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Vande Mataram Case 2026: धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर सजा? सुप्रीम कोर्ट करेगा संवैधानिक जांच
Vande Mataram Case 2026: वंदे मातरम् न गाने पर सजा के संवैधानिक सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई। टीएम कृष्णा की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा गया। 1986 के बिजोय इमैनुएल फैसले का भी उल्लेख हुआ।
Vande Mataram Case 2026 (Image Credit-Social Media)
नई दिल्ली। धार्मिक आस्था या अंतरात्मा की आवाज के कारण सम्मानपूर्वक ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाने वाले व्यक्ति को क्या आपराधिक सजा दी जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट अब इस महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल की जांच करेगा। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट संकेत दिया कि केवल धार्मिक या अंतरात्मा संबंधी आपत्ति के कारण राष्ट्रीय गीत न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक परिणाम नहीं भुगतने चाहिए। हालांकि अदालत ने अभी इस मुद्दे पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। उसने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और कहा है कि उसकी जांच मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित होगी कि राष्ट्रीय गीत को कानूनी संरक्षण देते समय किसी नागरिक की अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता पर आपराधिक दंड किस सीमा तक लगाया जा सकता है।
यह मामला प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत गायक टीएम कृष्णा की याचिका से सामने आया है। उन्होंने 2026 में किए गए ‘प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971’ के संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। संशोधित प्रावधान में राष्ट्रीय गीत को भी राष्ट्रीय गान के साथ कानूनी संरक्षण के दायरे में लाया गया है और जानबूझकर राष्ट्रीय गान अथवा राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या गायन कर रही सभा में व्यवधान पैदा करने पर तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। कृष्णा ने इसके साथ गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी है जिनके तहत निर्धारित सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंद गाने की व्यवस्था की गई है।
शीर्षक का एक जरूरी सुधार—कोर्ट ने अभी ‘अपराध नहीं’ का अंतिम फैसला नहीं दिया
इस खबर में सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी यही है। ‘धार्मिक वजह से वंदे मातरम् न गाना अपराध नहींः सुप्रीम कोर्ट’ शीर्षक से यह धारणा बन सकती है कि शीर्ष अदालत ने अंतिम निर्णय देकर कानून के किसी हिस्से को रद्द या असंवैधानिक घोषित कर दिया है। ऐसा अभी नहीं हुआ है। अदालत ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणी की है और केंद्र से जवाब मांगा है। पीठ ने संकेत दिया कि वास्तविक धार्मिक विश्वास अथवा अंतरात्मा के आधार पर सम्मानपूर्वक गीत न गाने वाले व्यक्ति को दंडित नहीं किया जाना चाहिए और इस संदर्भ में 1986 का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला लागू रहेगा। लेकिन संशोधित कानून की वैधता पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है।
दूसरा महत्वपूर्ण अंतर ‘न गाने’ और ‘गायन रोकने या व्यवधान डालने’ के बीच है। किसी व्यक्ति का स्वयं शांतिपूर्वक गीत न गाना एक बात है, जबकि दूसरे लोगों को गीत गाने से जानबूझकर रोकना या गायन कर रही सभा में व्यवधान पैदा करना अलग आचरण है। 2026 के संशोधित कानून में दंडात्मक प्रावधान मुख्य रूप से जानबूझकर गायन रोकने या व्यवधान पैदा करने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की चिंता यह है कि छह छंदों के अनिवार्य गायन संबंधी निर्देश और आपराधिक कानून को साथ पढ़े जाने पर इसका इस्तेमाल स्वयं गीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ भी हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट अब इसी सीमा को स्पष्ट करेगा।
40 साल पुराना फैसला बना इस मामले की कुंजी
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने ‘बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ के 1986 के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया। उस मामले में ‘जेहोवाज़ विटनेस’ ईसाई संप्रदाय से जुड़े तीन स्कूली बच्चों ने अपनी धार्मिक मान्यता के कारण राष्ट्रगान गाने से इनकार किया था। वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे लेकिन उसे गाते नहीं थे। स्कूल से निकाले जाने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने बच्चों के पक्ष में फैसला देते हुए उनकी धार्मिक तथा अंतरात्मा की स्वतंत्रता की रक्षा की थी।
