राजस्थान में प्रसूताओं की मौत का जिम्मेदार कौन? अस्पतालों में चल रहा मौत का खेल, जांच में खुलीं पोल

Rajasthan Maternal Deaths: राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की लगातार मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोटा के बाद भीलवाड़ा और जोधपुर में भी प्रसूताओं की मौत, OT में संक्रमण और फेल दवाओं की जांच में खुली बड़ी पोल।

Harsh Srivastava
Published on: 11 July 2026 7:57 PM IST
राजस्थान में प्रसूताओं की मौत का जिम्मेदार कौन? अस्पतालों में चल रहा मौत का खेल, जांच में खुलीं पोल
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Rajasthan Maternal Deaths: राजस्थान में पिछले कुछ समय से सरकारी चिकित्सा व्यवस्था और माताओं की सुरक्षा को लेकर एक बेहद डरावना और चिंताजनक माहौल बन गया है। राज्य के अलग-अलग बड़े जिलों से सामने आ रही नवविवाहित महिलाओं और प्रसूताओं की मौतों ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद या सीजेरियन डिलीवरी (C-Section) होने के कुछ ही घंटों के भीतर महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ने और उनकी जान जाने की लगातार घटनाओं ने राजस्थान की संपूर्ण स्वास्थ्य प्रणाली, डॉक्टरों की मुस्तैदी और प्रशासनिक चौकसी की पोल खोलकर रख दी है। कोटा, बीकानेर, जोधपुर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जैसे बड़े और प्रमुख जिलों में सामने आए इन दर्दनाक मामलों के बाद अब राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक में हड़कंप मचा हुआ है। अलग-अलग स्तर की विशेषज्ञ कमेटियां, वरिष्ठ डॉक्टर और ड्रग कंट्रोल विभाग रात-दिन इस पूरे खूनी खेल की गहन जांच में जुटे हुए हैं।

कोटा से शुरू हुआ मौत का तांडव

इस पूरे खौफनाक सिलसिले की शुरुआत मई 2026 में राजस्थान के बड़े शिक्षा और मेडिकल हब माने जाने वाले कोटा जिले से हुई थी। कोटा के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में महज कुछ ही दिनों के भीतर 5 प्रसूता माताओं की अचानक हुई दर्दनाक मौतों ने पूरे राज्य के प्रशासनिक महकमे को हिला दिया। सरकारी आंकड़ों और मेडिकल रिकॉर्ड के मुताबिक, इन सभी पीड़ित महिलाओं की सीजेरियन डिलीवरी बिल्कुल सामान्य तरीके से हुई थी। लेकिन ऑपरेशन सफल होने के बाद जैसे ही उन्हें जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया, अचानक उनकी हालत पागलों की तरह बिगड़ने लगी।

देखते ही देखते उनकी सांसें थम गईं और उन्होंने दम तोड़ दिया। इतना ही नहीं, इसी अस्पताल के भीतर कई अन्य प्रसूता महिलाओं के शरीर में भी भयंकर इंफेक्शन फैल गया और उनकी दोनों किडनियां फेल (Renal Failure) होने जैसी जानलेवा नौबत आ गई। इस भारी जन आक्रोश और हंगामे को देखते हुए दिल्ली एम्स (AIIMS), जयपुर के एसएमएस (SMS) अस्पताल और राष्ट्रीय स्तर के शीर्ष डॉक्टरों की एक उच्च स्तरीय टीम तुरंत कोटा भेजी गई। इस विशेष टीम ने अस्पताल के वार्डों, साफ-सफाई और इलाज के तरीकों की बारीकी से जांच शुरू की।

ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन पर गहराया शक

कोटा के अस्पताल में हुई इन शुरुआती मौतों के बाद डॉक्टरों और जांच टीम को सबसे बड़ा संदेह प्रसव के समय इस्तेमाल होने वाले ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) इंजेक्शन पर हुआ। मेडिकल की दुनिया में ऑक्सीटोसिन को एक बहुत ही जीवन रक्षक और जरूरी दवा माना जाता है। इसका मुख्य काम डिलीवरी के समय गर्भाशय के संकुचन को बढ़ाना और बच्चे के जन्म के ठीक बाद मां के शरीर से होने वाले भारी ब्लीडिंग (Postpartum Hemorrhage) को समय रहते रोकना होता है। जब जांच में पता चला कि मृत महिलाओं के शरीर से अत्यधिक खून बह गया था, तो शक सीधे इस इंजेक्शन की क्वालिटी पर चला गया। ड्रग कंट्रोल विभाग ने तुरंत कड़ा एक्शन लेते हुए इस दवा को बनाने वाली जैक्सन लैबोरेट्रीज़ (Jackson Laboratories) के लाइसेंस को सस्पेंड कर दिया और पूरे प्रदेश में इस दवा की सप्लाई पर रोक लगा दी। हालांकि, बाद में डॉक्टरों की बड़ी कमेटी ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में साफ किया कि केवल इस एक इंजेक्शन को ही मौतों का एकमात्र विलेन नहीं ठहराया जा सकता। मौतों के पीछे शरीर में जहर फैलना (Sepsis), फेफड़ों की नसों में खून का थक्का जमना (Pulmonary Embolism) और महिलाओं में पहले से मौजूद गंभीर खून की कमी (Anemia) जैसे कई अन्य मेडिकल कारण भी जिम्मेदार थे।

