भारत 2047 में दुनिया को क्या दे सकता है? विकास से आगे नई भारतीय सभ्यता दृष्टि की पूरी कहानी

India New Civilization Vision: 2047 तक भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं, बल्कि आधुनिकता का अपना मॉडल कैसे बना सकता है? जानिए संविधान, विज्ञान, तकनीक, सामाजिक न्याय, विविधता, पर्यावरण और मानव गरिमा को जोड़ने वाली भारत की नई सभ्यता दृष्टि।

Yogesh Mishra
Published on: 27 Sept 2026 6:26 PM IST
India New Civilization Vision Viksit Bharat 2 Explained
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India New Civilization Vision Viksit Bharat 2 Explained 

India New Civilization Vision: भारत के भविष्य को केवल इस सवाल से नहीं समझा जा सकता कि 2047 तक उसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हो जाएगी, प्रति व्यक्ति आय कितनी बढ़ेगी, कितने शहर विश्वस्तरीय होंगे, कितनी सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियां लगेंगी या उसकी सेना और अंतरिक्ष क्षमता कितनी आगे पहुंच जाएगी। इससे बड़ा सवाल यह है कि यदि भारत आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनता है तो वह किस तरह की सभ्यता और किस तरह की आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करेगा?

अमेरिका ने बीसवीं सदी में उदार लोकतंत्र, बाजार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उपभोक्तावाद और तकनीकी आधुनिकता का प्रभावशाली मॉडल प्रस्तुत किया। सोवियत संघ ने राज्य-नियोजित समाजवाद का विकल्प रखा। चीन ने इक्कीसवीं सदी में केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था, बाजार समर्थित राज्य व्यवस्था, विनिर्माण शक्ति, विशाल आधारभूत ढांचे और तकनीकी क्षमता को जोड़कर अपना अलग रास्ता बनाया।

भारत यदि केवल इनमें से किसी मॉडल की नकल करते हुए समृद्ध होता है तो वह बड़ी शक्ति जरूर बन सकता है, लेकिन उसकी सभ्यतागत पहचान अलग से नहीं बनेगी। भारत की वास्तविक संभावना तब पैदा होगी जब वह अपनी प्राचीन सभ्यतागत स्मृति, आधुनिक संविधान, विज्ञान और तकनीक, सामाजिक न्याय, विविधता, प्रकृति के साथ संतुलन और मानव गरिमा को जोड़कर आधुनिक जीवन का अपना रास्ता तैयार करे।

यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि भारत के पास कोई तैयार सभ्यता मॉडल पहले से मौजूद है, जिसे बस दुनिया के सामने रख देना है। भारतीय सभ्यता में महान दार्शनिक परंपराएं हैं तो जाति, अस्पृश्यता, लैंगिक असमानता और सामाजिक बहिष्कार का इतिहास भी है। सह-अस्तित्व और बहुलता की परंपराएं हैं तो संघर्ष और हिंसा के दौर भी रहे हैं। इसलिए नई भारतीय सभ्यता दृष्टि अतीत की वापसी नहीं हो सकती। उसे अतीत से मूल्य लेने होंगे, लेकिन आधुनिक संविधान की कसौटी पर। यही इस पूरी अवधारणा का मूल है। भारत को प्राचीन और आधुनिक में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। उसे यह दिखाना है कि हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता लोकतंत्र, विज्ञान, समानता और तकनीक के साथ खुद को नए रूप में कैसे ढाल सकती है।

राष्ट्र से बड़ी है सभ्यता की यात्रा

भारत को समझने के लिए राष्ट्र और सभ्यता के अंतर को समझना जरूरी है। आधुनिक भारतीय गणराज्य अपनी वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में 1950 में आया, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यतागत निरंतरता इससे हजारों वर्ष पुरानी है। वैदिक परंपराओं से लेकर बौद्ध और जैन चिंतन, उपनिषद, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक और चार्वाक जैसे दर्शन, भक्ति और सूफी परंपराएं, अनेक जनजातीय संस्कृतियां, द्रविड़ भाषायी संसार, संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल, फारसी और बाद की भारतीय भाषाओं की परंपराएं, भारत किसी एक विचार से बनी सभ्यता नहीं है। उसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषता शायद यही है कि यहां कई बार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग विचार एक ही सांस्कृतिक भूगोल में साथ मौजूद रहे।

