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NITI Aayog Education Report 2026: 1.19 लाख स्कूलों में अंधेरा, बेटियों के लिए टॉयलेट तक नहीं... नीति आयोग की रिपोर्ट ने खोली शिक्षा व्यवस्था की पोल
NITI Aayog Education Report 2026: नीति आयोग की रिपोर्ट ने सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत दिखाई
NITI Aayog Education Report 2026 India Education System Exposed
NITI Aayog Education Report 2026: सुबह-सुबह स्कूल ड्रेस पहनकर निकलने वाले लाखों बच्चों की आंखों में बड़े सपने होते हैं। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई इंजीनियर तो कोई शिक्षक। लेकिन सोचिए, जब वही बच्चा ऐसे स्कूल पहुंचे जहां पंखा नहीं चलता, पीने का पानी नहीं है, खास तौर से लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं और पढ़ाने के लिए शिक्षक भी न हों, तब उन सपनों का क्या होता होगा?
देश में शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ने सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत सामने रख दी है। रिपोर्ट बताती है कि देश के लाखों बच्चे आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं। कहीं बिजली नहीं है, कहीं पानी नहीं, तो कहीं बच्चियों के लिए शौचालय तक उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि कई राज्यों में बच्चे पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़ रहे हैं। इसी के साथ नीति आयोग की रिपोर्ट सरकारी मुहिम 'बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ' जैसी पहल पर सवालिया निशान खड़ा कर रही है।
भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था मजबूत होना बेहद जरूरी है। अगर करोड़ों बच्चों को अच्छी और समान शिक्षा नहीं मिलेगी तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा।
नीति आयोग की यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं दिखाती, बल्कि उस सच्चाई को सामने लाती है जिसे गांव-कस्बों के लाखों बच्चे हर दिन जी रहे हैं। स्कूल सिर्फ इमारत नहीं होते, वे बच्चों के भविष्य की नींव होते हैं। अगर यही नींव कमजोर होगी तो आने वाला कल भी कमजोर पड़ सकता है।
स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का गंभीर संकट
नीति आयोग की 'भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली' रिपोर्ट के मुताबिक देश के 1.19 लाख स्कूलों में अभी भी बिजली की सुविधा नहीं है। हालांकि पिछले 10 वर्षों में स्कूलों में बिजली की उपलब्धता 55 प्रतिशत से बढ़कर 91.9 प्रतिशत तक पहुंची है, लेकिन इतने बड़े आंकड़े यह बताते हैं कि अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए कार्यात्मक शौचालय नहीं हैं। वहीं 61,540 स्कूलों में उपयोग योग्य शौचालय तक नहीं हैं। यह स्थिति ग्रामीण इलाकों में ज्यादा गंभीर है, जहां कई बच्चियां सिर्फ शौचालय की कमी के कारण स्कूल जाना छोड़ देती हैं। इसके अलावा 14,505 स्कूल ऐसे हैं जहां पीने के पानी की सुविधा नहीं है। 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की व्यवस्था भी नहीं है। कोरोना महामारी के बाद स्वच्छता और साफ-सफाई को लेकर जागरूकता बढ़ी, लेकिन स्कूलों की यह तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली है।
बेटियों की पढ़ाई पर सबसे ज्यादा असर
विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कूलों में शौचालय और पानी जैसी सुविधाओं की कमी का सबसे बड़ा असर लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है। किशोरावस्था में पहुंचने के बाद कई बच्चियां स्कूल छोड़ देती हैं क्योंकि स्कूलों में सुरक्षित और साफ शौचालय उपलब्ध नहीं होते। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई परिवार बेटियों की पढ़ाई को लेकर पहले से ही असमंजस में रहते हैं। ऐसे में जब स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं तो परिवार बच्चियों को पढ़ाने के बजाय घर पर रोक लेना बेहतर समझते हैं। यही कारण है कि माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते लड़कियों की संख्या कम होने लगती है।
एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हजारों स्कूल
रिपोर्ट में शिक्षक संकट की तस्वीर भी बेहद चिंताजनक बताई गई है। देश में करीब 1.04 लाख स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है। इनमें लगभग 89 प्रतिशत स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाना पड़ता है। ऐसे में पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होना तय है। कई जगह शिक्षक को पढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक काम, मिड-डे मील और सरकारी योजनाओं की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। शिक्षकों की कमी का असर सीधे बच्चों की सीखने की क्षमता पर पड़ता है। राष्ट्रीय स्तर पर पहले भी कई सर्वे बता चुके हैं कि पांचवीं कक्षा के कई बच्चे दूसरी या तीसरी कक्षा की किताबें ठीक से नहीं पढ़ पाते।
बिहार में सबसे ज्यादा खाली पद
रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक शिक्षकों के रिक्त पदों में बिहार सबसे ऊपर है। बिहार में 2,08,784 पद खाली हैं। इसके बाद झारखंड में 80,341 और मध्य प्रदेश में 47,122 पद रिक्त हैं। इतने बड़े पैमाने पर शिक्षकों की कमी का असर शिक्षा व्यवस्था पर साफ दिखाई देता है। कई स्कूलों में विज्ञान और गणित जैसे विषयों के शिक्षक नहीं हैं। इससे बच्चों की बुनियादी शिक्षा कमजोर रह जाती है।
ग्रामीण इलाकों में अक्सर ऐसा भी देखने को मिलता है कि शिक्षक दूर-दराज के स्कूलों में नियमित नहीं पहुंचते। परिवहन की कमी और खराब आधारभूत ढांचे के कारण भी शिक्षा प्रभावित होती है।
पांचवीं के बाद बच्चे क्यों छोड़ रहे स्कूल?
