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सबीना यास्मीन का इस्तीफा: ममता बनर्जी से बगावत करने वाले ऋतब्रत गुट को झटका, मालदा की राजनीति में क्या बदलेंगे समीकरण?
Sabina Yasmin's resignation: उनका यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल खेमे और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विद्रोही गुट के बीच संगठनात्मक वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।
Sabina Yasmin's resignation
Sabina Yasmin's resignation: कोलकाता, पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे नेतृत्व संघर्ष के बीच पूर्व मंत्री और मालदा जिले की सुजापुर विधानसभा सीट से विधायक सबीना यास्मीन ने महिला संगठन के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा प्रदेश अध्यक्ष बिप्लब मित्रा को भेजा है। सबीना ने खराब स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियों को इसकी वजह बताया है।
हालांकि, उनका यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल खेमे और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विद्रोही गुट के बीच संगठनात्मक वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। सबीना विद्रोही गुट से जुड़ी थीं और उन्हें इसी गुट के महिला संगठन की प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी। इसलिए उनका पद छोड़ना केवल एक संगठनात्मक इस्तीफा नहीं, बल्कि बंगाल में चल रहे तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक संघर्ष से जुड़ा महत्वपूर्ण घटनाक्रम भी है।
इस इस्तीफे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सबीना यास्मीन ने संगठन का पद छोड़ा है, पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि ऋतब्रत तृणमूल नाम से कोई अलग संगठन नहीं है और उन्हें तृणमूल कांग्रेस के महिला संगठन का अध्यक्ष बनाया गया था। इस्तीफे में उन्होंने डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस का नाम भी इस्तेमाल नहीं किया। उनका यह रुख राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि वह भविष्य में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व के साथ बनी रहेंगी या किसी दूसरे राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बनेंगी। फिलहाल उनकी ओर से किसी नए राजनीतिक गुट में जाने या ममता बनर्जी के साथ लौटने की घोषणा नहीं हुई है।
कौन हैं सबीना यास्मीन, कितनी मजबूत है उनकी राजनीतिक पहचान?
सबीना यास्मीन पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं में शामिल हैं। वह राज्य सरकार में मंत्री रह चुकी हैं और 2026 के विधानसभा चुनाव में मालदा जिले की सुजापुर सीट से निर्वाचित हुई थीं। चुनावी हलफनामे के अनुसार उनकी उम्र 48 वर्ष है और उनकी शैक्षिक योग्यता स्नातकोत्तर है। उन्होंने अपना पेशा राज्य सहायता प्राप्त महाविद्यालय की शिक्षिका बताया है। सुजापुर विधानसभा क्षेत्र मालदा दक्षिण लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। इस क्षेत्र की राजनीति में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और स्थानीय प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
ऐसे इलाके में सबीना यास्मीन की चुनावी सफलता उन्हें केवल संगठनात्मक पदाधिकारी के बजाय स्वतंत्र स्थानीय राजनीतिक आधार रखने वाली नेता के रूप में स्थापित करती है।
उनकी राजनीतिक ताकत का सबसे ठोस प्रमाण 2026 का विधानसभा चुनाव है। सुजापुर में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में 1,12,795 वोट हासिल किए। उनका मत प्रतिशत लगभग 49.66 रहा। उन्होंने कांग्रेस के अब्दुल हन्नान को 60,287 वोटों के अंतर से हराया। यह जीत बताती है कि सुजापुर में उनके पक्ष में व्यापक चुनावी समर्थन मौजूद था। हालांकि किसी उम्मीदवार की जीत में व्यक्तिगत लोकप्रियता, पार्टी संगठन, स्थानीय गठबंधन और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की अलग-अलग भूमिका होती है। इसलिए उनकी पूरी चुनावी सफलता को केवल व्यक्तिगत जनाधार का परिणाम मानना उचित नहीं होगा।
कांग्रेस से तृणमूल तक, चार चुनावों में जीत से बना राजनीतिक आधार
