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FSSAI Food Labeling: सुप्रीम कोर्ट का सवाल- क्या भारतीयों को स्वस्थ भोजन चुनने का अधिकार नहीं? FSSAI से मांगा जवाब
FSSAI Food Labeling: सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI और केंद्र से पूछा कि चीनी, नमक और संतृप्त वसा की अधिक मात्रा वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी क्यों नहीं होनी चाहिए।
Supreme Court Food Labelling (Image Credit-Social Media)
नई दिल्ली। बिस्कुट हो, नमकीन, चिप्स, इंस्टेंट नूडल्स, मीठा पेय या कोई दूसरा पैकेटबंद खाद्य पदार्थ—उपभोक्ता को पैकेट घुमाकर पीछे लिखी महीन पोषण तालिका पढ़ने और प्रतिशत का हिसाब लगाने के बजाय सामने देखते ही पता चलना चाहिए कि उसमें चीनी, नमक या संतृप्त वसा जरूरत से ज्यादा है या नहीं। इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI को बेहद कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने पूछा कि यदि दुनिया के अनेक देशों में नागरिकों को पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी देकर यह बताया जा सकता है कि खाद्य पदार्थ में चीनी, नमक या वसा अधिक है, तो भारत में ऐसा करने में इतनी हिचक क्यों है? पीठ ने यहां तक पूछा कि क्या सरकार खाद्य उद्योग और बड़ी कंपनियों के दबाव में झुक रही है। केंद्र और FSSAI को अब दो सप्ताह में अंतिम निर्णय रखने को कहा गया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यह आखिरी अवसर है; सरकार निर्णय नहीं करती तो न्यायालय स्वयं निर्देश जारी करने पर विचार करेगा।
13 अगस्त की सुनवाई में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने फरवरी में दिए अपने निर्देशों की प्रगति पर असंतोष जताया। पीठ ने कहा कि उसका पिछला आदेश कोई सामान्य सुझाव नहीं था, जिसे अधिकारी अपनी सुविधा के अनुसार स्वीकार या अस्वीकार कर दें। मामला सीधे नागरिकों, खासकर बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। अदालत ने केंद्र से पूछा कि क्या वह नहीं चाहता कि देश के लोग स्वस्थ रहें और उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार क्यों न हो कि वे वास्तव में क्या खा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने आखिर मांगा क्या है
मामले का मूल प्रश्न बहुत सरल है। अभी अधिकांश पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर पोषण संबंधी जानकारी पीछे या किनारे छोटे अक्षरों में दी जाती है। उसमें प्रति 100 ग्राम या प्रति सर्विंग कैलोरी, कुल वसा, संतृप्त वसा, चीनी, सोडियम और दूसरे पोषक तत्व लिखे रहते हैं। कानूनी औपचारिकता तो इससे पूरी हो सकती है। लेकिन साधारण उपभोक्ता बाजार में खड़े होकर यह गणना शायद ही करता है कि 30 ग्राम चिप्स या चार बिस्कुट खाने से उसकी दैनिक नमक, चीनी या वसा सीमा का कितना हिस्सा पूरा हो जाएगा।
इसीलिए दुनिया भर में फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग की अवधारणा विकसित हुई—यानी पोषण संबंधी सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी पैकेट के सामने बड़े और आसानी से समझ आने वाले रूप में दी जाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे उपभोक्ताओं को पोषण मूल्य जल्दी समझाने, स्वस्थ विकल्प चुनने और खाद्य कंपनियों को अपने उत्पादों में सुधार के लिए प्रेरित करने वाला महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय मानता है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सुझाव है कि यदि किसी खाद्य पदार्थ में तय सीमा से अधिक चीनी, नमक या संतृप्त वसा हो तो पैकेट के सामने स्पष्ट शब्दों या प्रतीक में लिखा जाए—‘चीनी अधिक’, ‘सोडियम अधिक’, ‘संतृप्त वसा अधिक’।इससे खरीदार को गणित करने की जरूरत न पड़े।
फरवरी में ही अदालत ने दिया था रास्ता
10 फरवरी, 2026 के आधिकारिक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से ऐसी सामने की चेतावनी व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने को कहा था जिससे पैकेट देखते ही उपभोक्ता को पता चल सके कि उसमें चीनी, नमक अथवा संतृप्त वसा अधिक है। अदालत ने इस विषय को नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा माना और FSSAI को आगे की कार्ययोजना बताने के लिए समय दिया था।
