PoK में बगावत की उल्टी गिनती शुरू! पाकिस्तान को 48 घंटे का अल्टीमेटम, 'आर-पार' की जंग का ऐलान

PoK Protests Update: पीओके में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध तेज हो गया है। जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए 38 मांगों को पूरा करने की चेतावनी दी है।

Harsh Srivastava
Published on: 9 July 2026 6:55 PM IST
PoK में बगावत की उल्टी गिनती शुरू! पाकिस्तान को 48 घंटे का अल्टीमेटम, आर-पार की जंग का ऐलान
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PoK Protests Update: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) में इस समय भीषण जन-आक्रोश की आग भड़क उठी है। स्थानीय संगठन जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने सीधे पाकिस्तानी हुकूमत को हिलाकर रख दिया है। कमेटी ने शाहबाज सरकार को अपनी मांगे मानने के लिए सिर्फ 48 घंटे की आखिरी मोहलत दी है। आंदोलनकारियों ने दोटूक चेतावनी दी है कि अगर उनकी 38 सूत्री मांगों पर तुरंत मुहर नहीं लगी, तो वे मुजफ्फराबाद की तरफ एक ऐतिहासिक और निर्णायक जन-प्रतिरोध मार्च निकालेंगे। यह आर-पार की लड़ाई ऐसे समय पर हो रही है जब 27 जुलाई को होने वाले क्षेत्रीय चुनावों के लिए 9 जून से नामांकन का काम शुरू होना है।

शरणार्थी सीटों का बड़ा विवाद

इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ पाकिस्तान में बसे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित की गई 12 विधानसभा सीटें हैं, जिन्हें खत्म करने की पुरजोर मांग की जा रही है। आंदोलनकारियों का खुला आरोप है कि इस्लामाबाद इन विशेष सीटों के जरिए पीओके की आंतरिक राजनीति में अपनी मनमर्जी का दखल चलाता है। असल में ये 12 सीटें पाकिस्तान में रह रहे लगभग 4.36 लाख पंजीकृत वोटरों के हाथ में हैं, जबकि पीओके के मूल निवासी करीब 33 लाख स्थानीय वोटरों के हिस्से में सिर्फ 33 सीटें आती हैं। यह सीधा गणित लोकतांत्रिक समानता के उसूलों को पूरी तरह ध्वस्त करता है। हालांकि, पीओके सुप्रीम कोर्ट ने 7 जून को साफ कर दिया कि इन संवैधानिक सीटों को केवल एक साधारण सरकारी आदेश से हटाना मुमकिन नहीं है।

हक की मांग और गुस्सा

अवैध कब्जे वाले इस इलाके के लोगों में सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर ही गुस्सा नहीं है, बल्कि बुनियादी सुविधाओं के लिए भी कोहराम मचा है। जेएएसी के 38 सूत्री मांग पत्र में सबसे बड़ा मुद्दा बिजली की आसमान छूती कीमतों और आटे-चीनी जैसी जरूरी चीजों पर भारी सब्सिडी देने का है। स्थानीय निवासियों का दर्द है कि उनके खुद के पानी से बनने वाली पनबिजली को पाकिस्तान उन्हें ही बेहद महंगे दामों पर बेचता है। लोग मांग कर रहे हैं कि प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा सीधे पीओके के विकास, चमचमाती सड़कों, अच्छे अस्पतालों और युवाओं के रोजगार पर खर्च किया जाए।

कागजी आजादी का कड़वा सच

पाकिस्तान दुनिया के सामने इस इलाके को भले ही 'आजाद कश्मीर' कहकर दुष्प्रचार करता हो, मगर वहां की जमीनी हकीकत किसी नरक से कम नहीं है। यह क्षेत्र पाकिस्तान के मुख्य संविधान के दायरे में ही नहीं आता, जिसके कारण वहां के लोगों को नेशनल असेंबली में कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। सारी असली ताकतें इस्लामाबाद के कश्मीर काउंसिल के पास सुरक्षित हैं। सबसे दमनकारी नियम यह है कि चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को अनिवार्य रूप से पाकिस्तान में विलय का समर्थन करने की कसम खानी पड़ती है।

अमीरी में गरीबी की मार

प्राकृतिक संसाधनों, कीमती पत्थरों और पानी के मामले में यह इलाका बेहद समृद्ध है, मगर यहां के लोग भयंकर मुफलिसी में जीने को मजबूर हैं। सिंधु नदी के पानी से पाकिस्तान के 70 प्रतिशत खेतों की सिंचाई होती है, लेकिन बदले में स्थानीय जनता को सिर्फ भुखमरी मिलती है। साल 2025 की एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक, यहाँ की 66 प्रतिशत जनता खेती पर निर्भर है, लेकिन 57.1 प्रतिशत लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा और 29 प्रतिशत लोग कुपोषण का शिकार हैं। यह बदहाली पाकिस्तान के राष्ट्रीय औसत 19.9 प्रतिशत से कहीं ज्यादा डरावनी है।

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हर्ष श्रीवास्तव वाराणसी के रहने वाले पत्रकार और डिजिटल कंटेंट प्रोफेशनल हैं। वर्तमान में वे लखनऊ स्थित न्यूज़ट्रैक में डेस्क इंचार्ज के पद पर कार्यरत हैं। यहां वे कंटेंट प्लानिंग, एडिटोरियल कोऑर्डिनेशन, न्यूज़रूम संचालन के साथ-साथ रिसर्च आधारित एक्सप्लेनर, न्यूज़ फीचर और विश्लेषणात्मक लेख तैयार करते हैं। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है। उन्होंने वर्ष 2023 में पत्रकारिता की शुरुआत की और हिन्दुस्तान, टाइम्स इंटरनेट, इंडिया न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। वाराणसी, दिल्ली और लखनऊ में काम करने के दौरान उन्हें रिपोर्टिंग, कंटेंट राइटिंग और डिजिटल पत्रकारिता का अनुभव प्राप्त हुआ। हर्ष की विशेष रुचि राजनीति, चुनाव, अपराध, सार्वजनिक नीति, सुशासन और समसामयिक विषयों पर शोध-आधारित पत्रकारिता में है। वे गहन रिसर्च, फैक्ट-चेकिंग और सरल भाषा के माध्यम से जटिल विषयों को पाठकों तक सटीक, विश्वसनीय और प्रभावी ढंग से पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

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