सुप्रीम कोर्ट की बड़ी कार्रवाई: Jantar Mantar हिंसा की जांच के लिए 5 सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी, पूर्व CBI चीफ भी शामिल

Jantar Mantar Student Protest: सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शन में कथित पुलिस ज्यादती और हिंसा की जांच के लिए 5 सदस्यीय HPEC बनाई है। जानें कमेटी में कौन-कौन और जांच का दायरा क्या है।

Alakha Singh
Published on: 20 Aug 2026 6:55 PM IST (Updated on: 20 Aug 2026 6:56 PM IST)
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी कार्रवाई: Jantar Mantar हिंसा की जांच के लिए 5 सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी, पूर्व CBI चीफ भी शामिल
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Jantar Mantar Student Protest: जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों पर लगे अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में पांच सदस्यीय High-Powered Enquiry Committee (HPEC) गठित की है सीबीआई के पूर्व निदेशक भी शामिल हैं। कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी करेंगे। पैनल को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस ज्यादती के साथ-साथ पुलिसकर्मियों पर प्रदर्शनकारियों की ओर से हुई हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच करनी होगी।

न्यायालय का यह आदेश 18 अगस्त 2026 को CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने पारित किया, लेकिन आदेश की रिपोर्ट 20 अगस्त को सामने आई।

कौन-कौन हैं सुप्रीम कोर्ट की हाई-पावर्ड कमेटी में?

सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी में न्यायिक और जांच एजेंसियों के अनुभवी अधिकारियों को शामिल किया है।

  1. जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी — सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, अध्यक्ष
  2. जस्टिस रवि शंकर झा — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
  3. जस्टिस शालिंदर कौर — दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश
  4. ऋषि कुमार शुक्ला — केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के पूर्व निदेशक
  5. डॉ. एल.आर. बिश्नोई — मेघालय के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (DGP)

अदालत ने कहा कि समिति की संरचना तय करते समय सदस्यों की विशेषज्ञता, अनुभव और समिति में विविधता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा गया है।

किन आरोपों की जांच होगी?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में प्रदर्शनकारियों की ओर से लगाए गए कई गंभीर आरोपों को जांच के दायरे में रखा गया है। इनमें पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पैलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, लाठीचार्ज और आंसू गैस के कथित अत्यधिक या अनुपातहीन इस्तेमाल की जांच शामिल है। अदालत ने यह भी कहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच उचित संतुलन जरूरी है।

कमेटी यह भी देखेगी कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस या सुरक्षा कर्मियों ने वर्दी और स्पष्ट नाम-पट्टियां पहनी थीं या नहीं, ताकि कार्रवाई करने वाले अधिकारियों की पहचान और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

पैलेट गन के इस्तेमाल पर भी जांच

कमेटी को धातु के प्रोजेक्टाइल या पैलेट के इस्तेमाल से जुड़े सवालों पर भी विचार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि ऐसे प्रोजेक्टाइल से गंभीर और कभी-कभी स्थायी चोट लगने के आरोपों को देखते हुए इनके इस्तेमाल पर रोक की जरूरत के सवाल की भी जांच की जा सकती है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि पुलिस ने निश्चित रूप से अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया था। ये वे आरोप और मुद्दे हैं जिन्हें स्वतंत्र कमेटी जांचेगी। दिल्ली पुलिस ने अदालत के समक्ष अत्यधिक बल के आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि उसने प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए अधिकतम संयम और आवश्यक न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया।

महिला प्रदर्शनकारियों से जुड़े आरोप प्राथमिकता पर

कमेटी को महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित लक्षित हिंसा, उत्पीड़न, छेड़छाड़/मोलस्टेशन और सेकेंडरी विक्टिमाइजेशन के आरोपों की भी जांच करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस हिस्से को विशेष रूप से संवेदनशील बताते हुए इसे प्राथमिकता के आधार पर जांचने को कहा है। कमेटी को इस मामले में जल्द से जल्द अपनी पहली अंतरिम रिपोर्ट देने को कहा गया है।

पुलिस निगरानी और प्रदर्शनकारियों के डेटा की भी जांच

कमेटी यह भी जांच करेगी कि प्रदर्शनकारियों की पुलिस निगरानी या सर्विलांस किया गया था या नहीं और यदि ऐसा हुआ तो क्या वह उनके निजता और शांतिपूर्ण सभा के संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप था।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और अन्य अधिकारियों को प्रदर्शन के दौरान जुटाई गई व्यक्तिगत जानकारी और डिजिटल डेटा को सुरक्षित रखने तथा उसे सार्वजनिक न करने का निर्देश दिया था।