इसलिए भारतीय सभ्यता दृष्टि को किसी एक धर्म, भाषा, जाति या ऐतिहासिक काल तक सीमित करना भारत की वास्तविक जटिलता को छोटा कर देगा। आधुनिक भारत की सभ्यतागत शक्ति उसकी विविधता को राजनीतिक एकता के साथ जोड़ने की क्षमता में हो सकती है। इसी कारण संविधान इस नई सभ्यता दृष्टि का केंद्रीय आधार होना चाहिए। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे मूल्यों के जरिए संविधान प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक नागरिकता के बीच पुल बनाता है।

व्यक्ति भी महत्वपूर्ण, समाज भी

पश्चिमी आधुनिकता की बड़ी उपलब्धियों में व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा शामिल है। भारतीय सामाजिक परंपराओं में परिवार, समुदाय और सामाजिक जिम्मेदारी को अधिक महत्व मिलता रहा है। भारत की नई दृष्टि इन दोनों को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय जोड़ सकती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना समुदाय दमनकारी हो सकता है। दूसरी ओर सामाजिक जिम्मेदारी के बिना बहुत ज्यादा व्यक्तिवाद अकेलेपन, उपभोक्तावाद और सामाजिक टूटन को बढ़ा सकता है। इसलिए एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत होगी जिसमें व्यक्ति स्वतंत्र हो लेकिन समाज से कटा हुआ न हो। परिवार मजबूत हो लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता को निगले नहीं। समुदाय जीवित रहें लेकिन नागरिक अधिकार समुदाय की अनुमति पर निर्भर न हों। विवाह, लैंगिक समानता, जाति, धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और पारिवारिक अधिकार जैसे मुद्दे इसी संतुलन की कठिन परीक्षा हैं। नई सभ्यता दृष्टि की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि भारत इन सवालों को आधुनिक नागरिक अधिकारों और सामाजिक संबंधों के बीच कैसे संतुलित करता है।

अधिकार के साथ जिम्मेदारी, लेकिन अधिकारों की कीमत पर नहीं

भारतीय चिंतन में कर्तव्य का विचार पुराना है। आधुनिक लोकतंत्र मुख्यतः अधिकारों की भाषा में विकसित हुआ। दोनों जरूरी हैं। स्वच्छ हवा नागरिक का अधिकार है, लेकिन प्रदूषण कम करना समाज की जिम्मेदारी भी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अधिकार है, लेकिन जानबूझकर झूठ और हिंसा फैलाने से बचना सामाजिक जिम्मेदारी है। सार्वजनिक संपत्ति नागरिक की है, इसलिए उसकी रक्षा करना भी नागरिक जिम्मेदारी है। लेकिन यहां संवैधानिक सावधानी जरूरी है। कर्तव्य की भाषा का इस्तेमाल नागरिक अधिकारों को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता। नागरिक का राज्य के प्रति दायित्व है, लेकिन राज्य का नागरिक के प्रति संवैधानिक दायित्व भी उतना ही स्पष्ट है। इसलिए नई भारतीय दृष्टि का सूत्र अधिकार बनाम कर्तव्य नहीं, बल्कि अधिकार और जिम्मेदारी का संतुलन होना चाहिए।

विकास का अर्थ केवल जीडीपी नहीं

आधुनिक दुनिया ने आर्थिक उत्पादन को सफलता का सबसे बड़ा पैमाना बना दिया है। जीडीपी जरूरी है। गरीबी कम करने, अस्पताल बनाने, विश्वविद्यालयों को मजबूत करने, रक्षा क्षमता बढ़ाने, आधारभूत ढांचा खड़ा करने और सामाजिक सुरक्षा देने के लिए संपन्न अर्थव्यवस्था चाहिए। इसलिए गरीबी को किसी रोमानी आदर्श में बदलना भी सही नहीं होगा। लेकिन यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी हो जाए और उसकी हवा सांस लेने लायक न रहे, नदियां प्रदूषित हों, भूजल घटता जाए, बच्चे लगातार तनाव में रहें, बुजुर्ग अकेले पड़ जाएं, परिवार कर्ज में डूबे रहें और सामाजिक विश्वास कमजोर होता जाए तो केवल जीडीपी उसे सफल समाज नहीं बना सकती। भारतीय परंपरा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के अलग-अलग आयामों के रूप में देखने की परंपरा रही है। इससे आधुनिक आर्थिक नीति का कोई सीधा सूत्र निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन एक उपयोगी संकेत जरूर मिलता है कि मानव जीवन केवल आर्थिक उपभोग से बड़ा है।