सबीना यास्मीन के राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए उनके पिछले चुनावी रिकॉर्ड पर नजर डालना आवश्यक है। उन्होंने वर्ष 2011 में कांग्रेस के टिकट पर मोथाबाड़ी विधानसभा सीट से चुनाव जीता था। उस चुनाव में उन्हें 47,466 वोट मिले और उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नईमुद्दीन शेख को 6,020 वोटों से हराया। वर्ष 2016 में उन्होंने दोबारा कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में इसी सीट से जीत हासिल की। इस बार उन्हें 69,089 वोट मिले और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के मोहम्मद नजरुल इस्लाम को 38,174 वोटों से पराजित किया। इन दोनों चुनावों का महत्व इसलिए है कि सबीना ने अपनी राजनीतिक पहचान कांग्रेस के भीतर बनाई थी। वह शुरुआत से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की नेता नहीं थीं।
वर्ष 2018 में सबीना यास्मीन कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं। यह उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था। वर्ष 2021 में उन्होंने मोथाबाड़ी से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और लगातार तीसरी बार जीत हासिल की। उन्हें 97,397 वोट मिले, जबकि भाजपा के श्यामचंद घोष को 40,824 वोट प्राप्त हुए। उनकी जीत का अंतर 56,573 वोट रहा। इस चुनाव में कांग्रेस तीसरे स्थान पर चली गई। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण था कि जिस विधानसभा क्षेत्र में सबीना ने कांग्रेस के टिकट पर दो चुनाव जीते थे, उसी क्षेत्र में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर भी बड़ी जीत हासिल की। इससे उनके व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव का संकेत मिलता है, हालांकि पार्टी बदलने के साथ मतदाताओं के समर्थन में हुए बदलाव को केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता से नहीं समझा जा सकता।
वर्ष 2026 में सबीना यास्मीन ने मोथाबाड़ी के बजाय सुजापुर से चुनाव लड़ा और वहां भी जीत हासिल की। इस प्रकार वह 2011, 2016, 2021 और 2026 के चार लगातार विधानसभा चुनाव जीत चुकी हैं। इनमें तीन जीत मोथाबाड़ी और चौथी सुजापुर से हुई। दो अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों और दो राजनीतिक दलों के टिकट पर जीतने का उनका रिकॉर्ड मालदा जिले में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण प्रमाण है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि मोथाबाड़ी और सुजापुर दोनों मालदा दक्षिण लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। इसलिए उनका प्रभाव मुख्यतः दक्षिण मालदा के राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण है।
ममता बनर्जी की सरकार में क्या थी सबीना की हैसियत?
सबीना यास्मीन का राजनीतिक महत्व केवल विधानसभा चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहा। वह ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री भी रही हैं। वर्ष 2011 में उन्हें राज्य सरकार में जिम्मेदारी मिली थी। बाद में 2021 से 2026 के बीच उन्होंने सिंचाई एवं जलमार्ग तथा उत्तर बंगाल विकास से संबंधित राज्यमंत्री पदों पर काम किया। इन विभागों का मालदा जैसे जिले से विशेष संबंध है, जहां गंगा और उसकी सहायक नदियों से होने वाला कटाव, बाढ़, तटबंधों की सुरक्षा, कृषि भूमि का नुकसान और ग्रामीण बुनियादी ढांचे की समस्याएं महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे हैं।
मंत्री के रूप में काम करने के कारण सबीना यास्मीन को जिला प्रशासन, स्थानीय निकायों और पार्टी संगठन के साथ काम करने का अनुभव मिला। हालांकि उनके कार्यकाल में कौन-कौन सी परियोजनाएं पूरी हुईं, कितनी धनराशि खर्च हुई और स्थानीय जनता को उनका कितना लाभ मिला, इसका स्वतंत्र मूल्यांकन किए बिना उनके प्रशासनिक प्रदर्शन पर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि विधायक और मंत्री के रूप में उनका लंबा अनुभव उन्हें मालदा जिले के प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों में शामिल करता है।
ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के बीच विवाद कैसे बढ़ा?
