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‘दिमागी नक्सलियों’ पर रविशंकर प्रसाद का कांग्रेस पर हमला, बोले- दिल्ली-मुंबई में बैठकर माओवाद को देते हैं खाद-पानी
Ravi Shankar Prasad: पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ बयान पर सियासी घमासान के बीच रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस और माओवादी विचारधारा का समर्थन करने वालों पर निशाना साधा। उन्होंने नक्सलवाद के वैचारिक समर्थन पर सवाल उठाए।
Ravi Shankar Prasad
Ravi Shankar Prasad: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में ‘दिमागी नक्सलियों’ का जिक्र किए जाने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। इसी मुद्दे पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस और माओवादी विचारधारा का समर्थन करने वालों पर तीखा हमला बोला।
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि देश में सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई हुई है, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो शहरों में बैठकर इस विचारधारा को वैचारिक और आर्थिक समर्थन देने का काम करते हैं। उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा बताते हुए कहा कि दिल्ली, मुंबई और पटना के AC कमरों में बैठने वाले कुछ लोग माओवाद को खाद-पानी देते हैं। ऐसे लोग अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करके पैसा और व्यवस्था उपलब्ध कराने के साथ-साथ नक्सली हिंसा और अपराध को सही ठहराने का प्रयास करते हैं।
बीजेपी नेता ने अपने बयान में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम का भी जिक्र किया। उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार के दौरान हुई एक बड़ी नक्सली घटना को याद करते हुए कहा कि नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के जवानों की हत्या की थी। रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया कि उस दौर में पी. चिदंबरम की ओर से नक्सलियों से बातचीत की बात कही गई थी।
उन्होंने जेएनयू में नक्सल समर्थक तत्वों के सम्मान से जुड़े कार्यक्रम का भी उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब सुरक्षा बलों के जवान नक्सली हिंसा में मारे जा रहे थे, तब देश के विश्वविद्यालयों में ऐसी विचारधारा का महिमामंडन क्यों किया जा रहा था।
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि नक्सलवाद और माओवाद को सिर्फ जंगल में बंदूक लेकर घूमने वालों तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। उनके मुताबिक, जो लोग इस हिंसक विचारधारा को वैचारिक समर्थन देते हैं, उसके लिए संसाधन जुटाते हैं या हिंसा को सही ठहराने की कोशिश करते हैं, वे भी इस समस्या का हिस्सा हैं।
उन्होंने विपक्ष से सवाल करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान पर सवाल उठाने से पहले यह समझना होगा कि नक्सलवाद की विचारधारा किस तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बनती है।


