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Elections 2027: मुश्किल दौर में क्षेत्रीय दल, क्या भारतीय राजनीति से खत्म हो रही है उनकी ताकत?
Assembly Elections 2027: क्षेत्रीय दलों के सामने बढ़ती चुनौतियों के बीच क्या भारतीय राजनीति दो बड़े राष्ट्रीय ध्रुवों की ओर बढ़ रही है?
Assembly Elections 2027 Regional Parties Crisis
Assembly Elections 2027 Regional Parties Crisis: भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दल इस समय एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दो-दो हिस्सों में बंट चुकी हैं। ओडिशा में 24 साल तक सत्ता में रही बीजू जनता दल की सरकार चली गई। दिल्ली में आम आदमी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को 2025 के विधानसभा चुनाव में बड़ा झटका लगा। पश्चिम बंगाल में 2011 से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस 2026 में सरकार नहीं बचा सकी। उत्तर प्रदेश में कभी बड़ी सामाजिक ताकत रही बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव भी पिछले कुछ चुनावों में लगातार घटा है।
इन घटनाओं को एक साथ देखें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारतीय राजनीति धीरे-धीरे फिर दो बड़े राष्ट्रीय ध्रुवों की ओर लौट रही है और क्षेत्रीय दलों के लिए जगह सिकुड़ रही है? पहली नजर में कई घटनाएं इसी दिशा में जाती दिखाई देती हैं। लेकिन चुनावी आंकड़ों को थोड़ा गहराई से देखें तो तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। क्षेत्रीय दल सरकारें खो रहे हैं, कुछ दल टूट रहे हैं और राष्ट्रीय दल उन राज्यों में अपना आधार बढ़ा रहे हैं जिन्हें कभी क्षेत्रीय दलों का मजबूत किला माना जाता था। इसके बावजूद लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों का संयुक्त मत हिस्सा अब भी लगभग एक-तिहाई के आसपास बना हुआ है।
बंगाल ने बहस को सबसे ज्यादा तेज किया
2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया। निर्वाचन आयोग के घोषित परिणामों में भाजपा ने 207 सीटें जीतीं, जबकि 2011 से राज्य की सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को दो और माकपा को एक सीट मिली।
बंगाल के नतीजे इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लंबे समय से राज्य की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति माना जाता रहा था। ममता बनर्जी ने कांग्रेस और वाम दलों के पुराने राजनीतिक आधार को पीछे छोड़कर बंगाल की राजनीति में अपना अलग स्थान बनाया था। 2026 में भाजपा ने उसी राजनीतिक जमीन पर इतनी बड़ी जीत दर्ज की कि सत्ता का पूरा समीकरण बदल गया।
लेकिन चुनाव हारना किसी क्षेत्रीय दल के राजनीतिक अंत का प्रमाण नहीं होता। चुनाव के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर संघर्ष शुरू हो जाए तो स्थिति जरूर गंभीर हो सकती है। तृणमूल के भीतर ऐसा विवाद सामने आया और पार्टी के नाम तथा चुनाव चिह्न को लेकर मामला निर्वाचन आयोग और अदालत तक पहुंचा। ऐसे विवाद बताते हैं कि क्षेत्रीय दल के लिए चुनावी हार के बाद संगठन को एकजुट रखना कितना महत्वपूर्ण है।
तमिलनाडु में क्षेत्रीय राजनीति ने खुद को फिर साबित किया
2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में द्रविड़ मुनेत्र कषगम सत्ता से बाहर हुआ, लेकिन उसकी जगह भाजपा या कांग्रेस नहीं आई। अभिनेता विजय की नई पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम ने 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जगह बनाई। द्रमुक को 59 और अन्नाद्रमुक को 47 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को पांच और भाजपा को सिर्फ एक सीट मिली।
