TMC Internal Revolt: हार के बाद TMC में बगावत, अभिषेक-आईपैक पर फूटा नेताओं का गुस्सा

TMC Internal Revolt: पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद टीएमसी में बगावत तेज हो गई है। अभिषेक बनर्जी और आईपैक पर नेताओं ने गंभीर आरोप लगाए हैं। ममता बनर्जी की नेतृत्व शैली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

Aditya Kumar Verma
Published on: 12 May 2026 8:00 AM IST
TMC Internal Revolt
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TMC Internal Revolt: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर ऐसा राजनीतिक भूचाल आया है, जिसने पार्टी नेतृत्व से लेकर संगठन तक को हिला कर रख दिया है। पांच साल पहले जिस ममता बनर्जी ने बीजेपी को 100 सीटों तक पहुंचने से रोक दिया था, इस बार वही ममता बनर्जी अपनी पार्टी को भी सौ सीटों के अंदर सिमटने से नहीं बचा पाईं। 2021 में बीजेपी की सीटों को लेकर बड़ा दावा करने वाले प्रशांत किशोर इस चुनाव में सीधे तौर पर मैदान में नहीं थे, लेकिन उनकी बनाई संस्था आईपैक पूरी ताकत के साथ टीएमसी के लिए काम कर रही थी। अब हार के बाद पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा सवाल इसी आईपैक और अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर उठ रहे हैं।

टीएमसी के अंदर अब खुलकर कहा जा रहा है कि पार्टी को जमीन से ज्यादा एक कॉरपोरेट मॉडल की तरह चलाया गया। कई नेता मान रहे हैं कि चुनावी रणनीति बनाने वाली टीम ने संगठन पर कब्जा कर लिया था और पुराने नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को लगातार नजरअंदाज किया गया। यही वजह है कि अब हार के बाद पार्टी के भीतर दबा गुस्सा खुलकर बाहर आने लगा है।

अभिषेक बनर्जी पर सीधे हमले शुरू

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर शुभेंदु अधिकारी के शपथ लेने के कुछ ही देर बाद टीएमसी दफ्तरों में बेचैनी का माहौल देखने को मिला। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज हो गई कि हार सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि संगठनात्मक और अस्तित्व का संकट बन चुकी है। जो नेता चुनाव तक नेतृत्व का बचाव कर रहे थे, वही अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं।

सबसे ज्यादा निशाने पर टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी हैं। पार्टी के भीतर उन्हें ममता बनर्जी के बाद सबसे ताकतवर नेता माना जाता था। चुनावी रणनीति से लेकर संगठन तक में उनकी पकड़ मजबूत हो चुकी थी, लेकिन हार ने उनकी कार्यशैली को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया।

टीएमसी के कई नेताओं ने आरोप लगाया है कि पार्टी को ऐसे चलाया गया जैसे कोई कॉरपोरेट कंपनी चलाई जाती है। मालदा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी ने तो सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी को हार का जिम्मेदार बता दिया। उनका कहना है कि पार्टी धीरे-धीरे खत्म होती चली गई और नेतृत्व को इसकी चिंता तक नहीं रही। उन्होंने यहां तक कहा कि बंगाल की राजनीति कॉरपोरेट हाउस की तरह नहीं चल सकती।

कृष्णेंदु नारायण चौधरी ने दावा किया कि उन्होंने कई बार ममता बनर्जी को जमीनी हालात बताने की कोशिश की। व्हाट्सऐप पर मैसेज भी भेजे, लेकिन कोई बदलाव नहीं हुआ। महाभारत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी उन्हें धृतराष्ट्र की तरह नजर आईं, जो सब कुछ देखकर भी अनदेखा करती रहीं।

आईपैक पर फूटा नेताओं का गुस्सा

टीएमसी की हार के बाद सबसे ज्यादा हमला आईपैक पर हो रहा है। पार्टी के कई नेताओं का आरोप है कि संगठन से ज्यादा महत्व चुनावी कंसल्टेंसी फर्म को दिया गया। कल्याण बनर्जी ने साफ कहा कि टीएमसी की हार के पीछे आईपैक का चुनावी मैनेजमेंट बड़ी वजह बना। उनका कहना है कि पंचायत स्तर तक हर नेता खुद को टिकट का हकदार मानने लगा था और अंदरूनी लड़ाई ने पार्टी को कमजोर कर दिया।

रिजु दत्ता ने भी आईपैक पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि बाहर की एक संस्था ने पूरी पार्टी को अपने कब्जे में ले लिया। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनाव के दूसरे चरण के बाद आईपैक के डायरेक्टर विनेश चंदेल को बेल कैसे मिल गई। रिजु दत्ता का आरोप है कि आईपैक ने टीएमसी को अंदर से खत्म कर दिया और पार्टी की छवि भ्रष्टाचार और अत्याचार के कारण खराब होती चली गई।

रिजु दत्ता ने यह भी कहा कि टीएमसी के निचले स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जनता के खिलाफ अत्याचार किए, जिससे लोगों में नाराजगी बढ़ती गई। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

पूर्व विधायक खगेश्वर रॉय ने भी हार के लिए लगभग पूरी तरह आईपैक को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि 2021 के बाद से आईपैक संगठन पर हावी हो गया था। उन्होंने टिकट के बदले पैसे मांगे जाने तक के आरोप लगाए और कहा कि उम्मीदवार बनने की दौड़ में वह पैसे के कारण पीछे रह गए।

