जंतर-मंतर पर अब नहीं होंगे प्रदर्शन? CJP प्रोटेस्ट से पहले सॉलिसिटर जनरल ने बताया मास्टर प्लान!

Supreme Court on CJP Protest: कॉकरोच जनता पार्टी के 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले दिल्ली के 57 मेट्रो स्टेशन बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई। जानें जंतर-मंतर के विकल्प, ट्रैफिक एडवाइजरी और CJI सूर्यकांत के निर्देश।

Aditya Kumar Verma
Published on: 9 Oct 2026 6:33 PM IST
Supreme Court on CJP Protest | Jantar Mantar and Traffic Advisory
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Supreme Court on CJP Protest: दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार, 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) समेत कई संगठनों ने विरोध-प्रदर्शन (Protest) का आह्वान किया है। यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) में कथित अनियमितताओं और मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner-CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बुलाया गया है। प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की आशंका के बीच दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर आंदोलन की अनुमति नहीं दी। इसके अलावा, एहतियात के तौर पर दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करने और शनिवार को नई दिल्ली व हजरत निजामुद्दीन पहुंचने वाली ट्रेनों को रद्द करने का फैसला लिया गया।

हालांकि, सरकार और प्रशासन के इन कदमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India-CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और रेल सेवाओं पर रोक लगाने को लेकर चिंता जताई। अदालत ने साफ कहा कि विरोध-प्रदर्शन की आशंका के चलते पूरे शहर को बंद नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि 10 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो का संचालन पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए। साथ ही, आम लोगों की परेशानी कम करने के लिए दूसरे परिवहन साधनों और सड़क यातायात को लेकर भी जरूरी कदम उठाने को कहा।

57 मेट्रो स्टेशन बंद करने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में होने वाले प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली पुलिस और अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था के तहत कई सख्त कदम उठाने की तैयारी की थी। आशंका थी कि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी राष्ट्रीय राजधानी पहुंच सकते हैं। इसी के मद्देनजर दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करने और नई दिल्ली तथा हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर पहुंचने वाली ट्रेनों को रद्द करने का फैसला लिया गया।

इन फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) की सेवाओं को पूरी तरह रोक दिया जाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे दिल्ली के आम नागरिकों की आवाजाही प्रभावित न हो। मेट्रो और रेल सेवाएं बंद होने से उन लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी हो सकती है, जो रोजाना नौकरी, पढ़ाई और दूसरे जरूरी कामों के लिए सफर करते हैं।

‘पूरे शहर को बंद नहीं किया जा सकता’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन का हवाला देकर पूरे शहर को बंद नहीं किया जा सकता। सुरक्षा के नाम पर लगाए गए अत्यधिक प्रतिबंधों का सीधा असर आम लोगों पर पड़ सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और लोगों की आवाजाही जारी रखने के बीच संतुलन जरूरी है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह संबंधित अधिकारियों से मेट्रो और अन्य रेल सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए कहेंगे। उन्होंने अधिकारियों से परिवहन सेवाओं को उचित नियमों और नियंत्रण के साथ जारी रखने की अनुमति देने का आग्रह करने की बात कही।

पीठ ने तुषार मेहता के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया और स्पष्ट किया कि मेट्रो ट्रेनों के संचालन पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। अदालत के मुताबिक, सुरक्षा व्यवस्था के साथ परिवहन सेवाओं को इस तरह चलाया जाना चाहिए कि दिल्ली के निवासियों और दूसरे यात्रियों को कम से कम असुविधा हो।

मेट्रो और ट्रेनों के संचालन की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मेट्रो ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक नहीं होगी। साथ ही, अधिकारियों को मेट्रो और दूसरी रेल सेवाओं को उचित तरीके से चलाने के संबंध में सोच-समझकर फैसला लेना होगा।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अधिकारियों की ओर से लिए गए फैसले का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। इसका उद्देश्य यह है कि यात्रियों को पहले से पता हो कि मेट्रो और रेल सेवाएं किस तरह संचालित होंगी, ताकि उन्हें सफर के दौरान अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

पीठ ने कहा कि यात्रियों को और अधिक असुविधा से बचाने के लिए संबंधित फैसलों की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाना जरूरी है। यानी सुरक्षा व्यवस्था के तहत परिवहन सेवाओं में कोई बदलाव किया जाता है, तो लोगों को इसकी स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए, जिससे वे अपनी यात्रा की योजना उसी हिसाब से बना सकें।

