सिंधु सभ्यता के 'हिन्दू' गढ़ पर कैसे हुआ इस्लामी शासन का उदय? भजन की जगह अज़ान, जानें भारत के इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव

Islamic Rule In Sindh: कभी वेदों की गूंज और बुद्ध के उपदेशों से भरी भूमि आज इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान कहलाती है। जानिए कैसे सिंधु सभ्यता और सप्तसिंधु प्रदेश समय के साथ इस्लामी शासन में बदले।

Harsh Sharma
Published on: 5 Oct 2025 7:57 AM IST (Updated on: 5 Oct 2025 8:10 AM IST)
सिंधु सभ्यता के हिन्दू गढ़ पर कैसे हुआ इस्लामी शासन का उदय? भजन की जगह अज़ान, जानें भारत के इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव
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Islamic Rule In Sindh: कभी जिस धरती पर वेदों की गूंज सुनाई देती थी, जहां गौतम बुद्ध ने करुणा और शांति का संदेश दिया, और जहां संस्कृत की पहली ध्वनि उभरी, आज वही जगह “इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान” के नाम से जानी जाती है। यह सोचने वाली बात है कि क्या यह भूमि कभी हिंदू राष्ट्र थी? अगर नहीं, तो फिर यह इस्लामी देश कैसे बनी? इसका उत्तर इतिहास, धर्म और राजनीति, तीनों में छिपा है। आज का पाकिस्तान वही इलाका है जिसे पुराने समय में सप्तसिंधु प्रदेश कहा जाता था। यही वह भूमि है जहां सिंधु घाटी की सभ्यता बसी थी, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और तक्षशिला जैसे प्राचीन नगर यहीं फले-फूले। इस धरती पर यज्ञ हुए, ऋषि-मुनियों ने तपस्या की, और आगे चलकर यहीं से बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ।

कभी यह इलाका भारतीय संस्कृति का हिस्सा था, लेकिन वक्त के साथ यहां धर्म और सत्ता दोनों बदलते गए। आठवीं शताब्दी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया। राजा दाहर ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन वे हार गए, और पहली बार इस भूमि पर इस्लामी शासन की नींव पड़ी। इसके बाद ग़जनवी, गौरी, लोधी और मुगल शासकों के दौर में इस्लामी प्रभाव और गहराता गया।


लहू और आग में लिखा गया इतिहास

ब्रिटिश राज के समय हिंदू और मुसलमान एक साथ तो रहते थे, लेकिन आपसी विश्वास की दीवारें खड़ी हो चुकी थीं। 1906 में मुस्लिम लीग के गठन के साथ ही मुसलमानों के लिए अलग पहचान की मांग उठी। यहीं से शुरू हुआ दो राष्ट्र सिद्धांत, जिसने आगे चलकर भारत के विभाजन का रास्ता तैयार किया। मोहम्मद अली जिन्ना ने इसे इस्लाम के अस्तित्व का सवाल बना दिया, जबकि गांधीजी और नेहरू अखंड भारत के पक्ष में थे। 1940 के लाहौर प्रस्ताव में मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए अलग देश की मांग रखी गई, और 1947 में वह सपना हकीकत बना, लेकिन खून और बर्बादी के साथ।

विभाजन के समय पंजाब और बंगाल दंगों में जल उठे। करीब 10 लाख लोग मारे गए और एक करोड़ से ज्यादा को अपना घर छोड़ना पड़ा। जहां कभी हिंदू और सिख बड़ी संख्या में रहते थे, सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान, वहां अब मंदिरों की जगह मस्जिदों की अजान सुनाई देने लगी। 1947 में पाकिस्तान में हिंदू आबादी करीब 15% थी, लेकिन 1951 तक घटकर 2% से भी कम रह गई।


पाकिस्तान बना इस्लामी गणराज्य

1956 में पाकिस्तान ने खुद को आधिकारिक तौर पर इस्लामी गणराज्य घोषित किया। धर्मनिरपेक्षता को संविधान से बाहर कर दिया गया। जिया-उल-हक़ के शासन में शरीयत कानून लागू हुआ, और इस्लाम राजनीति और न्याय प्रणाली का केंद्र बन गया। धीरे-धीरे पाकिस्तान पूरी तरह एक धार्मिक राष्ट्र बन गया, जबकि भारत ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता चुना।

आज पाकिस्तान में हिंदू आबादी करीब 1.8% ही बची है। वे ज्यादातर सिंध के थरपारकर और मीरपुरखास में रहते हैं। कई प्राचीन मंदिर आज विरासत स्थलों (Heritage Sites) के रूप में तो मौजूद हैं, लेकिन पूजा की स्वतंत्रता सीमित है। जिन परिवारों ने सदियों तक उस भूमि पर जीवन बिताया, उन्होंने या तो भारत की ओर पलायन किया या चुपचाप वहीं रहना सीख लिया।


धर्म का सच

मनुस्मृति में कहा गया है, “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः”, यानी जो धर्म को नष्ट करता है, वही स्वयं नष्ट होता है, और जो धर्म की रक्षा करता है, वही बचता है। पाकिस्तान का इतिहास इसी सत्य को दर्शाता है, जहां धर्म को राजनीति का केंद्र बना दिया गया, वहीं भारत ने धर्म और राजनीति को अलग रखा।इसलिए कहा जा सकता है कि पाकिस्तान कभी हिंदू राष्ट्र नहीं था, लेकिन वह हिंदू संस्कृति की भूमि जरूर थी। इसकी मिट्टी में वेदों की गूंज, नदियों में सिंधु घाटी का इतिहास, और हवा में प्राचीन सभ्यता की खुशबू अब भी मौजूद है। समय के साथ सब कुछ बदल गया, सीमाएं, शासन और पहचान। पर शायद अब भी वह भूमि मन ही मन पूछती है, “मैं कौन हूं? वही सिंधु की धरती या इस्लामी गणराज्य?” कभी यहां दीपक की रोशनी थी, अब अजान की आवाज़ है, और यही विरोधाभास पाकिस्तान के इतिहास की असली कहानी है।

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Harsh Sharma is a Content Writer at Newstrack.com.

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