तमिलनाडु का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां एक क्षेत्रीय दल के कमजोर होने के बाद मतदाता किसी राष्ट्रीय दल की ओर नहीं गया। उसने एक नए क्षेत्रीय विकल्प को जगह दी। इसका अर्थ साफ है कि क्षेत्रीय राजनीति की जमीन खत्म नहीं हुई है। पुराने दल के प्रति नाराजगी या बदलाव की इच्छा कई बार राष्ट्रीय दल को नहीं, बल्कि नए क्षेत्रीय दल को मौका देती है।
यही कारण है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु को साथ रखकर देखने पर भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है। एक राज्य में राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दल को सत्ता से बाहर करता है, दूसरे राज्य में क्षेत्रीय दल की जगह नया क्षेत्रीय दल लेता है।
असम और पुडुचेरी में भी अलग तस्वीर
असम में 2026 का विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय दल के विस्तार की कहानी कहता है। भाजपा ने 126 सदस्यीय विधानसभा में 82 सीटें जीतीं और कांग्रेस 19 सीटों पर रही। लेकिन असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने 10-10 सीटें जीतकर विधानसभा में अपनी मौजूदगी बनाए रखी।
इससे पता चलता है कि किसी राज्य में राष्ट्रीय दल की मजबूत सरकार बनने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि क्षेत्रीय दल पूरी तरह गायब हो जाएं। स्थानीय पहचान, जातीय समूह और क्षेत्रीय हितों से जुड़े दल अपनी जगह बनाए रख सकते हैं।
पुडुचेरी में तस्वीर और स्पष्ट है। 30 सदस्यीय विधानसभा में ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस 12 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। भाजपा को चार, द्रमुक को पांच, टीवीके को दो और कांग्रेस को एक सीट मिली। यानी छोटे केंद्रशासित प्रदेश में भी क्षेत्रीय नेतृत्व राजनीतिक व्यवस्था के केंद्र में रहा।
केरल की राजनीति भी इसी जटिलता को दिखाती है। यहां राष्ट्रीय दलों के साथ राज्य आधारित दलों का सामाजिक और चुनावी प्रभाव बना हुआ है। भारतीय राजनीति को केवल राष्ट्रीय दल बनाम क्षेत्रीय दल के दो खानों में बांटकर समझना इसलिए मुश्किल है।
महाराष्ट्र ने दिखाया कि क्षेत्रीय दलों का असली संकट क्या है
क्षेत्रीय दलों के सामने सबसे बड़ा खतरा हमेशा चुनाव हारना नहीं होता। कई बार उससे बड़ा संकट पार्टी के भीतर पैदा होता है। महाराष्ट्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
शिवसेना एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दो राजनीतिक हिस्सों में बंटी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी अजित पवार और शरद पवार के नेतृत्व वाले अलग-अलग गुटों में चली गई। दोनों मामलों में सवाल सिर्फ विधायक या सांसदों की संख्या का नहीं था। सवाल पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न, संगठन और राजनीतिक विरासत का भी था।
2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 132 सीटें जीतीं। एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 57 और अजित पवार की राकांपा को 41 सीटें मिलीं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना को 20 और शरद पवार की राकांपा को 10 सीटें मिलीं।
यही क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी चुनौती है। जब पार्टी का संगठन किसी एक नेता या परिवार के इर्द-गिर्द बहुत ज्यादा केंद्रित हो जाता है, तब नेतृत्व संघर्ष चुनावी हार से कहीं बड़ा संकट बन सकता है।
ओडिशा ने बताया कि सरकार जाना और वोट आधार खत्म होना अलग बातें हैं
ओडिशा की कहानी क्षेत्रीय दलों की वास्तविक ताकत समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
