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ओवैसी-बेनीवाल आए साथ तो बिगड़ेगा कांग्रेस का खेल? राजस्थान निकाय चुनाव में नए समीकरण की आहट
राजस्थान निकाय चुनाव के बीच ओवैसी और हनुमान बेनीवाल के एक मंच पर आने की चर्चा तेज है। जानिए जाट-मुस्लिम समीकरण और कांग्रेस-भाजपा पर संभावित असर।
Rajasthan Civic Election AIMIM: राजस्थान में निकाय चुनाव के बीच असदुद्दीन ओवैसी और हनुमान बेनीवाल के एक मंच पर आने की संभावित चर्चा ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। जयपुर में दोनों नेताओं की संभावित साझा सभा को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ओवैसी और बेनीवाल की नजदीकी राजस्थान में नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार कर सकती है?
हालांकि, अभी इसे औपचारिक राजनीतिक गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। एआईएमआईएम की ओर से भी गठबंधन की बात से इनकार किया गया है। इसके बावजूद चुनावी मैदान में दोनों नेताओं की संभावित एकजुटता को जाट और मुस्लिम वोटों के समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
एआईएमआईएम ने गठबंधन की चर्चा को किया खारिज
एआईएमआईएम के प्रदेश उपाध्यक्ष बाबू भाई ‘फ्रिज वाले’ ने ओवैसी और बेनीवाल के साथ आने को राजनीतिक गठबंधन मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि यह गठबंधन नहीं बल्कि ‘इंसानियत की दुकान’ है।
यानी पार्टी की ओर से फिलहाल किसी औपचारिक चुनावी गठजोड़ की पुष्टि नहीं की गई है। इसके बावजूद दोनों नेताओं की संभावित साझा मौजूदगी ने राजस्थान की निकाय राजनीति में चर्चा को जरूर तेज कर दिया है।
जाट-मुस्लिम समीकरण पर टिकी निगाहें
राजस्थान की राजनीति में जाट समुदाय का प्रभाव कई क्षेत्रों में अहम माना जाता है। वहीं मुस्लिम मतदाता भी कई शहरी निकाय क्षेत्रों में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहते हैं।
ऐसे में बेनीवाल के प्रभाव वाले जाट मतदाताओं और ओवैसी के समर्थक मुस्लिम मतदाताओं के बीच संभावित तालमेल को कांग्रेस के लिए चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। खासकर उन सीटों पर जहां मुकाबला बेहद करीबी रहता है, वोटों का मामूली बिखराव भी नतीजे बदल सकता है।
हालांकि यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि किसी एक नेता का समर्थन या सभा सीधे तौर पर पूरे समुदाय के वोट को एक दिशा में ले जाएगी। स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ भी निकाय चुनाव में अहम भूमिका निभाएगी।
भाजपा को कैसे हो सकता है फायदा?
राजनीतिक समीकरण का दूसरा पहलू भाजपा से जुड़ा है। यदि कांग्रेस के परंपरागत वोट आधार में किसी स्तर पर विभाजन होता है और मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय बनता है, तो भाजपा को इसका चुनावी लाभ मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
एआईएमआईएम ने राजस्थान निकाय चुनाव में सीमित संख्या में उम्मीदवार उतारे हैं। वहीं बेनीवाल की पार्टी की ओर से करीब 1200 उम्मीदवारों के मैदान में होने का दावा किया गया है। ऐसे में दोनों दलों की चुनावी ताकत और उनका वास्तविक वोट ट्रांसफर कितना होता है, यह नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगा।
सोशल मीडिया और जनसभाओं का असर
ओवैसी की जनसभाएं और बेनीवाल की जमीनी तथा सोशल मीडिया मौजूदगी इस संभावित समीकरण को और चर्चा में ला रही है। सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक संदेश को तेजी से फैलाने की रणनीति निकाय चुनाव में खासकर युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद कर सकती है।
अगर दोनों नेताओं की राजनीतिक अपील कुछ क्षेत्रों में एक-दूसरे के पूरक साबित होती है, तो कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए चुनावी रणनीति को लेकर नई चुनौती खड़ी हो सकती है।
जयपुर की सभा पर सबकी नजर
फिलहाल सबसे ज्यादा नजर जयपुर में प्रस्तावित सभा और दोनों नेताओं की संभावित साझा मौजूदगी पर है। क्या यह केवल एक मंच साझा करने तक सीमित रहेगा या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक रणनीति है, यह आने वाले दिनों में साफ हो सकता है।
राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे यह भी बताएंगे कि ओवैसी और बेनीवाल की संभावित नजदीकी वास्तव में वोटों के गणित को प्रभावित करती है या फिर यह महज चुनावी चर्चा बनकर रह जाती है। फिलहाल इतना जरूर है कि इस संभावित समीकरण ने कांग्रेस, भाजपा और क्षेत्रीय दलों की चुनावी रणनीतियों पर बहस तेज कर दी है।


