पंजाब में 2027 की सियासी बिसात तैयार! अकाली दल का बड़ा ऐलान, अमित शाह ने दिए NDA के संकेत

Punjab Election 2027 SAD BJP Alliance: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सुखबीर सिंह बादल ने कांग्रेस और AAP को छोड़ अन्य दलों से गठबंधन के संकेत दिए। अमित शाह के NDA सरकार वाले बयान से BJP-SAD गठबंधन की अटकलें तेज।

Alakha Singh
Published on: 23 Oct 2026 4:41 PM IST (Updated on: 23 Oct 2026 5:01 PM IST)
पंजाब में 2027 की सियासी बिसात तैयार! अकाली दल का बड़ा ऐलान, अमित शाह ने दिए NDA के संकेत
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Punjab Election 2027: पंजाब की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की संभावनाओं ने जोर पकड़ लिया है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) को गठबंधन की दौड़ से बाहर कर बाकी दलों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। दूसरी तरफ, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पंजाब में NDA सरकार बनने का दावा राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे रहा है। दोनों बयानों को साथ रखकर देखें तो सवाल उठता है कि क्या भाजपा और अकाली दल एक बार फिर पुराने रिश्ते बहाल करने की जमीन तैयार कर रहे हैं?

हालांकि, अभी तक दोनों दलों ने गठबंधन का औपचारिक ऐलान नहीं किया है। भाजपा पहले पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह चुकी है। ऐसे में सुखबीर बादल का खुला प्रस्ताव और अमित शाह का NDA सरकार को लेकर भरोसा जताना आगामी चुनाव के लिए अहम राजनीतिक संकेत जरूर हैं, लेकिन इन्हें गठबंधन की पुष्टि मानना जल्दबाजी होगी।

सुखबीर बादल का संदेश: कांग्रेस-AAP से दूरी, बाकी दलों के लिए रास्ता खुला

शिरोमणि अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ किसी भी परिस्थिति में गठबंधन नहीं करेगी। हालांकि, उन्होंने उन दलों के साथ हाथ मिलाने की संभावना खुली रखी है, जो अकाली दल की विचारधारा और कार्यक्रमों से सहमत हों।

सुखबीर बादल ने कहा, "अकाली दल एक क्षेत्रीय पार्टी है और हमारे लिए पंजाब सबसे पहले है। हम सरकार बनाएं या न बनाएं, पंजाब के लोगों के लिए लड़ते रहेंगे। हमारी नजर में पंजाब के दो सबसे बड़े दुश्मन कांग्रेस और आम आदमी पार्टी हैं। इन पार्टियों के साथ हमारा कभी कोई गठबंधन नहीं हो सकता। हालांकि, हम उन अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार हैं, जो शिरोमणि अकाली दल की विचारधारा और कार्यक्रमों से सहमत हैं।"

बादल के इस बयान के राजनीतिक मायने अहम हैं। उन्होंने भाजपा का नाम लेकर गठबंधन की घोषणा नहीं की, लेकिन कांग्रेस और AAP को बाहर रखने के बाद अन्य दलों के लिए रास्ता खुला छोड़ दिया है। पंजाब में भाजपा के साथ संभावित तालमेल की चर्चा के बीच इसे एक रणनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

अमित शाह के बयान ने क्यों बढ़ाई गठबंधन की चर्चा?

इस सियासी तस्वीर का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान है। दिल्ली में यमुना नदी के पुनरुद्धार से जुड़ी परियोजनाओं की शुरुआत के दौरान शाह ने कहा कि वह एक दिन पहले ही पंजाब में थे। उन्होंने राज्य में AAP सरकार के कार्यकाल के दौरान नशीले पदार्थों के कारोबार के बढ़ने का आरोप लगाया और दावा किया कि लोगों ने 2027 में पंजाब में NDA सरकार बनाने का फैसला कर लिया है।

शाह के बयान का सीधा राजनीतिक संदेश AAP सरकार को निशाने पर लेना और NDA के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश है। लेकिन पंजाब में NDA की सरकार बनाने की बात अपने आप में यह स्पष्ट नहीं करती कि भाजपा किस दल के साथ चुनाव लड़ेगी या अकाली दल के साथ सीटों का समझौता होगा।

यहीं सुखबीर बादल और अमित शाह के बयानों के बीच राजनीतिक कड़ी दिखाई देती है। एक तरफ अकाली दल ने भाजपा समेत संभावित सहयोगियों के लिए दरवाजा खुला रखा है, तो दूसरी तरफ भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पंजाब में NDA की सत्ता वापसी का दावा कर रहा है। इससे गठबंधन की अटकलों को बल मिलता है, लेकिन अंतिम तस्वीर अभी सामने नहीं आई है।

भाजपा की मुश्किल: अकेले चुनाव लड़ने का दावा या पुराने साथी की वापसी?

