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MRI बनाने वाले रेमंड डेमेडियन को नोबेल क्यों नहीं मिला? पूरी कहानी
MRI Nobel Prize Controversy Explained: रेमंड डेमेडियन ने MRI तकनीक के विकास में क्या योगदान दिया और 2003 का नोबेल पुरस्कार उन्हें क्यों नहीं मिला? जानिए डेमेडियन, पॉल लॉटरबर और पीटर मैन्सफील्ड की भूमिका और नोबेल विवाद की पूरी कहानी।
MRI Nobel Prize Controversy Explained in Hindi
MRI Nobel Prize Controversy Explained: आज दुनिया के लगभग हर बड़े अस्पताल में एमआरआई मशीन मौजूद है। बिना शरीर को चीरे फाड़े, यह मशीन शरीर के अंदर की बेहद बारीक तस्वीरें खींच सकती है, जिससे डॉक्टर कैंसर, चोट, दिमागी बीमारियों और न जाने कितनी ही समस्याओं का पता लगा पाते हैं। लेकिन इस जीवनरक्षक तकनीक को संभव बनाने वाले असली इंसान का नाम कितने लोग जानते हैं, यह एक बड़ा सवाल है। जब 2003 में इसी खोज के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया, तो उनका नाम पूरी तरह गायब था। यह कहानी है डॉक्टर रेमंड डेमेडियन की, जिन्हें आज भी बहुत से विशेषज्ञ एमआरआई तकनीक का असली जनक मानते हैं।
डेमेडियन ने असल में क्या किया था
रेमंड डेमेडियन एक अमेरिकी डॉक्टर और वैज्ञानिक थे, जिन्होंने 1971 में एक बेहद अहम खोज की। उन्होंने पाया कि कैंसर से प्रभावित शरीर के ऊतक और सामान्य स्वस्थ ऊतक चुंबकीय अनुनाद यानी 'न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस' के प्रति अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं। यह खोज उन्होंने विज्ञान की एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित की। और इसी खोज के आधार पर उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि इस अंतर का इस्तेमाल करके इंसानी शरीर के भीतर की तस्वीर खींचने वाली एक मशीन बनाई जा सकती है, जिससे बिना ऑपरेशन किए ही शरीर के भीतर कैंसर जैसी बीमारियों का पता लगाया जा सके। उन्होंने 1972 में इस विचार को लेकर एक पेटेंट भी दाखिल किया। इसके बाद डेमेडियन ने अपनी टीम के साथ मिलकर वाकई एक ऐसी मशीन बनाने पर काम शुरू किया, जिसे उन्होंने खुद इंडोमिटेबल यानी अजेय नाम दिया। 1977 में उन्होंने और उनके साथी वैज्ञानिकों ने इसी मशीन के जरिए दुनिया की पहली पूरे शरीर की एमआरआई स्कैनिंग एक जीवित इंसान पर सफलतापूर्वक की।
दूसरे वैज्ञानिकों का योगदान भी अहम रहा
डेमेडियन की खोज के बाद पॉल लॉटरबर नाम के एक रसायनशास्त्री ने 1973 में एक ऐसी तकनीक विकसित की जिससे चुंबकीय अनुनाद के डेटा से असल में एक स्पष्ट तस्वीर बनाई जा सके। उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि उन्हें यह विचार डेमेडियन के 1971 के शुरुआती काम से मिली प्रेरणा से आया। इसके एक साल बाद ब्रिटेन के भौतिकशास्त्री पीटर मैन्सफील्ड ने एक तेज और बेहतर तरीका खोजा जिससे तस्वीरें और भी जल्दी और साफ बनाई जा सकें। यानी तीनों वैज्ञानिकों का काम एक दूसरे पर टिका हुआ था, डेमेडियन ने मूल वैज्ञानिक सिद्धांत और पहली असली मशीन दी, जबकि लॉटरबर और मैन्सफील्ड ने उसी सिद्धांत को साफ और तेज तस्वीरों में बदलने वाली तकनीक विकसित की।
2003 में नोबेल पुरस्कार की घोषणा और विवाद
अक्टूबर 2003 में नोबेल समिति ने एमआरआई तकनीक के विकास के लिए चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार पॉल लॉटरबर और पीटर मैन्सफील्ड को देने की घोषणा की। इस सूची में रेमंड डेमेडियन का नाम शामिल नहीं था। यह बेहद हैरान करने वाली बात थी, क्योंकि नोबेल पुरस्कार के नियमों के मुताबिक किसी एक खोज के लिए अधिकतम तीन जीवित वैज्ञानिकों को यह सम्मान दिया जा सकता है, फिर भी समिति ने सिर्फ दो नामों को ही चुना। कई विशेषज्ञों और खुद डेमेडियन का मानना था कि यह चूक जानबूझकर की गई थी। इसके पीछे कई वजहें बताई गईं। जैसे यह कि डेमेडियन एक क्लीनिकल डॉक्टर थे न कि पारंपरिक अकादमिक वैज्ञानिक। इसके अलावा उनका स्वभाव काफी मुखर और आक्रामक माना जाता था, वे खुद अपने लिए पुरस्कार की पैरवी करते रहते थे, और यह भी कहा गया कि उनके कुछ विवादित निजी विश्वास, जैसे सृजनवाद का समर्थन, भी इस फैसले के पीछे एक वजह रहे हों।