2024 में नवीन पटनायक की बीजू जनता दल सरकार 24 साल बाद सत्ता से बाहर हो गई और भाजपा ने राज्य में सरकार बनाई। भाजपा को 147 में से 78 सीटें मिलीं, जबकि बीजद को 51 सीटें मिलीं। लेकिन दोनों दलों के मत प्रतिशत में बहुत बड़ा अंतर नहीं था। बीजद को करीब 40.22 प्रतिशत और भाजपा को करीब 40.07 प्रतिशत वोट मिले।
यानी करीब 0.15 प्रतिशत अंक के अंतर ने दोनों दलों की सीटों में 27 का फर्क पैदा कर दिया।
यही भारतीय चुनाव व्यवस्था की खासियत है। किसी दल को पूरे राज्य में बहुत ज्यादा वोट मिल सकते हैं, लेकिन अगर उसके वोट कई सीटों पर दूसरे स्थान तक सीमित रह जाएं तो सीटें कम मिल सकती हैं। दूसरी ओर, वोट अगर कुछ खास क्षेत्रों में केंद्रित हों तो कम कुल मत प्रतिशत के बावजूद सीटें ज्यादा मिल सकती हैं। ओडिशा में बीजद सत्ता से बाहर जरूर हुआ, लेकिन करीब 40 प्रतिशत वोट यह बताते हैं कि उसका राजनीतिक आधार एक चुनाव में गायब नहीं हुआ।
बिहार में राजद की सीटें घटीं, लेकिन वोट आधार अभी भी बड़ा है
बिहार में भी इसी अंतर को समझना जरूरी है। 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को 25 सीटें मिलीं, जबकि 2020 में उसके पास 75 सीटें थीं। भाजपा को 89 और जनता दल यूनाइटेड को 85 सीटें मिलीं। एनडीए ने कुल 202 सीटों के साथ सरकार बनाई।
लेकिन राजद का मत आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। उसे करीब 23 प्रतिशत वोट मिले और कुल मतों की संख्या के लिहाज से वह राज्य में सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी रही। इसका अर्थ यह है कि राजद को चुनावी सीटों के स्तर पर बड़ा नुकसान हुआ, लेकिन उसके पास अब भी एक बड़ा सामाजिक और मतदाता आधार मौजूद है।
यह अंतर भारतीय चुनावों को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। किसी दल के पास ज्यादा वोट हो सकते हैं, लेकिन सीटें कम हो सकती हैं। इसलिए केवल विधानसभा में विधायकों की संख्या देखकर उस दल की वास्तविक सामाजिक ताकत का अनुमान लगाना हमेशा सही नहीं होता।
बहुजन समाज पार्टी की स्थिति भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश में उसका मत प्रतिशत पिछले कुछ चुनावों में काफी घटा है, लेकिन उसका परंपरागत सामाजिक आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। चुनावी राजनीति में उसका प्रभाव पहले की तुलना में कम हुआ है, लेकिन उसे अप्रासंगिक मान लेना भी जल्दबाजी होगी।
लोकसभा में अब भी करीब एक-तिहाई वोट क्षेत्रीय राजनीति के साथ
क्षेत्रीय दलों की स्थिति समझने के लिए पिछले चार लोकसभा चुनावों के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध चुनावी वर्गीकरण के अनुसार 2009 में राष्ट्रीय दलों को करीब 63.59 प्रतिशत और क्षेत्रीय दलों को करीब 31.22 प्रतिशत वोट मिले थे। 2014 में राष्ट्रीय दलों का संयुक्त मत हिस्सा करीब 60.04 प्रतिशत और क्षेत्रीय दलों का 35.85 प्रतिशत रहा। 2019 में राष्ट्रीय दलों का हिस्सा बढ़कर करीब 68.15 प्रतिशत हो गया और क्षेत्रीय दल करीब 28.1 प्रतिशत पर आ गए। 2024 में राष्ट्रीय दलों का संयुक्त हिस्सा करीब 62.72 प्रतिशत और क्षेत्रीय दलों का करीब 33.53 प्रतिशत रहा।
आंकड़ों को देखें तो पिछले डेढ़ दशक में राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ है। भाजपा का राष्ट्रीय विस्तार हुआ, कांग्रेस की स्थिति बदली, कई राज्यों में सरकारें बदलीं और कई पुराने राजनीतिक समीकरण टूटे। इसके बावजूद क्षेत्रीय दलों के हिस्से का वोट पूरी तरह गायब नहीं हुआ। वह अलग-अलग चुनावों में ऊपर-नीचे होते हुए भी मोटे तौर पर एक तिहाई के आसपास बना रहा।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि “क्षेत्रीय दलों का एक तिहाई वोट” निर्वाचन आयोग की अपनी कोई अलग संयुक्त श्रेणी नहीं है। यह अलग राजनीतिक दलों को वर्गीकृत करके निकाला गया चुनावी आंकड़ा है। इसलिए इसे एक अनुमानित व्यापक तस्वीर की तरह देखना ज्यादा उचित है।
