Petrol Diesel Kaise Bachaye: तेल बचायें, देश को बचाएं, यही है सबसे बड़ा उपाय

Petrol Diesel Kaise Bachaye: भारत ने 2024-25 में कुल 239.17 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों की खपत की। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा डीज़ल का है।

Yogesh Mishra
Published on: 12 May 2026 8:02 PM IST
Petrol Diesel Kaise Bachaye
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Petrol Diesel Kaise Bachaye

Petrol Diesel Kaise Bachaye: भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन उसकी इस रफ्तार के पीछे एक ऐसी ताकत काम कर रही है, जो जितनी जरूरी है, उतनी ही खतरनाक भी। वह है - तेल। खेतों में दौड़ते ट्रैक्टर हों, हाईवे पर भागते ट्रक, शहरों में चलती कारें, उड़ते विमान या उद्योगों की मशीनें, भारत की पूरी अर्थव्यवस्था बड़ी हद तक पेट्रोल और डीज़ल पर टिकी हुई है।

समस्या यह है कि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल खुद पैदा नहीं कर पाता। देश को हर साल अरबों डॉलर का तेल विदेशों से खरीदना पड़ता है। रूस, इराक, सऊदी अरब और दूसरे देशों से आने वाला यही तेल भारत की अर्थव्यवस्था की धड़कन भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी। तेल की कीमत बढ़ते ही महंगाई बढ़ती है, रुपये पर दबाव आता है और आम आदमी की जेब तक उसका असर महसूस होने लगता है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत के पास दुनिया की बड़ी रिफाइनरियां हैं, विशाल तेल कंपनियां हैं और ऊर्जा खपत का विशाल बाजार भी है। लेकिन इसके बावजूद देश अभी भी तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत हर साल कितना तेल जलाता है, कितना आयात करता है, इससे अर्थव्यवस्था पर कितना बोझ पड़ता है और क्या देश के पास इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता है?

पेट्रोल-डीज़ल का खर्च

भारत ने 2024-25 में कुल 239.17 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों की खपत की। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा डीज़ल का है। 2024-25 में भारत में लगभग 91.4 मिलियन टन डीज़ल और करीब 40 मिलियन टन पेट्रोल खर्च हुआ। यानी पेट्रोल और डीज़ल मिलाकर करीब 131–132 मिलियन टन ईंधन हर साल देश में जलता है।


डीज़ल अकेले पेट्रोल से दोगुने से भी अधिक है। इसका कारण यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था का माल-ढुलाई ढांचा अभी भी मुख्यतः ट्रकों पर निर्भर है। खेत, मंडी, सड़क, खदान, निर्माण, बस, ट्रक, छोटे मालवाहक वाहन और रेल के कुछ हिस्से तक डीज़ल पर चलते हैं।

प्रोडक्शन और इम्पोर्ट

भारत अपनी जरूरत का बहुत छोटा हिस्सा ही खुद निकाल पाता है। 2024-25 में भारत का घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन करीब 28.70 मिलियन टन रहा। इसी साल कच्चे तेल का आयात करीब 242–243 मिलियन टन रहा। यानी भारत की कच्चे तेल में आयात निर्भरता लगभग 87–88 प्रतिशत है। सरल भाषा में कहें तो भारत जितना कच्चा तेल उपयोग करता है, उसका लगभग हर 8 में से 7 हिस्सा बाहर से आता है।

भारत पेट्रोल और डीज़ल को सीधे उतनी मात्रा में आयात नहीं करता, जितना कच्चा तेल आयात करता है। भारत कच्चा तेल खरीदता है। उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस करता है। उससे पेट्रोल, डीज़ल, एलपीजी, नाफ्था, बिटुमेन और दूसरे उत्पाद बनते हैं। भारत की रिफाइनिंग क्षमता मजबूत है। भारत दुनिया के बड़े रिफाइनिंग देशों में है। लेकिन कच्चे तेल के स्रोत में भारत कमजोर है। यही असली समस्या है।

