"मोदी ही हैं न जो Iran के गुण गा रहे...", तो खामेनेई की मौत 'चुप' क्यों? भारत की 'विदेश नीति' पर नेहा सिंह राठौर ने उठाये तीखे सवाल

Neha Singh Rathore: इस घटना को लेकर विश्व भर के कई नेता अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, तब भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इस मामले में स्पष्ट बयान न देना सोशल मीडिया पर इस वक़्त गए गंभीर रू से चर्चा का केन्द्र बना हुआ है।

Priya Singh Bisen
Published on: 2 March 2026 12:50 PM IST (Updated on: 2 March 2026 1:02 PM IST)
Neha Singh Rathore
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Neha Singh Rathore (photo: social media)

Neha Singh Rathore: भारत और पश्चिम एशिया की राजनीति बीते कुछ दिनों में एक नए मोड़ पर आ गई है, जब अमेरिका-इज़रायल द्वारा ईरान पर भयंकर रूप से सैन्य हमला किया गया और इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भू-राजनीतिक तनाव को इतना गंभीर बना दिया है कि विश्व के कई भागों से बेहद आपत्तीजनजक प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।

इस घटना को लेकर विश्व भर के कई नेता अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, तब भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इस मामले में स्पष्ट बयान न देना सोशल मीडिया पर इस वक़्त गए गंभीर रू से चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। कई नेटिज़न्स और आलोचक यह सवाल खड़े कर रहे हैं कि क्या भारत वास्तव में अपने 'दोस्त' देशों के प्रति स्थिर और साफ़ रुख रख पा रहा है?

नेहा सिंह राठौर का सोचिए मीडिया पोस्ट

भोजपुरी की जानी-मानी लोकगायका और अपनी बात दमदार तरीके से रखने वाली नेहा सिंह राठौर अब फिर से चर्चा में आ गयी हैं। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में नेहा सिंह ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ईरान को मित्र मानते रहे हैं, लेकिन जब अमेरिका और इज़रायल जैसे शक्तिशाली देशों ने ईरान और उसके शीर्ष नेता पर हमला किया, तब भारत की तरफ़ से श्रद्धांजलि या कड़ी प्रतिक्रिया का शब्द भी नहीं निकला। यह टोन सोशल मीडिया यूज़र्स द्वारा भारत की विदेश नीति और उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करने का कारण बन रहा है।

वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति पर सवाल ?

वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति परिपक्व और संतुलित कूटनीति के रूप में देखी जाती रही है, लेकिन इस विवादित परिस्थिति में यह संतुलन बेहद चुनौतीपूर्ण नजर आता है। भारत ने आधिकारिक बयान में कहा है कि वह स्थिति को लेकर "संयम, कूटनीति और सभी पक्षों से तनाव कम करने" का आह्वान करता है। हालांकि, देश के राजनीतिक विरोधी दलों का मानना है कि यह 'चुप्पी' भारत को कमजोर दिखाने का काम कर रही है और उसकी विदेश नीति की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय ?

इसे लेकर अब राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत को हमेशा दो मुश्किल विकल्पों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है - एक तरफ अमेरिका और इज़रायल जैसी शक्तियों के साथ सुरक्षा और रणनीतिक संबंध, और दूसरा ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय हितों के लिए ईरान जैसे देशों से रिश्ते। भारत की विदेश नीति का यह संतुलन ही उसके लिए मुश्किल स्थिति पैदा कर रहा है, क्योंकि किसी भी साफ़ रुख से उसे एक बड़े गुट से दूरी बनाने का बड़ा ख़तरा उठाना पड़ेगा।

हालाँकि, भारत सरकार ने अमेरिकी-इज़रायली हमले की स्पष्ट रूप से निंदा नहीं की, लेकिन उसने साफ कहा है कि "सभी पक्षों को युद्ध को बढ़ावा देने के बजाय बातचीत और बातचीत के लिए तैयार होना चाहिए।" इसी वजह से कई विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की मौन रणनीति संयम की नीति का अहम भाग' है - ताकि किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष को और भड़कने से रोका जा सके।

इस बीच, देश में विभिन्न शहरों और समुदायों से विरोध प्रदर्शन की भी खबरें सामने आ रही हैं, जिनमें लोग ईरान पर हमले और दुनिया भर की कूटनीतिक प्रतिक्रियाओं को लेकर अपनी नाराज़गी जता रहे हैं।

यदि मौजूदा हालातों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए तो।.... इस परिप्रेक्ष्य में भारत की विदेश नीति को लेकर एक बड़ा बहस पहली बार इतनी खुलकर सामने आई है - क्या भारत का मौन रुख उसकी मजबूती का संकेत है, या फिर उसकी विश्वसनीयता पर संदेह पैदा कर रहा है?

Priya Singh Bisen

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