डायनोप्रोस्टोन जेल भी टेस्ट में फेल

कोटा कांड की परतें जैसे-जैसे खुलती गईं, स्वास्थ्य विभाग के सामने एक और बेहद चौंकाने वाला सच सामने आया। सामान्य और सुरक्षित डिलीवरी के लिए इस्तेमाल होने वाले एक और खास केमिकल डायनोप्रोस्टोन जेल (Dinoprostone Gel) का एक विशेष बैच सरकारी लैब के क्वालिटी टेस्ट में पूरी तरह से फेल हो गया। इस जेल का इस्तेमाल गर्भवती महिलाओं को प्रसव पीड़ा शुरू कराने (Labor Induction) के लिए डॉक्टरों द्वारा किया जाता है। जैसे ही इस दवा के घटिया और असुरक्षित होने की रिपोर्ट सामने आई, पूरे राजस्थान के मेडिकल स्टोर्स और अस्पतालों में हड़कंप मच गया। सरकार ने तुरंत इस जेल की बिक्री और इस्तेमाल पर पूरी तरह से ताला लगा दिया। हालांकि, स्वास्थ्य विभाग के बड़े अफसरों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जनता को शांत करने की कोशिश की और कहा कि केवल एक जेल के फेल होने से यह नहीं कहा जा सकता कि पूरे प्रदेश में हो रही सभी मौतें इसी वजह से हुई हैं। इसकी एक अलग से वैज्ञानिक जांच की जा रही है।

भीलवाड़ा के ऑपरेशन थिएटर में मिला 'जहर'

अभी कोटा का मामला पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि जुलाई के महीने में भीलवाड़ा जिले के सबसे बड़े महात्मा गांधी अस्पताल से एक और बेहद दुखद खबर आई। यहां महज 6 दिनों के भीतर 5 प्रसूता महिलाओं की लगातार मौत ने सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा दीं। इस बार मामला किसी खराब दवा का नहीं, बल्कि अस्पताल प्रशासन की सबसे बड़ी लापरवाही और गंदगी का था। जब जयपुर से आई डॉक्टरों की टीम ने अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर (OT) की जांच की और वहां के सैंपल लिए, तो उसकी कल्चर रिपोर्ट में बेहद खतरनाक और जानलेवा बैक्टीरियल संक्रमण की पुष्टि हुई। यह चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी लापरवाही थी, क्योंकि जिस जगह मरीज का पेट चीरा जाता है, वह जगह 100% कीटाणुमुक्त होनी चाहिए थी। इस रिपोर्ट के आते ही सरकार ने भीलवाड़ा के उस ऑपरेशन थिएटर को तुरंत सील कर दिया और वहां बड़े पैमाने पर सैनिटाइजेशन और गैस से सफाई (Fumigation) का काम शुरू करवाया।

जोधपुर और बीकानेर में भी मचा हड़कंप

माताओं की मौत का यह जानलेवा साया सिर्फ कोटा या भीलवाड़ा तक सीमित नहीं रहा। पश्चिमी राजस्थान के दो सबसे बड़े मेडिकल केंद्रों, बीकानेर और जोधपुर से भी ऐसी ही डरावनी खबरें सामने आईं। बीकानेर के प्रसिद्ध पीबीएम (PBM) अस्पताल में 2 प्रसूताओं की अचानक मौत और कई अन्य महिलाओं की तबीयत बिगड़ने के बाद हड़कंप मच गया। वहीं दूसरी तरफ, जोधपुर के पावटा जिला अस्पताल में सीजेरियन ऑपरेशन के बाद अचानक 8 महिलाओं की हालत एक साथ इतनी ज्यादा बिगड़ गई कि पूरे अस्पताल में चीख-पुकार मच गई। स्थिति आउट ऑफ कंट्रोल होते देख इनमें से 2 महिलाओं को तुरंत वेंटिलेटर और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर आईसीयू (ICU) में भर्ती करना पड़ा। इन लगातार हादसों से डरी-सहमी राज्य सरकार ने आखिरकार राजस्थान के सभी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों को कड़े शब्दों में आदेश जारी किया कि वे अपने यहां साफ-सफाई और ऑपरेशन के नियमों (SOP) का सख्ती से पालन करें।

कोटा की भूल भीलवाड़ा में क्यों दोहराई?

