ममता के गढ़ में स्मृति का बांग्ला वार! ‘आमी आपनादेर मेये’ से BJP ने बदला बंगाल का खेल?

West Bengal Election Smriti Irani 2026: ममता बनर्जी के गढ़ में स्मृति ईरानी का बांग्ला दांव चर्चा में है। ‘आमी आपनादेर मेये’ के भावनात्मक संदेश के साथ BJP ने बंगाल चुनाव में नया नैरेटिव खड़ा कर दिया। क्या इससे बदल जाएगा चुनावी खेल? जानिए पूरी रणनीति।

Harsh Srivastava
Published on: 23 April 2026 9:24 AM IST
ममता के गढ़ में स्मृति का बांग्ला वार! ‘आमी आपनादेर मेये’ से BJP ने बदला बंगाल का खेल?
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West Bengal Election Smriti Irani 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक नई और बेहद दिलचस्प 'नैरेटिव वॉर' छिड़ी हुई है। जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को 'बाहरी' या 'आउटसाइडर' बताकर घेरती रही हैं, वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी इस मोर्चे पर बीजेपी का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरी हैं। स्मृति ईरानी जब मंच से अपनी सहज और धाराप्रवाह बांग्ला में बोलना शुरू करती हैं, तो वे न केवल विपक्ष के आरोपों की हवा निकाल देती हैं, बल्कि सीधे तौर पर बंगाली जनमानस के दिलों में पैठ बनाती नजर आती हैं।

जब 'बनर्जी' बनीं 'बंदोपाध्याय': जड़ों से जुड़ाव का नया अंदाज

स्मृति ईरानी का बंगाल चुनाव में उतरना किसी सांस्कृतिक-राजनीतिक प्रयोग से कम नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान उनका एक अलग ही रूप निखरकर सामने आ रहा है। वे केवल भाषण नहीं दे रहीं, बल्कि वे उन बारीक सांस्कृतिक कड़ियों को जोड़ रही हैं जो उन्हें बंगाल की माटी का हिस्सा बनाती हैं। जब वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधती हैं, तो उन्हें बनर्जी नहीं बल्कि खाटी बंगाली लहजे में 'ममता बंदोपाध्याय' कहकर पुकारती हैं। इसी तरह, बीजेपी के चुनाव चिह्न 'कमल' को वे 'पद्म फूल' बोलती हैं, जिससे स्थानीय जनता को उनके अपने होने का गहरा एहसास होता है।

"आमी आपनादेर मेये": दिल्ली से आई नेता नहीं, बंगाल की बेटी

एक चुनावी सभा में जब स्मृति ईरानी ने कहा, "आमी आपनादेर मेये, दिल्ली थेके आशिनी, बांग्लार माटी आमार निजेर," तो भीड़ ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। इसका सीधा अर्थ था कि "मैं आप लोगों की बेटी हूं, मैं दिल्ली से नहीं आई हूं, बंगाल की मिट्टी मेरी अपनी है।" स्मृति अपने भाषणों में अक्सर यह याद दिलाती हैं कि उनके नाना कोलकाता के साल्टलेक में रहते थे और उनके परिवार का जुड़ाव दमदम इलाके से भी रहा है। उनकी मां शिबानी बागची एक बंगाली ब्राह्मण परिवार से हैं, यही कारण है कि स्मृति के लिए बांग्ला सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि उनकी मातृभाषाओं में से एक है।

खान-पान की गवाही और सांस्कृतिक मेलजोल

स्मृति ईरानी बखूबी जानती हैं कि बंगाल के लोगों के दिल तक पहुंचने का रास्ता उनकी संस्कृति और खान-पान से होकर गुजरता है। बाहरी होने के आरोपों पर वे बड़े ही अनूठे अंदाज में जवाब देती हैं। वे मंच से कहती हैं, "मैं बंगाल के घर की लड़की हूं। आप मुझे बताइए, मैं इलिश मछली खाती हूं, कातला खाती हूं और भाप चिंगड़ी का स्वाद भी जानती हूं। मैं आलू भात और केला मिलाकर दूध-भात खाती हूं।" खान-पान की इन छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण आदतों का जिक्र करके वे यह साबित कर देती हैं कि बंगाल की संस्कृति उनके डीएनए में रची-बसी है।

"मा-बोनेरा, भय पाबेन ना": नारी शक्ति की बुलंद आवाज

स्मृति ईरानी केवल भाषा के स्तर पर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील मुद्दों पर भी ममता सरकार को उनके ही मैदान में चुनौती दे रही हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी हृदयविदारक घटनाओं पर वे सीधे बंगाली महिलाओं से मुखातिब होती हैं। वे कहती हैं, "मा-बोनेरा, भय पाबेन ना, अन्यायेर बिरुद्धे आमरा आपनादेर पासे आछी।" यानी "माताओं और बहनों, डरिए मत, अन्याय के खिलाफ लड़ाई में हम आपके साथ हैं।" उनका यह 'मा-बोनेरा' (माताओं-बहनों) वाला संबोधन सीधे महिला वोटरों के साथ भावनात्मक सेतु का काम कर रहा है, जो बंगाल के चुनावों में सबसे निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

पर्दे से राजनीति तक: रिफाइंड बांग्ला का जादू

स्मृति ईरानी की बांग्ला भाषा पर इतनी जबरदस्त पकड़ के पीछे एक दिलचस्प कारण उनकी अभिनय पृष्ठभूमि भी है। उन्होंने मशहूर बंगाली फिल्म 'अमृता' में दिग्गज अभिनेता विक्टर बनर्जी के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी। उस दौरान उन्होंने अपनी भाषा और संवाद अदायगी को और अधिक तराशा। आज वही कला चुनावी रैलियों और रोड शो में उनके काम आ रही है। कोलकाता की सड़कों पर रोड शो के दौरान जब वे सीधे बांग्ला में संवाद करती हैं, तो 'आउटसाइडर' वाला नैरेटिव कहीं टिकता नजर नहीं आता।

रणनीतिक प्रयोग: ममता की भाषा में ममता को चुनौती

बीजेपी ने स्मृति ईरानी को एक 'इम्पैक्ट प्लेयर' के रूप में मैदान में उतारा है। वे न केवल एक स्टार प्रचारक हैं, बल्कि एक ऐसी नेता के रूप में पेश की गई हैं जो स्थानीय संवेदनाओं को समझती हैं। 'माटी', 'पद्म फूल' और 'मां-माटी-मानुष' जैसे शब्दों को अपने विमर्श में शामिल कर वे ममता बनर्जी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं। वे साफ तौर पर यह संदेश दे रही हैं कि बंगाल की अस्मिता पर केवल एक दल का अधिकार नहीं है, और एक बंगाली बेटी के रूप में वे अपने अधिकारों और प्रदेश के विकास के लिए पूरी तरह समर्पित हैं।

Harsh Srivastava

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Content Writer Mail ID - harshsri764@gmail.com

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