Uniform Civil Code: 2029 से पहले सभी भाजपा-एनडीए शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य: अमित शाह

UCC 2029: गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 2029 से पहले सभी 21 भाजपा-NDA शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू की जाएगी। उत्तराखंड के बाद कई राज्यों में प्रक्रिया तेज।

Newstrack Network
Published on: 14 Sept 2026 4:52 PM IST
Uniform Civil Code 2029
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Uniform Civil Code 2029 (Image Credit-Social Media)

मुंबई। समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर भाजपा ने 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक लक्ष्य सामने रखा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को मुंबई में कहा कि उन्हें भरोसा है कि भाजपा और NDA शासित सभी 21 राज्यों में 2029 से पहले समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। शाह ने कहा कि कई राज्यों में UCC की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसे बाकी NDA शासित राज्यों तक भी ले जाया जाएगा।

हालांकि, 2029 तक सभी 21 राज्यों में UCC लागू होना अभी गृह मंत्री द्वारा व्यक्त राजनीतिक लक्ष्य और विश्वास है। संविधान में इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं है।

भाजपा के पुराने वैचारिक एजेंडे का अहम मुद्दा

समान नागरिक संहिता भाजपा के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में लंबे समय से शामिल रही है। राम मंदिर, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधानों को हटाने और UCC को पार्टी के पुराने प्रमुख मुद्दों के तौर पर देखा जाता रहा है।

राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 से जुड़े फैसलों के बाद UCC भाजपा के वैचारिक एजेंडे का प्रमुख शेष मुद्दा बनकर सामने आया है। पार्टी इसे नागरिक कानूनों में समानता और महिलाओं के अधिकारों से जोड़ती रही है।

UCC में किन मामलों पर पड़ेगा असर?

समान नागरिक संहिता का मूल विचार यह है कि धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय नागरिक मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था हो।

इसमें मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति, गोद लेने और पारिवारिक संबंधों से जुड़े नियम शामिल हो सकते हैं। हालांकि किसी भी राज्य में UCC का वास्तविक स्वरूप उसके कानून और नियमों पर निर्भर करेगा।

अनुच्छेद 44 देता है UCC की दिशा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के तहत समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है।

हालांकि नीति निदेशक तत्व अदालत के जरिए सीधे लागू कराए जाने वाले मौलिक अधिकार नहीं हैं। इसलिए अनुच्छेद 44 सरकार को संवैधानिक दिशा देता है, लेकिन किसी निश्चित तारीख तक UCC लागू करने की बाध्यता तय नहीं करता।

तीन तलाक का उदाहरण देकर शाह ने जोड़ा UCC से

अमित शाह ने अपने बयान में तीन तलाक का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तीन तलाक खत्म होने से मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार मिले हैं। केंद्र सरकार 2019 के मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम को इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में पेश करती रही है।

हालांकि तीन तलाक कानून और UCC अलग-अलग कानूनी विषय हैं। तीन तलाक कानून एक विशिष्ट प्रथा से संबंधित है, जबकि UCC विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य व्यक्तिगत कानूनों के व्यापक ढांचे को प्रभावित कर सकता है।

उत्तराखंड बना पहला बड़ा राज्य मॉडल

राज्य स्तर पर UCC लागू करने का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण उत्तराखंड है। राज्य विधानसभा ने फरवरी 2024 में UCC विधेयक पारित किया था। राष्ट्रपति की मंजूरी और नियमों की प्रक्रिया के बाद 27 जनवरी 2025 से उत्तराखंड में UCC लागू हुआ।

उत्तराखंड स्वतंत्र भारत में नया समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य बना। हालांकि गोवा में पुर्तगाली काल से चली आ रही एक समान प्रकृति की नागरिक व्यवस्था पहले से मौजूद है, जिसका ऐतिहासिक और कानूनी आधार अलग है।

अब गुजरात और असम समेत दूसरे राज्यों की ओर नजर

उत्तराखंड के बाद दूसरे भाजपा शासित राज्यों में भी UCC को लेकर कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार गुजरात और असम में भी UCC से जुड़ी विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है।

इससे संकेत मिलता है कि भाजपा एक केंद्रीय कानून के बजाय राज्य-स्तरीय मॉडल के जरिए UCC को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।

समवर्ती सूची के कारण राज्यों को मिला रास्ता

विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानूनों से जुड़े कई विषय संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं। इसका अर्थ है कि इन क्षेत्रों में संसद के साथ-साथ राज्य विधानमंडल भी कानून बना सकते हैं।

इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत राज्यों के पास अपने क्षेत्र में UCC से जुड़े कानून बनाने का रास्ता मौजूद है। हालांकि केंद्र के मौजूदा कानूनों से टकराव की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 254 से जुड़ी प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।

21 राज्यों में लागू करना बड़ी चुनौती

2029 से पहले 21 राज्यों में UCC लागू करना आसान नहीं होगा। अलग-अलग राज्यों की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां काफी भिन्न हैं।

