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नेहा बोरा को राहुल गांधी क्यों दे रहे इतनी तवज्जो? इसके पीछे छिपा 2027 के लिए कांग्रेस का सीक्रेट प्लान
नेहा बोरा की राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ मौजूदगी ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। उत्तराखंड से जुड़ी नेहा बोरा को लेकर अटकलें हैं कि कांग्रेस उन्हें 2027 विधानसभा चुनाव से पहले युवा चेहरे के तौर पर आगे ला सकती है।
Neha Bora: दिल्ली की राजनीति में इन दिनों एक नाम लगातार चर्चा में है नेहा बोरा। न वह कांग्रेस की किसी बड़ी पदाधिकारी के तौर पर जानी जाती हैं और न ही अभी किसी चुनावी पद की दावेदार हैं, लेकिन 12 और 13 अक्टूबर को जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर इंडिया गठबंधन के मार्च में नेहा बोरा राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ चलती दिखाई दीं।
अगले दिन विपक्षी नेताओं की बैठक और प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिला। राहुल गांधी का खुद पीछे खड़े होकर उन्हें माइक सौंपना भी चर्चा का विषय बन गया। अब सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस के पास NSUI और यूथ कांग्रेस जैसे अपने छात्र और युवा संगठन होने के बावजूद नेहा बोरा को इतना प्रमुख स्थान क्यों दिया जा रहा है?
इसके पीछे राहुल गांधी का सीक्रेट प्लान क्या है?
दरअसल, अगले साल 2027 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव होने वाला है और हरीश रावत पर भ्रष्टाचार के आरोप और संगठन में अंदरूनी कलह समेत कई कारणों से यहां कांग्रेस संगठन में कमजोरी देखने को मिली है। ऐसे में नेहा बोरा मूल रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की रहने वाली हैं, जबकि उनका परिवार खटीमा (उधम सिंह नगर) में रहता है। माना जा रहा है कि उत्तराखंड चुनाव में कांग्रेस नेहा बोरा को लेकर बड़ा दाव खेल सकती है।
खटीमा से दिल्ली तक का सफर और उत्तराखंड कांग्रेस की चुनौती
खटीमा उत्तराखंड की राजनीति का काफी अहम और चर्चित इलाका है। यह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का गृह क्षेत्र और पूर्व निर्वाचन क्षेत्र भी रहा है। फिलहाल उत्तराखंड में कांग्रेस संगठनात्मक रूप से कमजोर स्थिति में है। ऐसे में राहुल गांधी खटीमा की इस बेटी को राष्ट्रीय स्तर पर तैयार करके उत्तराखंड की सत्ता को चुनौती देने वाला नया चेहरा बना सकते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में ठाकुर समीकरण की अहमियत
उत्तराखंड की सियासत में लंबे समय से ब्राह्मण और ठाकुर समुदायों के बीच राजनीतिक समीकरणों की चर्चा होती रही है। मौजूदा भाजपा नेतृत्व में शामिल पुष्कर सिंह धामी भी ठाकुर समाज से आते हैं। ऐसे में ठाकुर बिरादरी से ताल्लुक रखने वाली नेहा बोरा इस पारंपरिक जातीय समीकरण में अहम भूमिका निभा सकती हैं। उनके पिता सेना में कर्नल या अधिकारी रहे हैं, जिससे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि उत्तराखंड के सैनिक परिवारों से भी जुड़ती है। एक सैनिक की बेटी, जो JNU से पीएचडी कर रही है और हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में आक्रामक तरीके से अपनी बात रखती है, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पारंपरिक नेताओं के सामने नई चुनौती पेश कर सकती है।
नेहा बोरा की एंट्री से ठाकुर वोटों का गणित कैसे बदल सकता है?
उत्तराखंड की राजनीति में ठाकुर यानी राजपूत समुदाय की आबादी करीब 35 से 38 प्रतिशत बताई जाती है। इसे राज्य के सबसे बड़े और निर्णायक वोट बैंकों में गिना जाता है। यही वजह है कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में प्रभावशाली ठाकुर नेताओं को आगे रखने की होड़ दिखाई देती है। इसी बीच JNU की रिसर्च स्कॉलर और सैनिक परिवार से आने वाली नेहा बोरा की चर्चा ने इस समीकरण को और दिलचस्प बना दिया है। खटीमा के ठाकुर परिवार से जुड़ी नेहा की युवाओं के बीच पकड़ को देखते हुए ऐसी संभावना जताई जा रही है कि कांग्रेस उन्हें उत्तराखंड में पार्टी के नए चेहरे के रूप में आगे बढ़ा सकती है।
Gen Z वोटरों की आवाज और रोजगार का मुद्दा
उत्तराखंड की आबादी और मतदाता सूची में Gen Z यानी 15 से 29 साल के युवाओं की हिस्सेदारी करीब 25 से 30 प्रतिशत बताई जाती है। यह ऐसा वर्ग है, जो चुनावी नतीजों पर असर डालने की क्षमता रखता है। इस बार राज्य के युवाओं के लिए राष्ट्रवाद और पारंपरिक राजनीति से ज्यादा रोजगार की कमी, पेपर लीक की घटनाएं और अंकिता भंडारी केस जैसे सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अहम बनकर सामने आए हैं। कांग्रेस नेहा के इसी जमीनी संघर्ष के सहारे राज्य के लाखों युवाओं की नाराजगी को अपने समर्थन में बदलने की कोशिश कर सकती है।
वामपंथी छात्र राजनीति और कांग्रेस की भविष्य की रणनीति
नेहा बोरा फिलहाल ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ी हैं। इसके बावजूद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की ओर से उन्हें लगातार मंच पर जगह मिलना इस संभावना को जन्म देता है कि कांग्रेस भविष्य में उन्हें उत्तराखंड की मुख्यधारा की राजनीति में आगे ला सकती है। अगर नेहा आगे चलकर चुनावी राजनीति में उतरती हैं, तो वह उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में युवाओं, महिलाओं और सैनिक परिवारों के बीच कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस पाने में मदद कर सकती हैं।
क्या नेहा बोरा उत्तराखंड की नई राजनीतिक आवाज बन सकती हैं?
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ नेहा बोरा की मौजूदगी को एक संभावित राजनीतिक अवसर के तौर पर देखा जा सकता है। वह छात्र राजनीति से निकली हैं, आंदोलनों में सक्रिय रही हैं और Gen Z के बीच चर्चा में हैं। इन खूबियों के चलते कांग्रेस उन्हें अपने व्यापक युवा संपर्क अभियान में जगह दे सकती है।


