TRENDING TAGS :
'हमारे हाथ बंधे नहीं हैं', चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट को क्यों करनी पड़ी सख्त टिप्पणी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रभावित होने की आशंका पर संवैधानिक अदालतों के हाथ बंधे नहीं हैं। YSRCP की याचिका पर उम्मीदवारों की अंतिम सूची 23 अक्टूबर तक टालने का निर्देश दिया।
Supreme Court News: चुनाव आयोग की शक्तियों और चुनाव प्रक्रिया में न्यायपालिका के हस्तक्षेप को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक अदालतें जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप कर सकती हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में सामान्यतः न्यायिक दखल से बचा जाता है, लेकिन जब अवैध या असंवैधानिक तरीकों से चुनाव को प्रभावित करने की आशंका हो, तो अदालतों के हाथ बंधे नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी युवजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) की याचिका पर आई। पार्टी ने आरोप लगाया था कि हिंसा और कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण उसके करीब दो-तिहाई उम्मीदवार शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में नामांकन दाखिल नहीं कर सके। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने प्रथम दृष्टया माना कि नामांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप जरूरी हो सकता है।
23 अक्टूबर तक अंतिम सूची जारी नहीं करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश राज्य चुनाव आयोग (SEC) को YSRCP की नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने की मांग पर विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही, आयोग से 21 अक्टूबर को उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी नहीं करने और इसे 23 अक्टूबर तक टालने को कहा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सीधे चुनाव प्रक्रिया अपने हाथ में नहीं ले रही, बल्कि राज्य चुनाव आयोग को शिकायत पर विचार कर उचित फैसला लेने का निर्देश दे रही है। YSRCP ने अपनी याचिका में दावा किया था कि हिंसा और अन्य बाधाओं के चलते उसके लगभग दो-तिहाई उम्मीदवार नामांकन दाखिल करने से वंचित रह गए।
हाई कोर्ट से राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट पहुंची YSRCP
YSRCP ने पहले आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट से चुनाव के दौरान संभावित हिंसा को रोकने के लिए अग्रिम सुरक्षा उपाय करने की मांग की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने 15 अक्टूबर को याचिका खारिज कर दी। इसके बाद नामांकन की समय-सीमा बढ़ाने की मांग भी ठुकरा दी गई, जिसके बाद पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
याचिका का राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने विरोध किया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने विपक्षी दल की ओर से पेश वीडियो क्लिप और भौतिक व इलेक्ट्रॉनिक ज्ञापनों को ध्यान में रखते हुए मामले की न्यायिक समीक्षा को जरूरी माना।
'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा'
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं और नामांकन दाखिल करना इस प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखना संवैधानिक लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
पीठ के मुताबिक, जब कोई प्रमुख विपक्षी दल अपनी आशंकाओं के समर्थन में सबूतों के साथ अदालत पहुंचता है, तो न्यायपालिका केवल इस आधार पर आंखें नहीं मूंद सकती कि मामला चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा है।
चुनाव आयोग के अधिकारों पर न्यायपालिका का अहम संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक संयम जरूरी है, ताकि चुनाव स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं के नियंत्रण में रहें और निर्धारित समय-सीमा के भीतर संपन्न हों। लेकिन इस संयम का अर्थ यह नहीं है कि चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के कथित अवैध प्रयासों पर अदालतें चुप रहें।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोककर चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित की जा रही है, तो संवैधानिक अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।
यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। हालांकि, मौजूदा मामला आंध्र प्रदेश के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों और YSRCP की शिकायत से संबंधित है। इसे सीधे SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं माना जाना चाहिए।