सड़क पर निकलने वालों के लिए ट्रैफिक एडवाइजरी जारी करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो और रेल सेवाओं को लेकर ही निर्देश नहीं दिया, बल्कि सड़क मार्ग से दिल्ली के भीतर यात्रा करने वाले लोगों की परेशानी को भी ध्यान में रखा। अदालत ने दिल्ली के अधिकारियों को ट्रैफिक एडवाइजरी (Traffic Advisory) जारी करने का निर्देश दिया, ताकि लोगों को सड़क पर आवाजाही के दौरान होने वाली दिक्कतों के बारे में पहले से जानकारी मिल सके।

प्रदर्शन को देखते हुए अगर किसी सड़क पर बैरिकेडिंग या यातायात में बदलाव किया जाता है, तो लोगों को उसके बारे में बताना जरूरी होगा। इससे यात्रियों को वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करने और अपनी यात्रा की योजना बनाने में मदद मिलेगी।

अदालत की चिंता इस बात को लेकर थी कि विरोध-प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए किए गए इंतजामों का असर आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर जरूरत से ज्यादा न पड़े। इसलिए, प्रशासन को सुरक्षा के साथ-साथ यातायात और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था भी बनाए रखनी होगी।

जंतर-मंतर के अलावा दूसरी जगह प्रदर्शन कराने पर विचार

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुझाव भी दिया। अदालत ने कहा कि दिल्ली में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर के अलावा किसी दूसरी उपयुक्त जगह की पहचान की जानी चाहिए। इस जगह पर प्रदर्शनकारियों के लिए जरूरी सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध होने चाहिए, ताकि लोग शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से अपनी बात रख सकें।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को बताया कि सक्षम अधिकारी शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर के अलावा किसी दूसरी जगह को तय करने के सुझाव पर विचार करेंगे।

इसके बाद सभी पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि अब समय आ गया है कि जंतर-मंतर के स्थान पर किसी दूसरे उपयुक्त स्थल की पहचान की जाए। ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को जरूरी सुविधाएं मिल सकें और विरोध-प्रदर्शन को व्यवस्थित तरीके से आयोजित किया जा सके।

क्या भविष्य में जंतर-मंतर पर नहीं होंगे प्रदर्शन?

सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सुझाव रखा गया कि शांतिपूर्ण और कानूनी विरोध-प्रदर्शनों के लिए ऐसी दूसरी जगह तय की जा सकती है, जहां जरूरी सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध हों। अदालत ने केंद्र सरकार से इस सुझाव पर विचार करने और उचित फैसला लेने को कहा।

आदेश में कहा गया कि भारत सरकार शांतिपूर्ण और कानूनी विरोध-प्रदर्शनों के लिए किसी दूसरी उपयुक्त जगह की पहचान करने के सुझाव पर विचार करे। इसके बाद सक्षम अधिकारी इस संबंध में फैसला लें।

हालांकि, इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिए गए हैं। फिलहाल अदालत ने दूसरी जगह तय करने के सुझाव पर विचार करने को कहा है। इसलिए, भविष्य में जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन नहीं होंगे, ऐसा निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।

कॉकरोच जनता पार्टी समेत कई संगठनों के 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले हुई इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद करने पर रोक लगाने की बात कही, तो दूसरी तरफ शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक जगह तय करने के सुझाव पर भी विचार करने का निर्देश दिया। अब इस मामले में केंद्र और संबंधित अधिकारियों के फैसले अहम होंगे।

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आदित्य कुमार वर्मा उत्तर प्रदेश के पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने भारतीय राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और मानवीय सरोकारों से जुड़ी खबरों की व्यापक रिपोर्टिंग की है। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है और वे रिपोर्टर, एंकर तथा सब-एडिटर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। साथ ही वो उत्तर प्रदेश की राजनीति, शासन-प्रशासन और नौकरशाही व्यवस्था की गहरी समझ रखते हैं। पत्रकारिता के अलावा उन्हें पुस्तकों का अध्ययन, लेखन, कविता-लेखन और पाठ और यात्राएं करना विशेष रूप से पसंद है। विभिन्न संस्कृतियों और समाजों को करीब से जानने-समझने की उनकी रुचि ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है, जिसका सकारात्मक प्रभाव उनकी लेखन शैली और रिपोर्टिंग में भी देखने को मिलता है।

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