भारत की नई सभ्यता दृष्टि आर्थिक समृद्धि को नकारेगी नहीं। बल्कि वह समृद्धि को मानव कल्याण, समय, रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक सम्मान के व्यापक ढांचे में रख सकती है।

सबसे कमजोर व्यक्ति की कसौटी

किसी भी विकास मॉडल की असली परीक्षा समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में दिखाई देती है। गांधी की अंतिम व्यक्ति की कसौटी, विनोबा भावे का सर्वोदय, आंबेडकर की सामाजिक समानता, राममनोहर लोहिया का विशेष अवसर और दीनदयाल उपाध्याय का अन्त्योदय अलग-अलग वैचारिक परंपराओं से आते हैं, लेकिन इनके बीच एक साझा सवाल दिखाई देता है: समाज अपनी सबसे कमजोर इकाई के साथ कैसा व्यवहार करता है? यही भारतीय विकास दृष्टि को केवल बाजार केंद्रित या केवल राज्य केंद्रित व्यवस्था से अलग करने का आधार बन सकता है। इसका अर्थ बाजार या निजी उद्यम को कमजोर करना नहीं है। सवाल यह है कि बाजार से पैदा हुई संपत्ति और राज्य की क्षमता मिलकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पानी, आवास, डिजिटल पहुंच और सम्मानजनक रोजगार की न्यूनतम सामाजिक नींव कितनी व्यापक बना पाती है।

‘विकसित भारत 2047’ के सरकारी विमर्श में भी समावेशन, युवा, तकनीक और अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की बात की जाती है। इसे अभी उपलब्धि के प्रमाण के रूप में नहीं बल्कि घोषित नीति-दिशा के रूप में देखना अधिक उचित होगा। असली कसौटी उसके परिणाम होंगे।

तकनीक मनुष्य के ऊपर नहीं, मनुष्य के लिए

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में यही भारत की सबसे बड़ी सभ्यतागत परीक्षाओं में से एक हो सकती है। अमेरिका में तकनीकी शक्ति मुख्य रूप से निजी कंपनियों और बाजार आधारित नवाचार से विकसित हुई। चीन ने विशाल डिजिटल क्षमता को मजबूत राज्य व्यवस्था के साथ जोड़ा। भारत ने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे के जरिए एक अलग प्रयोग किया है, जिसमें डिजिटल प्रणालियों को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आधारभूत व्यवस्था की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश हुई है।

यह प्रयोग भारत को दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखने का अवसर देता है। क्या डिजिटल समाज का भविष्य केवल दो तरह का होगा, एक ओर बड़ी कंपनियों का निगरानी आधारित बाजार और दूसरी ओर राज्य की व्यापक निगरानी? या ऐसा तीसरा रास्ता भी संभव है जिसमें डिजिटल पहचान, भुगतान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता नागरिकों को बेहतर सेवाएं दें, लेकिन उनके डेटा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भी रक्षा हो? यदि भारत यह संतुलन व्यवहार में बना पाता है तो उसकी डिजिटल व्यवस्था का महत्व केवल तकनीकी नहीं रहेगा। लेकिन यदि तकनीक नागरिक को सुविधा देने के बजाय उसे लगातार मापने, वर्गीकृत करने और नियंत्रित करने लगे तो वही व्यवस्था उलटा असर भी पैदा कर सकती है। इसलिए भविष्य की भारतीय सभ्यता में तकनीकी क्षमता के साथ डिजिटल गरिमा भी जरूरी होगी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बीच मानवीय बुद्धि

कृत्रिम बुद्धिमत्ता ज्ञान के निर्माण और इस्तेमाल का तरीका बदल रही है। मशीनें लिख रही हैं, अनुवाद कर रही हैं, कोड बना रही हैं, रोग पहचानने में सहायता कर रही हैं और वैज्ञानिक अनुसंधान में भी भूमिका बढ़ा रही हैं।ऐसे समय में शिक्षा का अर्थ केवल जानकारी याद करना नहीं रह सकता।भारतीय दार्शनिक परंपराओं में ज्ञान को सूचना से बड़ा माना गया। ज्ञान के साथ विवेक, अनुभव, संवाद और आत्मपरीक्षण की भी बात हुई। आधुनिक भारत इन विचारों को वैज्ञानिक शिक्षा के विकल्प के रूप में नहीं बल्कि उसके साथ जोड़ सकता है।एक विद्यार्थी को गणित, जीवविज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ इतिहास, दर्शन, तर्क, नैतिकता, साहित्य और कला की भी जरूरत होगी।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहुविषयी शिक्षा, भारतीय भाषाओं, कला-संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपराओं को अधिक स्थान देने की दिशा रखती है। लेकिन असली परीक्षा नीति दस्तावेज की नहीं, शिक्षा की गुणवत्ता की होगी।भारतीय ज्ञान का अध्ययन आलोचनात्मक और शोध आधारित होना चाहिए। न अपनी विरासत के प्रति हीन भावना हो और न हर प्राचीन दावे को बिना प्रमाण के सत्य मान लेने की प्रवृत्ति।