भीलवाड़ा के अस्पताल में एक के बाद एक 5 माताओं की मौत के बाद आज जनता सरकार और स्वास्थ्य महकमे से एक बेहद तीखा और चुभने वाला सवाल पूछ रही है। सवाल यह है कि जब मई के महीने में कोटा के अस्पताल में 5 मौतें हुई थीं और वहां की जांच कमेटी ने साफ-साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटरों में खतरनाक इंफेक्शन फैल रहा है, तो फिर भीलवाड़ा के प्रशासन ने समय रहते अपने ऑपरेशन थिएटर की सफाई क्यों नहीं की? अगर कोटा के हादसे से सबक लेकर उसी वक्त राजस्थान के सभी सरकारी अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर्स को पूरी तरह से कीटाणुमुक्त और साफ कर दिया जाता, तो आज भीलवाड़ा और बीकानेर में इन बेकसूर माताओं की जान नहीं जाती। इन लापरवाह अफसरों की वजह से आज कई मासूम नवजात बच्चे अपनी मां के आंचल और दूध से हमेशा के लिए महरूम हो गए हैं।

आखिर क्यों जा रही है माताओं की जान?

सीनियर डॉक्टरों, मेडिकल ऑडिट और जांच कमेटियों की रिपोर्ट को अगर आसान शब्दों में समझें, तो इन मौतों के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित 6 बड़े प्रशासनिक और मेडिकल कारण सामने आए हैं:

अत्यधिक ब्लीडिंग (PPH): बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के शरीर से बहुत ज्यादा मात्रा में खून बह जाना, जिसे डॉक्टर समय पर नहीं रोक पाए।

खून में जहर फैलना (Sepsis): गंदे और बिना धुले सर्जिकल उपकरणों या दूषित वार्ड के कारण महिलाओं के शरीर में खतरनाक इंफेक्शन का फैल जाना।

नसों में खून का जमना (Pulmonary Embolism): ऑपरेशन के बाद शरीर के भीतर खून का थक्का बनकर फेफड़ों की मुख्य नसों में फंस जाना, जिससे अचानक सांस रुक जाती है।

अंगों का काम बंद करना (Multi-Organ Failure): भारी इंफेक्शन या शरीर से पूरा खून बह जाने के कारण किडनी, लिवर और दिल का एक साथ फेल हो जाना।

गंभीर एनीमिया: राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के शरीर में पहले से ही खून की भारी कमी होती है। ऐसे में डिलीवरी के दौरान थोड़ा सा भी खून बहने पर उनकी जान पर बन आती है।

लापरवाह पोस्ट-ऑपरेटिव केयर: ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकालने के बाद डॉक्टरों और नर्सों द्वारा शुरुआती 24 से 48 घंटों तक मरीज के ब्लड प्रेशर, पल्स और यूरिन आउटपुट की सही तरीके से और नियमित मॉनिटरिंग न करना।

दिल्ली तक गूंज और 3-स्तरीय नया कानून

राजस्थान में माताओं की मौत के इन सिलसिलेवार मामलों की गूंज अब देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुकी है। केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए राजस्थान सरकार से 24 घंटे के भीतर एक विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की है। चौतरफा आलोचनाओं से घिरी राज्य सरकार ने अब अपनी कमियों को छुपाने और व्यवस्था को सुधारने के लिए दवाओं की जांच और खरीद की पूरी नीति को ही बदल दिया है।

सरकार ने पूरे राज्य में एक नया और ऐतिहासिक 'तीन-स्तरीय ड्रग टेस्टिंग सिस्टम' (Three-Tier Drug Testing System) लागू करने का फैसला किया है। इस नए नियम के मुताबिक, अब कोई भी जीवन रक्षक दवा मरीजों तक पहुंचने से पहले 3 अलग-अलग बड़ी सरकारी लैबोरेट्रीज के कड़े टेस्ट से गुजरेगी और तीनों जगह पास होने के बाद ही उसे अस्पताल के वार्ड में भेजा जाएगा। बहरहाल, सरकार भले ही अब नए नियम बना रही हो, लेकिन इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि राजस्थान का पूरा सरकारी मेडिकल सिस्टम इस वक्त खुद वेंटिलेटर पर आ चुका है और उसे एक बड़े इलाज की सख्त जरूरत है।

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हर्ष श्रीवास्तव वाराणसी के रहने वाले पत्रकार और डिजिटल कंटेंट प्रोफेशनल हैं। वर्तमान में वे लखनऊ स्थित न्यूज़ट्रैक में डेस्क इंचार्ज के पद पर कार्यरत हैं। यहां वे कंटेंट प्लानिंग, एडिटोरियल कोऑर्डिनेशन, न्यूज़रूम संचालन के साथ-साथ रिसर्च आधारित एक्सप्लेनर, न्यूज़ फीचर और विश्लेषणात्मक लेख तैयार करते हैं। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है। उन्होंने वर्ष 2023 में पत्रकारिता की शुरुआत की और हिन्दुस्तान, टाइम्स इंटरनेट, इंडिया न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। वाराणसी, दिल्ली और लखनऊ में काम करने के दौरान उन्हें रिपोर्टिंग, कंटेंट राइटिंग और डिजिटल पत्रकारिता का अनुभव प्राप्त हुआ। हर्ष की विशेष रुचि राजनीति, चुनाव, अपराध, सार्वजनिक नीति, सुशासन और समसामयिक विषयों पर शोध-आधारित पत्रकारिता में है। वे गहन रिसर्च, फैक्ट-चेकिंग और सरल भाषा के माध्यम से जटिल विषयों को पाठकों तक सटीक, विश्वसनीय और प्रभावी ढंग से पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

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