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SIR 2026: SIR के बाद अब घर-घर छूटे मतदाताओं को खोजेगा चुनाव आयोग, 20 राज्यों में विशेष अभियान
SIR 2026: SIR के बाद 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छूटे पात्र मतदाताओं की पहचान के लिए घर-घर अभियान चलेगा। BLO फॉर्म-6 के जरिए नाम जोड़ने में मदद करेंगे।
SIR 2026 (Image Credit-Social Media)
नई दिल्ली। देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच चुनाव आयोग ने अब उन पात्र मतदाताओं को खोजने के लिए विशेष अभियान शुरू करने का निर्देश दिया है जिनके नाम पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची में नहीं आ पाए। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह अभियान चलाया जाएगा जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। बूथ लेवल अधिकारी यानी BLO ऐसे मतदाताओं के घर तक पहुंचेंगे, पुरानी और नई मतदाता सूची का मिलान करेंगे और यदि कोई पात्र व्यक्ति गलती से छूट गया है तो उससे नया फॉर्म-6 भरवाकर नाम जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। चुनाव आयोग ने इस अभियान में नए और पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के साथ बेघर, रैन बसेरों में रहने वाले और श्रमिक बस्तियों के लोगों को भी शामिल करने को कहा है। आयोग ने राज्यों से यह काम करीब एक महीने में पूरा करने को कहा है।
इस फैसले की अहमियत केवल इतनी नहीं है कि छूटे नाम दोबारा जोड़े जाएंगे। यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है जब SIR के दौरान करीब 13 करोड़ नामों को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो चुका है। विपक्ष इसे बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जाने का मामला बता रहा है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि इस आंकड़े को “13 करोड़ वैध मतदाताओं को अंतिम रूप से मतदाता सूची से निकाल दिया गया” समझना गलत होगा। आयोग के मुताबिक करीब 13 करोड़ का आंकड़ा मोटे तौर पर चार श्रेणियों से बना है—लगभग 2.8 करोड़ मृत, करीब 3 करोड़ अनुपस्थित या जिनका पता नहीं चल पाया, करीब 6.3 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित और लगभग एक करोड़ ऐसे नाम जो एक से अधिक स्थानों पर दर्ज पाए गए। इन्हें ASDD यानी अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट श्रेणियों में रखा गया। आयोग का पक्ष है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची से किसी नाम का बाहर होना और अंतिम सूची से किसी पात्र नागरिक का नाम कानूनी प्रक्रिया के बाद हटाया जाना दो अलग अवस्थाएं हैं।
यहीं इस पूरे विवाद को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है। SIR से पहले की मतदाता सूची में नाम था लेकिन सत्यापन के दौरान व्यक्ति अपने पते पर नहीं मिला, तो उसका मामला उस व्यक्ति से अलग है जिसकी मृत्यु प्रमाणित हो चुकी है। इसी तरह कोई व्यक्ति स्थायी रूप से दूसरे शहर या राज्य में चला गया है तो पुराने पते से उसका नाम हटना आवश्यक हो सकता है, लेकिन वह अपने नए सामान्य निवास स्थान पर मतदाता बनने का अधिकारी है। एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में दर्ज नामों में एक प्रविष्टि बनाए रखकर दूसरी हटाई जा सकती है। इसलिए इन चारों श्रेणियों को जोड़कर सीधे यह कहना कि 13 करोड़ जीवित और पात्र मतदाताओं का मतदान अधिकार खत्म कर दिया गया, उपलब्ध आंकड़ों से साबित नहीं होता। दूसरी ओर इतने बड़े पैमाने पर नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर होने के कारण यह सवाल स्वाभाविक है कि इनमें कहीं पात्र और जीवित मतदाता भी तो नहीं छूट गए। आयोग का नया घर-घर अभियान इसी संभावना की दोबारा जांच करने की कोशिश है।
आंकड़ों में महाराष्ट्र सबसे अधिक चर्चा में रहा है। SIR से पहले महाराष्ट्र की मतदाता संख्या करीब 9.78 करोड़ थी, जबकि 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट सूची में यह करीब 7.71 करोड़ रह गई। यानी लगभग 2.07 करोड़ नामों का अंतर आया। लेकिन यहां भी 2.07 करोड़ को अंतिम रूप से हटाए गए पात्र मतदाताओं की संख्या कहना सही नहीं होगा। चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अवधि 30 सितंबर से बढ़ाकर 12 अक्टूबर कर दी है। करीब 1.22 करोड़ मतदाताओं से संबंधित नोटिस और विसंगतियों के निस्तारण की समयसीमा भी आगे बढ़ाई गई है। इसका अर्थ है कि वहां अंतिम सूची तैयार होने से पहले नाम जोड़ने, दस्तावेज देने और आपत्ति दूर करने की प्रक्रिया अभी चल रही है।
