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5 मिनट में ही हेकड़ी खत्म! प्रशांत किशोर को SC की तगड़ी फटकार, बिहार चुनाव को 'रद्द' कराने का सपना हुआ चूर-चूर...
Prashant Kishor: सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को मात्र 5 मिनट में ही खारिज कर दिया और स्पष्ट कहा कि चुनाव में जनता ने अपनी पसंद साफ़ कर दी है, ऐसे में न्यायालय का प्रयोग पॉपुलैरिटी बढ़ाने के लिए किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता।
Bihar Election Petition Rejected by SC (PHOTO: SOCIAL MEDIA)
Prashant Kishor: बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा करने वाले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ा झटका दिया है। जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया कि बिहार सरकार द्वारा महिलाओं के खातों में डाले गए पैसे के कारण चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हुआ और इसीलिए पूरे बिहार के चुनाव को रद्द किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत की याचिका की ख़ारिज
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को मात्र 5 मिनट में ही खारिज कर दिया और स्पष्ट कहा कि चुनाव में जनता ने अपनी पसंद साफ़ कर दी है, ऐसे में न्यायालय का प्रयोग पॉपुलैरिटी बढ़ाने के लिए किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी को स्पष्ट रूप से सख्त चेतावनी दी कि वे राजनीतिक स्टैंडबाजी के लिए न्यायालय का दुरुपयोग न करें और इस मामले को पहले पटना हाई कोर्ट में ले जाएँ।
जनसुराज पार्टी की राजनीतिक असफलता
प्रशांत किशोर ने बिहार में नई पार्टी जनसुराज के माध्यम से राज्य की राजनीति में अपनी पकड़ बनाने का पूरा प्रयास किया था। चुनाव के दौरान उन्होंने बड़े-बड़े दावे किए थे। उनका दावा था कि JDU से वो 25 से कम सीटें जीत पाएगी, नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं किसी भी हाल में नहीं बन पाएंगे, और यदि जनसुराज को 130 सीटों से कम मिली तो वे हार मान लेंगे।
लेकिन चुनाव के नतीजे उनकी उम्मीदों के बिलकुल विपरीत रहे। JDU ने लगभग 85 सीटों पर जीत हासिल कर शानदार प्रदर्शन किया और नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे। इसके अलावा, जनसुराज को एक भी सीट जीतने में सफलता नहीं मिल सकी। इससे यह पूरी तरह से साफ़ हो गया कि जनता ने उनकी पार्टी को सीधा नकार दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तथ्य को रेखांकित किया कि जनता ने उन्हें साफतौर से नकार दिया है, ऐसे में उनकी याचिका सिर्फ लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश जैसी लगती है। ऐसे में कोर्ट ने उनकी पार्टी के वरिष्ठ वकील से सवाल किया कि चुनाव में आपकी पार्टी को कितने वोट मिले, और जब जनता ने नकार दिया तो आप सुप्रीम कोर्ट क्यों आए।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने प्रशांत किशोर को तगड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि चुनाव में किसी भी प्रकार की आचार संहिता उल्लंघन की शिकायत के लिए समयसीमा निर्धारित है। चुनाव आयोग ने करीब 45 दिन तक सभी डिजिटल फुटेज और सबूत सुरक्षित रखने का प्रावधान रखा है। ऐसे में याचिका दायर करने का समयसीमा समाप्त होने के बाद कोर्ट में जाकर चुनाव रद्द करवाना स्वीकार्य नहीं है।
इस मामले पर कोर्ट ने यह भी साफ़ कर दिया है कि यदि इस मामले में कोई आपत्ति थी, तो उसे चुनाव आयोग के समक्ष वक़्त रहते उठाया जाना चाहिए था। अब कोर्ट ने इसे राजनीतिक लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश के रूप में देखा। कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति दी ताकि प्रशांत किशोर इसे पटना हाई कोर्ट में अपील कर सकें।
प्रशांत किशोर की रणनीतिक गलतफहमी
इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर राजनीतिक रणनीति में माहिर हो सकते हैं, लेकिन उन्हें अपनी स्थिति और जनता की प्रतिक्रिया को गंभीरता से समझना समझने की ज़रूरत है। बिहार चुनाव के दौरान उन्होंने मीडिया और जनता के सामने अपने दावों और हावभाव से बड़ी उम्मीदें जगाई थीं, लेकिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे।
उल्लेखनीय है कि प्रशांत किशोर की संस्था आईपैक पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति पर अभी भी काम कर रही है। चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर की रणनीति सफल रही हो सकती है, लेकिन व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा और जनता की वास्तविकता में भारी अंतर देखने को मिला।
उतर गया भूत, हेकड़ी खत्म!
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ़ किया कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और मीडिया में दिखाए गए बड़े-बड़े दावे सिर्फ और सिर्फ जनता की नजरों में उनके लिए पूरी तरह से नकारात्मक साबित हुए। कोर्ट ने कहा कि जनता ने उन्हें नकार दिया, ऐसे में न्यायालय का प्रयोग कर अपनी लोकप्रियता बढ़ाना अनुचित है।
विश्लेषकों का कहना है कि इस मामले ने यह साबित कर दिया कि राजनीतिक रणनीति और सत्ता के लिए महत्वाकांक्षा अलग बातें हैं। प्रशांत किशोर ने बिहार में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को लेकर जो बयान दिए थे, उनकी वास्तविकता में कोई पुष्टि नहीं हुई। बता दे, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उनके राजनीतिक भूत और हेकड़ी को मात्र 5 मिनट में ही निकाल दिया।
जनसुराज पार्टी के लेकर SC सख्त
बिहार चुनाव में जनसुराज पार्टी की असफलता और सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रशांत किशोर की याचिका खारिज करने से यह साफ़ हो गया है कि जनता की इच्छा सर्वोपरि है। किसी भी राजनीतिक रणनीतिकार की लोकप्रियता न्यायिक मंच पर नहीं खरीदी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से साफ संदेश दे दिया है कि न्यायालय का दुरुपयोग राजनीतिक रूप से किसी फायदे के लिए नहीं किया जा सकता।
बता दे, प्रशांत किशोर के राजनीतिक दावे और वास्तविकता के बीच का यह अंतर भविष्य में उनके राजनीतिक कदमों पर प्रभाव डाल सकता है। बिहार चुनाव के इस नतीजे ने यह भी सिद्ध कर दिया कि जनता की नज़र और न्यायपालिका की सख्ती, दोनों ही राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को परखने के लिए निर्णायक हैं।