उस फैसले का मूल सिद्धांत यह था कि किसी व्यक्ति का सम्मानपूर्वक खड़े रहते हुए अपनी वास्तविक धार्मिक मान्यता के कारण राष्ट्रगान न गाना अपने आप राष्ट्रगान का अपमान नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 25 अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, हालांकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के दूसरे प्रावधानों के अधीन है। वर्तमान सुनवाई में जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत अपेक्षा करेगी कि ‘बिजोय इमैनुएल’ में घोषित कानून मौजूदा अधिनियम को समझने में भी लागू हो।
कोर्ट तय नहीं करेगा कि ‘वंदे मातरम्’ दो छंद है या छह
याचिका का एक बड़ा हिस्सा ‘वंदे मातरम्’ के छह छंदों से संबंधित है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह स्वयं यह निर्धारित करने नहीं बैठेगा कि राष्ट्रीय गीत की आधिकारिक सामग्री क्या होनी चाहिए या उसमें दो छंद होने चाहिए अथवा छह। पीठ के अनुसार लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को राष्ट्रीय प्रतीकों और उनसे जुड़े औपचारिक स्वरूप पर निर्णय लेने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि वह राष्ट्रीय भावना अथवा आकांक्षा के बारे में सरकार के निर्णय के स्थान पर अपना निर्णय नहीं रखेगी। उसकी मुख्य चिंता उस निर्णय से उत्पन्न होने वाले आपराधिक परिणामों की संवैधानिकता होगी।
इसका अर्थ है कि अदालत के सामने दो प्रश्नों को अलग-अलग देखा जा रहा है। पहला, सरकार राष्ट्रीय गीत का कौन-सा स्वरूप आधिकारिक अवसरों पर निर्धारित करती है। दूसरा, उस स्वरूप को गाने से धार्मिक अथवा अंतरात्मा के आधार पर इनकार करने वाले व्यक्ति के खिलाफ क्या राज्य आपराधिक शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। अदालत ने पहले विषय पर सरकार के अधिकार क्षेत्र को महत्व दिया है, लेकिन दूसरे को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर जांचने की बात कही है।
विवाद छह छंदों को लेकर क्यों?
टीएम कृष्णा की याचिका का तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ के अंतिम चार छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवी-परंपरा से जुड़े संदर्भ आते हैं। उनका कहना है कि ऐसे छंदों का गायन प्रत्येक नागरिक के लिए दंड के भय के साथ अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता से टकरा सकता है। याचिका संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1), 19(1)(a), 21 और 25(1) के आधार पर संशोधित व्यवस्था को चुनौती देती है। यह याचिकाकर्ता का संवैधानिक तर्क है, सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष नहीं।
याचिकाकर्ता ने ऐतिहासिक संदर्भ भी दिया है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों के गायन की व्यापक परंपरा बनी थी और 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने भी विवादों के बीच सार्वजनिक राष्ट्रीय अवसरों के लिए शुरुआती हिस्से को प्राथमिकता दी थी। दूसरी ओर केंद्र सरकार का पक्ष है कि राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय गीत से जुड़ा औपचारिक निर्णय संविधानसम्मत विधायी तथा कार्यकारी प्रक्रिया से लिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन ऐतिहासिक और धार्मिक तर्कों पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।
‘राष्ट्रीय गीत क्या हो’, अदालत इस राजनीतिक-सांस्कृतिक सवाल में नहीं जाएगी
सुनवाई में पीठ ने इस सीमा को विशेष रूप से स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि वह यह तय करने नहीं जा रही कि देश की राष्ट्रीय भावना क्या होनी चाहिए। यदि निर्वाचित सरकार कानून के जरिए राष्ट्रीय गीत की पहचान और उसके औपचारिक स्वरूप के बारे में निर्णय करती है तो अदालत का काम उस निर्णय के सांस्कृतिक मूल्यांकन में प्रवेश करना नहीं बल्कि यह देखना है कि उससे किसी मौलिक अधिकार का असंवैधानिक उल्लंघन तो नहीं हो रहा।
यह रुख महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे मामला ‘वंदे मातरम् के पक्ष या विपक्ष’ की बहस के बजाय अधिक सीमित संवैधानिक प्रश्न पर आ जाता है—क्या राज्य किसी राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान सुनिश्चित करते हुए नागरिक को अपनी अंतरात्मा के विरुद्ध बोलने या गाने के लिए आपराधिक दंड के जरिए बाध्य कर सकता है? इसी प्रश्न पर 1986 का बिजोय इमैनुएल फैसला मौजूदा मामले में केंद्रीय संदर्भ बन गया है।
अनुच्छेद 25 के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल भी
