Sona Mat Khareedo: सोना मत खरीदो! इंदिरा गांधी भी कर चुकी हैं आग्रह, क्या हर बार ये संकट बना वजह?

Sona Mat Khareedo: भारत में विदेशी मुद्रा संकट के दौरान सरकारें कई बार लोगों से सोना न खरीदने की अपील कर चुकी हैं। Appeal and 1971 Gold Crisis Situation Deal Indira Gandhi Apeel Impact Econ

Neel Mani Lal
Published on: 12 May 2026 4:20 PM IST
Gold Control Act
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Gold Control Act (Image Credit-Social Media)

Sona Mat Khareedo: भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है और हर साल भारी मात्रा में सोना आयात किया जाता है। चूंकि इस आयात का भुगतान डॉलर में होता है सो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनता है। पीएम मोदी ने ईरान युद्ध के चलते बनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए डॉलर बचाने के लिए अनेक उपायों की सलाह दी है जिसमें सोने की खरीद कम से कम एक साल के लिए रोकने की अपील शामिल है।

वैसे इस तरह की अपील भारत में पहली बार नहीं की गई है। जब भी देश पर विदेशी मुद्रा का दबाव बढ़ता है, सरकारें नागरिकों से सोने की खरीद कम करने की अपील करती रही हैं।

1967 में इंदिरा गांधी ने भी की थी ऐसी अपील

यह पहली बार नहीं है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने लोगों से सोना न खरीदने को कहा हो। वर्ष 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी देशवासियों से सोने की खरीद रोकने की अपील की थी। उस समय इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय अनुशासन की बात कहते हुए लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सोना न खरीदने का आग्रह किया था। वजह यह थी कि उस दौर में भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। 1965 के भारत-पाक युद्ध, लगातार सूखे, अनाज संकट और गिरते विदेशी मुद्रा भंडार ने अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया था। 1966 में भारत को रुपये का 36 फीसदी अवमूल्यन भी करना पड़ा था।

इंदिरा गांधी सरकार का मानना था कि सोने का भारी आयात विदेशी मुद्रा भंडार को तेजी से खत्म कर रहा है। इसी कारण सरकार ने गोल्ड कंट्रोल नीति को आगे बढ़ाया और बाद में 1968 में गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया गया। इस कानून के तहत सोने के व्यापार और निजी स्वामित्व पर कड़े नियम लगाए गए।

गोल्ड कंट्रोल एक्ट क्यों लाया गया था?

1960 के दशक में भारत के पास विदेशी मुद्रा की भारी कमी थी। उस समय देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक आयात पर निर्भर थी, जबकि निर्यात कमजोर था। सरकार का मानना था कि अगर सोने के आयात पर रोक नहीं लगी तो डॉलर भंडार और तेजी से घटेगा।

उस समय के वित्त मंत्री मोरारजी देसाई का मानना था कि भारत सोना खाने वाली अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है। सरकार चाहती थी कि लोग सोने की बजाय बैंकिंग और उत्पादक निवेश में पैसा लगाएं।

1968 में सरकार ने गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया। यह भारत के आर्थिक इतिहास के सबसे कठोर आर्थिक नियंत्रणों में गिना जाता है। मोरारजी देसाई द्वारा शुरू की गई गोल्ड कंट्रोल नीतियों को बाद में इंदिरा गांधी सरकार ने और सख्त किया। लोगों को सोने की ईंटें और सिक्के रखने पर प्रतिबंध लगाया गया। ज्वैलर्स के लिए भी कई लाइसेंस और नियंत्रण लागू किए गए। हालांकि, इन कानूनों का एक बड़ा दुष्प्रभाव भी सामने आया। विशेषज्ञों के अनुसार गोल्ड कंट्रोल कानूनों के कारण देश में तस्करी और हवाला कारोबार तेजी से बढ़ा। आखिरकार 1990 में इस कानून को समाप्त कर दिया गया क्योंकि सरकार ने माना कि इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

जब भारत ने गिरवी रख दिया था सोना

भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का भुगतान संतुलन संकट सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है। उस समय भारत के पास केवल दो से तीन सप्ताह के आयात के बराबर विदेशी मुद्रा बची थी।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि भारत सरकार और रिज़र्व बैंक को लगभग 67 टन सोना विदेशों में गिरवी रखना पड़ा। इस सोने को बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड के पास भेजा गया ताकि भारत इमरजेंसी विदेशी मुद्रा जुटा सके। इसके बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव आउट वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की।

2013 में भी सोने पर सख्ती

2013 में भी भारत को चालू खाता घाटे और गिरते रुपये की समस्या का सामना करना पड़ा था। उस समय अमेरिका के फेडरल रिजर्व की नीतियों के कारण विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा था और रुपया रिकॉर्ड गिरावट पर पहुंच गया था।

यूपीए सरकार ने सोने के आयात शुल्क को 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत तक कर दिया। साथ ही 80:20 स्कीम लागू की गई, जिसके तहत आयातित सोने का 20 प्रतिशत निर्यात करना जरूरी था। उस दौर में भारत का गोल्ड इंपोर्ट बिल 54 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया था। सरकार का मानना था कि सोने की मांग कम किए बिना चालू खाता घाटा काबू नहीं होगा।

अमेरिका: निजी सोना रखना अपराध बना

महामंदी के दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट ने 1933 में आदेश जारी किया। इसके तहत अमेरिकी नागरिकों को अपना अधिकांश सोना सरकार को सौंपने का आदेश दिया गया। सरकार का उद्देश्य डॉलर को स्थिर करना और बैंकिंग संकट रोकना था। निजी तौर पर बड़ी मात्रा में सोना रखना गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। यह प्रतिबंध लगभग चार दशक तक प्रभावी रहा और 1974 में जाकर अमेरिकी नागरिकों को फिर स्वतंत्र रूप से सोना रखने की अनुमति मिली।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन भी गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा था। 1966 में ब्रिटिश सरकार ने गोल्ड कॉइन और सोने की खरीद पर नियंत्रण लगाए। सरकार को डर था कि लोग पाउंड की बजाय सोने में निवेश करने लगेंगे जिससे मुद्रा संकट और बढ़ जाएगा।

चीन में 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद निजी गोल्ड ट्रेडिंग लगभग पूरी तरह राज्य नियंत्रण में चली गई थी। 1980 के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद जाकर निजी सोना बाजार धीरे धीरे खुला।

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