डेमेडियन ने इस फैसले का विरोध कैसे किया
डेमेडियन ने इस फैसले को चुपचाप स्वीकार नहीं किया। उनके समर्थकों के एक समूह ने न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, लॉस एंजिल्स टाइम्स और यहां तक कि स्वीडन के एक बड़े अखबार में पूरे पन्ने के विज्ञापन छपवाए, जिनका शीर्षक था वह शर्मनाक गलती जिसे सुधारा जाना चाहिए। इस कदम ने पूरे वैज्ञानिक जगत में हलचल मचा दी, क्योंकि इस तरह सार्वजनिक रूप से नोबेल समिति के फैसले पर सवाल उठाना बेहद असामान्य माना जाता था। डेमेडियन का कहना था कि उन्होंने ही असल में एमआरआई का आविष्कार किया, जबकि लॉटरबर और मैन्सफील्ड ने सिर्फ उस तकनीक को और बेहतर बनाया। उन्होंने एक बार यह भी कहा था कि अगर उनका जन्म ही न हुआ होता, तो शायद एमआरआई तकनीक कभी अस्तित्व में ही न आती।
नोबेल समिति का फैसला आज भी रहस्य बना हुआ है
नोबेल पुरस्कार से जुड़े सभी आंतरिक विचार विमर्श के दस्तावेज पचास सालों तक पूरी तरह गोपनीय रखे जाते हैं। इसका मतलब है कि 2003 के इस फैसले के पीछे असली वजह क्या थी, यह बात दुनिया को 2053 से पहले शायद ही पता चल पाए। तब तक यह विवाद वैज्ञानिक जगत में बहस का विषय बना रहेगा। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भले ही डेमेडियन ने बुनियादी सिद्धांत और पहली मशीन दी हो लेकिन आज इस्तेमाल होने वाली एमआरआई तकनीक के तरीकों का सीधा आधार लॉटरबर और मैन्सफील्ड की बाद की खोजों पर ही टिका है। इसलिए इस पूरे विवाद में कोई एक पूरी तरह सही या गलत पक्ष बताना मुश्किल है।
डेमेडियन का बाकी योगदान
नोबेल पुरस्कार न मिलने के बावजूद डेमेडियन का काम यहीं नहीं रुका। उन्होंने फोनार नाम की एक कंपनी की स्थापना की, जिसने दुनिया की पहली व्यावसायिक एमआरआई मशीनें बनाईं और उन्हें अस्पतालों तक पहुंचाया। आज दुनियाभर के अस्पतालों में जो हजारों एमआरआई मशीनें रोज इस्तेमाल होती हैं, उनकी शुरुआत की कहानी सीधे तौर पर डेमेडियन की उसी अजेय नाम की पहली मशीन से जुड़ी है। इस पूरे योगदान को देखते हुए उन्हें बाद में अमेरिका के राष्ट्रीय आविष्कारक हॉल ऑफ फेम में भी शामिल किया गया, जो वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में दिया जाने वाला एक बड़ा सम्मान माना जाता है।
रेमंड डेमेडियन की कहानी यह दिखाती है कि विज्ञान की दुनिया में किसी खोज का श्रेय मिलना हमेशा उतना सीधा और निष्पक्ष नहीं होता जितना हम सोचते हैं। कई बार किसी खोज की शुरुआत करने वाले व्यक्ति को वह पहचान नहीं मिल पाती जो उसे बाद में तकनीक को निखारने वाले वैज्ञानिकों को मिल जाती है। यह भी एक दिलचस्प सबक है कि विज्ञान में योगदान अक्सर टीम वर्क जैसा होता है, जहां एक व्यक्ति की शुरुआती चिंगारी को दूसरे लोग आगे बढ़ाकर पूरी तकनीक में बदल देते हैं, और यह तय करना बेहद मुश्किल हो जाता है कि असली श्रेय किसे और कितना मिलना चाहिए।
अपने ऊपर किया प्रयोग
एक दिलचस्प तथ्य यह है कि जब डेमेडियन ने अपनी पहली मशीन पर परीक्षण शुरू किए थे, तो शुरुआती दौर में उन्होंने खुद अपने शरीर पर भी प्रयोग करने की कोशिश की थी, लेकिन उनका शरीर उस समय बनाई गई मशीन के लिए बहुत बड़ा साबित हुआ। इसलिए आखिरकार उनकी टीम के एक पतले सहयोगी पर ही पहला सफल परीक्षण किया गया। एक और दिलचस्प बात यह है कि नोबेल पुरस्कार से जुड़ा यह विवाद इकलौता मामला नहीं है जहां किसी अहम खोज के पीछे के व्यक्ति को नजरअंदाज कर दिया गया हो। ऐसे कई उदाहरण विज्ञान के इतिहास में मिलते हैं, जिनकी वजह से आज कई वैज्ञानिक संस्थान और शोधकर्ता यह मांग करते हैं कि नोबेल समिति अपने फैसलों में और ज्यादा पारदर्शिता लाए, ताकि भविष्य में इस तरह के विवाद कम हो सकें।
हर बार जब कोई मरीज एमआरआई मशीन में जाता है और बिना किसी दर्द या चीरफाड़ के अपने शरीर के भीतर की सटीक तस्वीर पाता है, तो उस पल में कहीं न कहीं डेमेडियन की वह शुरुआती खोज भी जिंदा रहती है, भले ही उनका नाम नोबेल पुरस्कार की सूची में दर्ज न हो पाया हो। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि किसी तकनीक का असली मूल्य सिर्फ उसे मिलने वाले पुरस्कारों से नहीं, बल्कि उससे बचाई गई जिंदगियों की गिनती से भी आंका जाना चाहिए।