खासकर पूर्वोत्तर और जनजातीय क्षेत्रों में प्रथागत कानूनों और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्थाओं का सवाल महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि UCC के किसी भी मॉडल में स्थानीय परंपराओं और संवैधानिक सुरक्षा के बीच संतुलन बड़ा मुद्दा रहेगा।

जनजातीय समुदायों को लेकर अलग प्रावधान

UCC की बहस में जनजातीय समुदायों को लेकर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। उत्तराखंड के UCC में अनुसूचित जनजातियों को कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यवहार में UCC भी सभी समुदायों पर बिना किसी अपवाद के एक समान व्यवस्था लागू करने के बजाय संवैधानिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अलग प्रावधान रख सकता है।

समर्थकों का तर्क- महिलाओं को मिलेगा समान अधिकार

UCC के समर्थकों का सबसे बड़ा तर्क लैंगिक समानता है। उनका कहना है कि विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में महिलाओं को धर्म के आधार पर अलग-अलग कानूनी अधिकार नहीं मिलने चाहिए।

समर्थकों के अनुसार समान कानून से व्यक्तिगत कानूनों की जटिलता कम होगी और नागरिक अधिकारों का आधार धर्म के बजाय समान नागरिकता बनेगा।

विरोधियों को धार्मिक स्वतंत्रता और विविधता की चिंता

दूसरी ओर मुस्लिम संगठनों और कुछ अन्य समूहों की ओर से UCC को लेकर आपत्तियां उठती रही हैं। उनका कहना है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था समानता के साथ धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता को भी महत्व देती है।

पूर्वोत्तर और जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक कानूनों की सुरक्षा भी बड़ा सवाल है। आलोचकों का तर्क है कि व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों में सुधार किया जा सकता है, इसके लिए जरूरी नहीं कि सभी मामलों में एक ही संहिता लागू की जाए।

विधि आयोग की राय भी रही अलग

UCC को लेकर विधि आयोगों की राय भी समय-समय पर चर्चा में रही है। 21वें विधि आयोग ने 2018 में परिवार कानून सुधार पर अपने परामर्श पत्र में तत्काल समान नागरिक संहिता को आवश्यक या वांछनीय नहीं माना था और व्यक्तिगत कानूनों में सुधार पर जोर दिया था।

बाद में 22वें विधि आयोग ने 2023 में UCC पर जनता और संबंधित संगठनों से नए सिरे से सुझाव मांगे थे। इससे स्पष्ट है कि UCC के स्वरूप और आवश्यकता को लेकर कानूनी विशेषज्ञों के बीच भी बहस रही है।

2029 की समयसीमा क्यों महत्वपूर्ण?

अमित शाह का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2029 में अगला लोकसभा चुनाव प्रस्तावित है। यदि उससे पहले अधिकांश भाजपा-एनडीए शासित राज्यों में UCC लागू होता है तो यह भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक एजेंडे को बड़े स्तर पर लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

लेकिन अलग-अलग राज्यों के कानूनों में अंतर रहा तो देश में एक ही UCC के बजाय अलग-अलग राज्यीय मॉडल भी सामने आ सकते हैं।

राष्ट्रीय UCC के बजाय राज्य मॉडल पर जोर

शाह के बयान से फिलहाल यह संकेत मिलता है कि भाजपा-एनडीए शासित राज्यों के जरिए UCC को आगे बढ़ाने पर जोर है। इसका अर्थ यह नहीं है कि संसद में पूरे देश के लिए केंद्रीय UCC कानून की कोई तत्काल समयसीमा घोषित की गई है।

राज्य स्तर पर कानून बनने के बाद उनके प्रावधान, न्यायिक समीक्षा और सामाजिक प्रभाव राष्ट्रीय स्तर की आगे की रणनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।

आगे की असली परीक्षा कानून के अमल की

UCC पर बहस अब केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं रहेगी। यदि अधिक राज्यों में इसे लागू किया जाता है तो असली परीक्षा इसके व्यावहारिक अमल की होगी।

विवाह पंजीकरण, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति अधिकार, गोद लेने और पारिवारिक विवादों जैसे मामलों में कानून किस तरह काम करता है, इससे UCC की स्वीकार्यता और प्रभाव का आकलन होगा।

2029 से पहले UCC की राह होगी राजनीतिक और कानूनी दोनों

अमित शाह ने 2029 से पहले 21 भाजपा-एनडीए शासित राज्यों में UCC लागू करने का भरोसा जताकर इस मुद्दे को एक स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य के रूप में सामने रखा है।

अब उत्तराखंड के अनुभव, दूसरे राज्यों में बन रहे कानूनों, जनजातीय और धार्मिक समूहों की चिंताओं तथा अदालतों की समीक्षा के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अगले ढाई वर्षों में यह लक्ष्य किस हद तक जमीन पर उतरता है।

UCC भाजपा के पुराने वैचारिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 2029 से पहले राज्यों में इसके विस्तार की कोशिश अब इसे चुनावी राजनीति के साथ-साथ भारत की व्यक्तिगत कानून व्यवस्था में संभावित बड़े बदलाव के केंद्र में ले आई है।

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