TMC Crisis Explained: टीएमसी में घमासान, क्या तृणमूल भी चलेगी शिवसेना और एनसीपी की राह?

TMC Crisis Explained: आज जब ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में घमासान मचा है, तब सबके मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर तृणमूल का भविष्य क्या होगा?

Yogesh Mishra
Published on: 12 July 2026 7:52 PM IST
TMC Crisis Mamata Banerjee Party
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TMC Crisis Mamata Banerjee Party 

TMC Crisis Explained: महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार व उद्धव ठाकरे की पार्टियों की गति देखने के बाद, आज जब ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में घमासान मचा है, तब सबके मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर तृणमूल का भविष्य क्या होगा? कहीं शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस की राह पर ही तृणमूल भी तो नहीं चल निकलेगी? इन तीनों क्षेत्रीय क्षत्रपों के पीछे चालें चलने वाले मोहरे को लेकर लोगों का आम मत यही है कि इसके पीछे भाजपा ही है।

यदि इतिहास के पन्नों को पलटा जाए, तो इस आशंका से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी और सिंबल दोनों चले जाएँगे। पार्टी का कार्यालय और फंड भी बागी गुट को मिलने से कोई गुरेज़ नहीं कर सकता। यही खेल शिवसेना और एनसीपी के साथ हो भी चुका है। परंतु, इस सवाल की तह तक पहुँचने के लिए जरूरी है कि हम निर्वाचन आयोग के नियम, सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले और तकनीकी पहलुओं के आलोक में तृणमूल कांग्रेस के इस मौजूदा संकट का बारीक विश्लेषण करें।

चुनाव आयोग की भूमिका और 'बहुमत के परीक्षण' का नियम

जब कोई बागी गुट खुद को 'असली पार्टी' बताकर दावा पेश करता है, तो चुनाव आयोग 'इलेक्शन सिम्बल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968' के पैराग्राफ 15 के तहत दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला लेता है। आयोग मुख्य रूप से दो मोर्चों पर बहुमत की परीक्षा लेता है:


1. विधायी बहुमत: आयोग यह देखता है कि पार्टी के कुल सांसदों और विधायकों में से कितने किस गुट के साथ हैं।

2. संगठनात्मक बहुमत: आयोग यह जाँचता है कि पार्टी की मुख्य कार्यकारिणी और पंजीकृत पदाधिकारियों में से किसका समर्थन किस गुट को हासिल है।

1971 के ऐतिहासिक 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि चुनाव आयोग को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि कौन सा गुट असली पार्टी है, और इसके लिए 'बहुमत परीक्षण' ही सबसे प्रामाणिक तरीका है।

चुनाव आयोग की प्रक्रिया

दस्तावेजों की जाँच: आयोग दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर अपनी-अपनी शक्ति के समर्थन में हलफनामे और संगठनात्मक चुनाव के दस्तावेज जमा करने को कहता है।

स्पष्ट बहुमत की स्थिति: यदि एक गुट के पास संगठन और विधायिका दोनों में स्पष्ट और भारी बहुमत मिलता है, तो आयोग उसे असली पार्टी घोषित कर मूल नाम व चुनाव चिह्न सौंप देता है।


सिंबल फ्रीज होने की स्थिति: यदि विवाद बहुत पेचीदा हो और कोई चुनाव नजदीक हो, तो आयोग अंतरिम व्यवस्था के तौर पर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज कर सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को नए नाम (मूल नाम के आगे कोई प्रत्यय/उपसर्ग जोड़कर) और नए 'मुक्त चुनाव चिह्न' आवंटित किए जाते हैं।

सदन के भीतर के नियम: दल-बदल विरोधी कानून

चुनाव आयोग के बाहर, सदन के भीतर विधायकों या सांसदों की सदस्यता पर संविधान की 10वीं अनुसूची लागू होती है।

यदि कोई गुट सदन के भीतर मूल पार्टी के 'व्हिप' के खिलाफ वोट करता है या पार्टी छोड़ता है, तो उनकी सदस्यता जा सकती है। इसका अंतिम अधिकार संबंधित सदन के अध्यक्ष के पास होता है, चुनाव आयोग के पास नहीं।