इससे पहले अप्रैल 2025 में भी अदालत ने FSSAI की विशेषज्ञ समिति को पैकेट के सामने पोषण लेबल व्यवस्था पर अपनी सिफारिशें तय करने का समय दिया था। FSSAI ने अदालत को बताया था कि उसके पहले प्रस्तावित इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग मॉडल पर 14 हजार से अधिक प्रतिक्रियाएं मिलीं। लेकिन हितधारकों में सहमति नहीं बन सकी। यानी बहस नई नहीं है। भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक पोषण लेबल पर कई वर्ष से चर्चा चल रही है और FSSAI ने 2022 में भी इसके लिए मसौदा नियम जारी किया था।
FSSAI का नया प्रस्ताव अदालत को क्यों पसंद नहीं आया
ताजा सुनवाई से पहले FSSAI ने एक वैकल्पिक व्यवस्था सामने रखी। चेतावनी चिन्ह लगाने के बजाय पैकेट पर एक तालिका या चित्रात्मक रूप में यह बताया जाए कि किसी उत्पाद में मौजूद अतिरिक्त चीनी, संतृप्त वसा और नमक दैनिक अनुशंसित मात्रा का कितना प्रतिशत है। खाद्य उद्योग के अनेक प्रतिनिधियों ने सीधे चेतावनी वाले लेबलों का विरोध किया था। यहीं अदालत और याचिकाकर्ता की मुख्य आपत्ति है।
मान लीजिए पैकेट पर लिखा हो कि किसी पदार्थ की एक सर्विंग में दैनिक अनुशंसित सोडियम का 28 प्रतिशत है। साधारण खरीदार को फिर भी यह तय करना होगा कि यह अधिक है या कम। यदि उसी जगह साफ लिखा हो—‘नमक अधिक’-तो निर्णय तुरंत हो जाता है।
इसीलिए आलोचकों का कहना है कि केवल आंकड़े देने वाली पोषण तालिका और चेतावनी लेबल समान चीज नहीं हैं। पहली जानकारी देती है; दूसरी जानकारी का अर्थ भी समझाती है।
स्टार रेटिंग पर भी क्यों हुआ विवाद
FSSAI का पहले प्रस्तावित मॉडल इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग था, जिसमें खाद्य पदार्थ को आधे से पांच स्टार तक रेट करने की कल्पना की गई थी। अधिक स्टार का मतलब अपेक्षाकृत बेहतर पोषण प्रोफाइल।लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसमें एक बुनियादी समस्या बताई। कोई उत्पाद चीनी या नमक में अधिक हो सकता है। लेकिन उसमें कुछ सकारात्मक तत्व—जैसे प्रोटीन, फाइबर, फल या मेवे—होने के कारण उसे संतोषजनक स्टार मिल सकते हैं। उपभोक्ता स्टार देखकर उसे स्वस्थ मान सकता है, जबकि उसमें किसी एक हानिकारक तत्व की मात्रा काफी ज्यादा हो।
चेतावनी लेबल इसके उलट सीधे कहता है—‘चीनी अधिक है’, भले ही उत्पाद में कुछ उपयोगी तत्व भी क्यों न हों।
इसी अंतर ने ‘स्टार रेटिंग बनाम चेतावनी’ को भारत की खाद्य नीति की केंद्रीय बहस बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट अब साफ, तत्काल समझ आने वाली जानकारी की दिशा में दबाव बढ़ा रहा है।
कंपनियों को चेतावनी लेबल से परेशानी क्यों
खाद्य उद्योग की आपत्तियां पूरी तरह निराधार मान लेना भी उचित नहीं होगा। कंपनियों का तर्क रहा है कि खाद्य पदार्थों की श्रेणियां अलग-अलग होती हैं, एक ही सीमा सभी उत्पादों पर लागू करना वैज्ञानिक रूप से कठिन हो सकता है और सामने बड़ी चेतावनी लगाने से किसी खाद्य पदार्थ को अनावश्यक रूप से ‘खराब’ बताने की धारणा बन सकती है।इसके अलावा पैकेजिंग बदलने, उत्पादों के फॉर्मूले संशोधित करने और अलग-अलग आकार की सर्विंग के लिए नियम लागू करने की लागत भी उद्योग उठाता है।
लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य पक्ष का जवाब है कि उद्योग की व्यावसायिक असुविधा उपभोक्ता के स्वास्थ्य और जानने के अधिकार से बड़ी नहीं हो सकती। अदालत की टिप्पणी का केंद्र भी यही था—नीति का पहला उद्देश्य नागरिकों का स्वास्थ्य होना चाहिए, न कि बहुराष्ट्रीय अथवा बड़ी खाद्य कंपनियों की सुविधा।
‘कॉरपोरेट दबाव’ पर अदालत का बेहद कड़ा सवाल
सुनवाई में पीठ ने पूछा कि क्या FSSAI विनिर्माण उद्योग के दबाव में झुक रहा है। यह किसी कंपनी के खिलाफ भ्रष्टाचार का न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। अदालत ने विलंब और FSSAI के रुख को देखते हुए प्रश्न उठाया है। इसे उसी रूप में समझना चाहिए।
महत्वपूर्ण यह है कि अदालत ने नियामक संस्था को याद दिलाया कि उसका मूल दायित्व किसके प्रति है।
FSSAI का अस्तित्व खाद्य कंपनियों को बाजार सुविधा देने के लिए ही नहीं बल्कि उपभोक्ता को सुरक्षित भोजन सुनिश्चित करने के लिए है। इसलिए यदि उद्योग और स्वास्थ्य हितों में टकराव हो तो नियामकीय कसौटी वैज्ञानिक साक्ष्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य होना चाहिए।
‘भारत विकसित देशों के मानक क्यों नहीं अपना सकता?’
