राष्ट्रगान की तरह ‘वंदे मातरम्’ के गायन में भी जानबूझकर बाधा डालना होगा दंडनीय, तीन साल तक की जेल का प्रावधान

Vande Mataram: संसद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण देने वाले संशोधन को मंजूरी दी है। जानें नए प्रावधान में क्या बदलेगा और जानबूझकर व्यवधान डालने पर क्या सजा होगी।

Newstrack Network
Published on: 8 Aug 2026 7:07 PM IST (Updated on: 8 Aug 2026 7:08 PM IST)
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Vande Mataram: देश के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान वैधानिक संरक्षण देने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। संसद ने राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। संशोधन का उद्देश्य वर्ष 1971 के मौजूदा कानून में राष्ट्रगीत को भी शामिल करना है, ताकि उसके गायन को जानबूझकर रोकना या उसे गा रही सभा में व्यवधान उत्पन्न करना भी उसी प्रकार दंडनीय हो, जैसा अब तक राष्ट्रगान के मामले में है।⁠

मौजूदा Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के सम्मान की रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान हैं। इसकी धारा-3 के तहत किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन को रोकना अथवा राष्ट्रगान गा रही सभा में व्यवधान पैदा करना अपराध है। दोष सिद्ध होने पर अधिकतम तीन वर्ष का कारावास, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। प्रस्तावित संशोधन इसी धारा में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को भी जोड़ता है। ⁠

क्या बदल जाएगा नए प्रावधान से?

संशोधन लागू होने के बाद यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ‘जन गण मन’ या ‘वंदे मातरम्’ के गायन को होने से रोकता है अथवा उसे गा रहे किसी समूह या सभा में जानबूझकर बाधा पैदा करता है तो उसके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जा सकेगी। पहली दोषसिद्धि में तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान रहेगा। पुराने कानून में दूसरी और प्रत्येक बाद की दोषसिद्धि पर कम से कम एक वर्ष के कारावास की व्यवस्था भी है, और संशोधन राष्ट्रगीत को उसी कानूनी ढांचे के भीतर लाता है।

‘वंदे मातरम्’ को पहले ऐसा स्पष्ट वैधानिक संरक्षण नहीं था

राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में असाधारण ऐतिहासिक स्थान प्राप्त है, लेकिन 1971 के कानून की धारा-3 में अब तक केवल राष्ट्रगान के गायन में जानबूझकर बाधा डालने का स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान था। इसी कानूनी अंतर को समाप्त करने के लिए सरकार संशोधन लाई है।

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के समान सम्मान और दर्जा प्राप्त होगा। नए संशोधन के पीछे सरकार ने इसी ऐतिहासिक भावना को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने का तर्क भी रखा है।

सिर्फ न गाना और जानबूझकर बाधा डालना एक बात नहीं

नए प्रावधान को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। कानून की भाषा मुख्य रूप से जानबूझकर गायन रोकने या गायन कर रही सभा में व्यवधान उत्पन्न करने को दंडनीय बनाती है। इसे यह अर्थ देना सही नहीं होगा कि हर नागरिक को प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाना ही पड़ेगा, अन्यथा वह स्वतः अपराधी हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने Bijoe Emmanuel बनाम State of Kerala (1986) मामले में माना था कि राष्ट्रगान के प्रति सम्मान रखते हुए धार्मिक अंतरात्मा के कारण उसे न गाने वाले विद्यार्थियों को केवल इस आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता, यदि वे राष्ट्रगान के दौरान शांत और सम्मानपूर्वक खड़े रहते हैं। इसलिए ‘सम्मान’, ‘गायन में भागीदारी’ और ‘जानबूझकर व्यवधान’ कानूनी दृष्टि से अलग-अलग प्रश्न हैं।

राष्ट्रगीत को बराबर कानूनी कवच देने की कोशिश

सरकार का तर्क है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों भारतीय राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं, इसलिए जानबूझकर किए गए व्यवधान के मामले में दोनों को समान सुरक्षा मिलनी चाहिए। विधेयक 24 जुलाई 2026 को राज्यसभा में पेश किया गया था। राज्यसभा ने इसे 29 जुलाई को पारित किया और उसके बाद लोकसभा से भी मंजूरी मिल गई।

1971 के कानून में पहले से क्या-क्या अपराध हैं?

राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत सार्वजनिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय ध्वज या संविधान को जलाना, विकृत करना, अपवित्र करना, पैरों तले रौंदना अथवा अन्य निर्धारित तरीकों से उनका जानबूझकर अपमान करना दंडनीय है। राष्ट्रगान को बाधित करने के लिए अलग से धारा-3 मौजूद है। वर्ष 2003 और 2005 में भी कानून में संशोधन कर राष्ट्रीय ध्वज से संबंधित कुछ प्रावधान और स्पष्ट किए गए थे।

राष्ट्रीय सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता—दोनों का संतुलन जरूरी

कानून विशेषज्ञों के अनुसार राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा की रक्षा करना संविधान के मूल नागरिक कर्तव्यों से जुड़ा विषय है। संविधान के अनुच्छेद 51A(a) में प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताया गया है कि वह संविधान, उसके आदर्शों एवं संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे। वहीं किसी कानून को लागू करते समय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति, अंत:करण और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है।

इसलिए इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका निशाना केवल असहमति या मौन रहना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकना अथवा उस दौरान व्यवधान पैदा करना है। कानून प्रभावी होने के बाद अदालतें भी प्रत्येक मामले के तथ्यों और आरोपी की मंशा के आधार पर अपराध का निर्धारण करेंगी।

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