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जब बागियों ने ही हासिल कर लिया पार्टी पर हक! TMC में खीचतान के बाद होने लगी अखिलेश-शिंदे-अजित पवार तक की चर्चा
TMC Symbol Row: अखिलेश यादव, एकनाथ शिंदे और अजित पवार के मामलों में पार्टी टूटने के बाद बागी गुटों को नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार मिला।
Image Source- Social Media
TMC Symbol Row: तृणमूल कांग्रेस किसकी है? इस सवाल पर चुनाव आयोग (Election Commission) ने विराम लगा दिया है। नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर लंबे समय से आमने-सामने खड़े दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों के लिए आयोग ने अलग-अलग नए नाम और नए चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिए हैं। इस फैसले के तहत चुनाव आयोग ने पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम के साथ 'फुटबॉल खिलाड़ी' का चुनाव चिन्ह सौंपा है। वहीं दूसरी ओर, पार्टी से बगावत करने वाले दूसरे गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम दिया गया है और उन्हें 'लिफाफा' चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया है।
वहीं इस बीच खास बात यह है कि भारतीय राजनीति में पार्टी के भीतर टूट के बाद असली पार्टी और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच विवाद से लेकर शिवसेना में एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट की लड़ाई और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में अजित पवार और शरद पवार के बीच विवाद तक ऐसे मामले चुनाव आयोग के सामने पहुंच चुके हैं।
इन मामलों में चुनाव आयोग ने अलग-अलग परिस्थितियों में पार्टी के संविधान, संगठन और सांसदों-विधायकों के समर्थन जैसे आधारों को देखा। अब टीएमसी के मामले में भी आगे की तस्वीर इसी तरह की प्रक्रिया के बाद साफ हो सकती है।
अखिलेश और मुलायम के बीच छिड़ी थी जंग
साल 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने थे और उससे पहले समाजवादी पार्टी में जबरदस्त खींचतान चल रही थी। पार्टी के नेतृत्व को लेकर विवाद पिता मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच पहुंच गया था।
विवाद इतना बढ़ा कि मामला चुनाव आयोग तक पहुंच गया। दोनों पक्ष पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर अपना दावा कर रहे थे। आखिरकार चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव के गुट को समाजवादी पार्टी का नाम और ‘साइकिल’ चुनाव चिह्न रखने का अधिकार दिया।
हालांकि, मुलायम सिंह यादव लगातार यह कहते रहे कि पार्टी में किसी तरह की बगावत नहीं हुई है। इसके बावजूद पार्टी के भीतर दोनों गुटों के बीच नेतृत्व और संगठन को लेकर विवाद चुनाव आयोग के सामने पहुंच चुका था।
अखिलेश को क्यों मिला ‘साइकिल’ सिंबल?
चुनाव आयोग ने इस विवाद की जांच चुनाव चिह्न आरक्षण और आवंटन आदेश, 1968 (Election Symbols Order, 1968) की धारा 15 के तहत की थी। आयोग के सामने समाजवादी पार्टी के दो गुट थे। एक गुट मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाला था, जबकि दूसरे गुट का प्रतिनिधित्व अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव कर रहे थे।
अखिलेश यादव के गुट के पास उस समय बड़ी संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन था। उन्हें 228 में से 205 विधायकों (MLAs) का समर्थन मिला था। इसके अलावा 68 में से 56 एमएलसी (MLCs), 24 में से 15 सांसदों (MPs) और 46 में से 28 राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्यों का समर्थन भी उनके साथ था। यही संख्या और संगठन के भीतर समर्थन चुनाव आयोग के फैसले में महत्वपूर्ण आधार बना।
1972 का फैसला बना अहम आधार
समाजवादी पार्टी के विवाद में चुनाव आयोग ने 1972 के सादिक अली बनाम चुनाव आयोग (Sadiq Ali vs Election Commission) मामले में आए फैसले को भी ध्यान में रखा था।