किस-किस देश से तेल खरीदता है भारत

2024-25 में भारत के पांच बड़े कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता रहे—रूस, इराक, सऊदी अरब, यूएई और अमेरिका। इन पांच देशों की हिस्सेदारी कुल आयात मात्रा में लगभग 82.57 प्रतिशत तक पहुंच गई। रूस सबसे बड़ा स्रोत रहा। रूस की हिस्सेदारी 2022-23 में 21.6 प्रतिशत थी। 2023-24 में यह 35.9 प्रतिशत हुई। 2024-25 में यह करीब 35.8 प्रतिशत रही। मात्रा के हिसाब से रूस से आयात 2024-25 में करीब 87.54 मिलियन टन बताया गया। इसका बड़ा कारण रूसी क्रूड की छूट और भारतीय रिफाइनरियों की उसे प्रोसेस करने की क्षमता रही।


रूस के बाद इराक, सऊदी अरब, यूएई और अमेरिका आते हैं। पहले भारत बहुत अधिक तेल खाड़ी देशों पर निर्भर था। अब रूस की हिस्सेदारी बहुत बढ़ गई है। इससे भारत को कुछ समय तक सस्ता तेल मिला। लेकिन इससे भू-राजनीतिक जोखिम भी बढ़ा। अगर रूस पर प्रतिबंध बढ़ते हैं, शिपिंग बीमा महंगा होता है, डॉलर भुगतान में दिक्कत आती है या पश्चिमी दबाव बढ़ता है, तो भारत की आपूर्ति रणनीति प्रभावित हो सकती है।

तेल की भारी खरीद से असर

तेल भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विदेशी मुद्रा खपतों में से एक है। वित्तीय वर्ष 25 में भारत का तेल आयात बिल करीब 137 अरब डॉलर बताया गया। जब तेल महंगा होता है, तो तीन असर एक साथ आते हैं। पहला, डॉलर की मांग बढ़ती है। दूसरा, रुपये पर दबाव बढ़ता है। तीसरा, महंगाई बढ़ती है। क्योंकि डीज़ल महंगा होने पर माल ढुलाई महंगी होती है। माल ढुलाई महंगी होने पर सब्जी से लेकर सीमेंट तक महंगा होता है।

भारत जैसे देश के लिए तेल केवल ऊर्जा नहीं है। यह महंगाई, चालू खाते का घाटा, रुपये की कीमत, सरकारी सब्सिडी, किसानों की लागत, ट्रांसपोर्ट लागत और उद्योग की प्रतिस्पर्धा—सबको प्रभावित करता है। इसलिए प्रधानमंत्री जब पेट्रोल, डीज़ल और गैस के संयमित उपयोग की अपील करते हैं, तो उसका अर्थ केवल ‘बचत’ नहीं होता। उसका अर्थ है—डॉलर बचाना, आयात बिल कम करना, महंगाई पर दबाव कम करना और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना।

डीज़ल कहाँ खर्च होता है?

ताज़ा पीपीएसी - क्रिसिल अध्ययन के अनुसार, रिटेल आउटलेट से बिकने वाले डीज़ल में सबसे बड़ा हिस्सा ट्रकों का है। ट्रक अकेले रिटेल डीज़ल का लगभग 64.2 प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद निजी कारें 14.3 प्रतिशत, बसें 4.1 प्रतिशत, टैक्सी 3.4 प्रतिशत और थ्री-व्हीलर 1.4 फीसदी आते हैं। गैर-परिवहन उपयोग में कृषि 4.7 फीसदी, उद्योग 2.6 फीसदी, डीज़ल जेनरेटर 1.6 फीसदी, मोबाइल टावर 0.4 प्रतिशत और अन्य उपयोग 3.4 प्रतिशत हैं।

इसमें ट्रकों का हिस्सा लगभग 55.4 फीसदी, निजी कारों का 12.4 फीसदी, बसों का 5.9 फीसदी, टैक्सी का 2.9 प्रतिशत, रेल का 2.1 प्रतिशत, विमान और शिपिंग का 0.8 प्रतिशत और नॉन ट्रांसपोर्ट का 19.3% बताया गया है। यानी डीज़ल का असली केंद्र भारत की माल ढुलाई व्यवस्था है।