किसी व्यक्ति को कुछ कहने का अधिकार जितना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है, कुछ परिस्थितियों में किसी बात को न कहने या न दोहराने की स्वतंत्रता भी उसी संवैधानिक विमर्श का हिस्सा हो सकती है। कृष्णा की याचिका इसी आधार पर अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ अनुच्छेद 25 का भी सहारा लेती है। लेकिन कोई भी मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं है। धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है, जबकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संविधान में निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट को अंततः संतुलन यह तय करना होगा कि राष्ट्रीय गीत के सम्मान और राष्ट्रीय समारोहों की एकरूपता सुनिश्चित करने में राज्य का वैध हित कहां तक जाता है और वास्तविक धार्मिक या अंतरात्मा संबंधी आपत्ति रखने वाले नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता कहां से शुरू होती है। अदालत की प्रारंभिक टिप्पणियों से इतना जरूर स्पष्ट है कि वह सम्मानपूर्वक असहमति और जानबूझकर अपमान अथवा व्यवधान को एक ही श्रेणी में रखने के पक्ष में नहीं दिखाई देती।
सुनवाई में ‘नक्सली’ शब्द पर तीखी बहस
संवैधानिक बहस के बीच अदालत में एक असामान्य और तीखा विवाद भी हुआ। टीएम कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. एस. मुरलीधर ने तर्क दिया कि राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़ी ऐसी व्यवस्था ऊपर से थोपने के बजाय सार्वजनिक विमर्श और सहमति से विकसित होनी चाहिए। इसका जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कानून निर्माण और ‘नक्सलियों’ की सोच को लेकर टिप्पणी की। मुरलीधर ने तत्काल इस पर आपत्ति जताई और कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे कानून अधिकारी से ऐसी भाषा की अपेक्षा नहीं की जाती। उन्होंने मेहता से टिप्पणी वापस लेने को कहा, लेकिन मेहता ने अपनी बात वापस नहीं हैं।
जस्टिस बागची ने हस्तक्षेप करते हुए बहस को संवैधानिक प्रश्न पर वापस लाने का प्रयास किया। उन्होंने व्यापक सिद्धांत के रूप में कहा कि किसी व्यक्ति पर कोई राजनीतिक या गंभीर आरोप लगा देने मात्र से उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। अदालत ने अनावश्यक तनाव और भावनात्मक बहस से बचने पर जोर दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा कि विचार करना अपने आप किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं बनाता।
‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं रही
‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ दोनों का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और स्वतंत्र भारत के सार्वजनिक जीवन में विशिष्ट स्थान है, लेकिन दोनों की ऐतिहासिक और कानूनी यात्रा समान नहीं रही। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को कहा था कि ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को समान सम्मान दिया जाएगा। इसके बाद दशकों तक ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान मिलता रहा, जबकि ‘Prevention of Insults to National Honour Act, 1971’ में मूल दंडात्मक संरक्षण मुख्यतः राष्ट्रगान सहित निर्धारित राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़ा था।
2026 के संशोधन ने ‘National Song’ को भी संबंधित दंडात्मक व्यवस्था में शामिल कर इस कानूनी स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव किया। अब विवाद इस बात पर है कि कानूनी संरक्षण का अर्थ क्या केवल जानबूझकर अपमान और व्यवधान रोकना है या इसका प्रभाव नागरिक को गायन में भाग लेने के लिए बाध्य करने तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि बिजोय इमैनुएल फैसला चार दशक बाद एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है।
सम्मान और अनिवार्य गायन—दो अलग कानूनी प्रश्न
इस मामले को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी यही है कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना और उसे स्वयं गाना कानूनी रूप से अनिवार्य होना दो अलग प्रश्न हैं। कोई व्यक्ति शांतिपूर्वक खड़ा रहकर गीत का सम्मान कर सकता है लेकिन धार्मिक या अंतरात्मा संबंधी कारण से उसे न गाए—1986 के राष्ट्रगान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर को मौलिक अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना था। दूसरी तरफ कोई व्यक्ति जानबूझकर गायन रोकता है, सभा में बाधा डालता है या दूसरे लोगों को गीत गाने से रोकता है तो उसकी कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।
इसलिए मंगलवार की सुनवाई का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘वंदे मातरम् न गाने की खुली छूट’ दे दी है और न यह कि उसने छह छंदों संबंधी केंद्र की व्यवस्था रद्द कर दी है। अदालत ने अभी केंद्र से जवाब मांगा है और संवैधानिक जांच जारी है। लेकिन उसने एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक रेखा जरूर खींच दी है—वास्तविक धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के आधार पर सम्मानपूर्वक स्वयं गीत न गाने वाले नागरिक और राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें व्यवधान डालने वाले व्यक्ति को एक ही कानूनी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अब अंतिम फैसला तय करेगा कि 2026 के संशोधित कानून और छह छंदों संबंधी सरकारी निर्देशों को इस संवैधानिक सीमा के भीतर किस तरह पढ़ा और लागू किया जाएगा।


