उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म! धामी सरकार का बड़ा फैसला, क्या ‘हिंदुत्व राजनीति’ में योगी से आगे निकल रहे हैं सीएम धामी?

उत्तराखंड सरकार ने ‘अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम 2025’ लागू कर मदरसा बोर्ड खत्म किया। 1 जुलाई 2026 से नया कानून लागू होगा, विपक्ष ने जताई आपत्ति।

Harsh Sharma
Published on: 8 Oct 2025 5:15 PM IST (Updated on: 8 Oct 2025 5:17 PM IST)
उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म! धामी सरकार का बड़ा फैसला,  क्या ‘हिंदुत्व राजनीति’ में योगी से आगे निकल रहे हैं सीएम धामी?
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Uttarakhand Madarsa Board: उत्तराखंड की धामी सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। जबरन धर्मांतरण और समान नागरिक संहिता (UCC) के बाद अब सरकार ने मदरसा बोर्ड को खत्म करने वाला नया कानून लागू कर दिया है। इस फैसले को लेकर राजनीतिक हलकों में इसे बीजेपी की ‘हिंदुत्व राजनीति’ का अगला बड़ा कदम माना जा रहा है। दरअसल, उत्तराखंड विधानसभा के मॉनसून सत्र में ‘अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025’ पारित किया गया था। इस बिल को अगस्त में कैबिनेट ने मंजूरी दी थी और अब 6 अक्टूबर को राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने इसे अपनी स्वीकृति दे दी है। इससे अब यह बिल कानून बन गया है।

राज्यपाल की मंजूरी के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि, “इस कानून के तहत अल्पसंख्यक समुदायों की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक नया प्राधिकरण बनाया जाएगा, जो ऐसे शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता देने का काम करेगा।” अब इस कानून के लागू होने के बाद राज्य के सभी मदरसे और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेने के लिए बाध्य होंगे।

उत्तराखंड बना पहला राज्य, जहां खत्म हुआ मदरसा शिक्षा बोर्ड

उत्तराखंड सरकार ने ‘अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम 2025’ को मंजूरी दे दी है, जिससे अब यह पूरी तरह से कानून बन गया है। यह कानून 1 जुलाई 2026 से लागू किया जाएगा। इसके तहत न सिर्फ मदरसे बल्कि सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान इसके दायरे में आएंगे। सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद राज्य के हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है ताकि शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता और पारदर्शिता लाई जा सके। इस कदम से उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है, जहां मदरसा शिक्षा बोर्ड समाप्त कर दिया गया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि इस नए कानून से शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी, जिससे छात्रों को सीधा लाभ मिलेगा। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि यह कदम मदरसा शिक्षा के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है और अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए चुनौतियां खड़ी कर सकता है।

इस कानून से क्या बदलेगा:

-उत्तराखंड सरकार का नया कानून 1 जुलाई 2026 से लागू होने जा रहा है। इसके लागू होने के बाद मदरसा शिक्षा बोर्ड कानून 2016 और गैर-सरकारी अरबी व फारसी मदरसा मान्यता नियम 2019 खत्म हो जाएंगे। अब राज्य में केवल मदरसे ही नहीं, बल्कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिलेगा। पहले यह दर्जा सिर्फ मदरसों तक सीमित था, लेकिन अब सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदायों के स्कूल भी इसमें शामिल होंगे।

सरकार के अनुसार, एक नया प्राधिकरण (Authority) बनाया जाएगा जो सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता देने का काम करेगा। हर संस्था को 1 जुलाई 2026 तक इस प्राधिकरण से मान्यता लेना जरूरी होगा, वरना उन्हें बंद कर दिया जाएगा। इसके साथ ही, अब सभी मदरसे और अल्पसंख्यक स्कूलों में नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF) और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुसार ही पढ़ाई होगी। पहले मदरसों का अपना अलग बोर्ड होता था जो पाठ्यक्रम तय करता था, लेकिन अब मदरसा बोर्ड समाप्त हो जाएगा और इन संस्थानों में वही पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा जो राज्य के अन्य स्कूलों में लागू है।

सरकार और विपक्ष की राय:

उत्तराखंड सरकार इस नए कानून को एक बड़ा सुधार मान रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि राज्य के मदरसों में कई सालों से स्कॉलरशिप वितरण में गड़बड़ियां, मिड-डे मील में अनियमितताएं और पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याएं देखी जा रही थीं। धामी ने बताया कि इस नए कानून से शिक्षा व्यवस्था ज्यादा साफ, जवाबदेह और गुणवत्तापूर्ण बनेगी। साथ ही अब सरकार को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की निगरानी करने और जरूरी दिशा-निर्देश जारी करने का भी अधिकार मिलेगा, जिससे पूरे सिस्टम में सुधार आएगा।

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Harsh Sharma is a Content Writer at Newstrack.com.

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