भाजपा फिलहाल अकाली दल के साथ गठबंधन को लेकर सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट सहमति जाहिर नहीं कर रही है। अगस्त में पार्टी ने पंजाब की सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता सतीश पूनिया ने कहा था कि पार्टी अपनी ताकत और क्षमता के आधार पर सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनसे पूछा गया कि क्या इसका मतलब गठबंधन नहीं करना है, तो उन्होंने इसका जवाब हां में दिया था। साथ ही, उन्होंने कहा था कि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा।

इससे पहले 19 सितंबर को केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी अकाली दल के साथ गठबंधन की संभावना को लेकर सख्त रुख दिखाया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा अकाली दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। साथ ही, उन्होंने स्पष्ट किया था कि यदि भविष्य में दोनों दल साथ आते हैं, तो सीटों का बंटवारा समान शर्तों पर होना चाहिए। उनके मुताबिक, पुराने 22 सीटों वाले फॉर्मूले के आधार पर भाजपा अब छोटे सहयोगी की भूमिका में नहीं रहना चाहती।

इन बयानों से भाजपा की रणनीतिक प्राथमिकता स्पष्ट होती है। पार्टी पंजाब में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाना चाहती है और किसी भी संभावित गठबंधन में पहले जैसी सीमित भूमिका स्वीकार करने के मूड में नहीं दिखती। इसलिए, यदि अकाली दल के साथ बातचीत आगे बढ़ती भी है, तो सीटों का बंटवारा और नेतृत्व की भूमिका सबसे बड़े मुद्दे बन सकते हैं।

गठबंधन की अटकलें क्यों थम नहीं रहीं?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा से जुड़े एक सूत्र ने कहा कि दोनों पक्षों में से किसी ने भी गठबंधन की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। रिपोर्ट में एक भाजपा नेता के हवाले से कहा गया कि यदि पार्टी पंजाब में किसी दल के साथ गठबंधन करती है, तो अकाली दल एक संभावित विकल्प होगा।

सूत्रों के मुताबिक, अकाली दल भाजपा का पुराना सहयोगी रहा है और दोनों दलों के बीच राजनीतिक तालमेल की संभावना अन्य विकल्पों की तुलना में अधिक मानी जा रही है। हालांकि, बातचीत किन मुद्दों पर होती है और दोनों पक्ष सीटों के बंटवारे पर किस तरह सहमत होते हैं, यह निर्णायक होगा।

भाजपा के सामने एक तरफ सभी सीटों पर अकेले लड़ने का घोषित रुख है, तो दूसरी तरफ पंजाब में सत्ता तक पहुंचने के लिए संभावित सहयोगियों की जरूरत का सवाल है। वहीं, अकाली दल के लिए भी गठबंधन राजनीतिक वापसी का रास्ता बन सकता है, बशर्ते उसे अपनी क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक हिस्सेदारी से समझौता न करना पड़े।

2020 में टूटा था गठबंधन, अब क्या फिर साथ आएंगे दोनों दल?

भाजपा और शिरोमणि अकाली दल लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में सहयोगी रहे। हालांकि, केंद्र के कृषि कानूनों को लेकर वर्ष 2020 में दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। अकाली दल ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था। इसके बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनावी राह अपनाई।

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने जीत दर्ज कर सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही। भगवंत मान मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव ने पंजाब की राजनीति में पारंपरिक दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी।

अब 2027 के चुनाव से पहले अकाली दल कांग्रेस और AAP को स्पष्ट रूप से खारिज कर रहा है, जबकि भाजपा NDA की सरकार बनाने का दावा कर रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच संभावित तालमेल की चर्चा स्वाभाविक है।

सियासी विश्लेषण: गठबंधन से ज्यादा सीटों और नेतृत्व की लड़ाई अहम

पंजाब में भाजपा-अकाली दल के संभावित गठबंधन की राह में सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक इच्छा से ज्यादा शर्तों की हो सकती है। अकाली दल पंजाब में अपनी क्षेत्रीय पहचान और पारंपरिक जनाधार को बनाए रखना चाहेगा, जबकि भाजपा अब पहले की तरह सीमित सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार दिखाई नहीं देती।

सुखबीर बादल का बयान गठबंधन के लिए सैद्धांतिक दरवाजा खोलता है, लेकिन भाजपा को नाम लेकर आमंत्रित नहीं करता। वहीं, अमित शाह का NDA सरकार बनाने का दावा भाजपा के चुनावी आत्मविश्वास को दिखाता है, पर यह नहीं बताता कि उस सरकार तक पहुंचने का रास्ता अकेले चुनाव लड़कर बनेगा या पुराने सहयोगी के साथ।

फिलहाल दोनों दलों के बयानों में संभावनाएं जरूर दिखाई देती हैं, लेकिन औपचारिक सहमति नहीं। यदि गठबंधन की बातचीत आगे बढ़ती है, तो सबसे अहम सवाल यही होगा कि भाजपा और अकाली दल कितनी सीटों पर समझौता करते हैं और क्या दोनों पार्टियां पुरानी साझेदारी के नए समीकरण पर सहमत हो पाती हैं। 2027 की चुनावी लड़ाई में पंजाब का राजनीतिक गणित इसी फैसले से काफी हद तक प्रभावित हो सकता है।

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Alakha Singh is a Senior journalist with having more than one decade of experience in digital media. Alakha Singh has covered Loksabha Elections 2014 and 2019 closely with the several state assembly elections. He has expertise in SEO oriented content writing on various topics and issues. At HT Digital Alakha Singh has been recognised as one of the top performer of the team for many years continuously. At Livehindustan Alakha has worked on National, States and Utility beats (Career Beat in last 4 years mainly), Earlier he worked with HT Digital for more than 8 years and 2.5 years with Amar Ujala web. In initial days of his career Alakha Singh also worked as a reporter (stringer) with NBT Gurgaon. He pursued P.G. Diploma in Journalism from South Campus, University of Delhi in 2013 and MAMC from Kurukshetra University in 2014. He Belongs to District Banda of Uttar Pradesh.

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