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Shiv Sena (UBT) Crisis: मातोश्री से फिर उठी बगावत की चिंगारी, अब आदित्य ठाकरे का सबसे करीबी नेता हुआ बागी
Shiv Sena (UBT) Crisis: शिवसेना (UBT) में एक बार फिर बगावत की चिंगारी भड़क उठी है। मातोश्री के करीबी और आदित्य ठाकरे के विश्वस्त नेता के बागी होने की सुगबुगाहट से उद्धव ठाकरे की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
Shiv Sena (UBT) Crisis: महाराष्ट्र की सियासत में 'मातोश्री' का रुतबा कभी निर्विवाद हुआ करता था। एक दौर था जब यहां से निकला हर फरमान पत्थर की लकीर माना जाता था, लेकिन आज वही मातोश्री अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर का सामना कर रहा है। उद्धव ठाकरे के सामने अपनी पार्टी और अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने की एक ऐसी चुनौती खड़ी हो गई है, जो दिन-ब-दिन और गहरी होती जा रही है।
पिछले चार सालों में यह दूसरा मौका है जब उनकी पार्टी में बड़ी सेंधमारी हुई है। साल 2022 में सत्ता गंवाने के बाद अब छह लोकसभा सांसद उनका साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के पाले में जा चुके हैं और अब विधायकों के बागी होने के काले बादल भी मंडराने लगे हैं।
इस संकट की गहराई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन नेताओं ने कभी ठाकरे परिवार के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, वे भी अब छिटकते नजर आ रहे हैं। हाल ही में उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों की अहम बैठक में तीन विधायक और एक एमएलसी का न पहुंचना कई सवाल खड़े कर गया।
हालांकि, इन नेताओं ने स्वास्थ्य कारणों या निजी व्यस्तताओं का हवाला देकर अपनी गैरमौजूदगी की सूचना पहले ही दे दी थी, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसे महज एक इत्तेफाक नहीं माना जा रहा। इस पूरी कहानी में सबसे चौंकाने वाला नाम एमएलसी सुनील शिंदे का है। यह वही सुनील शिंदे हैं जिन्होंने साल २०१९ में आदित्य ठाकरे के सियासी लॉन्चपैड के लिए अपनी जीती हुई वर्ली विधानसभा सीट बिना किसी हिचकिचाहट के कुर्बान कर दी थी। उनका यह कदम ठाकरे परिवार के प्रति अगाध श्रद्धा का प्रतीक माना गया था। मगर आज उसी वफादार नेता की दूरी यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या वह भी बागी गुट की राह पकड़ने वाले हैं।
नेतृत्व की साख और कार्यकर्ताओं की दूरी
शिवसेना (यूबीटी) से पुराने और करीबी नेताओं का यूं एक-एक कर जाना महज एक राजनीतिक दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह उद्धव ठाकरे के नेतृत्व की शैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। विद्रोह करने वाले गुट का शुरू से यही आरोप रहा है कि मातोश्री के दरवाजे आम शिवसैनिकों और विधायकों के लिए लगभग बंद हो चुके थे और ठाकरे परिवार तक पहुंचना एक खास घेरे के कारण बेहद मुश्किल हो गया था।
कांग्रेस और एनसीपी के साथ महाविकास अघाड़ी (एमवीए) का गठबंधन भी जमीनी स्तर के उन पारंपरिक शिवसैनिकों को रास नहीं आया, जो दशकों से एक अलग विचारधारा के साथ पले-बढ़े थे। इसी असंतोष की आग में घी डालने का काम एकनाथ शिंदे ने किया और नतीजा यह हुआ कि कभी जिस शिवसेना में बगावत की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, आज वहां खुद उद्धव ठाकरे के बनाए गए नेता ही उनके खिलाफ खड़े हैं। सांसदों के छिटकने से पार्टी वैसे ही हाशिए पर जा चुकी है और अब बचे हुए विधायकों का जाना एमवीए के ढांचे को पूरी तरह से खोखला कर सकता है।
आदित्य ठाकरे के सियासी सफर पर मंडराता खतरा
बालासाहेब ठाकरे की विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अब युवा चेहरे आदित्य ठाकरे के कंधों पर है। लेकिन जिस तेजी से जमीनी नेता, बूथ मैनेजमेंट संभालने वाले दिग्गज और मुंबई-कोंकण जैसे गढ़ के पिलर एकनाथ शिंदे के साथ जा रहे हैं, उसने आदित्य की राह को कांटों से भर दिया है। साल 2024 के चुनावों में भी शिंदे गुट और बीजेपी ने वर्ली में आदित्य की तगड़ी घेराबंदी की थी।
अब जब उनके लिए अपनी सीट छोड़ने वाले पुराने सिपहसालार ही दूरी बना रहे हैं, तो जनता के बीच यह संदेश जाना तय है कि नेतृत्व के कौशल में कोई न कोई भारी कमी जरूर है। यह लड़ाई अब सिर्फ सत्ता हासिल करने की नहीं रह गई है, बल्कि बालासाहेब की 'असली विरासत' पर मुहर लगाने की है। ऐसे में अपनी ही जमीन खिसकती देख उद्धव और आदित्य के लिए एमवीए गठबंधन में अपने सहयोगियों के सामने राजनीतिक सौदेबाजी करना भी बेहद मुश्किल हो गया है। कांग्रेस और शरद पवार यह बखूबी जानते हैं कि बीजेपी के साथ जाने के सारे रास्ते बंद होने के बाद ठाकरे परिवार के पास इस गठबंधन में रहने के अलावा कोई और व्यावहारिक चारा नहीं है।
क्या 'मातोश्री' फिर लिख पाएगा वापसी की कहानी?
सियासत की इस बिसात पर अब उद्धव ठाकरे के लिए 'करो या मरो' वाली स्थिति पैदा हो गई है। सिर्फ सहानुभूति के सहारे राजनीतिक वैतरणी पार नहीं की जा सकती। विरोधी खेमा आक्रामक है और खुद को बालासाहेब के सच्चे वारिस के रूप में स्थापित करने के लिए हर संभव दांव चल रहा है। लगातार टूटती पार्टी और कम होते विधायकों-सांसदों की संख्या ने उद्धव के लिए एक भारी मानसिक और राजनीतिक तनाव पैदा कर दिया है।
अगर उन्हें इस ब्रांड को खत्म होने से बचाना है और अपने बचे हुए कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने से रोकना है, तो पिता-पुत्र दोनों को मातोश्री की चारदीवारी से पूरी तरह बाहर निकलना होगा। साल 2022 की पहली बगावत के बाद जिस तरह वे सड़क पर उतरे थे, आज उससे कहीं ज्यादा पसीना बहाने और सीधे जनता से जुड़ने की जरूरत है। अगर संगठन को नए सिरे से नहीं सींचा गया, तो ठाकरे परिवार का यह सबसे चुनौतीपूर्ण दौर उनके राजनीतिक सूर्यास्त की शुरुआत भी साबित हो सकता है।