खेती में खर्च तेल

ताज़ा रिटेल अध्ययन में कृषि का हिस्सा रिटेल डीज़ल का 4.7 फीसदी बताया गया है। पुराने सर्वे में कुल डीज़ल खपत में कृषि का हिस्सा लगभग 13 प्रतिशत था, जिसमें ट्रैक्टर 7.4 प्रतिशत, पंपसेट 2.9 फीसदी और कृषि उपकरण 2.7 प्रतिशत बताए गए थे। फर्क इसलिए है क्योंकि पुराने सर्वे में कुल बिक्री डेटा का तरीका अलग था और कृषि में ट्रैक्टरों का गैर-कृषि उपयोग भी शामिल होता था। आज खेती में डीज़ल की निर्भरता अभी भी गंभीर है। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेसर, पंपसेट, माल ढुलाई और मंडी तक परिवहन—इन सबमें डीज़ल लगता है।

पेट्रोल का खर्च

पेट्रोल लगभग पूरा परिवहन क्षेत्र में खर्च होता है। ताज़ा अध्ययन के अनुसार पेट्रोल की रिटेल बिक्री में दो-पहिया वाहन 59 फीसदी पेट्रोल इस्तेमाल करते हैं। निजी कारें 28 फीसदी, निजी एसयूवी 8.62 फीसदी, टैक्सी 1.91 फीसदी, टैक्सी एसयूवी 1.38 प्रतिशत फीसदी उपयोग करते हैं। पुराने सरकारी सर्वे में भी यही तस्वीर थी। उसमें कहा गया था कि पेट्रोल का 99.6 प्रतिशत परिवहन क्षेत्र में जाता है। दो-पहिया 61.42 प्रतिशत और कारें 34.33 प्रतिशत पेट्रोल खर्च करती हैं।

औसतन भारतीय पेट्रोलियम खर्च

भारत की कुल पेट्रोलियम उत्पाद खपत 2024-25 में करीब 239 मिलियन टन रही। यदि आबादी करीब 145 करोड़ मानी जाए, तो प्रति व्यक्ति सालाना पेट्रोलियम उत्पाद खपत लगभग 165 किलो बैठती है। केवल पेट्रोल और डीज़ल मिलाकर देखें तो 131–132 मिलियन टन को आबादी से बांटने पर करीब 90–92 किलो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष आता है।


लीटर में मोटा अनुमान लगाएं तो यह लगभग 105–115 लीटर पेट्रोल व डीज़ल प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष के बराबर है। यह सीधा व्यक्ति द्वारा खरीदा गया ईंधन नहीं है। इसमें ट्रक से आपके घर तक आया सामान, बस, टैक्सी, खेती, उद्योग और निर्माण सब शामिल हैं।

भारत में तेल की संभावना

भारत में संभावना है, लेकिन अभी तक वह पर्याप्त उत्पादन में नहीं बदली। भारत में 26 अवसादी बेसिन हैं। भारत में अब तक करीब 12.0 अरब टन तेल समतुल्य पेट्रोलियम खोज बताई गई है और लगभग 12.9 अरब टन तेल समतुल्य अज्ञात संभावित भंडार अनुमानित है। इसका अर्थ यह है कि भूगर्भीय संभावना है। लेकिन संभावना और व्यावसायिक उत्पादन दो अलग चीजें हैं। खोज, गहराई, समुद्री क्षेत्र, तकनीक, पर्यावरण मंजूरी, निवेश जोखिम और उत्पादन लागत—ये सब निर्णायक होते हैं।

भारत का उत्पादन अभी मुख्यतः मुंबई अपतटीय/मुंबई हाई, राजस्थान, असम-अराकान, कंबे, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी जैसे बेसिनों से आता है। 2023-24 में कुल कच्चा तेल उत्पादन 29.36 मिलियन मीट्रिक टन था। इसमें मुंबई बेसिन का हिस्सा करीब 13.24 मिलियन मीट्रिक टन, यानी 45.1 प्रतिशत था। कंबे 5.28 मिलियन मीट्रिक टन, राजस्थान 4.43 मिलियन मीट्रिक टन, असम-अराकान शेल्फ 4.41 मिलियन मीट्रिक टन और कृष्णा-गोदावरी 1.71 मिलियन मीट्रिक टन के आसपास रहे।

