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क्या दिक्कत है…चीफ जस्टिस का फोन नहीं उठाते... बंगाल के टॉप अधिकारी को क्यों पड़ी SC की फटकार?
पश्चिम बंगाल के मालदा हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, मुख्य सचिव और डीजीपी को फटकार, फोन न उठाने पर उठे सवाल और लिखित माफी के आदेश।
पश्चिम बंगाल से जुड़े एक गंभीर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के शीर्ष अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। मामला मालदा हिंसा के दौरान प्रशासन की भूमिका को लेकर है, जहां न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक बंधक बनाकर रखा गया था। इस पूरे घटनाक्रम पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए साफ कहा है कि यह प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था की बड़ी नाकामी है।
9 घंटे तक बंधक रहे न्यायिक अधिकारी
घटना उस समय की है जब पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान भीड़ ने न्यायिक अधिकारियों को घेर लिया। इस दौरान तीन महिला अधिकारियों समेत कुल सात न्यायिक अधिकारियों को करीब 9 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि देर रात खुद Chief Justice of India को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। इससे साफ संकेत मिला कि हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर जा चुके थे।
“फोन क्यों नहीं उठाते”, कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने सीधे सवाल किया कि आखिर ऐसी क्या दिक्कत है कि आप चीफ जस्टिस का फोन तक नहीं उठाते।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए मुख्य सचिव ने सफाई देते हुए कहा कि वह उस समय दिल्ली में एक बैठक में थे और उन्हें कोलकाता से कोई कॉल नहीं मिला। हालांकि, अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई और इसे लापरवाही माना।
“इतने ऊंचे मत हो जाइए”, जस्टिस बागची की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने मुख्य सचिव को कड़े शब्दों में चेताया। उन्होंने कहा कि अगर आपने अपना मोबाइल नंबर साझा किया होता, तो चीफ जस्टिस और हाई कोर्ट प्रशासन के लिए आपसे संपर्क करना आसान होता।
जब मुख्य सचिव ने कहा कि उनका नंबर उपलब्ध है, तो इस पर जस्टिस बागची ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आप इतने ऊंचे नहीं हो सकते कि चीफ जस्टिस की आप तक पहुंच ही न हो। उन्होंने साफ कहा कि थोड़ा नीचे उतरिए, ताकि जरूरी समय पर आपसे संपर्क हो सके।
हाई कोर्ट से लिखित माफी मांगने का आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सख्त निर्देश जारी किए। कोर्ट ने मुख्य सचिव और डीजीपी दोनों को आदेश दिया कि वे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से लिखित में माफी मांगें।
अदालत ने कहा कि यह आपके प्रशासन और पुलिस तंत्र की घोर विफलता है कि हमें खुद हस्तक्षेप करना पड़ा और न्यायिक अधिकारियों को अतिरिक्त शक्तियां देनी पड़ीं।
घंटों तक नहीं मिला कोई जवाब
बेंच ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि मुख्य सचिव से संपर्क करने के लिए घंटों कोशिश की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। जबकि उसी समय सात न्यायिक अधिकारी बंधक बने हुए थे।
अदालत ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यही तरीका है ब्यूरोक्रेसी के काम करने का, और इस राज्य में तो पूरी तरह अफरा-तफरी मची हुई है।
और भी बिगड़ सकते थे हालात
घटना की टाइमलाइन बताते हुए अदालत ने कहा कि यह मामला दोपहर करीब 3:30 बजे शुरू हुआ, लेकिन इसकी जानकारी रात 11:30 बजे जाकर मिली। कोर्ट ने चिंता जताई कि इतने लंबे समय तक हालात अनियंत्रित रहे, तो कुछ भी हो सकता था।
हजारों लोगों की भीड़ लगातार बढ़ती रही और स्थिति और ज्यादा विस्फोटक बन सकती थी। जस्टिस बागची ने कहा कि हालात को संभालने के लिए आखिरकार देश के मुख्य न्यायाधीश को खुद दखल देना पड़ा।
अधिकारी भी नहीं संभाल पाए स्थिति
अदालत ने मौके पर मौजूद प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। कोर्ट के अनुसार, जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक दोनों मौके पर मौजूद थे, लेकिन वे स्थिति को संभालने में नाकाम रहे।
जब पुलिस अधीक्षक से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वहां महिलाएं भी मौजूद थीं और अगर कोई कार्रवाई की जाती, तो उनकी जान को खतरा हो सकता था। इस पर अदालत ने साफ संकेत दिया कि इस तरह की निष्क्रियता स्वीकार नहीं की जा सकती।


