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दिल्ली हाईकोर्ट में नेहा बोरा के समर्थन में उतरे वकील, बोले- रिजीम चेंज की बात करना गलत नहीं
नेहा बोरा के 10 हजार रुपये के बॉन्ड नोटिस पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। वकील ने कहा कि लोकतंत्र में ‘रिजीम चेंज’ की बात गलत नहीं, जबकि ASG ने विरोध में दलील दी।
Neha Bora News: सत्ता परिवर्तन की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में कानूनी बहस के दौरान लोकतंत्र, विरोध-प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था का मुद्दा आमने-सामने आ गया। AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि लोकतंत्र में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन की बात करना गलत नहीं है। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने कहा कि सत्ता परिवर्तन का रास्ता वोट से होकर गुजरता है, न कि राजधानी में कथित तौर पर उपद्रवी तत्वों के जमावड़े से। यह बहस नेहा बोरा की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान हुई, जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने और शांति बनाए रखने संबंधी नोटिस को चुनौती दी है।
‘लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की बात करने में कुछ गलत नहीं’
सुनवाई के दौरान सरकार का पक्ष रख रहे ASG चेतन शर्मा ने अदालत का ध्यान उन दस्तावेजों की ओर दिलाया, जिनमें नेहा बोरा के सीजेपी नेताओं और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के साथ एक सभा में शामिल होने का उल्लेख है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, ASG ने अदालत से संबंधित दस्तावेजों के सीरियल नंबर 11 और 12 देखने को कहा।
चेतन शर्मा ने सभा में कथित तौर पर दिए गए बयान का हवाला देते हुए कहा, “ये रिजीम चेंज की लड़ाई है और हम रिजीम चेंज करवाकर रहेंगे।” उन्होंने दलील दी कि नेहा बोरा भी इस सभा का हिस्सा थीं।
इस पर नेहा बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की बात करने में कुछ भी गलत नहीं है। इस दौरान अदालत ने सवाल किया कि क्या उसे इस मुद्दे पर जाने की जरूरत है।
नेहा बोरा के वकील ने क्या कहा?
नेहा बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में दलील दी कि किसी सरकार या व्यवस्था को बदलने की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में आता है। उन्होंने ‘रिजीम चेंज’ के नारे को अपने आप में गलत ठहराए जाने पर सवाल उठाया और कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की बात करना कोई गैरकानूनी गतिविधि नहीं है। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी पूछा कि क्या मामले में इस पहलू पर विचार करना जरूरी है। इस तरह नेहा बोरा के वकील ने सभा में कथित तौर पर दिए गए राजनीतिक बयान और कानून-व्यवस्था भंग होने की आशंका के आधार पर की गई निवारक कार्रवाई के बीच अंतर पर जोर दिया।
ASG बोले- सत्ता परिवर्तन वोट से होगा, जमावड़ों से नहीं
केंद्र सरकार की ओर से दलील देते हुए ASG चेतन शर्मा ने कहा कि सत्ता परिवर्तन चुनाव में वोट के जरिए होता है, न कि दिल्ली में कथित तौर पर उपद्रवी तत्वों के इकट्ठा होने से। उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 का हवाला देते हुए कहा कि कानून के तहत इन प्रावधानों को साथ में लागू किया जा सकता है।
ASG के मुताबिक, संबंधित अधिकारियों को शांति भंग होने की आशंका थी और इसी आधार पर निवारक कार्रवाई की गई। उन्होंने अदालत से मामले को केवल तकनीकी पहलुओं तक सीमित न रखने की अपील की।
चेतन शर्मा ने आशंका जताई कि समय रहते कदम नहीं उठाए जाते तो राजधानी में अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती थी। उन्होंने जोर दिया कि कार्रवाई का उद्देश्य किसी घटना के घटित होने के बाद कदम उठाना नहीं, बल्कि संभावित अशांति को पहले ही रोकना था।
नेहा बोरा ने CJP से खुद को अलग किया
नेहा बोरा की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में उस आरोप का भी जवाब दिया जिसमें कहा जा रहा था की नेहा CJP के प्रोटेस्ट में उनकेब बुलाने पर ही साथ गई थी। इस नेहा बोरा की ओर से कहा गया वह CJP प्रोटेस्ट का हिस्सा नहीं थी और नहीं ही CJP के बुलाने पर गई थी। नेहा के वकील ने कोर्ट को बताया कि वह किसी दूसरे संगठन के बुलाने पर कनॉट प्लेस गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, नेहा बोरा की ओर से CJP से किसी संबंध को भी खारिज किया गया। यानी कोर्ट को बताया गया कि नेहा बोरा का CJP से कोई लेना देना नहीं है।
10 हजार रुपये के बॉन्ड वाले नोटिस को दी चुनौती
नेहा बोरा ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के उस नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें उन्हें 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने और शांति बनाए रखने की शर्त पूरी करने को कहा गया है।
याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह सवाल उठा कि क्या संभावित शांति भंग होने की आशंका के आधार पर अधिकारियों की कार्रवाई उचित थी। एक तरफ सरकार ने कथित सभा और उसमें दिए गए बयानों के आधार पर निवारक कार्रवाई का बचाव किया, तो दूसरी तरफ नेहा बोरा की ओर से दलील दी गई कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग करना अपने आप में गलत नहीं है।
इस तरह सुनवाई में राजनीतिक विरोध और लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ-साथ सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन की शक्तियों के इस्तेमाल का मुद्दा भी केंद्र में रहा।