तेल निकालने में गलती

पूरी बात को केवल गलती कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन हाँ, भारत ने कई अवसर खोए हैं। भारत के बड़े तेल क्षेत्र पुराने हो चुके हैं। मुंबई हाई और असम जैसे क्षेत्रों में प्राकृतिक गिरावट है। उत्पादन घट रहा है। 2020-21 में घरेलू कच्चा तेल उत्पादन 30.494 मिलियन मीट्रिक टन था, जो 2024-25 में घटकर 28.704 मिलियन मीट्रिक टन हो गया। सरकार ने संसद में भी कहा कि परिपक्व और पुराने क्षेत्रों में प्राकृतिक गिरावट उत्पादन घटने की वजह है।

फिर भी कुछ कमियां रही हैं। अन्वेषण में निजी निवेश उतना नहीं आया। गहरे समुद्र में खोज महंगी है। मंजूरियां लंबे समय लेती थीं। आँकड़ों की उपलब्धता पहले कमजोर थी। उत्पादन-साझेदारी और मूल्य निर्धारण नीतियों को लेकर कई विवाद रहे। अब हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति, खुला क्षेत्र लाइसेंसिंग कार्यक्रम, खोजे गए छोटे क्षेत्र, राष्ट्रीय आँकड़ा भंडार, एकल लाइसेंस और 2025 पेट्रोलियम नियम जैसे प्रयास इसी कमी को दूर करने के लिए किए गए हैं। लेकिन इनके नतीजे उत्पादन में आने में वर्षों लगते हैं।

भारत में प्रमुख तेल कुएँ और क्षेत्र

भारत के बड़े उत्पादक क्षेत्र हैं—मुंबई हाई, हीरा, नीलम, बसेइन के आसपास पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र; राजस्थान में मंगला, भाग्यम, ऐश्वर्या जैसे क्षेत्र; असम में डिगबोई, नाहरकटिया, मोरान, रुद्रसागर आदि; गुजरात/कंबे बेसिन में अंकलेश्वर, गांधार, कलोल आदि; कृष्णा-गोदावरी बेसिन में गहरे समुद्री तेल-गैस क्षेत्र; और कावेरी बेसिन के कुछ क्षेत्र। महानिदेशालय हाइड्रोकार्बन के अनुसार 2023-24 में कच्चा तेल उत्पादन में मुंबई बेसिन सबसे बड़ा रहा।

मुंबई हाई भारत का सबसे महत्वपूर्ण तेल क्षेत्र है। यह 1974 में खोजा गया था। इसका उत्पादन 1985 में बहुत ऊपर था, लेकिन बाद में घटा। तेल और प्राकृतिक गैस निगम ने ब्रिटिश पेट्रोलियम के साथ तकनीकी सहयोग का समझौता किया है, जिसके तहत मुंबई हाई से तेल उत्पादन में 44 प्रतिशत और गैस उत्पादन में 89 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना जताई गई है। यह वृद्धि 2027-28 के आसपास साफ दिखने की उम्मीद बताई गई थी।

भारत में रिफाइनरियाँ

भारत की प्रमुख रिफाइनरियाँ असम के डिगबोई, गुवाहाटी, बोंगाईगाँव और नुमालीगढ़; बिहार के बरौनी; उत्तर प्रदेश के मथुरा; हरियाणा के पानीपत; पंजाब के भटिंडा; गुजरात के कोयली/वडोदरा और जामनगर; महाराष्ट्र के मुंबई; मध्य प्रदेश के बीना; ओडिशा के पारादीप; पश्चिम बंगाल के हल्दिया; आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम; तमिलनाडु के चेन्नई/मनाली और नागपट्टिनम क्षेत्र; केरल के कोच्चि; कर्नाटक के मंगलूरु; और राजस्थान के बाड़मेर/पचपदरा क्षेत्र में हैं। निजी क्षेत्र में रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी दुनिया के सबसे बड़े शोधन परिसरों में गिनी जाती है। नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी भी बड़ी है। भारत शोधन क्षमता में दुनिया में चौथे स्थान पर बताया गया है।


भारत की समस्या शोधन क्षमता नहीं है। समस्या कच्चे तेल का स्रोत है। हमारे पास रिफाइनरियाँ हैं। तकनीकी क्षमता है। निर्यात क्षमता भी है। लेकिन कच्चा तेल बाहर से आता है। इसलिए भारत कच्चे तेल की कीमत और डॉलर पर निर्भर रहता है।