नई व्यवस्था में BLO की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होने जा रही है। राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को SIR से पहले की मतदाता सूची और उसके बाद तैयार सूची का मिलान कर उन लोगों की पहचान करने को कहा गया है जिनका नाम पहले मौजूद था लेकिन अब नहीं है। BLO ऐसे व्यक्तियों तक पहुंचेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि व्यक्ति वास्तव में वहां रहता है या नहीं, वह किसी दूसरी जगह स्थानांतरित हुआ है, उसकी मृत्यु हो चुकी है अथवा वह पात्र होने के बावजूद प्रक्रिया में छूट गया। पात्र व्यक्ति का नाम गलती से बाहर मिला तो उससे फॉर्म-6 भरवाया जाएगा। आवेदन का अंतिम निर्णय BLO नहीं बल्कि संबंधित Electoral Registration Officer यानी ERO करेगा।
इस प्रक्रिया में राजनीतिक दलों को भी शामिल रखने की व्यवस्था की गई है। जिन छूटे हुए मतदाताओं से फॉर्म-6 भरवाया जाएगा उनकी जानकारी राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट यानी BLA के साथ साझा की जाएगी। यदि किसी नाम पर किसी राजनीतिक दल या दूसरे पात्र पक्ष को आपत्ति है तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसे उठाया जा सकेगा। इसके बाद ERO उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों को देखकर निर्णय करेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि नाम जोड़ने की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में रहे और कोई अपात्र व्यक्ति केवल विशेष अभियान का लाभ उठाकर मतदाता सूची में प्रवेश न कर सके।
आयोग ने BLO को सक्रिय लक्ष्य देने की व्यवस्था भी की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रत्येक BLO को हर सप्ताह करीब 20 से 25 ऐसे मतदाताओं तक पहुंचने को कहा गया है जिनके नाम छूटने या नए मतदाता के रूप में पंजीकरण की संभावना है। यह सामान्य मतदाता पंजीकरण अभियान से कुछ अलग है क्योंकि इसमें अधिकारी केवल आवेदन आने का इंतजार नहीं करेंगे बल्कि संभावित छूटे हुए मतदाताओं की पहचान कर उनके घर तक जाएंगे। चुनाव आयोग ने राज्यों से इस अभियान को लगभग एक महीने में पूरा करने को कहा है।
विशेष अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन नागरिकों को मतदाता सूची में लाना भी है जिनका स्थायी आवास नहीं है। मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को रैन बसेरों, श्रमिक बस्तियों और बेघर लोगों के रहने वाले स्थानों पर विशेष शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं। भारतीय चुनाव कानून में मतदाता बनने के लिए मकान का मालिक होना आवश्यक नहीं है। मूल प्रश्न व्यक्ति के ‘सामान्य निवास’ का है। इसलिए बेघर नागरिक भी पात्रता की शर्तें पूरी करने पर मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकते हैं। आयोग का नया अभियान इस वर्ग पर विशेष ध्यान देने की बात करता है।
पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं को भी अभियान में प्राथमिकता दी जाएगी। कोई नागरिक 18 वर्ष की पात्र आयु पूरी कर चुका है और उसका नाम सूची में नहीं है तो वह फॉर्म-6 के जरिए पंजीकरण करा सकता है। महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि SIR पूरी हो चुके राज्यों में अब सामान्य continuous updation यानी निरंतर अद्यतन प्रक्रिया के तहत फॉर्म-6 इस्तेमाल होगा और SIR के समय जो अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी, वह सामान्य नामांकन में आवश्यक नहीं होगी। इस बिंदु को लेकर पहले राजनीतिक विवाद भी हुआ था। आयोग का ताजा कदम सामान्य मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया को फिर प्रमुख माध्यम बनाता है।
इस अभियान को केवल प्रशासनिक कवायद के रूप में देखना मुश्किल है क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में बड़ा राजनीतिक विवाद चल रहा है। विपक्षी दलों ने SIR के दौरान बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर होने को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि पात्र मतदाताओं को सूची से हटाया गया। चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है। आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित और एक से अधिक स्थानों पर दर्ज प्रविष्टियों को साफ करने के साथ प्रत्येक पात्र नागरिक को सूची में बनाए रखना है। आयोग ने यह भी कहा है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के SIR संबंधी निर्णय सामूहिक और सर्वसम्मति से लिए गए। विपक्ष इन स्पष्टीकरणों से संतुष्ट नहीं है और प्रक्रिया की पारदर्शिता तथा बड़े पैमाने पर हुई कटौती को लेकर सवाल उठा रहा है।