मेडिकल सहायता और मुआवजे पर भी नजर

जिन प्रदर्शनकारियों को कथित पुलिस कार्रवाई में चोटें लगीं, उनके लिए मेडिकल सहायता और मुआवजे की व्यवस्था की पर्याप्तता की भी जांच होगी। अदालत ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों—प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों—को लगी चोटों के संबंध में अंतरिम मुआवजे के पहलू पर विचार किया जा सकता है।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों की भूमिका भी जांचेगी कमेटी

सुप्रीम कोर्ट ने जांच को एकतरफा नहीं रखा है। पुलिस और सुरक्षा बलों ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ ऐसे तत्व भी शामिल थे जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था और जिन्होंने पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा की।

कमेटी को प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों पर कथित हमले, सरकारी और निजी संपत्ति को हुए नुकसान तथा ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों की स्थिति की भी जांच करनी होगी।

CCTV से लेकर ड्रोन फुटेज तक सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस, अर्धसैनिक बलों और जांच एजेंसियों को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े सभी महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और उन्हें HPEC को सौंपने का निर्देश दिया है। इसमें CCTV फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी-वॉर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, वीडियोग्राफी, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और PCR कॉल लॉग शामिल हैं।

कमेटी जरूरत पड़ने पर फॉरेंसिक, तकनीकी और अन्य विशेषज्ञों की मदद भी ले सकेगी।

कमेटी की जांच एक बार की कवायद नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि HPEC की जांच केवल एक बार की जाने वाली कवायद नहीं होगी। समिति मुद्दों का लगातार और समय-समय पर आकलन करेगी और अपनी अंतरिम रिपोर्ट अदालत को देती रहेगी।

पहली अंतरिम रिपोर्ट में विशेष रूप से दो मुद्दों—प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित अत्यधिक बल प्रयोग और महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित हिंसा/उत्पीड़न, पर जल्द रिपोर्ट देने को कहा गया है।

धारा 163 BNSS और धारा 152 BNS पर भी सवाल

कमेटी के दायरे में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी होने वाले व्यापक प्रतिबंधात्मक आदेशों की समीक्षा का मुद्दा भी शामिल है। अदालत ने इस बात पर विचार की जरूरत बताई है कि ऐसे आदेशों का इस्तेमाल वास्तविक और आसन्न खतरे के बजाय शांतिपूर्ण सभा को रोकने के लिए नियमित या पूर्व-निवारक उपाय के तौर पर तो नहीं किया जा रहा।

इसी तरह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के इस्तेमाल से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों की भी जांच के दायरे में रखा गया है, ताकि राजनीतिक असहमति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को दबाने के लिए इसका इस्तेमाल न हो।

20 जुलाई को क्या हुआ था?

यह मामला 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद की ओर निकाले गए छात्र मार्च के बाद तेज हुआ। प्रदर्शनकारी कथित NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सुधार समेत कई मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ और पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप सामने आए।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हुईं। अदालत ने 28 जुलाई के अपने आदेश में नाबालिग प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर अंतरिम निर्देश दिए थे और 18 वर्ष से कम उम्र के उन बच्चों को रिहा करने को कहा था जिन्हें इन प्रदर्शनों के सिलसिले में हिरासत में लिया गया या गिरफ्तार किया गया था, हालांकि गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपियों को इसका अपवाद रखा गया था।

अब पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी पूरे घटनाक्रम के दोनों पक्षों की जांच करेगी। अदालत ने कहा है कि जिम्मेदारी तय करने और आगे की कार्रवाई के लिए समिति की रिपोर्ट उसके लिए महत्वपूर्ण होगी। पुलिस या सुरक्षा बलों के किसी अधिकारी द्वारा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई का रास्ता भी खुला रहेगा।

अगली सुनवाई: नए मामलों में नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 10 सितंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया है।

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Alakha Singh is a journalist with having more than one decade of experience in digital media. Alakha Singh has covered Loksabha Elections 2014 and 2019 closely with the several state assembly elections. He has expertise in SEO oriented content writing on various topics and issues. At HT Digital Alakha Singh has been recognised as one of the top performer of the team for many years continuously. Earlier he worked with HT Digital for more than 8 years and 2.5 years with Amar Ujala web. In initial days of his career Alakha Singh also worked as a reporter (stringer) with NBT Gurgaon. He pursued P.G. Diploma from South Campus, University of Delhi in 2013 and MAMC from Kurukshetra University in 2014. He Belongs to District Banda of Uttar Pradesh.

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