सबीना यास्मीन के इस्तीफे की राजनीतिक पृष्ठभूमि पश्चिम बंगाल के 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद पैदा हुए नेतृत्व संकट में छिपी है। चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे और ऋतब्रत बनर्जी के समर्थक विधायकों के बीच विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर विवाद हुआ। ममता खेमे की ओर से वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम सामने आया, जबकि विद्रोही विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन किया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ऋतब्रत ने अपने साथ 59 विधायकों का समर्थन प्रस्तुत किया और बाद में उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिली। इस घटनाक्रम में सबीना यास्मीन का नाम विधानसभा में उपनेता के लिए प्रस्तावित नेताओं में भी शामिल था।
विवाद बढ़ने के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल संगठन ने ऋतब्रत समर्थक कई वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की। निष्कासित नेताओं में सबीना यास्मीन, फिरहाद हकीम, अरूप रॉय, बिप्लब मित्रा और अन्य नेता शामिल थे। दूसरी ओर, विद्रोही गुट ने अपनी अलग संगठनात्मक संरचना बनाई और यह दावा किया कि वह तृणमूल कांग्रेस की मूल राजनीतिक परंपरा का ही प्रतिनिधित्व करता है। इसी संगठनात्मक व्यवस्था में सबीना यास्मीन को महिला संगठन की प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली थी। इसीलिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सबीना का ताजा इस्तीफा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक महिला तृणमूल संगठन से नहीं, बल्कि ऋतब्रत समर्थक गुट में मिले पद से संबंधित है।
इस विवाद का एक कानूनी पक्ष भी है। सितंबर 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा सचिवालय ने ऋतब्रत बनर्जी के साथ जुड़े दस विधायकों को दल-बदल कानून के अंतर्गत अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर नोटिस भेजे थे। इनमें सबीना यास्मीन भी शामिल थीं। यह कार्यवाही विधानसभा की सदस्यता से संबंधित है और संगठनात्मक पद से इस्तीफा देने भर से स्वतः समाप्त नहीं होती। इसलिए सबीना की आगे की राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए उनके संगठनात्मक संबंधों के साथ विधानसभा में उनकी सदस्यता से जुड़े कानूनी घटनाक्रम पर भी नजर रखना आवश्यक होगा।
इस्तीफे की असली वजह क्या है, क्या गुटबाजी से परेशान हैं सबीना?
सबीना यास्मीन ने अपने इस्तीफे के लिए स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया है। आनंदबाजार पत्रिका को दिए बयान में उन्होंने कहा कि महिला संगठन के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरे पश्चिम बंगाल में लगातार यात्रा करनी पड़ती है। वर्तमान शारीरिक और पारिवारिक परिस्थितियों में उनके लिए यह संभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जब वह पद की जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा सकतीं तो अनावश्यक रूप से पद पर बने रहने का कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने व्हाट्सऐप के माध्यम से अपना इस्तीफा बिप्लब मित्रा को भेजने की जानकारी दी।
यह उनका सार्वजनिक और प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण है। इसके अतिरिक्त किसी राजनीतिक मतभेद, दबाव या गुट छोड़ने की तैयारी को इस्तीफे का प्रमाणित कारण नहीं कहा जा सकता। हालांकि राजनीतिक दृष्टि से उनके निर्णय की परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं। वह ऐसे गुट के संगठनात्मक पद से हट रही हैं, जो पहले से नेतृत्व विवाद और विधायकों की सदस्यता संबंधी कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहा है। उनका यह कहना कि वह पद छोड़ रही हैं, लेकिन पार्टी नहीं, फिलहाल उनके भविष्य के राजनीतिक विकल्पों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं करता।
मोथाबाड़ी, सुजापुर और कालियाचक में कितना असर?
