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पंजाब में BJP-अकाली दल आए साथ तो किसकी बढ़ेगी ताकत? 2027 चुनाव से पहले पुराने यार कर सकते हैं कमाल
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP और शिरोमणि अकाली दल के दोबारा गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं।
Punjab Election 2027: पंजाब की राजनीति में एक बार फिर पुराने दोस्तों के साथ आने की चर्चा तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) अगर 2027 के विधानसभा चुनाव में हाथ मिला लेते हैं, तो राज्य का सियासी गणित बदल सकता है। कभी दोनों पार्टियों की जोड़ी ने पंजाब में लगातार सरकार चलाई थी, लेकिन किसान आंदोलन के दौरान दोनों के रास्ते अलग हो गए।
अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल तक के बयानों ने गठबंधन की अटकलों को हवा दे दी है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि अगर दोनों पुराने साथी फिर साथ आते हैं, तो फायदा किसे होगा और क्या वे आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस को चुनौती दे पाएंगे?
अमित शाह के बयान से बढ़ी गठबंधन की चर्चा
BJP और अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन की अटकलें तब तेज हुईं, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 22 अक्टूबर को दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि पंजाब में इस बार NDA की सरकार बनने वाली है। उनके इस बयान को राज्य में BJP और अकाली दल के संभावित गठबंधन से जोड़कर देखा जा रहा है।
इसके अगले ही दिन अकाली दल के अध्यक्ष और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने भी गठबंधन को लेकर अपना रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी समान विचारधारा और कार्यक्रमों से सहमत दलों के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार है। बादल ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी पर पंजाब को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया और दोनों दलों के साथ समझौते की संभावना से इनकार किया।
हालांकि, दोनों नेताओं के बयानों से गठबंधन की चर्चा जरूर तेज हुई है, लेकिन इसे अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे और गठबंधन की शर्तों पर क्या सहमति बनती है, यह देखना अहम होगा।
2020 में क्यों टूटी थी BJP-अकाली दल की दोस्ती?
BJP और अकाली दल का गठबंधन करीब दो दशक से ज्यादा समय तक पंजाब की राजनीति में अहम भूमिका निभाता रहा। दोनों पार्टियों ने 1997 के विधानसभा चुनाव में औपचारिक रूप से साथ चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। उस चुनाव में गठबंधन को 117 में से 93 सीटें मिली थीं।
इसके बाद दोनों दलों ने कई चुनाव साथ लड़े। गठबंधन की ताकत यह थी कि अकाली दल का ग्रामीण इलाकों, सिख मतदाताओं और किसानों के बीच प्रभाव माना जाता था, जबकि BJP शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ रखती थी। दोनों की ताकत मिलकर उन्हें एक मजबूत राजनीतिक विकल्प बनाती थी।
लेकिन सितंबर 2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों पार्टियों के रास्ते अलग हो गए। केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब समेत देश के कई हिस्सों में किसानों का आंदोलन चल रहा था। अकाली दल ने इन कानूनों के विरोध में NDA से नाता तोड़ लिया। बाद में केंद्र सरकार ने आंदोलन के बीच तीनों कृषि कानून वापस ले लिए।
अब करीब छह साल बाद दोनों दलों के फिर साथ आने की संभावना पर चर्चा हो रही है। अगर गठबंधन होता है, तो दोनों को अपने पुराने वोट बैंक को दोबारा मजबूत करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
1997 से 2017 तक कैसा रहा गठबंधन का प्रदर्शन?
BJP और अकाली दल की जोड़ी ने पंजाब में कई बार अच्छा प्रदर्शन किया। 1997 में 93 सीटें जीतने के बाद 2002 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन को बड़ा झटका लगा और दोनों पार्टियां मिलकर 44 सीटें ही जीत सकीं।
2007 में गठबंधन ने वापसी की और 67 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2012 के चुनाव में भी दोनों दलों ने सत्ता बरकरार रखी और कुल 68 सीटें जीतीं। इन नतीजों ने दिखाया कि ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के बीच दोनों पार्टियों का तालमेल उन्हें चुनावी फायदा पहुंचा सकता था।
लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर बदल गई। कांग्रेस ने 77 सीटें जीतकर सरकार बनाई, जबकि अकाली दल और BJP का गठबंधन सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गया। इसी चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी 20 सीटें जीतकर पंजाब की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।
2020 में गठबंधन टूटने के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां अलग-अलग मैदान में उतरीं। अकाली दल को सिर्फ तीन सीटें मिलीं, जबकि BJP दो सीटों पर जीत दर्ज कर सकी। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने 92 सीटें जीतकर सरकार बना ली। इन नतीजों से साफ हुआ कि अलग-अलग चुनाव लड़ने पर दोनों पुराने सहयोगियों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।
BJP और अकाली दल साथ आए तो किसे होगा फायदा?
