“सब्सिडी देने के बजाय”,…सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी से हड़कंप, संविदा शिक्षक व्यवस्था पर छिड़ी बहस

Temporary Employment In Education: सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर देते हुए संविदा शिक्षकों और अस्थायी उपायों पर सख्त टिप्पणी की। झारखंड सरकार को 50 प्रतिशत पद संविदा शिक्षकों के लिए अधिसूचित करने का निर्देश दिया गया।

Aditya Kumar Verma
Published on: 8 May 2026 8:50 AM IST
Temporary Employment In Education
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Temporary Employment In Education: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि शिक्षा को अस्थायी उपायों और सब्सिडी के सहारे चलाने के बजाय उसे मजबूत और स्थायी व्यवस्था के रूप में विकसित करना समय की जरूरत है। अदालत ने साफ कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सेवाएं देना नहीं है बल्कि व्यापक और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराना होना चाहिए, खासकर प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर।

संविदा शिक्षकों की नियुक्ति पर बड़ा निर्देश

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के भीतर राज्य भर में सहायक शिक्षकों और सहायक आचार्यों के कुल रिक्त पदों में से पचास प्रतिशत पद विशेष रूप से संविदा पर कार्यरत शिक्षकों के लिए अधिसूचित करे। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान जैसी सरकारी योजनाओं के तहत संविदा आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति निश्चित अवधि के अनुबंध पर की जाती है, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं है।

संविदा व्यवस्था पर अदालत की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है जब कार्यपालिका को सार्वजनिक रोजगार में संविदा व्यवस्था को समाप्त करने और नियमित अंतराल पर प्रदर्शन ऑडिट करने पर विचार करना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि किसी भी सेवा में दक्षता बढ़ाने के लिए रोजगार की सुरक्षा जरूरी है और शिक्षा व्यवस्था भी इससे अलग नहीं हो सकती।

शिक्षक और छात्र संबंध पर महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायालय ने अपने अवलोकन में यह भी कहा कि शिक्षक और छात्र का रिश्ता अस्थायी नहीं होता बल्कि वर्षों तक चलता है। ऐसे में संविदा शिक्षकों से बच्चों के भविष्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी की अपेक्षा करना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि स्थायी व्यवस्था के बिना शिक्षा प्रणाली को मजबूत नहीं किया जा सकता।

चुनाव आयोग नियुक्ति मामले पर भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान भी अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वर्ष दो हजार तेईस में दिया गया उसका निर्णय केवल तब तक के लिए था जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बनाती। अदालत ने स्पष्ट किया कि उस फैसले में संसद को किसी विशेष ढांचे में कानून बनाने का निर्देश नहीं दिया गया था।

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर बहस

इस मामले में कांग्रेस नेता जया ठाकुर की ओर से वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता न्यायपालिका जितनी ही महत्वपूर्ण है और नियुक्ति प्रक्रिया को कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त होना चाहिए। वहीं एडीआर की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कानून के अभाव का लाभ हर सरकार ने उठाया है, जिससे नियुक्तियों में दुरुपयोग की आशंका बनी रही है।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने लंबे समय तक कानून न बनाए जाने को निर्वाचितों का अत्याचार करार दिया। अदालत ने यह भी कहा कि कई सांसदों के निलंबन के कारण विधेयक पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि नया कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है क्योंकि अब नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह कार्यपालिका के प्रभाव में आ गई है।

Aditya Kumar Verma

Aditya Kumar Verma

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आदित्य कुमार वर्मा न्यूजट्रैक में कंटेंट राइटर हैं। ये लगभग आठ वर्ष से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं।

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