भारतीय भाषाएं आधुनिक ज्ञान की भाषाएं बनें

कोई भी सभ्यता अपनी भाषाओं को केवल भावनाओं और संस्कृति तक सीमित करके लंबे समय तक बौद्धिक रूप से स्वतंत्र नहीं रह सकती। अंग्रेजी भारत के लिए विज्ञान, वैश्विक संपर्क और अवसर की महत्वपूर्ण भाषा है। उसे हटाना न व्यावहारिक है और न जरूरी। समस्या अंग्रेजी का होना नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब भारतीय भाषाएं उच्च ज्ञान की दुनिया से कट जाती हैं।

यदि भौतिकी, चिकित्सा, कानून, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्थशास्त्र और दर्शन का गंभीर ज्ञान मुख्यतः अंग्रेजी में उपलब्ध रहेगा तो करोड़ों भारतीय ज्ञान के उपभोक्ता तो बनेंगे, लेकिन उसके बराबर के भागीदार नहीं बन पाएंगे। भारत को अंग्रेजी सहित दुनिया की भाषाओं के लिए खुला रहते हुए हिंदी, तमिल, बांग्ला, मराठी, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, असमिया, उड़िया, पंजाबी, उर्दू और दूसरी भारतीय भाषाओं में आधुनिक ज्ञान का विशाल संसार तैयार करना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यहां बड़ा अवसर दे सकती है। बेहतर मशीन अनुवाद, आवाज आधारित तकनीक और भारतीय भाषाओं के सक्षम भाषा मॉडल विकसित होते हैं तो पहली बार ज्ञान का भाषायी लोकतंत्रीकरण बड़े पैमाने पर संभव हो सकता है।

प्रकृति पर विजय नहीं, प्रकृति के साथ समृद्धि

औद्योगिक सभ्यता का एक बड़ा विचार था कि प्रकृति को नियंत्रित करके उसके संसाधनों से मानव समृद्धि पैदा की जाए। इस सोच ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में कमी, जल संकट और प्रदूषण ने उसकी सीमाएं भी दिखा दीं। भारतीय परंपराओं में नदियों, वृक्षों, पर्वतों और पशुओं को सांस्कृतिक महत्व देने की लंबी परंपरा रही है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्राचीन भारत आधुनिक अर्थों में पर्यावरण के प्रति आदर्श समाज था। लेकिन प्रकृति को केवल कच्चे माल के रूप में न देखने का सांस्कृतिक आधार जरूर मौजूद था। नई भारतीय दृष्टि इस सांस्कृतिक भावना को आधुनिक विज्ञान से जोड़ सकती है। स्वच्छ ऊर्जा, जल संरक्षण, टिकाऊ खेती, सार्वजनिक परिवहन, कम संसाधनों में बेहतर जीवन, जैव विविधता और ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें वस्तुओं का दोबारा इस्तेमाल हो, इस दिशा के हिस्से हो सकते हैं। लेकिन यहां भी नारों से ज्यादा परिणाम महत्वपूर्ण होंगे। भारत की पर्यावरणीय विश्वसनीयता उसकी नदियों, शहरों की हवा, भूजल, जंगल और ऊर्जा व्यवस्था में दिखाई देगी।