सुनवाई में केंद्र की ओर से अंतरराष्ट्रीय, विशेषकर विकसित देशों के मानकों को भारत में हूबहू लागू करने की व्यावहारिकता पर प्रश्न उठाया गया। इस पर अदालत ने तीखी प्रतिक्रिया दी और पूछा कि क्या भारत हमेशा अविकसित बने रहना चाहता है। पीठ ने कहा कि दुनिया को यह संदेश जाना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों और विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर है।
यह टिप्पणी केवल खाद्य लेबल की नहीं, नियामकीय सोच की आलोचना है।
भारत की विशाल आबादी, भाषाई विविधता और खाद्य बाजार अलग हो सकते हैं। लेकिन यही कारण शायद स्पष्ट चित्रात्मक चेतावनी को और महत्वपूर्ण बनाता है। यदि करोड़ों लोग अंग्रेजी पोषण तालिका या तकनीकी प्रतिशत आसानी से नहीं समझ सकते तो एक सरल प्रतीक अथवा स्थानीय भाषा की चेतावनी अधिक उपयोगी हो सकती है।
ब्रिटेन में लाल, पीला, हरा मॉडल
ब्रिटेन में लंबे समय से स्वैच्छिक ट्रैफिक-लाइट प्रणाली इस्तेमाल होती है। पैकेट के सामने वसा, संतृप्त वसा, चीनी और नमक की मात्रा के साथ रंग दिखाए जाते हैं—हरा कम, एम्बर यानी पीला/नारंगी मध्यम और लाल अधिक मात्रा का संकेत देता है। कैलोरी भी दिखाई जाती है। ब्रिटेन सरकार ने जून 2026 के अपने उपभोक्ता मार्गदर्शन में भी यही व्यवस्था समझाई है।
इसका फायदा बहुत सहज है। ग्राहक दो समान उत्पाद सामने रखकर देख सकता है कि किसमें लाल संकेत कम हैं। हालांकि ब्रिटेन की व्यवस्था को कानूनी रूप से हर उत्पाद पर अनिवार्य चेतावनी के रूप में समझना सही नहीं होगा। वहां यह व्यापक रूप से अपनाई गई अनुशंसित फ्रंट-ऑफ-पैक प्रणाली है। इसलिए भारत में इसे जस का तस लागू करने के बजाय अपने कानून के अनुसार मॉडल बनाना होगा।
चिली का काला अष्टकोण दुनिया में चर्चा का मॉडल
चिली ने इससे कहीं अधिक सीधी व्यवस्था अपनाई। जिन पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में निर्धारित सीमा से अधिक चीनी, सोडियम, संतृप्त वसा या कैलोरी होती है, उनके सामने काले अष्टकोणीय चेतावनी चिन्ह लगाए जाते हैं। उपभोक्ता को पोषण विज्ञान समझने की जरूरत नहीं—काला निशान देखकर वह जान जाता है कि संबंधित तत्व अधिक है।
यह व्यवस्था केवल सूचना तक सीमित नहीं रही। चिली ने बच्चों को लक्ष्य कर ऐसे खाद्य पदार्थों के विपणन और स्कूलों में बिक्री से जुड़े प्रतिबंध भी लागू किए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार चिली के उपाय लागू होने के शुरुआती 18 महीनों में अधिक चीनी वाले उत्पादों की खरीद लगभग 27 प्रतिशत, अधिक कैलोरी वाले उत्पादों की 24 प्रतिशत और अधिक सोडियम वाले उत्पादों की खरीद 37 प्रतिशत घटी।
इसलिए मूल सामग्री में ‘मीठे शीतल पेयों की बिक्री 24 प्रतिशत घटी’ लिखना उपलब्ध WHO आंकड़े का सटीक रूप नहीं है। 24 प्रतिशत वाला आंकड़ा अधिक कैलोरी वाले उत्पादों की खरीद में कमी से जुड़ा है।
