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'SIR में लाखों वोटर गायब'...UN की रिपोर्ट से सनसनी! मोदी सरकार से पूछे 7 बड़े सवाल, विपक्ष हमलावर
UN Report on SIR: संयुक्त राष्ट्र (UN) के तीन स्पेशल रैपोर्टर्स ने भारत की SIR प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में लाखों वोटरों के नाम हटाने और अल्पसंख्यकों पर कथित असर को लेकर चिंता जताई गई है। इस पर कांग्रेस और TMC ने केंद्र सरकार व चुनाव आयोग को घेरते हुए तीखा हमला बोला है।
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UN Report on SIR: भारत में चल रहे वोटर लिस्ट रिवीजन यानी एसआईआर का मामला संयुक्त राष्ट्र में पहुंच चुका है। बड़ी संख्या में लोगों, वह भी मुस्लिमों के नाम कटने पर संयुक्त राष्ट्र ने हैरानी और आपत्ति जताते हुए भारत सरकार से जवाब मांगा है।
संयुक्त राष्ट्र के तीन स्पेशल रैपोर्टर्स ने भारत सरकार को एक पत्र भेजकर कहा है कि एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के आरोप सामने आए हैं। पत्र में कहा गया है कि इसका असर कथित तौर पर सबसे ज्यादा मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ा है।
60 दिन में देना था जवाब
यह पत्र 1 मई 2026 को भेजा गया था। इसे अल्पसंख्यक मामलों के स्पेशल रैपोर्टर निकोलस लेवराट, अभिव्यक्ति की आजादी पर स्पेशल रैपोर्टर आइरीन खान और धर्म या आस्था की आजादी से जुड़े स्पेशल रैपोर्टर नाजिला घानेआ ने भेजा है। उन्होंने भारत सरकार से पूछा है कि आखिर यह कैसे सुनिश्चित किया गया कि कोई भी योग्य मतदाता 2026 के विधानसभा चुनाव में वोट डालने के अधिकार से बाहर न रह जाए?
यूएन ने किन बातों पर चिंता जताई है?
यूएन के लेटर में कहा गया है कि एसआईआर जिस तरीके से किया गया, उसे लेकर कई गंभीर शिकायतें मिली हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए और इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम बंगाली मूल के लोगों और दूसरे अल्पसंख्यकों की बताई जा रही है। यूएन का कहना है कि इन समुदायों को पहले भी कई बार विदेशी या अवैध प्रवासी बताकर निशाना बनाया जाता रहा है, इसलिए इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दूसरे चरण की एसआईआर प्रक्रिया में कई लोगों ने दावा किया कि उन्होंने अपने सभी वैध दस्तावेज जमा किए थे, इसके बावजूद उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। इतना ही नहीं, कई मामलों में दस्तावेजों में नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर को भी नाम हटाने का आधार बना लिया गया। यूएन ने कहा कि भारत में प्रशासनिक वजहों से इस तरह की गलतियां आम हैं, इसलिए इन्हें आधार बनाकर किसी का वोटिंग अधिकार खत्म करना चिंता की बात है।
एआई सिस्टम पर भी सवाल
यूएन ने बिहार में हुई एसआईआर प्रक्रिया का भी जिक्र किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वहां भी बड़ी संख्या में लोगों के वोटिंग अधिकार छिनने और नागरिकता पर सवाल खड़े होने की आशंका जताई गई। लेटर में यह भी कहा गया कि कथित तौर पर एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम का इस्तेमाल किया गया, जिसने वोटर डेटा में गड़बड़ियों को चिन्हित किया। यूएन ने इस सिस्टम की पारदर्शिता, संभावित गलतियों और पक्षपात को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
नेताओं के बयानों पर भी उठाई आपत्ति
पत्र में कुछ नेताओं के बयानों पर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक वरिष्ठ नेताओं, जिनमें केंद्रीय गृह मंत्री का भी जिक्र है, ने कथित तौर पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने को "अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों" के खिलाफ कार्रवाई के तौर पर पेश किया। स्पेशल रैपोर्टर्स का कहना है कि इस तरह की बातें भारतीय मुस्लिम नागरिकों और विदेशी नागरिकों के बीच फर्क को धुंधला करती हैं और भेदभाव का माहौल बना सकती हैं। यह भी कहा गया है कि संसद में "डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किए जाने की भी जानकारी मिली है। स्पेशल रैपोर्टर्स का कहना है कि ऐसे बयान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के तहत भेदभाव को बढ़ावा देने वाले माने जा सकते हैं।
पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम का भी जिक्र