आयात बिल घटाना

सरकार ने कई स्तरों पर प्रयास किए हैं। पहला, इथेनॉल मिश्रण। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को 20 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य 2025-26 रखा गया। 2013-14 में इथेनॉल आपूर्ति 38 करोड़ लीटर थी। 2023-24 में यह बढ़कर 707.4 करोड़ लीटर से अधिक हो गई। इससे पेट्रोल आयात बिल घटता है, किसानों को गन्ना/अनाज आधारित इथेनॉल बाजार मिलता है और कार्बन उत्सर्जन कम होता है।

दूसरा, सामरिक पेट्रोलियम भंडार। भारत ने विशाखापट्टनम, मंगलूरु और पादुर में कुल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता का भूमिगत कच्चा तेल भंडारण बनाया है। यह युद्ध, आपूर्ति बाधा और वैश्विक संकट में सुरक्षा देता है।

तीसरा, नगर गैस वितरण और संपीड़ित प्राकृतिक गैस/पाइप प्राकृतिक गैस विस्तार। सरकार ने 733 जिलों और लगभग पूरे मुख्यभूमि क्षेत्र में नगर गैस वितरण कवरेज बढ़ाने की बात कही है। इससे शहरों में डीज़ल-पेट्रोल की जगह संपीड़ित प्राकृतिक गैस और घरेलू रसोई गैस की जगह पाइप प्राकृतिक गैस का उपयोग बढ़ सकता है।

चौथा, सतत और संपीड़ित जैव-गैस। इसका लक्ष्य कृषि अवशेष, गोबर और नगर निगम कचरे से संपीड़ित जैव-गैस बनाना है। इससे डीज़ल/संपीड़ित प्राकृतिक गैस का कुछ हिस्सा बदला जा सकता है। किसानों को अतिरिक्त आय मिल सकती है।

पांचवां, हरित हाइड्रोजन मिशन। सरकार का लक्ष्य 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन है। सरकारी आकलन के अनुसार इससे 2030 तक कुल ₹1 लाख करोड़ तक जीवाश्म ईंधन आयात कम करने में मदद मिल सकती है।

छठा, अन्वेषण सुधार। हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति, खुला क्षेत्र लाइसेंसिंग कार्यक्रम, खोजे गए छोटे क्षेत्र, राष्ट्रीय आँकड़ा भंडार और 2030 तक 10 लाख वर्ग किलोमीटर अन्वेषण क्षेत्र जैसे लक्ष्य घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयास हैं।

इथेनॉल मिश्रण सबसे ठोस और दिखने वाला प्रयास रहा है। इससे पेट्रोल आयात प्रतिस्थापन में वास्तविक मदद मिली है। संपीड़ित प्राकृतिक गैस/पाइप प्राकृतिक गैस विस्तार ने शहरों में असर दिखाया है। विद्युत चालित दो-पहिया और बसों में असर बढ़ रहा है। लेकिन डीज़ल की असली चुनौती अभी भी बाकी है, क्योंकि ट्रक, लंबी दूरी की माल ढुलाई और कृषि मशीनरी अभी भी डीज़ल पर हैं। इसलिए पेट्रोल में इथेनॉल और विद्युत वाहन से मदद मिलेगी, लेकिन सबसे बड़ा लाभ तभी होगा जब माल ढुलाई परिवहन बदलेगा।

तेल कंपनियों का लाभ-हानि

2024-25 में सरकारी तेल कंपनियों का लाभ पिछले वर्ष की तुलना में घटा, क्योंकि शोधन और विपणन लाभांश कम हुए। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन का वित्त वर्ष 2024-25 का स्वतंत्र शुद्ध लाभ ₹12,962 करोड़ रहा, जबकि पिछले वर्ष यह ₹39,619 करोड़ था। भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड का वित्त वर्ष 2024-25 में शुद्ध लाभ ₹13,336.55 करोड़ रहा, जबकि पिछले वर्ष ₹26,858.84 करोड़ था। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड ने चौथी तिमाही वित्त वर्ष 2025 में समेकित कर-पश्चात लाभ ₹3,415 करोड़ बताया।