पुराने नियमों के तहत एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने पर राहत मिलती थी, लेकिन अब केवल 'विभाजन' के आधार पर अयोग्यता से छूट नहीं मिलती। अब अयोग्यता से बचने के लिए किसी दूसरे दल में विलय करना होता है, जिसके लिए कम से कम दो-तिहाई विधायकों/सांसदों का समर्थन अनिवार्य है।

महाराष्ट्र के उदाहरण: शिवसेना और एनसीपी विवाद के सबक

भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में महाराष्ट्र की शिवसेना (2022-23) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (2023-24) के विवाद इस कानून के सबसे सटीक उदाहरण हैं। इन मामलों में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए हैं:

चुनाव आयोग का फैसला और आधार

पार्टी के संविधान का परीक्षण: शिवसेना के मामले में आयोग ने पाया कि 2018 में पार्टी के संविधान में किए गए बदलाव अलोकतांत्रिक थे, जिससे संगठनात्मक चुनाव कराए बिना ही उद्धव ठाकरे को असीमित अधिकार मिल गए थे। इसलिए आयोग ने इस परीक्षण को विश्वसनीय नहीं माना।


संगठनात्मक बहुमत का परीक्षण: दोनों पक्षों ने पदाधिकारियों की जो सूचियाँ पेश कीं, उनमें भारी विसंगतियाँ थीं। विभाजन के बाद दोनों गुटों ने एक-दूसरे के पदाधिकारियों को हटा दिया था, जिससे असली पदाधिकारी तय करना मुश्किल हो गया।

विधायी बहुमत (सबसे निर्णायक आधार): चूंकि संगठन का बहुमत स्पष्ट नहीं हो सका, इसलिए आयोग ने विधायी विंग को ही अंतिम आधार माना। एकनाथ शिंदे गुट के पास शिवसेना के ~76% विधायी मत (55 में से 40 विधायक और 18 में से 13 लोकसभा सांसद) का समर्थन था, इसलिए उन्हें असली शिवसेना माना गया। यही फॉर्मूला एनसीपी में भी लागू हुआ, जहाँ अजीत पवार के पास 53 में से 41 विधायकों का समर्थन था, और 'घड़ी' चुनाव चिह्न उन्हें दे दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी रुख

कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग के पास यह तय करने का स्वतंत्र अधिकार है कि असली पार्टी कौन सी है। आयोग को इस बात का इंतजार करने की जरूरत नहीं है कि विधानसभा अध्यक्ष पहले विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लें।

कोर्ट ने एक बड़ी लकीर खींची कि 'राजनीतिक दल' हमेशा 'विधायी दल' से बड़ा होता है। केवल सदन के भीतर विधायकों का बहुमत होने का मतलब यह नहीं है कि वही असली राजनीतिक दल हैं।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सदन के भीतर व्हिप नियुक्त करने का अधिकार मूल राजनीतिक दल के पास होता है, न कि केवल सदन के भीतर बैठे विधायकों के पास।

तृणमूल कांग्रेस का मौजूदा गणित और नए समीकरण

यदि ममता बनर्जी की पार्टी में यह कानूनी ढर्रा अपनाया जाता है, तो सबसे पहले मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है।

2024 के आम चुनाव में टीएमसी ने लोकसभा की 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं, 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 294 में से 215 सीटों पर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। लेकिन अप्रैल-मई 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद बंगाल का पूरा समीकरण बदल चुका है।

2026 के ताजा आंकड़ों के अनुसार स्थिति इस प्रकार है:

विधानसभा की स्थिति: 2026 के चुनाव में टीएमसी सत्ता से बाहर हो गई और उसे केवल 80 सीटें मिलीं (बहुमत भाजपा को मिला, जिसने 206 सीटें जीतीं)। चुनाव के तुरंत बाद जून 2026 में टीएमसी में बड़ा बिखराव हुआ। कुल 80 विधायकों में से 64 विधायकों ने बगावत कर दी है, जिसका नेतृत्व रितब्रत बनर्जी कर रहे हैं। इस गुट को विधानसभा में आधिकारिक तौर पर मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता मिल चुकी है। वर्तमान में ममता बनर्जी के प्रति वफादार विधायकों की संख्या घटकर केवल 15 रह गई है।


लोकसभा की स्थिति: जून 2026 में सांसदों में भी बड़ी टूट हुई। 29 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में बगावत कर दी है और वे केंद्र में एनडीए l गठबंधन को समर्थन दे रहे हैं। निचले सदन में अब ममता बनर्जी के पास केवल 9 सांसद बचे हैं।