विविधता को समस्या नहीं, ताकत बनाना

भारत में सैकड़ों भाषाएं, अनेक धर्म, जातियां, क्षेत्रीय संस्कृतियां और जीवन पद्धतियां हैं। आधुनिक राष्ट्रों ने कई बार राष्ट्रीय एकता के लिए एक भाषा, एक संस्कृति और एक साझा पहचान को प्राथमिकता दी। भारत का अनुभव इससे अलग रहा है। एक व्यक्ति तमिल और भारतीय दोनों हो सकता है। नागा और भारतीय भी। बंगाली और भारतीय भी। मुस्लिम और भारतीय भी। हिंदू और भारतीय भी। सिख और भारतीय भी। यह केवल सांस्कृतिक विशेषता नहीं, बल्कि भविष्य की दुनिया के लिए भी महत्वपूर्ण अनुभव हो सकता है। प्रवास और वैश्वीकरण के कारण कई समाज तेजी से बहुसांस्कृतिक हो रहे हैं। भारत का अनुभव उनके लिए उपयोगी हो सकता है, यदि वह विविधता के साथ लोकतांत्रिक एकता बनाए रखने में सफल रहता है। लेकिन यहां भी दावा और वास्तविकता अलग रखनी होगी। सांप्रदायिक तनाव, जातिगत भेदभाव, जातीय संघर्ष और भाषायी विवाद भारत में मौजूद हैं। इसलिए नई सभ्यता दृष्टि की सफलता इन्हें छिपाने में नहीं बल्कि संवैधानिक संस्थाओं और सामाजिक संवाद के जरिए कम करने में होगी।

लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं

भारत की आधुनिक सभ्यता दृष्टि का केंद्रीय आधार लोकतंत्र होना चाहिए। लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच वर्ष में मतदान करना नहीं है। स्वतंत्र न्यायपालिका, विधायिका की जवाबदेही, स्वतंत्र और बहुल मीडिया, नागरिक स्वतंत्रता, संघवाद, स्थानीय शासन, सूचना तक पहुंच और शांतिपूर्ण असहमति भी लोकतंत्र के जरूरी हिस्से हैं। भारत के लिए लोकतंत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दुनिया को यह अनुभव दिखा सकता है कि विशाल जनसंख्या, अनेक भाषाओं और धर्मों वाला समाज, आर्थिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक शासन साथ-साथ चल सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र को स्थायी उपलब्धि मान लेना भी सही नहीं होगा। हर पीढ़ी को संस्थाओं की स्वतंत्रता, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और नागरिक अधिकारों की रक्षा करनी होती है। यहीं सत्ता और संस्थाओं की मजबूती के बीच फर्क समझना जरूरी है। शक्तिशाली सरकार तेजी से निर्णय ले सकती है, लेकिन लंबी अवधि की सभ्यता को ऐसी मजबूत संस्थाओं की जरूरत होती है जो अलग-अलग सरकारों के आने-जाने के बाद भी विश्वसनीय बनी रहें।

जाति से भागकर कोई नई सभ्यता नहीं बन सकती

भारत की सभ्यता पर गंभीर विमर्श जाति के सवाल को किनारे रखकर पूरा नहीं हो सकता। एक ओर भारतीय दर्शन में मानव एकता, करुणा और सार्वभौमिक चेतना की बातें मिलती हैं। दूसरी ओर सामाजिक जीवन में जन्म आधारित ऊंच-नीच और अस्पृश्यता जैसी व्यवस्थाएं लंबे समय तक मौजूद रहीं। आधुनिक संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया और समान नागरिकता का आधार दिया, लेकिन सामाजिक असमानता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसलिए भारत की नई सभ्यता दृष्टि को अतीत की महानता और अतीत की अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं, दोनों को स्वीकार करना होगा। आंबेडकर का महत्व यहीं असाधारण हो जाता है। सभ्यता को बचाने का अर्थ उसकी हर पुरानी व्यवस्था को बचाना नहीं है। सभ्यता जीवित तभी रहती है जब उसमें खुद को सुधारने की क्षमता हो। यदि भारत जन्म से मिलने वाली सामाजिक हैसियत के प्रभाव को कम करके अवसर, शिक्षा और व्यक्तिगत क्षमता को अधिक महत्व देने में सफल होता है तो यह उसकी सबसे बड़ी सभ्यतागत उपलब्धियों में से एक होगी।

स्त्री की स्वतंत्रता भी सभ्यता की कसौटी

किसी समाज की सभ्यता का स्तर इस बात से भी समझा जा सकता है कि वहां स्त्री को अपने जीवन, शिक्षा, काम, संपत्ति, विवाह, मातृत्व और सार्वजनिक भूमिका पर कितना वास्तविक अधिकार प्राप्त है। भारत में महिला शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक भागीदारी में प्रगति हुई है, लेकिन रोजगार, घरेलू काम, सुरक्षा, पोषण और संपत्ति जैसे क्षेत्रों में असमानताएं अब भी मौजूद हैं। नई सभ्यता दृष्टि में स्त्री को केवल परिवार की संरक्षक या संस्कृति की वाहक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वह स्वयं स्वतंत्र नागरिक है। भारतीय परिवार व्यवस्था की सकारात्मक सामाजिक ताकत तभी भविष्य में टिक सकती है जब उसके भीतर स्त्री और पुरुष दोनों की गरिमा और अवसर अधिक समान हों।