फिर भी इसका राजनीतिक अर्थ महत्वपूर्ण है। भारत में अब भी करोड़ों मतदाता ऐसे हैं जिनकी राजनीतिक पसंद राज्य आधारित दलों से जुड़ी हुई है।
2014 ने बताया कि वोट और सीट का गणित अलग होता है
2014 का लोकसभा चुनाव इस बात का शानदार उदाहरण है। उस चुनाव में राष्ट्रीय दलों का संयुक्त मत हिस्सा इन चार चुनावों में सबसे कम था, लेकिन भाजपा ने अकेले 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया।
इसका कारण यह था कि चुनाव में कुल वोट से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका भौगोलिक वितरण भी होता है। किसी दल को पूरे देश में 25 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं, लेकिन अगर वह हर सीट पर लगभग बराबर तरीके से तीसरे स्थान पर रहे तो सीटें बहुत कम मिल सकती हैं। दूसरी ओर किसी दल को 25 प्रतिशत वोट कुछ राज्यों में बहुत मजबूती से मिलें तो वह बड़ी संख्या में सीटें जीत सकता है। इसलिए क्षेत्रीय दलों की ताकत का आकलन केवल लोकसभा की सीटों से करना सही नहीं होगा। विधानसभा में वोट प्रतिशत, स्थानीय निकायों में संगठन, सामाजिक आधार और गठबंधन की क्षमता भी देखनी होगी।
राष्ट्रीय दलों का विस्तार वास्तविक चुनौती है
राष्ट्रीय दलों ने पिछले दशक में उन राज्यों में भी अपनी ताकत बढ़ाई है जहां कभी उनका प्रभाव सीमित था।
ओडिशा में भाजपा ने बीजद को सत्ता से बाहर किया। पश्चिम बंगाल में उसने तृणमूल को हराया। असम में उसकी स्थिति मजबूत हुई। कई दूसरे राज्यों में भी राष्ट्रीय दलों ने क्षेत्रीय दलों के पारंपरिक सामाजिक आधार में प्रवेश किया है।
इस बदलाव का असर केवल सीटों पर नहीं पड़ता। जब कोई राष्ट्रीय दल किसी राज्य में मजबूत होता है तो उसके पास ज्यादा संसाधन, व्यापक संगठन और दूसरे राज्यों से नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जोड़ने की क्षमता होती है। इसके मुकाबले एक राज्य तक सीमित क्षेत्रीय दल के लिए सत्ता से बाहर रहकर संगठन बनाए रखना कठिन हो सकता है।
लेकिन राष्ट्रीय दलों को भी क्षेत्रीय दलों की जरूरत खत्म नहीं हुई है। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी, उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी जैसे दल दिखाते हैं कि स्थानीय सामाजिक आधार वाले दल बड़े गठबंधनों के लिए अब भी उपयोगी हैं।
क्षेत्रीय दलों का सबसे बड़ा संकट नेतृत्व है
कई क्षेत्रीय दल किसी व्यापक संस्थागत ढांचे के बजाय एक करिश्माई नेता, परिवार, जातीय समूह या क्षेत्रीय अस्मिता के आसपास विकसित हुए हैं। पहली पीढ़ी के नेता के रहते यह व्यवस्था बहुत प्रभावी हो सकती है। लेकिन जैसे ही अगली पीढ़ी का सवाल आता है, पार्टी के भीतर संघर्ष शुरू हो सकता है।
कौन अगला नेता होगा? किसके पास संगठन का नियंत्रण रहेगा? विधायक किस नेतृत्व के साथ जाएंगे? पुराने कार्यकर्ताओं की भूमिका क्या होगी? पार्टी का चुनाव चिह्न और नाम किसके पास रहेगा? ऐसे सवालों का जवाब अगर पहले से स्पष्ट नहीं हो तो एक चुनावी हार बहुत जल्दी संगठनात्मक संकट में बदल सकती है।
महाराष्ट्र में शिवसेना और राकांपा के विभाजन ने इस खतरे को सबसे स्पष्ट रूप में सामने रखा है। क्षेत्रीय दलों के लिए इसलिए अब केवल लोकप्रिय नेता होना पर्याप्त नहीं है। मजबूत दूसरी पंक्ति का नेतृत्व और ऐसा संगठन भी जरूरी है जो सत्ता से बाहर रहने पर पार्टी को संभाल सके।
केवल क्षेत्रीय अस्मिता अब पर्याप्त नहीं
क्षेत्रीय दलों की राजनीति का आधार अक्सर भाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय अस्मिता, सामाजिक न्याय, जातीय प्रतिनिधित्व और राज्य के अधिकार रहे हैं। लेकिन मतदाता की प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं।
रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, महिलाओं के लिए योजनाएं, सरकारी सहायता, शहरी सुविधाएं और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चुनावी फैसलों को प्रभावित करते हैं। सोशल मीडिया ने मतदाता और राजनीतिक दल के बीच संवाद का तरीका भी बदल दिया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि क्षेत्रीय पहचान खत्म हो गई। तमिलनाडु में टीवीके का उभार इसका उलटा उदाहरण है। लेकिन अब क्षेत्रीय दलों को पुराने सामाजिक आधार के साथ नई पीढ़ी और नए आर्थिक समूहों को भी जोड़ना होगा।
यही वह जगह है जहां कई पुराने क्षेत्रीय दलों के सामने चुनौती है। अगर वे केवल अपनी पुरानी पहचान पर निर्भर रहते हैं तो राष्ट्रीय दल या नए क्षेत्रीय विकल्प उनके मतदाताओं तक पहुंच सकते हैं।
सत्ता से बाहर होने के बाद असली परीक्षा
किसी क्षेत्रीय दल के लिए सत्ता में रहना जितना महत्वपूर्ण है, सत्ता से बाहर रहने के बाद संगठन को बचाए रखना उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है। सत्ता में रहते हुए पार्टी के पास विधायक, स्थानीय नेता, कार्यकर्ता और संसाधन होते हैं। सत्ता जाने के बाद इनमें से कुछ नेता अपना राजनीतिक भविष्य दूसरे विकल्पों में तलाश सकते हैं। अगर पार्टी में पहले से नेतृत्व संघर्ष हो तो यह प्रक्रिया और तेज हो सकती है।
राष्ट्रीय दलों के पास कई राज्यों में संगठन होने के कारण एक राज्य की हार का असर पूरे संगठन पर नहीं पड़ता। लेकिन किसी एक राज्य पर निर्भर क्षेत्रीय दल के लिए सत्ता से बाहर होना बहुत बड़ा झटका हो सकता है।
इसलिए क्षेत्रीय दलों की स्थायी ताकत का असली पैमाना यह भी है कि वे हार के बाद कितने समय तक अपने संगठन और मतदाता आधार को एकजुट रख पाते हैं।
राष्ट्रीय चुनाव और विधानसभा चुनाव की राजनीति अलग हो सकती है
भारतीय मतदाता लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक फैसले ले सकता है। कोई मतदाता लोकसभा में राष्ट्रीय दल को वोट दे सकता है और विधानसभा में क्षेत्रीय दल को। यही वजह है कि लोकसभा में किसी क्षेत्रीय दल की कमजोर स्थिति को विधानसभा के भविष्य का अंतिम संकेत नहीं माना जा सकता।
तमिलनाडु इसका उदाहरण है। राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन राज्य की विधानसभा राजनीति अब भी मुख्य रूप से क्षेत्रीय दलों के बीच प्रतिस्पर्धा पर टिकी हुई है।
उत्तर प्रदेश में भी तस्वीर सरल नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं, भाजपा को 33, कांग्रेस को छह, राष्ट्रीय लोकदल को दो, अपना दल को एक और आजाद समाज पार्टी को एक सीट मिली। यह परिणाम दिखाता है कि राज्य में बड़े राष्ट्रीय दलों के साथ क्षेत्रीय और सामाजिक आधार वाले दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
2027 की परीक्षा
2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों में क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग तरह से परीक्षा होगी। उत्तर प्रदेश में सवाल यह होगा कि समाजवादी पार्टी अपना सामाजिक आधार कितना व्यापक कर पाती है और भाजपा के क्षेत्रीय सहयोगी अपने-अपने सामाजिक समूहों में कितनी ताकत बनाए रखते हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी के सामने सत्ता में रहते हुए अपना आधार बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि शिरोमणि अकाली दल के सामने अपने पुराने सामाजिक और राजनीतिक आधार को फिर से संगठित करने का सवाल होगा।
उत्तराखंड और गुजरात में क्षेत्रीय दलों की भूमिका सीमित रही है, जबकि गोवा की स्थानीय राजनीतिक संरचना अलग है। मणिपुर में क्षेत्रीय, जातीय और स्थानीय सवालों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। इसलिए 2027 के सभी चुनावों को केवल राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय दल की एक ही कसौटी से देखना सही नहीं होगा।
