'बुआ को बेटे के साथ…' महिला के आरोपों पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, बच्चों के इस्तेमाल पर सख्त टिप्पणी

Supreme Court, POCSO Case: सुप्रीम कोर्ट ने तलाक विवाद में बच्चों के इस्तेमाल और झूठे पॉक्सो मामलों पर सख्त टिप्पणी करते हुए नाबालिग की बुआ के खिलाफ दर्ज POCSO केस रद्द कर दिया। जानिए अदालत ने क्या कहा।

Newstrack Network
Published on: 25 July 2026 10:34 PM IST (Updated on: 25 July 2026 10:36 PM IST)
pocso act supreme court
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Supreme Court, POCSO Case: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बच्चों को हथियार बनाकर आपसी बदले की भावना निकालने और ससुराल पक्ष को झूठे मामलों में फंसाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने एक नाबालिग भतीजे के कथित यौन उत्पीड़न के आरोप में उसकी बुआ के खिलाफ दर्ज पॉक्सो (POCSO) मामला रद्द करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह एफआईआर प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई प्रतीत होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि आजकल वैवाहिक विवादों में पति-पत्नी एक-दूसरे को बदनाम करने के लिए बच्चों का इस्तेमाल करने लगे हैं। अदालत ने इसे बेहद गंभीर और चिंताजनक प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालय को तथ्यों की गहराई से जांच करनी होगी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक तलाकशुदा दंपति से जुड़ा है, जिनका वर्ष 2023 में तलाक हो चुका है। दोनों के जुड़वां बच्चे फिलहाल पिता के साथ रह रहे हैं।

मां ने आरोप लगाया था कि जब वह ससुराल गई थी, तब उसने अपनी ननद (बच्चों की बुआ) को बेटे का यौन उत्पीड़न करते देखा। महिला का दावा था कि उसके बेटे ने भी उससे इस संबंध में शिकायत की थी, जिसके बाद बुआ के खिलाफ पॉक्सो और अन्य धाराओं में मामला दर्ज कराया गया।

रिकॉर्ड में नहीं मिले आरोपों के सबूत

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि तलाक की कार्यवाही के दौरान या उससे पहले इस तरह का कोई आरोप सामने नहीं आया था। अदालत ने यह भी नोट किया कि इस एफआईआर से ठीक पहले पिता ने भी लड़के के मामा के खिलाफ उसकी जुड़वां बहन के कथित यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था।

पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों द्वारा लगाए गए आरोप यह संकेत देते हैं कि बच्चों का इस्तेमाल आपसी रंजिश निकालने के लिए किया जा रहा है।

बंबई हाई कोर्ट के फैसले पर भी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने बंबई हाई कोर्ट के उस आदेश की भी आलोचना की, जिसमें पर्याप्त तथ्यों की जांच किए बिना एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में रिकॉर्ड का गंभीरता से परीक्षण किया जाना जरूरी है।

एफआईआर रद्द, आगे कोई कार्रवाई नहीं

23 जुलाई को दिए गए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुणे जिले के खड़की थाने में बुआ के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है। इसलिए इसे रद्द किया जाता है और इस मामले में आगे कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में बच्चों का इस्तेमाल करना और आपराधिक कानूनों का दुरुपयोग करना न्याय व्यवस्था के साथ गंभीर खिलवाड़ है। ऐसे मामलों में अदालतें तथ्यों की बारीकी से जांच करेंगी ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मुकदमों का सामना न करना पड़े।

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