स्पेशल रैपोर्टर्स की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र का भी खास तौर पर जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक वहां एसआईआर के दौरान जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए, उनमें करीब 95 फीसदी मुस्लिम समुदाय से थे, जबकि उस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी करीब 25 फीसदी है। इसी आधार पर रिपोर्ट में कहा गया कि इस प्रक्रिया का असर अल्पसंख्यकों पर ज्यादा पड़ा हो सकता है।
स्पेशल रैपोर्टर्स की रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने कई कदम उठाए, जिसके बाद करीब 27 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हट गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से कई लोगों की अपील अभी भी ट्रिब्यूनल में लंबित है और वे अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल पाए।
भारत सरकार से मांगे गए सात जवाब
यूएन के स्पेशल रैपोर्टर्स ने भारत सरकार से सात अहम सवालों के जवाब मांगे हैं। इनमें हटाए गए वोटरों के धर्म और जातीय आधार से जुड़े आंकड़े, अपील की प्रक्रिया, गलत तरीके से नाम हटाए जाने पर मिलने वाले कानूनी विकल्प और यह सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदम शामिल हैं कि कोई पात्र मतदाता वोट देने से वंचित न रहे। यूएन ने भारत सरकार को जवाब देने के लिए 60 दिन का समय भी दिया था।
पहले भी एनआरसी को लेकर उठे थे सवाल
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि साल 2018 में असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया के दौरान भी यूएन के स्पेशल रैपोर्टर्स ने भारत सरकार को इसी तरह का लेटर भेजा था। उस समय भी जातीय, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के कथित बहिष्कार को लेकर चिंता जताई गई थी।
अब विपक्ष ने सरकार को घेरा
स्पेशल रैपोर्टर्स का यह पत्र सार्वजनिक होने के बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार पर हमला बोल दिया है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए तंज कसा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की काबिलियत की चर्चा अब संयुक्त राष्ट्र में हो रही है। उन्होंने लिखा कि यह पूरे देश के लिए कितना "गर्व का पल" है और आने वाली पीढ़ियां इसे याद रखेंगी।
तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने भी इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि असंवैधानिक एसआईआर प्रक्रिया की वजह से लाखों वोटर चुनावी लिस्ट से गायब हो गए हैं और आगे भी बड़ी संख्या में नाम हटने का खतरा बना हुआ है। उन्होंने कहा कि यूएन के स्पेशल रैपोर्टर्स ने एआई आधारित अपारदर्शी सिस्टम और अल्पसंख्यकों पर उसके कथित ज्यादा असर को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
सागरिका घोष ने यह भी कहा कि बिना जवाबदेही वाले एल्गोरिदम के जरिए वोटरों के अधिकार खत्म किए जा रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर हमला बोलते हुए कहा कि इस पूरी प्रक्रिया ने भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार किया है।
मानवाधिकारों का भी दिया गया हवाला
यूएन के स्पेशल रैपोर्टर्स ने अपने लेटर में कहा है कि सामने आए आरोप कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के संभावित उल्लंघन की तरफ इशारा करते हैं। रिपोर्ट में भारत की उन अंतरराष्ट्रीय संधियों का भी जिक्र किया गया है, जिनमें भेदभाव से सुरक्षा, मतदान का अधिकार और अल्पसंख्यकों के अधिकार शामिल हैं। हालांकि यूएन ने यह भी साफ कहा है कि वह इन आरोपों की सच्चाई पर कोई अंतिम फैसला नहीं दे रहा, बल्कि भारत सरकार से इन सभी आरोपों पर विस्तृत जवाब चाहता है।
क्या होते हैं स्पेशल रैपोर्टर्स ?
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के स्पेशल रैपोर्टर्स (Special Rapporteurs) स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ होते हैं, जिन्हें किसी देश, क्षेत्र या किसी खास मानवाधिकार मुद्दे पर निगरानी रखने और रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी दी जाती है। ये विशेषज्ञ तथ्यों का अध्ययन करते हैं, संबंधित सरकारों से जवाब मांग सकते हैं, अपनी चिंता जाहिर कर सकते हैं और संयुक्त राष्ट्र को अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं। हालांकि, इनके सुझाव और रिपोर्ट कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन्हें महत्वपूर्ण माना जाता है और इनका उद्देश्य मानवाधिकार से जुड़े मामलों पर निष्पक्ष निगरानी और संवाद को बढ़ावा देना होता है।