रिपोर्ट में ड्रॉप-आउट यानी पढ़ाई बीच में छोड़ने की समस्या को भी गंभीर बताया गया है। पश्चिम बंगाल में कक्षा 5 के बाद ड्रॉप-आउट दर 20 प्रतिशत है। अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में यह 18.3 प्रतिशत जबकि असम में 17.5 प्रतिशत दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं। गरीब परिवारों के बच्चे कम उम्र में काम पर लग जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में माध्यमिक स्कूल दूर होने से भी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। लड़कियों के मामले में सुरक्षा और शौचालय की कमी बड़ी वजह बनती है।
कई राज्यों में डिजिटल शिक्षा और स्मार्ट क्लास की बातें तो हो रही हैं, लेकिन जब स्कूलों में बिजली तक नहीं है, तब तकनीकी शिक्षा का सपना अधूरा ही नजर आता है।
शिक्षा पर खर्च बढ़ा, लेकिन चुनौतियां बरकरार
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने शिक्षा पर खर्च बढ़ाने का दावा किया है। समग्र शिक्षा अभियान, मिड-डे मील योजना, डिजिटल शिक्षा और नई शिक्षा नीति जैसी योजनाएं लागू की गईं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ योजनाएं शुरू करना काफी नहीं है, बल्कि उनकी निगरानी और सही क्रियान्वयन ज्यादा जरूरी है। कई बार बजट जारी होने के बावजूद सुविधाएं स्कूलों तक समय पर नहीं पहुंच पातीं।
मिड डे मील के साथ घोर लापरवाही
जिस मिड डे मील योजना को बच्चों के पोषण और बेहतर शिक्षा के लिए शुरू किया गया था, वही अब कई जगह डर और लापरवाही की पहचान बनती जा रही है। देश के अलग-अलग राज्यों से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जहां स्कूलों में बच्चों को परोसे गए खाने में कभी चूहा, कभी छिपकली तो कभी सांप जैसे जीव मिलने के मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं ने न सिर्फ अभिभावकों की चिंता बढ़ाई है, बल्कि सरकारी स्कूलों की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि मिड डे मील सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि करोड़ों गरीब बच्चों के लिए पोषण का सबसे बड़ा सहारा है। ऐसे में खाने की गुणवत्ता और स्वच्छता में जरा सी लापरवाही भी बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। कई मामलों में खाना खाने के बाद बच्चों की तबीयत बिगड़ने, उल्टी-दस्त और अस्पताल में भर्ती होने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं।
स्कूलों में भोजन बनाने और स्टोर करने की व्यवस्था को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। कहीं रसोईघर की साफ-सफाई ठीक नहीं मिलती तो कहीं खाद्य सामग्री खुले में रखी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित निरीक्षण, खाद्य गुणवत्ता की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय किए बिना ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल होगा।
अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को स्कूल भेजते समय उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि वहां मिलने वाला भोजन सुरक्षित और पौष्टिक होगा। लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाओं ने इस भरोसे को कमजोर किया है। अब जरूरत सिर्फ जांच और कार्रवाई की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को सुधारने की है ताकि बच्चों की थाली में पोषण पहुंचे, खतरा नहीं।
नई शिक्षा नीति के सामने बड़ी चुनौती
देश में नई शिक्षा नीति 2020 लागू की गई है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को आधुनिक और व्यावहारिक बनाना है। लेकिन जब स्कूलों में शिक्षक, बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं ही नहीं होंगी, तब नई शिक्षा नीति के लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा।
नई नीति में डिजिटल लर्निंग, स्किल एजुकेशन और आधुनिक लैब्स की बात की गई है। लेकिन ग्रामीण भारत के हजारों स्कूल अभी भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
गांव और शहर के स्कूलों में बढ़ती खाई
रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है। शहरों के निजी स्कूलों में स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर लैब और अंग्रेजी माध्यम शिक्षा तेजी से बढ़ रही है, जबकि गांवों के सरकारी स्कूलों में बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं।
इस असमानता का असर भविष्य में रोजगार और अवसरों पर भी पड़ सकता है। कमजोर शिक्षा व्यवस्था वाले क्षेत्रों के बच्चे प्रतियोगी दुनिया में पीछे छूट सकते हैं।
क्या कहती है विशेषज्ञों की राय?
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के लिए सिर्फ भवन निर्माण नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना होगा। शिक्षक भर्ती में तेजी लानी होगी, स्कूलों में नियमित निरीक्षण बढ़ाना होगा और स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर प्राथमिक स्तर पर बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुरक्षित माहौल मिले तो ड्रॉप-आउट दर में काफी कमी लाई जा सकती है।