तेल और प्राकृतिक गैस निगम और ऑयल इंडिया जैसी अपस्ट्रीम कंपनियाँ तेल निकालती हैं। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड शोधन और विपणन करती हैं। रिलायंस और नायरा बड़ी निजी शोधन कंपनियाँ हैं। जब कच्चा तेल सस्ता और उत्पाद लाभांश अच्छे होते हैं, शोधन कंपनियों को लाभ होता है। जब कच्चा तेल महंगा होता है और सरकार खुदरा मूल्य पूरी तरह नहीं बढ़ने देती, तो तेल विपणन कंपनियों पर अपूर्ण वसूली आती है। मई 2026 में रिपोर्टों के अनुसार सरकारी तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस को अंतरराष्ट्रीय मानक से कम कीमत पर बेचने के कारण लगभग ₹30,000 करोड़ प्रति माह अपूर्ण वसूली का दबाव बताया गया।

क्या है उपाय

भारत को तेल बचत को राष्ट्रीय अभियान बनाना चाहिए। सबसे पहले ट्रक ढुलाई को सुधारा जाए। समर्पित माल गलियारे, रेल माल ढुलाई, अंतर्देशीय जलमार्ग, रसद पार्क और बहु-माध्यम परिवहन को तेज किया जाए। अगर लंबी दूरी की ढुलाई ट्रकों से रेल और जलमार्ग पर जाती है, तो डीज़ल बिल में बड़ा फर्क आएगा।

दूसरा, दो-पहिया विद्युत वाहनों को बहुत तेज बढ़ाया जाए। पेट्रोल का सबसे बड़ा हिस्सा दो-पहिया वाहन खाते हैं। अगर शहरों और कस्बों में विद्युत स्कूटर, बैटरी अदला-बदली, सस्ती चार्जिंग और भरोसेमंद सेवा नेटवर्क बने, तो पेट्रोल की मांग पर सीधा असर पड़ेगा।

तीसरा, खेती में सौर पंप और विद्युत कृषि मशीनरी को बढ़ाया जाए। हर डीज़ल पंप को सौर पंप से बदलना संभव नहीं, लेकिन जहाँ विद्युत ग्रिड और भूजल स्थिति अनुमति दे, वहाँ बड़ा बदलाव हो सकता है। सामुदायिक कृषि मशीन केंद्रों में विद्युत या जैव-संपीड़ित प्राकृतिक गैस कृषि मशीनें दी जा सकती हैं।

चौथा, शहरों में सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दी जाए। मेट्रो, विद्युत बस, सुरक्षित फुटपाथ और साइकिल लेन पेट्रोल की बचत करते हैं। कारों की संख्या बढ़ाकर कोई देश तेल आयात कम नहीं कर सकता।

पांचवां, घरेलू खोज को तेज किया जाए। मंजूरियों को समयबद्ध किया जाए। आँकड़े पारदर्शी हों। निजी और विदेशी निवेश को भरोसा मिले। मुंबई हाई जैसे तेल क्षेत्र में तकनीक से उत्पादन बढ़ाया जाए।

छठा, इथेनॉल के बाद डीज़ल प्रतिस्थापन पर ध्यान दिया जाए। जैव डीज़ल, संपीड़ित जैव-गैस, द्रवीकृत प्राकृतिक गैस ट्रक, विद्युत ट्रक और हाइड्रोजन ईंधन सेल ट्रक पर स्पष्ट नीति चाहिए। भारत की असली चुनौती डीज़ल अर्थव्यवस्था है।

निष्कर्ष यह है कि भारत पेट्रोल-डीज़ल पर बहुत अधिक निर्भर है। पेट्रोल मुख्यतः दो-पहिया और कारों में खर्च होता है। डीज़ल मुख्यतः ट्रकों, माल ढुलाई, बसों, खेती और उद्योग में खर्च होता है। भारत कच्चे तेल का लगभग 87–88% आयात करता है। इसलिए तेल की हर अंतरराष्ट्रीय हलचल भारत की महंगाई, रुपया, व्यापार घाटा और आम आदमी की जेब को छूती है। भारत के पास रिफाइनरी शक्ति है, लेकिन कच्चे तेल की शक्ति नहीं। इसलिए समाधान केवल तेल निकालना नहीं है। समाधान है—तेल कम जलाना, बेहतर ढंग से जलाना और जहाँ संभव हो वहाँ तेल को बिजली, गैस, जैव ईंधन और ट्रेन आधारित अर्थव्यवस्था से बदलना।

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