संभावित गठबंधन का सबसे बड़ा फायदा दोनों पार्टियों के वोट बैंक को एक साथ लाने में हो सकता है। अकाली दल का पारंपरिक आधार ग्रामीण पंजाब, किसान समुदाय और सिख मतदाताओं के बीच माना जाता है। वहीं BJP की पकड़ शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में रही है।
अगर दोनों दल एक साथ चुनाव लड़ते हैं और उनके समर्थकों के वोट एक-दूसरे के उम्मीदवारों को मिलते हैं, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। लेकिन सिर्फ गठबंधन कर लेने से जीत पक्की नहीं हो जाती। इसके लिए दोनों पार्टियों को अपने समर्थकों को साथ बनाए रखना होगा और उम्मीदवारों के चयन से लेकर सीटों के बंटवारे तक हर मुद्दे पर सहमति बनानी होगी।
अकाली दल के सामने एक बड़ी चुनौती अपने पुराने जनाधार को वापस हासिल करने की भी है। वहीं BJP को यह देखना होगा कि पंजाब में उसका बढ़ता राजनीतिक प्रभाव गठबंधन के भीतर किस तरह जगह पाता है। ऐसे में दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा और नेतृत्व की भूमिका भी अहम मुद्दे बन सकते हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े क्या संकेत देते हैं?
2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखें, तो BJP और अकाली दल के संभावित गठबंधन को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। चुनावी आंकड़ों के एक विश्लेषण में दावा किया गया कि दोनों पार्टियों के वोट जोड़ने पर कई विधानसभा क्षेत्रों में उनकी स्थिति मजबूत दिखाई देती थी।
इस विश्लेषण के मुताबिक, BJP 23 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी, जबकि अकाली दल नौ क्षेत्रों में बढ़त बनाए हुए था। अलग-अलग क्षेत्रों में दोनों दलों के वोट जोड़ने पर कुल 58 विधानसभा सीटों पर बढ़त का अनुमान लगाया गया। पंजाब विधानसभा में बहुमत के लिए 59 सीटों की जरूरत होती है।
हालांकि, लोकसभा चुनाव में मिले वोटों को सीधे विधानसभा चुनाव के नतीजों में बदलकर नहीं देखा जा सकता। दोनों चुनावों के मुद्दे अलग हो सकते हैं और विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार, स्थानीय समस्याएं तथा राज्य सरकार के कामकाज जैसे मुद्दे ज्यादा प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए इन आंकड़ों को संभावित गठबंधन की ताकत का संकेत माना जा सकता है, जीत की गारंटी नहीं।
2027 में AAP और कांग्रेस के सामने कितनी बड़ी चुनौती?
अगर BJP और अकाली दल के बीच गठबंधन होता है, तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के सामने मुकाबले की नई चुनौती खड़ी हो सकती है। दोनों पार्टियां अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में एक-दूसरे की मदद कर सकती हैं। इससे चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने के बजाय कुछ सीटों पर सीधा और कड़ा भी हो सकता है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर खींचतान हुई या कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल नहीं बैठा, तो इसका नुकसान भी हो सकता है। दोनों दलों को यह भी तय करना होगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी पार्टी चुनाव लड़ेगी और सहयोगी दल के उम्मीदवार को कितना समर्थन मिलेगा।
इसके अलावा, 2027 के चुनाव में राज्य की मौजूदा सरकार का प्रदर्शन, किसानों के मुद्दे, बेरोजगारी, विकास और मतदाताओं की स्थानीय नाराजगी भी असर डाल सकती है।
पुराने यारों की वापसी से बदलेगा पंजाब का सियासी खेल?
फिलहाल BJP और अकाली दल के संभावित गठबंधन को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर दोनों दलों के फैसले के बाद ही साफ होगी। इतिहास बताता है कि साथ रहते हुए दोनों पार्टियां पंजाब में सत्ता हासिल कर चुकी हैं, जबकि अलग-अलग चुनाव लड़ने पर 2022 में उनका प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था।
अगर दोनों दल फिर हाथ मिलाते हैं, तो उन्हें पुराने वोट बैंक को जोड़ने के साथ-साथ नए राजनीतिक हालात के हिसाब से रणनीति भी बनानी होगी। सीटों का बंटवारा, उम्मीदवारों का चयन और मतदाताओं का भरोसा तय करेगा कि यह पुरानी दोस्ती 2027 में कितना कमाल दिखा पाती है।