सबीना यास्मीन के राजनीतिक प्रभाव का मुख्य क्षेत्र मालदा जिले का दक्षिणी हिस्सा है। इसमें मोथाबाड़ी, सुजापुर और कालियाचक क्षेत्र विशेष महत्व रखते हैं। मोथाबाड़ी विधानसभा क्षेत्र में कालियाचक-दो विकासखंड और कालियाचक-एक की कुछ ग्राम पंचायतें आती हैं। सबीना ने इस क्षेत्र का लगातार तीन बार प्रतिनिधित्व किया है। वर्ष 2026 में सुजापुर से चुनाव जीतने के कारण उनकी राजनीतिक सक्रियता का एक दूसरा विधानसभा क्षेत्र भी जुड़ गया है।
इन इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण उपस्थिति है और कांग्रेस का ऐतिहासिक प्रभाव भी रहा है। मालदा जिले की राजनीति में ए.बी.ए. गनी खान चौधरी के परिवार और कांग्रेस की परंपरागत संगठनात्मक जड़ों का लंबा इतिहास है। हालांकि विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने यहां अपना आधार बढ़ाया है, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं का व्यवहार हमेशा एक जैसा नहीं रहा। उदाहरण के लिए, मोथाबाड़ी में सबीना ने 2021 का विधानसभा चुनाव तृणमूल के टिकट पर बड़े अंतर से जीता, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी विधानसभा खंड में कांग्रेस को बढ़त मिली थी। इसलिए यहां किसी एक नेता की लोकप्रियता को किसी पार्टी के स्थायी और पूर्ण वर्चस्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
सबीना का महिला संगठन के पद से हटना और स्थानीय राजनीति से अलग होना दो अलग बातें हैं। यदि वह सुजापुर की विधायक के रूप में सक्रिय रहती हैं और मोथाबाड़ी में अपने पुराने समर्थकों से संपर्क बनाए रखती हैं, तो केवल प्रदेश स्तरीय पद छोड़ने से उनके स्थानीय प्रभाव में तत्काल गिरावट मान लेना उचित नहीं होगा। इसके विपरीत, यदि आगे चलकर उनका संगठनात्मक संबंध बदलता है, तो स्थानीय कार्यकर्ताओं, पंचायत प्रतिनिधियों और समर्थकों के बीच नए समीकरण पैदा हो सकते हैं।
क्या सबीना के इस्तीफे से ममता बनर्जी को फायदा होगा?
इस सवाल का उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि सबीना यास्मीन आगे कौन-सा राजनीतिक रास्ता अपनाती हैं। फिलहाल उन्होंने केवल पद छोड़ा है, इसलिए इसे ममता बनर्जी के खेमे में उनकी वापसी या ऋतब्रत गुट से पूरी तरह अलग होने के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
फिर भी कुछ राजनीतिक परिस्थितियां स्पष्ट हैं। ऋतब्रत समर्थक गुट ने सबीना जैसी अनुभवी विधायक को महिला संगठन की प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अपनी संगठनात्मक पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया था। उनके पद छोड़ने से उस गुट को नई महिला अध्यक्ष की नियुक्ति करनी होगी। मालदा जैसे जिले में जहां सबीना का लंबा चुनावी अनुभव है, वहां संगठन को उनके स्थान पर स्थानीय संपर्क रखने वाला नेतृत्व तैयार करना पड़ सकता है। लेकिन इससे गुट के वोट प्रतिशत या विधानसभा सीटों पर कितना प्रभाव पड़ेगा, इसका अभी कोई विश्वसनीय मापन उपलब्ध नहीं है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल खेमे के लिए भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यदि सबीना भविष्य में उस खेमे के साथ राजनीतिक संबंध पुनः स्थापित करती हैं, तो उनके अनुभव और स्थानीय संपर्क संगठनात्मक दृष्टि से उपयोगी हो सकते हैं। दूसरी ओर, यदि वह ऋतब्रत गुट में बनी रहती हैं और केवल प्रदेश स्तरीय जिम्मेदारी से मुक्त होती हैं, तो ममता खेमे के लिए इसे राजनीतिक उपलब्धि कहना उचित नहीं होगा।
क्या कांग्रेस के लिए खुल सकता है कोई नया रास्ता?