13 करोड़ के आंकड़े को लेकर विवाद आखिर क्यों इतना बड़ा है? इसकी एक वजह संख्या का आकार है। यह संख्या देश के कई बड़े राज्यों की पूरी मतदाता आबादी से भी अधिक है। दूसरी वजह प्रक्रिया है। यदि कोई व्यक्ति मृत है तो नाम हटना स्वाभाविक है, यदि कोई स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुका है तो पुराने निर्वाचन क्षेत्र से नाम हटना भी सामान्य है और एक व्यक्ति का दो स्थानों पर मतदाता बने रहना कानूनसम्मत नहीं है। विवाद मुख्यतः उन लोगों को लेकर है जिन्हें अनुपस्थित या पता न चलने वाला माना गया, उन स्थानांतरित मतदाताओं को लेकर है जो नए पते पर पंजीकृत नहीं हो पाए और उन संभावित मामलों को लेकर है जिनमें BLO के सत्यापन के दौरान पात्र मतदाता छूट गए। नया अभियान इन्हीं कमजोर कड़ियों की दोबारा जांच करेगा।
इसका एक बड़ा उदाहरण दिल्ली है। SIR से पहले दिल्ली में करीब 1.45 करोड़ मतदाता थे, जबकि ड्राफ्ट सूची में संख्या लगभग 97.53 लाख रह गई, यानी करीब 32.8 प्रतिशत का अंतर। महाराष्ट्र में संख्यात्मक रूप से करीब 2.07 करोड़ का अंतर सबसे बड़ा रहा। दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव, तेलंगाना तथा अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में भी अनुपात के लिहाज से बड़ा अंतर दर्ज हुआ। इन आंकड़ों ने विपक्ष की आपत्तियों को राजनीतिक बल दिया, जबकि आयोग ने बार-बार कहा कि ड्राफ्ट सूची अंतिम सूची नहीं है और दावे-आपत्तियों तथा सत्यापन के बाद पात्र लोगों को जोड़ा जा सकता है।
इसी विवाद ने 2 अक्टूबर को सड़कों पर राजनीतिक रूप भी लिया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी, वाम दलों, कांग्रेस से जुड़े युवा और छात्र संगठनों तथा अन्य समूहों के कार्यकर्ता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पहुंचने की कोशिश करते रहे। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू थे। पुलिस के मुताबिक जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों से करीब 700 लोगों को हिरासत में लिया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में आतिशी, सौरभ भारद्वाज, संजय सिंह सहित आम आदमी पार्टी के नेता, वामपंथी दलों और छात्र संगठनों के नेता तथा सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। सुरक्षा व्यवस्था के कारण दिल्ली मेट्रो के 12 स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार दिन के अलग-अलग समय में बंद किए गए और मध्य दिल्ली में इंटरनेट सेवाओं पर भी अस्थायी रोक लगाई गई।
दिल्ली के समानांतर मुंबई के शिवाजी पार्क में Cockroach Janta Party यानी CJP के आह्वान पर प्रदर्शन हुआ। Reuters के अनुसार सैकड़ों समर्थक इस आंदोलन में शामिल हुए, जबकि कुछ स्थानीय रिपोर्टों ने संख्या हजारों में बताई। इसलिए भीड़ की कोई एक निश्चित संख्या बताना फिलहाल उचित नहीं होगा। प्रदर्शन में CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने SIR, मतदाता सूची और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। CJP ने आंदोलन को दूसरे शहरों तक ले जाने की घोषणा भी की।
मुंबई के प्रदर्शन को फिल्म और कला जगत की कुछ प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी के कारण भी राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान मिला। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी, संगीतकार विशाल ददलानी, फिल्मकार विशाल भारद्वाज और हंसल मेहता तथा महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी सहित कई लोग प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की ओर से भी आंदोलन को समर्थन दिए जाने की खबरें हैं। प्रदर्शनकारियों के आरोपों को चुनाव आयोग ने स्वीकार नहीं किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची संबंधी निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं और SIR का उद्देश्य पात्र मतदाताओं को हटाना नहीं बल्कि सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी 2 अक्टूबर के प्रदर्शनों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त पर राजनीतिक हमला तेज किया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों की हिरासत का विरोध किया और कहा कि ज्ञानेश कुमार को जाना होगा तथा जिस “सिस्टम” ने उन्हें पद पर बैठाया है वह भी जाएगा। उन्होंने प्रदर्शन को कथित “वोट चोरी” के खिलाफ युवाओं की लड़ाई बताया। यह राहुल गांधी और कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है; “वोट चोरी” चुनाव आयोग या किसी न्यायिक संस्था द्वारा स्थापित तथ्य नहीं है। चुनाव आयोग ने ऐसे आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि SIR की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों को भी दावे और आपत्तियों का अवसर दिया गया है।
पूरे विवाद में एक और संवेदनशील मुद्दा चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की खबरों का है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले महीनों में SIR सहित कुछ प्रक्रियात्मक मामलों में सवाल या सुझाव दर्ज किए थे। चुनाव आयोग ने इस व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि प्रारूप तैयार करने के दौरान अधिकारियों और आयुक्तों की ओर से सवाल, सुझाव और टिप्पणियां सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा अंतिम निर्णय तीन सदस्यीय आयोग ने सर्वसम्मति से लिए। इसलिए इन टिप्पणियों को अपने आप मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ दूसरे दोनों चुनाव आयुक्तों के औपचारिक विरोध के रूप में प्रस्तुत करना भी सही नहीं होगा।
नए अभियान का व्यावहारिक अर्थ आम मतदाता के लिए बहुत सीधा है। जिस व्यक्ति का नाम SIR से पहले मतदाता सूची में था लेकिन अब दिखाई नहीं दे रहा, उसे यह मानकर नहीं बैठ जाना चाहिए कि उसका मतदान अधिकार स्थायी रूप से समाप्त हो गया। उसे अपनी वर्तमान मतदाता सूची में नाम जांचना चाहिए और नाम न मिलने पर फॉर्म-6 के जरिए पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। विशेष अभियान में BLO स्वयं भी ऐसे मतदाताओं तक पहुंचेंगे। लेकिन अंतिम जिम्मेदारी केवल BLO पर छोड़ना जोखिम भरा होगा, क्योंकि चुनाव में मतदान तभी संभव है जब अंतिम मतदाता सूची में नाम मौजूद हो।
यहां चुनाव आयोग के सामने भी दोहरी जिम्मेदारी है। मतदाता सूची साफ रखना आवश्यक है—मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों की पुरानी प्रविष्टियों और एक से अधिक स्थानों पर मौजूद नामों को अनिश्चितकाल तक बनाए रखना भी चुनावी सूची की विश्वसनीयता को कमजोर करता है। दूसरी तरफ किसी जीवित, पात्र और अपने निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य रूप से निवास करने वाले नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाना उससे उसके सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार के प्रयोग का अवसर छीन सकता है। इसलिए SIR की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जा सकती कि कितने नाम हटे; असली कसौटी यह होगी कि अंतिम सूची में प्रत्येक पात्र नागरिक शामिल हो और प्रत्येक अपात्र, मृत या दोहरी प्रविष्टि विधिसम्मत प्रक्रिया से हटे।
यही कारण है कि 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू हुआ नया घर-घर अभियान राजनीतिक विवाद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। करीब 13 करोड़ नामों की भारी संख्या ने SIR की शुद्धता पर सार्वजनिक बहस पैदा की है, लेकिन उस संख्या के भीतर मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और दोहरे पंजीकरण वाले लोगों के साथ कितने वास्तविक पात्र मतदाता छूटे, इसका अंतिम उत्तर अभी उपलब्ध नहीं है। चुनाव आयोग का नया अभियान इसी प्रश्न का व्यावहारिक परीक्षण होगा। यदि घर-घर सत्यापन में बड़ी संख्या में पात्र मतदाता वापस जुड़ते हैं तो यह SIR की प्रारंभिक प्रक्रिया में हुई चूक के पैमाने पर नए सवाल खड़े करेगा; यदि संख्या बहुत कम रहती है तो आयोग के इस तर्क को आंकड़ों का आधार मिलेगा कि अधिकांश बाहर हुई प्रविष्टियां मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लीकेट श्रेणी की थीं। इसलिए इस विवाद में अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा 13 करोड़ नहीं, बल्कि विशेष अभियान और सभी दावे-आपत्तियां निपटने के बाद प्रकाशित होने वाली अंतिम मतदाता सूची होगी।