गांव को संग्रहालय नहीं, भविष्य की इकाई बनाना होगा

गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी। आज भारत को उसी आर्थिक ढांचे में वापस ले जाना न संभव है और न जरूरी। लेकिन विकेंद्रीकरण का मूल विचार आज भी बेहद आधुनिक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तेज इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, दूर से काम, टेलीमेडिसिन, स्थानीय विनिर्माण और विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा ऐसी संभावनाएं पैदा कर रहे हैं जिनमें आर्थिक अवसर केवल महानगरों में केंद्रित रहना जरूरी नहीं है। भविष्य का गांव पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं होना चाहिए। वह ऐसा स्थान हो सकता है जहां आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं, तेज इंटरनेट, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और स्थानीय उद्यम मौजूद हों, लेकिन प्रकृति और समुदाय से उसका संबंध भी बना रहे। सरकारी ‘विकसित भारत 2047’ विमर्श में कृषि, गांव, टिकाऊ खेती, परंपरा और आधुनिक तकनीक को जोड़ने की बात भी सामने आती रही है। इसे फिलहाल नीति-दिशा के रूप में देखना चाहिए। इसकी सफलता का फैसला वास्तविक परिणाम करेंगे।

दुनिया के लिए प्रभुत्व नहीं, साझेदारी

यदि भारत बड़ी शक्ति बनता है तो उसकी सभ्यता दृष्टि की सबसे कठिन परीक्षा विदेश नीति में होगी। लगभग हर बड़ी शक्ति अपने आदर्शों की बात करती है। लेकिन शक्ति मिलने के बाद उसके व्यवहार में राष्ट्रीय हित प्रमुख हो जाते हैं। इसलिए भारत का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तभी विश्वसनीय वैश्विक विचार बन सकता है जब उसके व्यवहार में साझेदारी, संप्रभु समानता और विकासशील देशों की आवाज के लिए जगह दिखाई दे। भारत के पास इसके लिए ऐतिहासिक अनुभव है। औपनिवेशिक अतीत, गुटनिरपेक्ष आंदोलन की विरासत, वैश्विक दक्षिण के साथ संबंध और पश्चिम तथा गैर-पश्चिम दोनों से संवाद की क्षमता उसके पक्ष में मौजूद पूंजी हैं। लेकिन जैसे-जैसे भारत शक्तिशाली होगा, उसके आदर्शों और उसके व्यवहार के बीच अंतर भी दुनिया अधिक ध्यान से देखेगी। नई भारतीय दृष्टि को इसलिए केवल ‘विश्वगुरु’ बनने की भाषा से आगे जाना होगा। भारत ज्ञान साझा करने वाला हो सकता है, लेकिन उपदेश देने वाला नहीं। अपनी संस्कृति पर आत्मविश्वास रखने वाला हो सकता है, लेकिन दूसरी संस्कृतियों को कमतर मानने वाला नहीं। अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाला हो सकता है, लेकिन वैश्विक सार्वजनिक हितों में योगदान देने वाला भी।

योग और आयुर्वेद से आगे की सॉफ्ट पावर

भारत की सॉफ्ट पावर की चर्चा अक्सर योग, आयुर्वेद, भोजन, सिनेमा, अध्यात्म और त्योहारों तक सीमित रहती है। ये सभी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कोई नई सभ्यता दृष्टि केवल सांस्कृतिक चीजों के निर्यात से नहीं बनती। अमेरिका का प्रभाव केवल हॉलीवुड से नहीं बना। उसके विश्वविद्यालय, विज्ञान, उद्योग, तकनीकी संस्थान और राजनीतिक विचार भी उसकी वैश्विक शक्ति का हिस्सा बने। आधुनिक भारत को भी ऐसी संस्थाएं बनानी होंगी जहां दुनिया पढ़ना, शोध करना, इलाज कराना, तकनीक विकसित करना और विचारों पर बहस करना चाहे। नालंदा की स्मृति महत्वपूर्ण है, लेकिन इक्कीसवीं सदी का सवाल यह है कि क्या भारत दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में अपनी जगह बना सकता है। शून्य के इतिहास का गौरव महत्वपूर्ण है, लेकिन आज का सवाल यह है कि क्या भारत क्वांटम विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में नया ज्ञान पैदा कर रहा है।

