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UNICEF Survey: दुनिया के 87% बच्चे युद्ध नहीं चाहते, हिंसा और परिवार की कलह से हैं परेशान
UNICEF Survey Children Peace: यह संवेदनशील सच यूनिसेफ (UNICEF) का ताजा सर्वेक्षण—'द यंग वॉयस' (The Young Voices) उजागर करता है।
UNICEF Survey Children Peace
UNICEF Survey Children Peace: भले ही पूरी दुनिया पर इस समय आतंकवाद का साया मंडरा रहा हो और हर तरफ युद्ध की मुनादी सुनाई दे रही हो, लेकिन यदि बच्चों से पूछिए, तो वे किसी भी सूरत में हिंसा नहीं चाहते। हिंसा और युद्ध की विभीषिका सबसे ज्यादा बच्चों के सुकोमल मन को ही प्रभावित करती है। एक वैश्विक आंकड़े के अनुसार, दुनिया के सत्तासी फीसदी (87%) बच्चे किसी भी कीमत पर युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। अमीर हो या गरीब, दोनों ही तरह के देशों के बच्चे दुनिया में स्थायी शांति के हिमायती हैं। उनकी एकमात्र तमन्ना बड़े होकर एक ऐसे विश्व का निर्माण करने की है, जो हर तरह के अपराध, नफ़रत और हिंसा से पूरी तरह मुक्त हो।
यह संवेदनशील सच यूनिसेफ (UNICEF) का ताजा सर्वेक्षण—'द यंग वॉयस' (The Young Voices) उजागर करता है। यह विस्तृत सर्वेक्षण विश्व के 35 देशों के लगभग 9 करोड़ 30 लाख बच्चों की आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले समूहों के बीच किया गया था, जिनमें यूरोप तथा मध्य एशिया के देश भी शामिल हैं। इस सर्वेक्षण के ऐतिहासिक नतीजे इसी महीने न्यूयॉर्क में आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र (UN) के विशेष सम्मेलन में पेश किए जाने थे, लेकिन अमेरिका में उत्पन्न हुई अप्रत्याशित वैश्विक परिस्थितियों के चलते इस सम्मेलन को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है।
इस सर्वेक्षण में बच्चों से बहुत ही आत्मीय सवाल पूछे गए थे; जैसे—उनके घरों व पड़ोस का माहौल कैसा है? वे इस माहौल के बारे में क्या सोचते हैं? घर और बाहर उन्हें कितने अधिकार हासिल हैं? तथा समाज के बड़ों का उनके प्रति कैसा बर्ताव है?
पारिवारिक कलह और डांट-डपट का शिकार होता बचपन
सर्वेक्षण में शामिल लगभग दो-तिहाई बच्चों ने कहा कि वैसे तो वे अपने जीवन से संतुष्ट हैं, लेकिन उनकी मानसिक चिंता और उदासी का सबसे बड़ा कारण उनके परिवारों में रोज़ होने वाली तू-तू, मैं-मैं और कलह है। बड़ों के बीच होने वाले आपसी झगड़े, मनमुटाव और तनाव का अकारण शिकार इन मासूम बच्चों को बनना पड़ता है, जबकि उस पूरे विवाद में उनकी कोई गलती नहीं होती।
ज्यादातर बच्चों ने दूसरे बच्चों (अपने सहपाठियों और दोस्तों) के साथ अपने संबंधों को बेहद सकारात्मक और दोस्ताना बताया। लेकिन इसके समानांतर, दस में से छह बच्चों ने यह कड़वा सच भी स्वीकार किया कि अपने ही परिवारों में उन्हें अक्सर बड़ों की डांट-डपट और शारीरिक मारपीट का शिकार होना पड़ता है।
लगभग ग्यारह फीसदी बच्चे स्पष्ट रूप से यह मानते हैं कि उनके घरों में उनके साथ हिंसक बर्ताव होता है। छह में से एक बच्चे का साफ कहना था कि वह अपने आस-पड़ोस के माहौल में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता; जबकि दस में से एक बच्चे ने कहा कि उन्हें अपने अड़ोस-पड़ोस में अक्सर हिंसक और मारपीट की घटनाएं देखने को मिलती हैं।
विकासशील बनाम विकसित देशों का अंतर और अधिकारों का हनन
इस विस्तृत सर्वे के दौरान जब 15,200 बच्चों के व्यावहारिक डेटा का गहन विश्लेषण किया गया, तो यह दुखद तथ्य सामने आया कि गरीब और अभावग्रस्त घरों के बच्चों के साथ हिंसक घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक होती हैं। इसी तरह, विकसित देशों के बच्चों के मुकाबले विकासशील देशों के दोगुने बच्चे अपने परिवेश में खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। इसी असुरक्षा और बेहतर भविष्य की चाह में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में रहने वाले लगभग 23 फीसदी बच्चों की यह तमन्ना है कि वे बड़े होकर यूरोप या उत्तरी अमेरिका के विकसित देशों में जाकर बस जाएं।
अधिकारों की बात करें, तो एक-तिहाई से ज्यादा बच्चे दृढ़ता से चाहते हैं कि उनके मौलिक बाल-अधिकारों का किसी भी स्तर पर अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। इनमें से अधिकांश बच्चों की यह गंभीर शिकायत भी रही कि समाज और परिवार में उनके अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता। सबसे संवेदनशील तथ्य यह उभरकर आया कि सर्वे में शामिल सभी बच्चों में से तकरीबन एक-चौथाई (25%) बच्चे आज भी केवल सच्चे प्यार, सुरक्षा और ममता के भूखे हैं।
यूनिसेफ द्वारा कराए गए इस वैश्विक सर्वेक्षण का मूल निष्कर्ष यही है कि बच्चों को अगर इस दुनिया में किसी चीज़ से सबसे ज़्यादा नफ़रत है, तो वह है—हिंसा। उन्हें ऐसे लोग कतई पसंद नहीं हैं जो बात-बात पर मारपीट और झगड़ा करते हों। आज के नौनिहालों को इस बात पर सबसे कड़ी आपत्ति है कि वयस्क समाज और सत्ता के नीति-निर्माता उनके इन मासूम लेकिन बुनियादी विचारों को कोई तरजीह नहीं देते। दुनिया में युद्ध, शांति और भविष्य के सारे बड़े फैसले, इस धरती के असली वारिसों यानी बच्चों से बिना पूछे ही बंद कमरों में कर लिए जाते हैं।
( साभार-दैनिक जागरण।मूल रुप से दिनांक 14 सितंबर, 2001 को प्रकाशित ।)


