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Police Magistrate Powers: पुलिस अधिकारी के पास मजिस्ट्रेट की शक्ति कैसे? जानिए कानून क्या कहता है
Police Magistrate Powers: क्या पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट बनकर हिरासत का आदेश दे सकते हैं? जानिए Special Executive Magistrate की शक्तियां, BNSS की धाराएं, दिल्ली पुलिस अधिनियम और नागरिकों के कानूनी अधिकार।
Police Magistrate Powers Explained in Hindi | Delhi Police Powers | CJP Leaders Protest | Newstrack
Police Magistrate Powers: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत और तिहाड़ जेल में सात दिन बिताने के बाद रिहाई ने भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था के एक ऐसे प्रावधान को चर्चा में ला दिया है, जिसके बारे में आमतौर पर बहुत कम लोगों को जानकारी होती है। यह प्रावधान पुलिस अधिकारियों को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate:SEM) की शक्तियां दिए जाने से जुड़ा है।
इस मामले ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया है कि जब पुलिस किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो क्या उसी पुलिस व्यवस्था का कोई अधिकारी मजिस्ट्रेट की भूमिका निभाते हुए उसकी हिरासत बढ़ाने या उसे जेल भेजने का आदेश भी दे सकता है? कानून में इसका प्रावधान मौजूद है, लेकिन इन शक्तियों का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा सकता है और उनकी सीमाएं क्या हैं, यह समझना जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को 13 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम के बाद हिरासत में लिया गया था। पुलिस का आरोप था कि 13 अक्टूबर के घटनाक्रम के दौरान उनके आचरण से इस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ।
रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन से संबंधित दो मामले दर्ज किए। इनमें एक मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 332 और 61(2) के तहत दर्ज किया गया, जबकि दूसरे मामले में लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा और अन्य संबंधित प्रावधानों का उल्लेख किया गया।
दास और रांका को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाने का आदेश दिया। बाद में उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ाई गई, जिसके बाद दोनों को लगभग सात दिन तिहाड़ जेल में बिताने पड़े।
क्या होता है विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट?
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ऐसा अधिकारी होता है, जिसे कानून के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कुछ निर्धारित शक्तियां दी जाती हैं। सामान्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट व्यवस्था का उद्देश्य शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा संभावित विवादों या अशांति को रोकने के लिए निवारक कार्रवाई करना है।
दिल्ली में यह व्यवस्था इसलिए चर्चा में है, क्योंकि यहां कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को विशेष अधिसूचना के जरिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान की गई हैं।
दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 की धारा 70 के तहत दिल्ली पुलिस आयुक्त, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त और सहायक पुलिस आयुक्त जैसे निर्धारित पदों के अधिकारियों को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कुछ शक्तियां दी गई हैं। ये शक्तियां विशेष रूप से शांति बनाए रखने और अच्छे आचरण की सुरक्षा से संबंधित कानूनी कार्यवाहियों में महत्वपूर्ण हैं। ये अधिकार संबंधित कानून, अधिसूचना और निर्धारित सीमाओं के अधीन होते हैं।
कानून में क्या प्रावधान है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 14 कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति और उनकी व्यवस्था से संबंधित है। इसके तहत राज्य सरकार प्रत्येक जिले में कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकती है। धारा 14(6) यह भी स्पष्ट करती है कि लागू कानून के तहत पुलिस आयुक्त को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की सभी या कुछ शक्तियां दी जा सकती हैं।
वहीं, दिल्ली में पुलिस अधिकारियों को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान करने का विशिष्ट कानूनी आधार दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 70 और उसके तहत जारी अधिसूचना है। इसी व्यवस्था के माध्यम से निर्धारित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को कुछ मजिस्ट्रेटीय शक्तियां प्राप्त होती हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का अध्याय IX शांति बनाए रखने और अच्छे आचरण के लिए सुरक्षा से संबंधित प्रावधानों को समाहित करता है। इसमें संभावित शांति भंग को रोकने, संबंधित व्यक्तियों से सुरक्षा या बॉन्ड लेने और निर्धारित परिस्थितियों में आगे की कार्रवाई करने की व्यवस्था है।
यह अध्याय पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 के अध्याय VIII से संबंधित व्यवस्था का उत्तराधिकारी है। नई संहिता 1 जुलाई 2024 से लागू हुई।
BNSS की धारा 126 और 141
धारा 126 शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा मांगने की कार्यवाही से संबंधित है। यदि कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का आधार हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक शांति में बाधा डाल सकता है, तो कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत उससे बॉन्ड देने के लिए कहा जा सकता है।
धारा 141 उन परिस्थितियों से संबंधित है, जिनमें सुरक्षा देने के लिए पहले से किए गए बॉन्ड के उल्लंघन पर कार्रवाई की जा सकती है। लागू वैधानिक शर्तें पूरी होने पर संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार कर हिरासत में रखने का आदेश दिया जा सकता है। लेकिन ऐसी कार्रवाई के लिए संबंधित प्रावधान की शर्तों और प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
इसलिए किसी बॉन्ड के उल्लंघन का आरोप अपने आप में हिरासत का अधिकार नहीं बन जाता। यह देखना जरूरी है कि बॉन्ड किस कानूनी आदेश के तहत लिया गया था, उल्लंघन किस तरह हुआ और हिरासत के लिए कानून में निर्धारित शर्तें पूरी हुईं या नहीं।
क्या पुलिस अधिकारी न्यायिक काम कर सकते हैं?