चेतावनी का असर केवल ग्राहक पर नहीं, कंपनी पर भी
फ्रंट लेबल की एक कम दिखाई देने वाली ताकत है—उत्पाद सुधार।यदि किसी लोकप्रिय बिस्कुट पर बड़े अक्षरों में ‘चीनी अधिक’ छपना अनिवार्य हो जाए तो कंपनी के सामने दो विकल्प होंगे—चेतावनी स्वीकार करे या चीनी घटाए ताकि उत्पाद चेतावनी सीमा के नीचे आ जाए।इसीलिए WHO फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को उपभोक्ता शिक्षा के साथ खाद्य उद्योग को उत्पादों की संरचना सुधारने के लिए प्रेरित करने वाला उपकरण भी मानता है। यानी सही लेबलिंग केवल खरीद बदल सकती है, वह बाजार में बिकने वाले खाद्य पदार्थ को भी धीरे-धीरे बदल सकती है।
इतनी चिंता चीनी, नमक और संतृप्त वसा की ही क्यों
इन तीनों का शरीर में काम है और सामान्य मात्रा में ये ‘जहर’ नहीं हैं। समस्या अत्यधिक सेवन की है।
अधिक सोडियम लंबे समय में उच्च रक्तचाप और हृदय रोग के जोखिम से जुड़ा है। अत्यधिक मुक्त या अतिरिक्त चीनी ऊर्जा का सेवन बढ़ाकर वजन बढ़ने, दांतों की समस्या और चयापचय संबंधी बीमारियों के जोखिम में योगदान करती है। संतृप्त वसा की अधिक मात्रा रक्त में LDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने और हृदय रोग के जोखिम से जुड़ी हो सकती है।इसलिए किसी पैकेट पर ‘चीनी अधिक’ चेतावनी का अर्थ यह नहीं होगा कि एक बिस्कुट खाते ही बीमारी हो जाएगी। उसका अर्थ यह है कि नियमित आहार में ऐसे उत्पादों का अधिक सेवन स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकता है।
भारत में असली समस्या एक पैकेट नहीं, पूरे दिन की है
व्यक्ति सुबह मीठा सीरियल खाता है, दोपहर में नमकीन, शाम को बिस्कुट और मीठा पेय तथा रात में इंस्टेंट खाना। हर अलग पैकेट शायद ‘बहुत ज्यादा’ न लगे, लेकिन पूरे दिन में चीनी और नमक की कुल मात्रा अनुशंसित सीमा से काफी ऊपर जा सकती है।
यहीं फ्रंट चेतावनी उपयोगी होती है।उपभोक्ता यदि एक दिन में तीन ‘High in Sodium’ वाले पैकेट देख ले तो वह अगला विकल्प बदल सकता है।पोषण का जोखिम अक्सर एक असाधारण भोजन से नहीं बल्कि रोज दोहराए जाने वाले छोटे चुनावों से बनता है।
बच्चों के मामले में खतरा ज्यादा क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार बढ़ते बच्चों का उल्लेख किया है। इसका कारण केवल बच्चों का शरीर नहीं, बल्कि उनका व्यवहार और विपणन के प्रति संवेदनशीलता भी है। पैकेट की चमकदार डिजाइन, कार्टून पात्र, पुरस्कार, विज्ञापन और स्वाद बच्चों की पसंद पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में बच्चों और किशोरों में अधिक वजन और मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ी है। 2022 में विश्व स्तर पर 5 से 19 वर्ष के 39 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर अधिक वजन वाले थे, जिनमें करीब 16 करोड़ मोटापे की श्रेणी में थे।
सिर्फ अंग्रेजी में चेतावनी पर्याप्त होगी?