दल-बदल विरोधी कानून के मुताबिक, बागी सांसदों की संख्या (20) मूल संख्या (29) के दो-तिहाई से ज्यादा है, और बागी विधायकों की संख्या (64) भी उनकी मौजूदा जीती हुई सीटों (80) के दो-तिहाई से अधिक है। इसी कारण इन बागी विधायकों और सांसदों पर फिलहाल अयोग्यता की तलवार नहीं चल सकी है, और अब असली पार्टी व सिंबल के दावे की लड़ाई चुनाव आयोग के पाले में है।

बागी गुट के आगे तीन बड़े कानूनी पेंच

पहली नजर में भले ही ऐसा लगे कि संख्या बल बागी गुट के पास है, लेकिन चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के हालिया रुख के कारण यह मामला कानूनी रूप से बहुत पेचीदा हो चुका है। बागी गुट के लिए 'जोड़ा घास-फूल' सिंबल हासिल करना इतना आसान नहीं होगा, जिसके पीछे तीन मुख्य वजहें हैं:

1. लोकसभा और विधानसभा के बागियों में विरोधाभास (सबसे बड़ा पेंच)

यह इस पूरे मामले का सबसे कमजोर सिरा है। लोकसभा के 20 बागी सांसदों (काकोली घोष दस्तिदार गुट) ने संसद में अयोग्यता से बचने के लिए खुद को एक अन्य पंजीकृत पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया' के साथ विलय करने का पत्र स्पीकर को दे दिया है। दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल विधानसभा के बागी विधायक (रितब्रत बनर्जी गुट) इस विलय का विरोध कर रहे हैं; उनका कहना है कि वे किसी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो रहे, बल्कि वे ही 'असली टीएमसी' हैं।

चूंकि लोकसभा गुट ने तकनीकी रूप से किसी दूसरी पार्टी में विलय की राह चुन ली है, इसलिए चुनाव आयोग में उनके लिए यह दावा करना बहुत कमजोर हो जाएगा कि वे ही 'मूल तृणमूल कांग्रेस' हैं। एक ही सिक्के के दो पहलू दो अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हैं।

2. 'राजनीतिक दल' बनाम 'विधायी दल' का सिद्धांत

शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, केवल विधायकों या सांसदों का बहुमत होना यह साबित नहीं करता कि वही असली राजनीतिक दल हैं। ममता बनर्जी अभी भी पार्टी की संस्थापक और संगठनात्मक अध्यक्ष हैं। पार्टी का नाम, पंजीकरण और मूल सांगठनिक ढांचा यानी जमीनी कार्यकर्ता, ब्लॉक व जिला अध्यक्ष आदि अभी भी काफी हद तक उनके नियंत्रण में है। चुनाव आयोग जब संगठनात्मक वफादारी की जांच करेगा, तो वहाँ ममता बनर्जी का पलड़ा भारी रहना तय है।

3. 'सिंबल फ्रीज' होने की प्रबल संभावना

जब किसी दल में इस स्तर का गहरा और विरोधाभासी विभाजन होता है, तो चुनाव आयोग आमतौर पर किसी एक पक्ष को तुरंत सिंबल देने के बजाय पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को 'फ्रीज' केर देता है। ऐसी स्थिति में ममता बनर्जी गुट को 'तृणमूल कांग्रेस (ममता)' जैसा कोई नाम और नया सिंबल मिल सकता है, और बागी गुट को भी नए नाम और अलग सिंबल पर चुनाव लड़ना होगा।

कुलमिलाकर कानूनी पेचीदगियों और दोनों बागी धड़ों (सांसद बनाम विधायक) के परस्पर विरोधी स्टैंड को देखते हुए, चुनाव चिह्न सीधे बागी गुट की झोली में चला जाना निश्चित नहीं है। यह मामला चुनाव आयोग की दहलीज से होते हुए सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक खिंचेगा, और तब तक सिंबल फ्रीज रहने की संभावना सबसे ज्यादा है। पहली नजर में जो खेल महाराष्ट्र जैसा दिख रहा है, उसकी अंदरूनी परतें बंगाल में काफी अलग और उलझी हुई हैं।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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