NEET UG vs China Gaokao: पेपर होता है 'स्टेट सीक्रेट, चीन के इस एग्जाम के लिए युद्ध जैसे इंतज़ाम

NEET UG 2026 vs China Gaokao: गाओकाओ की तुलना अक्सर भारत की आईआईटी-जेईई और नीट से की जाती है, लेकिन इसका स्वरूप कहीं अधिक व्यापक है। परीक्षा पेपर होता है 'स्टेट सीक्रेट

Neel Mani Lal
Published on: 14 May 2026 3:05 PM IST
NEET UG 2026 vs China Gaokao
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NEET UG 2026 vs China Gaokao

NEET UG 2026 vs China Gaokao: जून का महीना चीन में बारिश और गर्मी के अलावा एक और चीज़ लेकर आता है, एक राष्ट्रीय मिशन जैसा माहौल। ये माहौल होता है दुनिया की सबसे बड़ी और शायद सबसे कठिन परीक्षा, गाओकाओ का। 2025 में, 1.33 करोड़ से अधिक छात्र इस परीक्षा में बैठे थे। यह संख्या भारत की नीट-यूजी और जेईई मेन परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों की कुल संख्या से कहीं अधिक है।

गाओकाओ परीक्षा सिर्फ विशाल आंकड़ों में ही नहीं बल्कि अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय महत्व के मामले में दुनिया में विशिष्ट स्थान रखती है।

जहाँ भारत में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा आयोजित नीट और अन्य परीक्षाएं पेपर लीक और अन्य गड़बड़ियों के चलते विवादों में घिरी रहती हैं, वहीं चीन ने गाओकाओ को मिलिट्री लेवल के एक 'फूलप्रूफ' अभियान जैसा बना दिया है। वहाँ नकल करना एक गंभीर आपराधिक जुर्म है, जिसके लिए सात साल तक की जेल हो सकती है और अन्य राष्ट्रीय शिक्षा परीक्षाओं से तीन साल का बैन लग सकता है।

स्टेट सीक्रेट है गाओकाओ का प्रश्नपत्र

गाओकाओ की सुरक्षा का पहला चरण परीक्षा से तीन महीने पहले ही शुरू हो जाता है, जब प्रश्नपत्रों बनाये जाते हैं। चीन इसे सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला मानता है। गाओकाओ के प्रश्नपत्रों को आधिकारिक तौर पर राजकीय गोपनीयता का दर्जा प्राप्त है। इन्हें तैयार करने के लिए चुने गए सीनियर शिक्षकों और प्रोफेसरों को पूर्ण एकांतवास में भेज दिया जाता है। ये जगहें अक्सर सुदूर सैन्य शिविरों या कड़ी सुरक्षा वाली जेल होती हैं जहां परिंदा भी पर न मार सके। इस दौरान उनका इंटरनेट और बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह काट दिया जाता है। ये एक्सपर्ट्स परीक्षा समाप्त होने तक वहीं बंद रहते हैं ।

पेपर छपाई का काम और भी संवेदनशील होता है। पेपर की छपाई ऐसी सुरक्षा में होती है जैसी करेंसी छापने में कई जाती है। प्रिंटिंग 24 घंटे सीसीटीवी कैमरों और सशस्त्र गार्डों की निगरानी में रहती है। एक बार छप जाने के बाद इन पेपरों को किसी बैंक कैश वैन से कहीं ज्यादा सुरक्षित तरीके से भेजा जाता है। सैटेलाइट ट्रैकिंग और जीपीएस सिस्टम से लैस बख्तरबंद ट्रक, पुलिस और सैन्य बलों के सशस्त्र एस्कॉर्ट के साथ इन्हें गंतव्य तक ले जाते हैं।

परीक्षा केंद्रों पर पहुँचने के बाद, पेपर एक विशेष 'स्टील-रिइन्फोर्स्ड' कमरे में रखे जाते हैं, जिसे खोलने के लिए तीन अलग-अलग अधिकारियों की चाबियों की जरूरत होती है। निगरानी में तैनात गार्ड को परीक्षा शुरू होने तक वहीं रहना और सोना पड़ता है।

ड्रोन, एआई और फेस रिकॉग्निशन

परीक्षा वाले दिन जब छात्र केंद्रों पर पहुँचते हैं, तो उनका सामना एक किले जैसी सुरक्षा से होता है। 2025 में, चीनी अधिकारियों ने अब तक के सबसे कड़े एंटी-चीटिंग उपाय लागू किए। परीक्षा केंद्रों पर इंटेलिजेंट सिक्योरिटी गेट्स लगे होते हैं, जो न केवल मोबाइल फोन और स्मार्टवॉच, बल्कि बाल की क्लिप जैसी छोटी धातु की वस्तुओं और छिपे हुए ईयरपीस का भी पता लगा सकते हैं।