आयुर्वेद की परंपरा महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन आधुनिक दुनिया में उसकी स्वीकार्यता वैज्ञानिक परीक्षण, प्रमाण और गुणवत्ता से ही बढ़ेगी। सभ्यता का आत्मविश्वास अतीत की उपलब्धियों को बार-बार दोहराने से नहीं, नई उपलब्धियां पैदा करने से आता है।

भारतीय आधुनिकता कैसी दिख सकती है?

कल्पना कीजिए 2047 के उस भारत की जहां दुनिया की अग्रणी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियां हिंदी, तमिल, बांग्ला और दर्जनों भारतीय भाषाओं में समान दक्षता से काम करती हैं। गांव के बच्चे को महानगर जैसी डिजिटल शिक्षा मिलती है। दूरदराज के इलाके में डॉक्टर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से रोग पहचानता है। शहरों का पानी बड़े पैमाने पर दोबारा इस्तेमाल होता है। बिजली का बड़ा हिस्सा स्वच्छ स्रोतों से आता है। किसान उपग्रह और मौसम के आंकड़ों के आधार पर सिंचाई तय करता है। विश्वविद्यालय वेदांत और क्वांटम भौतिकी दोनों पढ़ाते हैं, लेकिन दोनों को उनकी अपनी ज्ञान पद्धतियों और प्रमाण की कसौटियों के साथ। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, बौद्ध विहार और किसी भी आस्था से दूर रहने वाला नागरिक समान संवैधानिक सुरक्षा में रहता है।

जाति व्यक्ति का भविष्य तय नहीं करती। स्त्री को सुरक्षा और स्वतंत्रता में से किसी एक को नहीं चुनना पड़ता। तकनीक नागरिक की सेवा करती है, उसकी निजता खत्म नहीं करती। और आर्थिक सफलता का अंतिम पैमाना केवल अरबपतियों की संख्या नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार भी होता है। ऐसा भारत न प्राचीन भारत की पुनरावृत्ति होगा और न अमेरिका, यूरोप या चीन की प्रतिलिपि। यही भारतीय आधुनिकता की सबसे दिलचस्प संभावना हो सकती है।

रास्ते में पांच बड़े अंतर्विरोध होंगे

इस सभ्यता दृष्टि की सफलता अपने आप नहीं होगी। भारत को कई गहरे विरोधाभासों के बीच रास्ता निकालना होगा। तेज आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संतुलन बनाना होगा। तकनीकी सुविधा के साथ नागरिक निजता बचानी होगी। सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ वैज्ञानिक आलोचनात्मकता बनाए रखनी होगी। बहुसंख्यक सांस्कृतिक परंपरा और समान नागरिकता के बीच संवैधानिक संतुलन कायम रखना होगा। राष्ट्रीय एकता को मजबूत करते हुए संघीय और क्षेत्रीय विविधताओं के लिए पर्याप्त जगह रखनी होगी। इनके साथ जाति, लैंगिक असमानता, शिक्षा की गुणवत्ता और आर्थिक विषमता जैसी पुरानी चुनौतियां भी रहेंगी। किसी एक पक्ष को खत्म कर देना समाधान नहीं है। विकास रोककर पर्यावरण नहीं बचाया जा सकता और पर्यावरण नष्ट करके विकास लंबे समय तक टिक नहीं सकता। तकनीक छोड़ना संभव नहीं, लेकिन निजता छोड़ना भी उचित नहीं। संस्कृति छोड़कर आधुनिक होना जरूरी नहीं और विज्ञान छोड़कर संस्कृति बचाना संभव नहीं। राष्ट्रीय एकता चाहिए, लेकिन विविधता मिटाकर नहीं। इसी संतुलन को साधने की क्षमता नई भारतीय सभ्यता की असली परीक्षा होगी।

2047 केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, सभ्यतागत मोड़ भी हो सकता है