भारत की परिस्थितियों में यह भी अहम सवाल है।यदि पैकेट के सामने केवल “High in Sodium” लिखा है तो ग्रामीण या गैर-अंग्रेजी भाषी उपभोक्ता के लिए लाभ सीमित हो सकता है। चित्रात्मक चेतावनी का एक लाभ यह है कि भाषा निर्भरता कम होती है।
भारतीय मॉडल में शायद प्रतीक, रंग और सरल शब्दों का संयोजन अधिक प्रभावी होगा। राज्यों और भाषाओं की विविधता देखते हुए बहुभाषी सूचना के व्यावहारिक स्वरूप पर भी विचार करना होगा।
कंपनियों की पैकेजिंग पर असर बड़ा होगा
यदि अंतिम नियम चेतावनी चिन्ह अनिवार्य करता है तो देश की हजारों खाद्य कंपनियों को अपने पैकेट फिर डिजाइन करने पड़ेंगे। कई उत्पादों की प्रयोगशाला जांच और पोषण गणना दोबारा करनी होगी। छोटे उत्पादकों को अनुपालन के लिए समय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी।इसलिए नियम जारी होते ही अगले दिन बाजार में सब कुछ बदलना संभव नहीं होगा।आमतौर पर ऐसी व्यवस्था में संक्रमण अवधि दी जाती है ताकि पुराना पैकेजिंग स्टॉक खत्म हो सके और नई छपाई शुरू हो सके।लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी नियम लागू करने के व्यावहारिक समय से अधिक नीतिगत निर्णय को वर्षों तक टालने को लेकर है।
FSSAI ने पहले भी बड़े अक्षरों में चीनी-नमक-वसा का प्रस्ताव मंजूर किया था
जुलाई 2024 में FSSAI की खाद्य प्राधिकरण बैठक ने पोषण लेबल में कुल चीनी, नमक और संतृप्त वसा को मौजूदा आकार से बड़े और मोटे अक्षरों में दिखाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। लेकिन यह भी वही बुनियादी सवाल नहीं हल करता जो सुप्रीम कोर्ट उठा रहा है।मोटे अक्षर यह बताएंगे कि मात्रा कितनी है। चेतावनी यह बताएगी कि मात्रा ज्यादा है।दोनों के बीच यही निर्णायक फर्क है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और FSSAI को दो सप्ताह में अपने अंतिम रुख के साथ लौटने को कहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दो सप्ताह में हर भारतीय खाद्य पैकेट बदल जाएगा। पहले सरकार को यह बताना होगा कि वह किस प्रकार की फ्रंट-ऑफ-पैक व्यवस्था स्वीकार करती है, चेतावनी अनिवार्य होगी या कोई अन्य मॉडल और नियम बनाने की समयसीमा क्या होगी। यदि अदालत को जवाब फिर अस्पष्ट या अपर्याप्त लगा तो उसने संकेत दिया है कि अगली सुनवाई में वह स्वयं निर्देश दे सकती है।
इसलिए यह मामला अब केवल FSSAI की तकनीकी समिति में नहीं रह गया है। यह भारत की सर्वोच्च अदालत की सीधी निगरानी में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है।
यह बहस ‘जंक फूड बनाम हेल्दी फूड’ से बड़ी है
किसी सरकार का काम यह तय करना नहीं कि नागरिक को कौन-सा बिस्कुट खाना चाहिए। लेकिन यह सुनिश्चित करना उसका वैध दायित्व है कि नागरिक जब खरीद का निर्णय करे तो उसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपे हुए न मिलें।यही इस मामले का केंद्रीय सिद्धांत है—चुनाव उपभोक्ता का रहेगा, लेकिन जानकारी भी साफ होनी चाहिए।
यदि किसी पैकेट में नमक अधिक है तो कंपनी उसे बेच सकती है और ग्राहक खरीद सकता है, लेकिन पैकेजिंग ऐसी नहीं होनी चाहिए कि उपभोक्ता को यह समझने के लिए पोषण विज्ञान का छात्र होना पड़े। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी इसी जगह केंद्रित है।
भारत में पैकेटबंद भोजन की अगली बड़ी लड़ाई शायद स्वाद या कीमत की नहीं, पैकेट के सामने के कुछ सेंटीमीटर की है। उस जगह पर अभी कंपनी अपना ब्रांड, तस्वीर और आकर्षक दावा लिखती है। अदालत का सवाल है—वहीं सामने उपभोक्ता के स्वास्थ्य से जुड़ा सबसे जरूरी सच भी क्यों न लिखा जाए?
यदि दो सप्ताह बाद FSSAI स्पष्ट चेतावनी व्यवस्था की ओर बढ़ता है, तो यह भारत में खाद्य लेबलिंग का दशकों में सबसे बड़ा बदलाव हो सकता है। और यदि वह फिर पीछे हटता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दे दिया है—इस बार अदालत स्वयं रास्ता तय कर सकती है।


