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SC में सरेआम जज ने कपिल सिब्बल को भयंकर लताड़ा! I-PAC केस में आग बबूला हुए जस्टिस मिश्रा, कर दी बोलती बंद
SC slams Kapil Sibal: SC में I-PAC केस पर तीखी बहस, कपिल सिब्बल को जस्टिस मिश्रा की कड़ी फटकार। ED अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर उठे बड़े सवाल, ममता बनर्जी से जुड़े विवाद ने पकड़ा तूल।
SC slams Kapil Sibal: देश की सबसे बड़ी अदालत में मंगलवार को एक ऐसी बहस हुई जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच जारी खींचतान अब एक नए और बेहद दिलचस्प कानूनी मोड़ पर आ खड़ी हुई है। सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को कड़ी चेतावनी देते हुए कुछ ऐसे सवाल पूछे, जिनका जवाब देना फिलहाल आसान नहीं दिख रहा है। कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा कि जांच एजेंसी के नाम की रट लगाने के बजाय उन अधिकारियों के अधिकारों की बात कीजिए, जिनके साथ बदसलूकी हुई है।
"क्या सरकारी अधिकारी इस देश के नागरिक नहीं?"
सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा उस वक्त भड़क उठे जब दलीलें सिर्फ एजेंसी की शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमने लगीं। उन्होंने एक ऐसा सवाल दागा जिसने पूरी बहस की दिशा बदल दी। कोर्ट ने पूछा, "क्या कोई व्यक्ति सरकारी अधिकारी बन जाने के कारण अपने मौलिक अधिकार खो देता है? क्या ED के अधिकारी इस देश के नागरिक नहीं हैं?" दरअसल, ED के कुछ अधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से भी याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार और जांच में बाधा डालने का आरोप लगाया है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर आप सिर्फ 'ED-ED' की रट लगाते रहेंगे और उन पीड़ित अधिकारियों के अधिकारों को नजरअंदाज करेंगे, तो आप बड़ी मुश्किल में पड़ सकते हैं।
कपिल सिब्बल की दलील और 'मुसीबतों का पिटारा'
पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष रख रहे दिग्गज वकील कपिल सिब्बल ने पुरजोर दलील दी कि किसी मामले की जांच करना एक 'वैधानिक अधिकार' (Statutory Right) है, न कि 'मौलिक अधिकार' (Fundamental Right)। उनका कहना था कि अगर जांच में कोई बाधा डालता है, तो उसके लिए कानून में अलग रास्ते हैं, लेकिन इसके लिए सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट नहीं आया जा सकता। सिब्बल ने आगाह किया कि अगर इस तरह से जांच एजेंसियों को मौलिक अधिकारों की दुहाई देकर सीधे बड़ी अदालत में आने की छूट दी गई, तो यह 'मुसीबतों का पिटारा' (Pandora’s Box) खोलने जैसा होगा, जिससे कानूनी व्यवस्था चरमरा सकती है।
आखिर क्या है पूरा विवाद?
इस पूरी कानूनी लड़ाई की जड़ें जनवरी के उस वाकये में छिपी हैं, जब ED ने मशहूर पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ठिकानों पर छापेमारी की थी। आरोप है कि जब कोयला तस्करी मामले की जांच के सिलसिले में यह छापेमारी चल रही थी, तब खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वहां पहुंच गई थीं। ED का दावा है कि उनके वहां पहुंचने के बाद कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मौके से हटा दिए गए, जिससे उनकी जांच बुरी तरह प्रभावित हुई। एजेंसी का आरोप है कि यह सीधे तौर पर सरकारी काम में हस्तक्षेप और अधिकारियों के अधिकारों का हनन है।
चुनावी मौसम और सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
चूंकि देश में चुनावी माहौल गरमाया हुआ है, इसलिए राज्य सरकार की ओर से सुनवाई टालने की भी कोशिश की गई। लेकिन जस्टिस मिश्रा ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा, "हम न तो चुनाव का हिस्सा बनना चाहते हैं और न ही किसी अपराध का।" कोर्ट की यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि वह इस मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि संवैधानिक नजरिए से देख रहा है। अब सवाल सिर्फ एक एजेंसी और मुख्यमंत्री के टकराव का नहीं रह गया है, बल्कि यह तय होना बाकी है कि क्या एक सरकारी अधिकारी भी अपनी ड्यूटी के दौरान मौलिक अधिकारों की सुरक्षा मांग सकता है? सुप्रीम कोर्ट का अगला फैसला जांच एजेंसियों की आजादी और राज्यों की शक्तियों के बीच की लकीर को हमेशा के लिए साफ कर सकता है।