लेकिन असली खेल तकनीक का है। 2025 में पहली बार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया गया। परीक्षा हॉल के अंदर एक रीयल-टाइम इंटेलिजेंट सर्विलांस सिस्टम लगा होता है जो छात्रों की गतिविधियों पर लगातार नज़र रखता है। यह सिस्टम स्वचालित रूप से फुसफुसाहट, असामान्य नज़रें घुमाने, या किसी वस्तु को आगे बढ़ाने जैसी हरकतों को पकड़ कर अलार्म बजा देता है। पहचान सत्यापन के लिए फेशियल रिकॉग्निशन, फिंगरप्रिंटिंग और यहाँ तक कि आइरिस स्कैन का उपयोग किया जाता है, ताकि किसी दूसरे छात्र के बैठने की संभावना ही खत्म हो जाए। ये जाँच परीक्षा से पहले, दौरान और बाद में कई बार की जाती है।

एग्जाम के दौरान आसमान में ड्रोन उड़ते हैं, जो केंद्रों के आसपास किसी भी संदिग्ध सिग्नल या संचार पर नज़र रखते हैं, और जैमर्स पूरे इलाके में मोबाइल सिग्नल को ब्लॉक कर देते हैं ।

जब पूरा देश थम जाता है

गाओकाओ के दिन परीक्षा केंद्रों के पास निर्माण कार्य पर पूरी तरह रोक लगा दी जाती है। वाहनों के हॉर्न बजाने पर पाबंदी लगा दी जाती है, और सड़कों को विशेष रूप से 'साइलेंस ज़ोन' में बदल दिया जाता है। छात्रों को समय पर केंद्र पहुँचाने के लिए विशेष लेन, मुफ्त राइड और अतिरिक्त बसें व सबवे सेवाएँ चलाई जाती हैं । स्कूलों के बाहर, परीक्षा केंद्रों की दीवारों, शौचालयों और कूड़ेदानों तक की जाँच की जाती है।

सुनयुंग: दक्षिण कोरिया का इम्तिहान

चीन का यह कड़ा रवैया अकेला नहीं है। उसका पड़ोसी दक्षिण कोरिया भी अपनी विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा, सुनयुंग के लिए कुछ ऐसा ही इंतज़ाम करता है, जो शायद दुनिया में सबसे अनोखा है। हर साल नवंबर में होने वाली इस आठ घंटे की मैराथन परीक्षा में लगभग 5 लाख से अधिक छात्र बैठते हैं। यह परीक्षा न केवल शीर्ष विश्वविद्यालय में प्रवेश, बल्कि करियर, सामाजिक प्रतिष्ठा और यहाँ तक कि अच्छे वैवाहिक जीवन का प्रवेश द्वार भी मानी जाती है ।

सुनयुंग के दिन दक्षिण कोरिया सचमुच थम जाता है। अंग्रेजी सुनने की परीक्षा के 35 मिनट के दौरान, पूरे देश में सभी विमानों की उड़ान और लैंडिंग पर रोक लगा दी जाती है। पायलटों को निर्देश दिया जाता है कि वे हवा में ही चक्कर लगाते रहें, ताकि ज़मीन पर कोई ध्वनि प्रदूषण न हो। केवल सैन्य और आपातकालीन उड़ानों को ही छूट होती है। इस एक परीक्षा के कारण 140 से अधिक उड़ानों का समय बदला जाता है। स्टॉक मार्केट एक घंटा देरी से खुलता है। सार्वजनिक कार्यालय और बैंक सड़कों पर ट्रैफिक कम करने के लिए अपने कर्मचारियों को एक घंटा देरी से बुलाते हैं। पुलिस गाड़ियाँ देरी से आने वाले छात्रों को सायरन बजाकर परीक्षा केंद्र तक पहुँचाने के लिए सड़कों पर तैनात रहती हैं। परीक्षा केंद्रों के बाहर, जूनियर छात्र हाथों में तख्तियाँ लेकर खड़े होते हैं, नारे लगाते हैं और अपने सीनियर्स का उत्साहवर्धन करते हैं।

गाओकाओ बनाम भारतीय परीक्षाएं

गाओकाओ की तुलना अक्सर भारत की आईआईटी-जेईई और नीट से की जाती है, लेकिन इसका स्वरूप कहीं अधिक व्यापक है। जहाँ जेईई एडवांस्ड भौतिकी और गणित की क्षमता की गहराई को परखता है, वहीं गाओकाओ मानसिक सहनशक्ति और पाठ्यक्रम की व्यापकता की चरम परीक्षा लेता है। यह परीक्षा सिर्फ इंजीनियरिंग या मेडिकल के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान, कला और ह्यूमैनिटीज सहित सभी ग्रेजुएट पढ़ाई के लिए एकमात्र प्रवेश द्वार है। नौ घंटे से अधिक की यह परीक्षा दो से तीन दिनों तक चलती है, जिसमें चीनी भाषा, गणित और विदेशी भाषा अनिवार्य होती हैं ।

शीर्ष विश्वविद्यालयों, जैसे सिंघुआ या पेकिंग यूनिवर्सिटी, में प्रवेश दर 0.1% से भी कम है। यही कारण है कि छात्र इसकी तैयारी में दो से पाँच साल तक लगा देते हैं। जहाँ भारत में परीक्षा प्रणाली लगातार विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही है, वहीं ये देश दिखाते हैं कि जब एक परीक्षा को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का विषय बना दिया जाए, तो उसकी पवित्रता किस हद तक सुरक्षित रखी जा सकती है।

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