न्यायिक मजिस्ट्रेट आपराधिक मामलों की सुनवाई, आरोपों से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया और कानून द्वारा निर्धारित अन्य न्यायिक कार्यों का निर्वहन करते हैं। वे न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा होते हैं।
कार्यपालक मजिस्ट्रेट मुख्य रूप से शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने, संभावित अशांति को रोकने और कानून में निर्धारित निवारक कार्यवाहियों से जुड़े होते हैं।
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट को मिली शक्तियां इन्हीं वैधानिक सीमाओं के भीतर होती हैं। वह केवल इस पद के आधार पर सामान्य आपराधिक मुकदमे का ट्रायल करने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के बराबर नहीं हो जाता।
पुलिस अधिकारी को मजिस्ट्रेट की शक्ति देने पर सवाल क्यों?
पुलिस का सामान्य काम अपराध की जांच करना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना, साक्ष्य जुटाना और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई करना है। वहीं, मजिस्ट्रेट की भूमिका में किसी व्यक्ति की स्थिति, पुलिस के दावों और हिरासत की आवश्यकता पर विचार करना पड़ सकता है। जब पुलिस व्यवस्था का ही कोई अधिकारी मजिस्ट्रेट की शक्ति का इस्तेमाल करता है, तो यह सवाल उठता है कि क्या संबंधित कार्यवाही में पर्याप्त स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो पाती है।
आलोचकों का तर्क है कि जांच करने वाली संस्था और निवारक हिरासत से जुड़े आदेश देने वाले अधिकारी के बीच संस्थागत दूरी कम होने से हितों के टकराव की आशंका पैदा हो सकती है। इससे नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती है।
हालांकि, केवल पुलिस अधिकारी होने से कोई आदेश अपने आप गैरकानूनी नहीं हो जाता। यदि कानून संबंधित अधिकारी को स्पष्ट अधिकार देता है, तो वह निर्धारित सीमाओं में उनका इस्तेमाल कर सकता है।
क्या विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट किसी को जेल भेज सकता है?
इसका जवाब परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधान पर निर्भर करता है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट की निवारक (प्रिवेंटिव) शक्तियों के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में हिरासत का आदेश दिया जा सकता है। इसी तरह, पहले दिए गए शांति बॉन्ड के कथित उल्लंघन पर भी कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई संभव है।
लेकिन संबंधित आदेश के लिए वैधानिक आधार होना चाहिए, आवश्यक प्रक्रिया का पालन होना चाहिए और हिरासत कानून द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर होनी चाहिए।
किसी व्यक्ति को केवल इसलिए अनिश्चितकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि पुलिस को उसके भविष्य के आचरण पर संदेह है। निवारक कार्रवाई के लिए भी कानून की शर्तें लागू होती हैं और व्यक्ति को उपलब्ध कानूनी उपायों का अधिकार बना रहता है।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से वंचित करने की कार्रवाई कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही की जा सकती है।
अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि, निवारक हिरासत से जुड़े मामलों में अनुच्छेद 22 के कुछ प्रावधान अलग तरीके से लागू होते हैं। इसलिए हर प्रकार की पुलिस हिरासत पर एक ही नियम लागू मानना उचित नहीं होगा। इसके अतिरिक्त, संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
इन संवैधानिक प्रावधानों का व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य की शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से न हो और नागरिकों की स्वतंत्रता कानूनी सुरक्षा के दायरे में रहे।
क्या यह व्यवस्था पहली बार चर्चा में आई है?
पुलिस अधिकारियों को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां देने और इन शक्तियों के इस्तेमाल की प्रक्रिया पर पहले भी कानूनी बहस होती रही है। इस व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में त्वरित निर्णय की आवश्यकता होती है। निर्धारित पुलिस अधिकारियों को कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियां देने से प्रशासन संभावित अशांति को रोकने के लिए जल्दी कार्रवाई कर सकता है।
दूसरी ओर, आलोचक कहते हैं कि निवारक शक्तियों का व्यापक इस्तेमाल शांतिपूर्ण प्रदर्शन, असहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है। उनका मानना है कि हिरासत से जुड़े मामलों में स्वतंत्र समीक्षा, स्पष्ट कारण और प्रभावी कानूनी निगरानी बेहद जरूरी हैं।
ऐसे मामलों में न्यायपालिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अदालतें यह जांच सकती हैं कि संबंधित अधिकारी के पास अधिकार था या नहीं, आदेश के लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद था या नहीं और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं।
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की व्यवस्था भारतीय कानून में मौजूद है। दिल्ली में निर्धारित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी संबंधित अधिसूचना और कानून के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेट की कुछ शक्तियां दी गई हैं।
अंततः सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पुलिस अधिकारी को मजिस्ट्रेट की शक्ति दी जा सकती है या नहीं। सवाल यह भी है कि जब ऐसी शक्ति दी जाती है, तो उसके निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह इस्तेमाल को कैसे सुनिश्चित किया जाता है।