एक साथ चुनाव की बहस का असर
एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की प्रस्तावित व्यवस्था भी क्षेत्रीय दलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके समर्थकों का कहना है कि बार-बार होने वाले चुनावों की लागत और प्रशासनिक दबाव कम हो सकता है। दूसरी ओर कुछ क्षेत्रीय दलों और आलोचकों को आशंका है कि एक साथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय नेतृत्व राज्य के स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा प्रभाव डाल सकते हैं।
पैसा और संगठन की चुनौती, लेकिन स्थानीय नेटवर्क अब भी ताकत
आज का चुनाव केवल रैलियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं से नहीं चलता। सोशल मीडिया, चुनावी आंकड़ों का इस्तेमाल, पेशेवर प्रचार, बूथ प्रबंधन और लगातार मतदाताओं से संपर्क के लिए बड़े संसाधनों की जरूरत होती है।
राष्ट्रीय दलों को यहां फायदा है क्योंकि उनका संगठन कई राज्यों में फैला है। वे एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक अपने संसाधन और कार्यकर्ता स्थानांतरित कर सकते हैं। छोटे क्षेत्रीय दलों के लिए ऐसा करना कठिन हो सकता है।
लेकिन क्षेत्रीय दलों के पास एक ऐसी ताकत है जिसे राष्ट्रीय दल आसानी से दोहरा नहीं सकते। वह है स्थानीय सामाजिक नेटवर्क। किसी जाति, भाषा, समुदाय, किसान समूह या क्षेत्र विशेष के साथ दशकों से बना राजनीतिक संबंध कई बार सीमित संसाधनों वाले दल को भी चुनाव में महत्वपूर्ण बना देता है।
क्षेत्रीय राजनीति का स्वरूप बदल रहा है
पश्चिम बंगाल में तृणमूल की हार, महाराष्ट्र में शिवसेना और राकांपा का विभाजन, ओडिशा में बीजद की सत्ता से विदाई, दिल्ली में आप की हार और बिहार में राजद की सीटों में बड़ी गिरावट निश्चित रूप से क्षेत्रीय दलों के लिए कठिन समय का संकेत हैं।
लेकिन दूसरी तरफ तमिलनाडु में एक नए क्षेत्रीय दल का उभार, पुडुचेरी में क्षेत्रीय नेतृत्व की मजबूत मौजूदगी, असम में क्षेत्रीय दलों की भूमिका और लोकसभा चुनावों में करीब एक-तिहाई वोट का क्षेत्रीय दलों के साथ जाना यह भी बताता है कि क्षेत्रीय राजनीति खत्म नहीं हुई है।
असल संकट उन दलों के सामने ज्यादा गंभीर है जिनका संगठन एक व्यक्ति या परिवार पर बहुत अधिक निर्भर है, जिनके पास दूसरी पंक्ति का नेतृत्व नहीं है, जो सत्ता से बाहर रहकर संगठन नहीं चला पाते या जिनका पारंपरिक सामाजिक आधार नई पीढ़ी में कमजोर हो रहा है।
इसके विपरीत जिन क्षेत्रीय दलों के पास मजबूत संगठन, स्पष्ट राज्य आधारित मुद्दे, अगली पीढ़ी का नेतृत्व, व्यापक सामाजिक गठबंधन और बदलती राजनीति के साथ खुद को ढालने की क्षमता है, उनके लिए भारतीय राजनीति में जगह अब भी बनी हुई है।
भारत में राष्ट्रीय राजनीति मजबूत जरूर हुई है। राष्ट्रीय दल अब उन राज्यों में भी पहुंच बना रहे हैं जिन्हें कभी क्षेत्रीय दलों का स्थायी किला माना जाता था। लेकिन इससे क्षेत्रीय राजनीति अपने आप खत्म नहीं हो जाती। भारत की भाषाई, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विविधता अब भी राज्यों की अलग-अलग राजनीतिक जरूरतें पैदा करती है।
यही वजह है कि आने वाले समय में सवाल यह नहीं होगा कि क्षेत्रीय दल बचेंगे या नहीं। बड़ा सवाल यह होगा कि कौन से क्षेत्रीय दल बदलते भारत के साथ खुद को बदल पाएंगे और कौन अपने पुराने सामाजिक आधार के साथ ही सिमट जाएंगे।
2027 के विधानसभा चुनाव इस बदलाव की अगली बड़ी परीक्षा होंगे। इन चुनावों से यह समझने में मदद मिलेगी कि भारतीय राजनीति वास्तव में दो बड़े राष्ट्रीय ध्रुवों की ओर बढ़ रही है या राष्ट्रीय राजनीति के मजबूत होने के बावजूद क्षेत्रीय शक्तियां अपने लिए नई जगह बनाती रहेंगी।