सबीना यास्मीन का राजनीतिक जीवन कांग्रेस से शुरू हुआ था। उन्होंने 2011 और 2016 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीते थे। वर्ष 2018 में वह तृणमूल कांग्रेस में चली गईं। इसलिए कांग्रेस के साथ उनका पुराना संबंध राजनीतिक विश्लेषण में प्रासंगिक है। लेकिन इस समय कांग्रेस में उनकी वापसी को लेकर कोई पुष्ट सार्वजनिक घोषणा सामने नहीं आई है।
मालदा दक्षिण में कांग्रेस की ऐतिहासिक उपस्थिति और सबीना के पुराने चुनावी रिकॉर्ड को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि भविष्य में वह अपना राजनीतिक संबंध बदलने का निर्णय लेती हैं, तो उसका स्थानीय राजनीति में महत्व होगा। हालांकि किसी संभावित दल-बदल का प्रभाव कांग्रेस, तृणमूल या अन्य दलों पर कितना पड़ेगा, यह स्थानीय नेताओं के रुख, संगठनात्मक समर्थन और चुनावी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी की जांच से भी जुड़ा है नाम
सबीना यास्मीन की वर्तमान राजनीतिक स्थिति का एक और महत्वपूर्ण पहलू राष्ट्रीय जांच एजेंसी की जांच है। सितंबर 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने मालदा के मोथाबाड़ी क्षेत्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान हुई हिंसा और न्यायिक अधिकारियों को रोके जाने के मामले में सबीना यास्मीन को पूछताछ के लिए नोटिस भेजा था। इस मामले में उनके पति मेहबूब आलम से भी पूछताछ की खबर सामने आई थी। रिपोर्टों के अनुसार, यह मामला अप्रैल 2026 में कालियाचक-दो क्षेत्र में हुए विरोध प्रदर्शन और हिंसा से संबंधित है।
हालांकि किसी जांच एजेंसी द्वारा नोटिस भेजे जाने या पूछताछ के लिए बुलाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति अपराध का दोषी है। उपलब्ध रिपोर्टों में इस मामले में सबीना यास्मीन के खिलाफ किसी अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि की जानकारी नहीं है। इसी तरह इस जांच को उनके 14 अक्टूबर के संगठनात्मक इस्तीफे का कारण बताने वाला कोई पुष्ट प्रमाण भी सामने नहीं आया है। दोनों घटनाओं को अलग-अलग तथ्यों के रूप में देखना जरूरी है।
आगे की राजनीति में किन बातों का महत्व होगा?
सबीना यास्मीन के राजनीतिक भविष्य को लेकर फिलहाल तीन प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। पहला, क्या वह ऋतब्रत बनर्जी समर्थक संगठन में बिना पद के सक्रिय रहेंगी? दूसरा, क्या ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल संगठन और विद्रोही विधायकों के बीच चल रहे विवाद में उनकी स्थिति बदलेगी? तीसरा, क्या विधानसभा की सदस्यता संबंधी कानूनी कार्यवाही उनके राजनीतिक फैसलों को प्रभावित करेगी? इन सवालों के उत्तर आने वाले घटनाक्रम से ही मिलेंगे। अभी किसी संभावित वापसी, नए दल में प्रवेश या राजनीतिक संन्यास की पुष्टि नहीं हुई है।
उनके राजनीतिक प्रभाव का आकलन करते समय एक तथ्य विशेष महत्व रखता है। सबीना ने चार लगातार विधानसभा चुनाव जीते हैं। पहले कांग्रेस और फिर तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल करने का उनका रिकॉर्ड बताता है कि वह मालदा की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय और स्थापित नेता हैं। लेकिन संगठनात्मक नेतृत्व और चुनावी लोकप्रियता अलग-अलग प्रकार की राजनीतिक ताकतें हैं। किसी नेता के विधानसभा चुनाव जीतने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उसके साथ पूरे जिले के पार्टी कार्यकर्ता या दूसरे निर्वाचित प्रतिनिधि भी खड़े हैं।
इसलिए सबीना यास्मीन का इस्तीफा फिलहाल ऋतब्रत समर्थक गुट के लिए एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक परिवर्तन है, लेकिन इसे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के किसी एक खेमे की निर्णायक राजनीतिक जीत या हार नहीं माना जा सकता। इसका तत्काल प्रभाव महिला संगठन की प्रदेश स्तरीय नेतृत्व व्यवस्था पर पड़ेगा। स्थानीय राजनीतिक दृष्टि से सबसे अधिक ध्यान सुजापुर, मोथाबाड़ी और आसपास के कालियाचक क्षेत्र पर रहेगा, जहां सबीना का लंबा चुनावी इतिहास है।
उनके अगले सार्वजनिक राजनीतिक निर्णय से यह अधिक स्पष्ट होगा कि इस्तीफा केवल स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण लिया गया प्रशासनिक फैसला था या इसके बाद उनके संगठनात्मक संबंधों में भी कोई बदलाव होता है।