दरअसल, साल 1972 में कांग्रेस के अलग-अलग गुटों के बीच पार्टी और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हुआ था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे विवादों को देखने के लिए तीन महत्वपूर्ण टेस्ट की बात कही थी।
पहला था पार्टी के संविधान का विश्लेषण। यानी यह देखा जाए कि पार्टी का संविधान क्या कहता है और संगठन की संरचना क्या है। दूसरा यह पता लगाना था कि पार्टी का कौन सा गुट उसके संविधान का पालन कर रहा है। तीसरा और अहम आधार यह था कि पार्टी के किस गुट के पास ज्यादा सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों का समर्थन है। यही प्रक्रिया आगे भी ऐसे कई मामलों में चुनाव आयोग के सामने आधार बनी।
एकनाथ शिंदे के साथ भी हुआ ऐसा
साल 2022 में महाराष्ट्र की शिवसेना (Shiv Sena) में भी ऐसा ही विवाद सामने आया। एकनाथ शिंदे शिवसेना के अधिकांश विधायकों और सांसदों के समर्थन का दावा कर रहे थे। मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा और आयोग ने भी पार्टी और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद में इसी तरह के कानूनी प्रावधानों और आधारों को देखा।
आयोग के सामने आंकड़ा यह था कि विधानसभा चुनाव में जीतने वाले शिवसेना के 55 विधायकों में से 40 विधायक एकनाथ शिंदे के साथ थे। वहीं, 18 में से 13 सांसद भी उनके गुट के समर्थन में थे।
इसके बाद चुनाव आयोग ने सिर्फ विधायकों और सांसदों के समर्थन को ही नहीं देखा, बल्कि पार्टी के पदाधिकारियों और संगठन के स्तर पर भी स्थिति की जांच की।
इस पूरी प्रक्रिया के बाद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई। इस मामले में भी पहले अंतरिम आदेश आया था और बाद में अंतिम आदेश जारी किया गया।
आयोग तक पहुंची पवार परिवार की जंग
महाराष्ट्र के बड़े राजनीतिक परिवारों में शामिल पवार परिवार में साल 2023 में पार्टी टूटने के बाद ऐसा ही विवाद सामने आया। अजित पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के 53 में से 40 विधायक अलग हो गए थे।
इसके बाद पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा चुनाव आयोग तक पहुंचा। आयोग ने इस मामले में करीब छह महीने तक प्रक्रिया चलाई और कुल 10 बार बैठकें कीं।
अंत में चुनाव आयोग ने अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को असली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी माना और उसे पार्टी का नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने का अधिकार दिया। यह वही पार्टी थी जिसका गठन अजित पवार के चाचा और वरिष्ठ नेता शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर किया था।
अजित पवार को क्यों मिला ‘घड़ी’ सिंबल?
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विवाद में चुनाव आयोग ने तीन प्रमुख आधारों पर जांच की थी। इनमें पार्टी के संविधान के उद्देश्य और लक्ष्य, पार्टी के संविधान का पालन और बहुमत यानी किस गुट के पास ज्यादा निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन है, जैसे पहलू शामिल थे।
पूरी प्रक्रिया के बाद सांसदों और विधायकों के समर्थन के आधार पर अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने का अधिकार मिला।
आयोग ने अपने फैसले में कहा था कि याचिकाकर्ता अजित अनंतराव पवार के नेतृत्व वाला गुट ही नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी है और चुनाव चिह्न आरक्षण और आवंटन आदेश, 1968 के तहत पार्टी के नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल का हकदार है।
पुराने मामलों से क्या समझ आता है?
अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के समाजवादी पार्टी विवाद से लेकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तक के मामलों में एक बात साफ दिखाई देती है कि पार्टी टूटने के बाद सिर्फ यह दावा करना पर्याप्त नहीं होता कि असली पार्टी किसके पास है।
चुनाव आयोग पार्टी के संविधान, संगठन में स्थिति और सांसदों तथा विधायकों समेत पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन जैसे पहलुओं को देखता है। अलग-अलग मामलों में इन आधारों की अहमियत परिस्थितियों के हिसाब से तय हुई है।


