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पिता की अंत्येष्टि में नहीं पहुंचीं बेटियां, ऑनलाइन रुपये भेजकर मांगा संस्कार का वीडियो
Sonipat News: सोनीपत के वृद्धाश्रम में शिवचरण गुप्ता का निधन हो गया। बेटियां अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुईं, लेकिन उनके नेत्रदान से दो दृष्टिहीन लोगों की जिंदगी रोशन हुई।
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Sonipat News: रिश्तों की संवेदनहीनता और रिश्तों के घटते मोल को उजागर करने वाली एक अत्यंत दुखद घटना हरियाणा के सोनीपत से सामने आई है। अपने जमाने में करोड़ों रुपये का कपड़ा कारोबार संभालने वाले गांव ककरोई निवासी शिवचरण गुप्ता का मंगलवार को एक वृद्धाश्रम में निधन हो गया। उनके अंतिम समय में उनकी तीन पढ़ी-लिखी और शिक्षक बेटियां उनके पास नहीं पहुंचीं, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है।
ऑनलाइन 5100 रुपये भेजे, वीडियो कॉल पर देखी अंत्येष्टि
सोनीपत स्थित आनंदाश्रम के संचालक ने शिवचरण गुप्ता के निधन की सूचना नेपाल, मुंबई और उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहने वाली उनकी तीनों बेटियों को दी। हालांकि, तीनों ही बेटियों ने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने से इनकार कर दिया। मुंबई में रहने वाली बेटी ने आनंदाश्रम के संचालक को ऑनलाइन 5100 रुपये भेजकर अंतिम संस्कार करने को कहा, वहीं नेपाल में रहने वाली बेटी ने केवल वीडियो कॉल के जरिए अंत्येष्टि की रस्म देखी। दो अन्य बेटियों ने इतना भी प्रयास नहीं किया। अंततः, समाजसेवियों और आश्रम के सदस्यों ने मिलकर शिवचरण गुप्ता की पार्थिव देह को कंधा दिया और उनका अंतिम संस्कार संपन्न कराया।
कारोबार में घाटे के बाद बेटियों ने मोड़ा मुंह
शिवचरण गुप्ता ने लगभग छह दशक पहले मुंबई में कपड़ा कारोबार स्थापित किया था और अपनी तीनों बेटियों को पढ़ा-लिखाकर शिक्षक बनाया। बेटियां अपने-अपने परिवारों के साथ नेपाल, मुंबई और आजमगढ़ में बस गईं। जब व्यापार में भारी घाटा हुआ और कारोबार बंद हो गया, तो बेटियों ने माता-पिता की सुध लेना बंद कर दिया। शिवचरण कुछ समय अपनी बड़ी बेटी के पास रहे भी, लेकिन तीन साल पहले अपनी पत्नी के साथ सोनीपत के वृद्धाश्रम में आ गए। डेढ़ वर्ष पूर्व जब उनकी पत्नी का देहांत हुआ, तब भी तीनों में से कोई बेटी सोनीपत नहीं आई थी।
जाते-जाते दो दृष्टिहीन लोगों की जिंदगी कर गए रोशन
रिश्तों की इस कड़वाहट और पीड़ा के बीच शिवचरण गुप्ता मानवता की एक अनूठी मिसाल कायम कर गए। उन्होंने जीवित रहते ही नेत्रदान का संकल्प लिया था। उनके निधन के तुरंत बाद उनकी दोनों आंखें दान कर दी गईं, जिससे दो जरूरतमंद दृष्टिहीन व्यक्तियों के जीवन में नया उजाला आया। जिन आंखों का इंतजार उनकी सगी बेटियां आखिरी बार देखने के लिए भी नहीं कर सकीं, वे आंखें अब किसी और के जीवन की उम्मीद बन गई हैं।


