रणनीति ने उसे एक खास राजनीतिक और सैन्य दिशा दी।
माओ की रणनीति भारत में क्या थी?
माओवादी सोच का मूल तर्क यह था कि भारत जैसे विशाल ग्रामीण देश में क्रांति शहरों से नहीं, गांवों से शुरू होगी। पहले दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में क्रांतिकारी आधार बनाए जाएँगे। वहाँ राज्य की उपस्थिति को चुनौती दी जाएगी। गुरिल्ला दस्ते बनाए जाएँगे। धीरे-धीरे “मुक्त क्षेत्र” विकसित किए जाएँगे। फिर लंबी लड़ाई के बाद गांवों से शहरों को घेरकर राज्य सत्ता हासिल की जाएगी। इसे दीर्घकालिक जनयुद्ध की रणनीति कहा जाता है।
यही बिंदु मुख्यधारा की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों और नक्सल-माओवादी धाराओं के बीच सबसे बड़ा फर्क बना। सीपीआई और सीपीआई (एम) ने अंततः भारतीय संविधान, चुनाव और संसदीय राजनीति के भीतर सत्ता परिवर्तन का रास्ता स्वीकार किया। नक्सली-माओवादी धारा का सशस्त्र हिस्सा मानता रहा कि वर्तमान राज्य व्यवस्था को चुनाव से मूल रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता।यह केवल चुनाव लड़ने या न लड़ने का छोटा मतभेद नहीं था। राज्य और लोकतंत्र की प्रकृति को लेकर मूल वैचारिक विभाजन था।
नक्सलवाद हिंसक कैसे होता गया?
1967 का संघर्ष भूमि से शुरू हुआ था, लेकिन जल्दी ही प्रश्न उठा कि ‘वर्ग-शत्रु’ कौन है और उससे कैसे निपटा जाए? चारु मजूमदार की धारा ने कुछ समय के लिए व्यक्तिगत ‘वर्ग-शत्रुओं’ के विनाश को क्रांतिकारी कार्रवाई का महत्वपूर्ण रूप माना। इससे जमींदारों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और दूसरे लोगों की हत्याएँ होने लगीं। राज्य की ओर से भी बहुत कठोर दमन हुआ। गिरफ्तारियाँ, पुलिस कार्रवाई और मुठभेड़ें बढ़ीं। हिंसा ने प्रतिक्रिया में हिंसा पैदा की।
आने वाले दशकों में माओवादी संगठनों ने पुलिस चौकियों, सुरक्षा बलों, राजनीतिक प्रतिनिधियों, सड़क और रेल ढाँचों तथा अपने कथित विरोधियों पर हमले किए। दूसरी ओर सुरक्षा बलों ने व्यापक प्रतिउग्रवाद अभियान चलाए। बीच में सबसे अधिक नुकसान कई बार उन ग्रामीण और आदिवासी नागरिकों को उठाना पड़ा जो संघर्ष क्षेत्र में रह रहे थे।
‘अर्बन नक्सल’ क्या कोई आधिकारिक कानूनी शब्द है?
यह बाद के वर्षों में राजनीतिक बहस में लोकप्रिय हुआ शब्द है। भारतीय कानून में ‘अर्बन नक्सल’ नाम की कोई अलग कानूनी श्रेणी नहीं है। किसी व्यक्ति पर कार्रवाई उसके कथित कार्य, संगठन से संबंध और संबंधित कानूनों के तहत होती है, न कि केवल इस राजनीतिक विशेषण के आधार पर। इसलिए किसी सरकार की आलोचना करने वाले, आदिवासी अधिकारों की बात करने वाले, वामपंथी बुद्धिजीवी या मानवाधिकार कार्यकर्ता को अपने-आप ‘नक्सली’ नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति का प्रतिबंधित माओवादी संगठन से वास्तविक संगठनात्मक संबंध या हिंसक गतिविधि में सहभागिता हो, तो यह केवल वैचारिक असहमति का प्रश्न नहीं रहता।यह भेद लोकतांत्रिक बहस के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
नक्सलबाड़ी आंदोलन और आज के माओवाद में कितना फर्क है?
1967 का नक्सलबाड़ी एक सीमित भौगोलिक किसान विद्रोह था। उसके पास आधुनिक सैन्य ढाँचा, व्यापक जंगल नेटवर्क या दशकों से विकसित भूमिगत संगठन नहीं था। आज का सीपीआई (माओवादी) कई पूर्ववर्ती संगठनों के दशकों लंबे विकास का परिणाम है। उसने गुरिल्ला संरचनाएँ, भूमिगत नेतृत्व और कुछ क्षेत्रों में स्थानीय संगठनों का तंत्र विकसित किया। इसलिए 1967 के किसान विद्रोह को सीधे आज के संगठन के समान मानना ऐतिहासिक गलती होगी। लेकिन वैचारिक वंशावली जुड़ी हुई है। नक्सलबाड़ी प्रतीक है। माओवादी संगठन उस क्रांतिकारी परंपरा के वर्तमान सशस्त्र उत्तराधिकारियों में प्रमुख है।
क्या नक्सलवाद आज भी 1967 जितना बड़ा है?
2026 की स्थिति में भारत सरकार का आधिकारिक दावा है कि वामपंथी उग्रवाद का भौगोलिक विस्तार और हिंसा पिछले वर्षों में काफी घटे हैं। गृह मंत्रालय की नीति सुरक्षा अभियान और विकास दोनों के माध्यम से इसे समाप्त करने पर केंद्रित है।लेकिन इस वर्तमान स्थिति और सरकारी लक्ष्यों का मूल्यांकन अलग विषय है। ऐतिहासिक रूप से इतना स्पष्ट है कि जिस आंदोलन ने कभी पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र तक प्रभाव डाला था, उसका सक्रिय सशस्त्र क्षेत्र अब काफी संकुचित हुआ है।
एक गांव का नाम पूरे आंदोलन का नाम कैसे बन गया?
यह इस कहानी का शायद सबसे अद्भुत हिस्सा है। 1967 से पहले ‘नक्सलबाड़ी’ केवल उत्तर बंगाल का एक स्थानीय भौगोलिक नाम था। कुछ महीनों के किसान विद्रोह के बाद यह नाम पहले भारतीय राजनीति, फिर विश्व की वामपंथी शब्दावली का हिस्सा बन गया।
नक्सलबाड़ी से निकला—नक्सल → नक्सली → नक्सलवाद। और इसकी विचारधारात्मक धारा जुड़ी—मार्क्स → लेनिन → माओ → भारतीय परिस्थितियों में नक्सलबाड़ी। लेकिन इन चारों को एक सीधी रेखा मानना भी सही नहीं होगा। भारतीय नक्सली आंदोलन ने समय के साथ अपने अलग सिद्धांत, संगठन और रणनीतियाँ विकसित कीं और अनेक बार स्वयं के भीतर विभाजित हुआ। पूरी कहानी का सबसे सरल निष्कर्ष यह है कि नक्सलबाड़ी एक जगह है।
नक्सलबाड़ी की कहानी का सबसे बड़ा ऐतिहासिक विरोधाभास यही है कि 1967 में उत्तर बंगाल के एक छोटे किसान संघर्ष ने कुछ ही महीनों में दम तोड़ दिया, लेकिन उस गांव का नाम भारत की सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक बहसों में जीवित है।