टीएमसी ने अपने नेताओं को भेजे नोटिस

हार के बाद पार्टी के भीतर जिस तरह बयानबाजी शुरू हुई, उससे नेतृत्व की मुश्किलें और बढ़ गईं। टीएमसी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि पार्टी नेताओं के इन बयानों से सहमत नहीं है। पार्टी विरोधी गतिविधियों और बयानों को लेकर रिजु दत्ता, पापिया घोष, कोहिनूर मजूमदार और कार्तिक घोष जैसे नेताओं को कारण बताओ नोटिस भेजे गए हैं।

लेकिन इन नोटिसों के बावजूद पार्टी के भीतर का गुस्सा कम होता नहीं दिख रहा। नेताओं का आरोप है कि शीर्ष नेतृत्व के करीबी लोग जिला और स्थानीय नेताओं से लगातार पैसे मांगते थे। इससे संगठन में नाराजगी बढ़ती गई और जमीनी कार्यकर्ता खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे।

आधुनिक बनाम जमीनी राजनीति की बहस

टीएमसी उम्मीदवार आतिन घोष ने अभिषेक बनर्जी का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी को आधुनिक तकनीक के जरिए संगठित करने की कोशिश की। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी माना कि तकनीक लोगों की नब्ज नहीं समझ सकती।

सीनियर नेता असित मजूमदार ने भी नेतृत्व के एक हिस्से पर अहंकार और प्रशासनिक निष्क्रियता का आरोप लगाया। उनका कहना है कि गुटबाजी के कारण विकास परियोजनाएं रुक गईं और सरकार की छवि खराब हुई।

कल्याण बनर्जी ने भी कहा कि कोई राजनीतिक ताकत हमेशा चरम पर नहीं रह सकती। जब उभार अपनी सीमा तक पहुंच जाता है, तो पतन भीतर से शुरू होता है। उन्होंने साफ कहा कि तृणमूल कांग्रेस को किसी और ने नहीं, बल्कि खुद तृणमूल ने हराया है।

चुनाव हारने के बाद नेताओं का मोहभंग

बैरकपुर से चुनाव हारने वाले टीएमसी उम्मीदवार और फिल्म निर्देशक राज चक्रवर्ती ने राजनीति छोड़ने का एलान कर दिया। उनका कहना है कि 2021 में उन्होंने राजनीति शुरू की थी और पांच साल तक जिम्मेदारी निभाने की कोशिश की, लेकिन अब उनका राजनीतिक अध्याय खत्म हो गया है।

पूर्व क्रिकेटर और पूर्व खेल राज्य मंत्री मनोज तिवारी ने भी पार्टी नेतृत्व पर नाराजगी जताई। उनका कहना है कि मंत्री पद सिर्फ दिखावे के लिए दिया गया था और उनके पास कोई वास्तविक जिम्मेदारी नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया कि खेल मंत्री रहे अरूप बिश्वास उन्हें काम ही नहीं करने देते थे। मनोज तिवारी ने लियोनेल मेसी के कोलकाता दौरे के दौरान हुए अव्यवस्था के लिए भी अरूप बिश्वास को जिम्मेदार ठहराया।

ममता बनर्जी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती

चुनाव हारने के बाद टीएमसी नेताओं को डर है कि अब नगर निगम और पंचायत स्तर पर भी दल-बदल शुरू हो सकता है। यही वजह है कि ममता बनर्जी संगठन को संभालने के लिए अपने पुराने और भरोसेमंद नेताओं को आगे ला रही हैं।

80 साल के शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया है। वह 1998 में टीएमसी के गठन से ही ममता बनर्जी के करीबी माने जाते हैं और लगातार दसवीं बार विधायक बने हैं। उनके साथ असीमा पात्रा और नयना बंद्योपाध्याय को उपनेता प्रतिपक्ष बनाया गया है, जबकि कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम को चीफ व्हीप की जिम्मेदारी दी गई है।

दिलचस्प बात यह है कि इन नियुक्तियों पर हस्ताक्षर अभिषेक बनर्जी ने ही किए हैं, जबकि ये सभी नेता ममता बनर्जी के पुराने और भरोसेमंद सहयोगी माने जाते हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि टीएमसी के भीतर अब पुराने और नए नेतृत्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश शुरू हो चुकी है।

कानूनी और राजनीतिक लड़ाई की तैयारी

रवींद्रनाथ टैगोर जयंती के एक कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने साफ कहा कि अब बीजेपी के खिलाफ कानूनी और राजनीतिक लड़ाई खुलकर लड़ी जाएगी। उन्होंने खुद को वकील बताते हुए संकेत दिए कि आने वाले दिनों में टीएमसी सड़क से लेकर अदालत तक संघर्ष करेगी।

लेकिन पार्टी के भीतर जिस तरह असंतोष बढ़ रहा है, उससे ममता बनर्जी की राह आसान नहीं दिख रही। हार के बाद टीएमसी के सामने सिर्फ विपक्ष में बैठने की चुनौती नहीं है, बल्कि संगठन को टूटने से बचाने की भी बड़ी जिम्मेदारी है।

Aditya Kumar Verma

Aditya Kumar Verma

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आदित्य कुमार वर्मा न्यूजट्रैक में कंटेंट राइटर हैं। ये लगभग आठ वर्ष से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं।

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