भारत की 2047 की विकास यात्रा में अर्थव्यवस्था, तकनीक, युवा, उत्पादकता, आधारभूत ढांचा और संस्थागत बदलाव महत्वपूर्ण होंगे। लेकिन विकसित देश बनना और विकसित सभ्यता बनना एक ही बात नहीं है। विकसित अर्थव्यवस्था के लिए पूंजी, उत्पादकता, तकनीक, उद्योग और आधारभूत ढांचा चाहिए। विकसित सभ्यता के लिए इनके साथ न्याय, ज्ञान, करुणा, स्वतंत्रता, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और मजबूत संस्थाएं भी चाहिए। 2047 में भारत स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा। वह क्षण केवल यह गिनने का अवसर नहीं होगा कि 1947 के बाद अर्थव्यवस्था कितनी बढ़ी। इससे बड़ा सवाल यह होगा कि एक शताब्दी के लोकतांत्रिक प्रयोग के बाद भारत ने मनुष्य और समाज के बारे में कौन-सा विचार विकसित किया।

भारत दुनिया को आखिर क्या नया दे सकता है?

शायद भारत को दुनिया को कोई एक नया ‘वाद’ देने की जरूरत ही नहीं है। बीसवीं सदी विचारधाराओं की सदी थी। पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद और इनके बीच संघर्षों ने दुनिया की राजनीति को आकार दिया। इक्कीसवीं सदी को शायद किसी एक सर्वग्रासी विचारधारा की जरूरत नहीं है। उसे उन चीजों के बीच संतुलन खोजने की जरूरत है जिन्हें आधुनिक दुनिया ने अलग-अलग खानों में बांट दिया है। भारत की संभावित सभ्यता दृष्टि इसलिए संयोजन की दृष्टि हो सकती है। विज्ञान के साथ अध्यात्म, बाजार के साथ सामाजिक न्याय, व्यक्ति के साथ समुदाय, अधिकार के साथ जिम्मेदारी, विकास के साथ प्रकृति, तकनीक के साथ मानव गरिमा, राष्ट्र के साथ विश्व, परंपरा के साथ आलोचना और विविधता के साथ एकता। इनमें से कोई भी विचार अकेले भारत की खोज नहीं है। इन्हें विशिष्ट रूप से भारतीय बताना भी ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। भारत की विशिष्टता शायद इन विचारों के स्वामित्व में नहीं, बल्कि इन्हें अपने विशाल, विविध और लोकतांत्रिक समाज में एक साथ व्यवहार में उतारने की क्षमता में हो सकती है।

नई सभ्यता की घोषणा नहीं की जाती, उसे जीवन में सिद्ध किया जाता है

भारत खुद को विश्वगुरु घोषित कर दे, इससे दुनिया उसे विश्वगुरु नहीं मान लेगी। कोई सभ्यता विज्ञापन से आदर्श नहीं बनती। दुनिया तब देखेगी जब भारतीय विश्वविद्यालय ज्ञान के बड़े केंद्र बनेंगे। जब भारतीय शहर रहने लायक होंगे। जब गांव सम्मानजनक जीवन देंगे। जब विज्ञान मौलिक खोज करेगा। जब तकनीक गरीब की क्षमता बढ़ाएगी। जब स्त्री को स्वतंत्र और सुरक्षित जीवन मिलेगा। जब जाति का असर लगातार घटेगा। जब अलग आस्था रखने वाला व्यक्ति समान रूप से सुरक्षित महसूस करेगा। जब न्याय समय पर मिलेगा। जब नदियां साफ होंगी। जब आर्थिक शक्ति के साथ नागरिक गरिमा भी बढ़ेगी।

यही भारत की नई सभ्यता दृष्टि की सबसे कठिन और शायद सबसे सुंदर संभावना है। भारत को अतीत और आधुनिकता में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। उसे अपने अतीत की श्रेष्ठ चेतना को आधुनिक संविधान, विज्ञान और समानता की कसौटी पर कसकर भविष्य की ओर ले जाना है। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होगी कि वह अमेरिका या चीन से अधिक शक्तिशाली बन गया। उससे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि उसने यह दिखा दिया कि कोई देश एक साथ समृद्ध, वैज्ञानिक, तकनीकी, लोकतांत्रिक, बहुलतावादी, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और मानवीय हो सकता है।और अगर भारत ऐसा कर पाया, तो उसकी सभ्यतागत शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं होगा कि दुनिया भारतीय नारे बोल रही है। असली प्रमाण यह होगा कि दुनिया भारत के अनुभव को देखकर एक सवाल पूछ रही होगी: क्या आधुनिकता का एक अधिक मानवीय रास्ता भी संभव है?

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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