West Bengal CM History: बंगाल में किस मुख्यमंत्री की रही साफ छवि, किसके दौर में बढ़े दंगे-अपराध ?

West Bengal CM Political History: आज बंगाल की राजनीति सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह हिंसा, घोटाले, सांप्रदायिक तनाव, बेरोजगारी और राजनीतिक टकराव का बड़ा केंद्र बन चुकी है।

Jyotsana Singh
Published on: 9 May 2026 2:15 PM IST
West Bengal CM Whose Clean Image
X

West Bengal CM Whose Clean Image (AI Image)

West Bengal CM Political History: रवींद्रनाथ टैगोर का साहित्य, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का साहस, सत्यजीत रे की कला और हुगली किनारे बसती बौद्धिक संस्कृति… पश्चिम बंगाल केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। लेकिन इसी बंगाल ने राजनीतिक हिंसा, कैडर राज, नक्सलवाद, घोटालों और सत्ता संघर्ष के सबसे कड़वे दौर भी देखे हैं। आजादी के बाद जब लाखों शरणार्थी टूटी उम्मीदों के साथ बंगाल पहुंचे, तब इस राज्य को संभालने के लिए ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी जो केवल सरकार न चलाए, बल्कि एक नया भविष्य गढ़े। इस राज्य की सत्ता की बागडोर संभालते हुए डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने विकास की नींव रखी, ज्योति बसु ने वामपंथ को गांव-गांव तक पहुंचाया, ममता बनर्जी ने 34 साल पुरानी सत्ता को उखाड़कर ‘परिवर्तन’ का बिगुल फूंका लेकिन 2026 में बंगाल ने इतिहास बदलते हुए भाजपा को सत्ता सौंप दी। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से देश की सबसे चर्चित और उथल-पुथल भरी राजनीति मानी जाती रही है।

आज बंगाल की राजनीति सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह हिंसा, घोटाले, सांप्रदायिक तनाव, बेरोजगारी और राजनीतिक टकराव का बड़ा केंद्र बन चुकी है।

आजादी के बाद बंगाल की राजनीति का सफर (West Bengal Ka Rajnitik Itihas Kya Hai)

1947 में देश आजाद हुआ और बंगाल दो हिस्सों में बंट गया। पूर्वी बंगाल पाकिस्तान चला गया, जबकि पश्चिमी हिस्सा भारत का राज्य बना। विभाजन के बाद बंगाल को शरणार्थी संकट, आर्थिक अस्थिरता और राजनीतिक अशांति जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का दबदबा रहा, लेकिन धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा ने यहां अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। 1977 में वाम मोर्चे की सरकार बनने के बाद बंगाल की राजनीति पूरी तरह बदल गई। करीब 34 साल तक वाम दलों ने यहां शासन किया, जो भारतीय राजनीति का सबसे लंबा निर्वाचित वाम शासन माना जाता है।


2011 में ममता बनर्जी ने वाम किले को ढहा दिया और तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। इसके बाद से बंगाल की राजनीति में भाजपा बनाम टीएमसी की सीधी लड़ाई देखने को मिल रही है। इस लंबे राजनीतिक सफर में कई मुख्यमंत्री आए। कुछ ने विकास की मजबूत नींव रखी, कुछ ने वैचारिक राजनीति को आगे बढ़ाया, जबकि कुछ के कार्यकाल हिंसा और विवादों के कारण चर्चा में रहे। कानून-व्यवस्था किसके दौर में मजबूत रही, किस मुख्यमंत्री की छवि बेदाग रही और किसके शासन पर सबसे ज्यादा सवाल उठे यह समझना बंगाल की राजनीति को समझने जैसा है-

डॉ. बिधान चंद्र रॉय (1948-1962) (West Bengal Second CM Bidhan Chandra Roy)



आजादी और देश विभाजन के बाद पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में था। लाखों शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से बंगाल आए थे। रोजगार, आवास और खाद्यान्न की भारी समस्या थी। ऐसे कठिन समय में डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने राज्य की कमान संभाली। 1948 से 1962 तक करीब 14 साल मुख्यमंत्री रहने वाले डॉ. रॉय को आधुनिक पश्चिम बंगाल का निर्माता माना जाता है। उन्होंने केवल प्रशासन नहीं संभाला, बल्कि बंगाल के भविष्य की नींव रखी। दुर्गापुर को औद्योगिक शहर के रूप में विकसित किया गया। सॉल्ट लेक जैसी योजनाबद्ध टाउनशिप की शुरुआत हुई। कल्याणी शहर बसाया गया। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े सुधार किए गए। उनकी सरकार ने शरणार्थियों के पुनर्वास पर भी तेजी से काम किया। उस दौर में प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत माना जाता था। राजनीतिक हिंसा सीमित थी और सरकार संस्थागत तरीके से चलती दिखती थी। सबसे बड़ी बात यह रही कि डॉ. रॉय की व्यक्तिगत ईमानदारी पर कभी गंभीर सवाल नहीं उठे। विपक्ष भी उनके प्रशासनिक कौशल और विजन की तारीफ करता था। इसलिए उन्हें बंगाल का सबसे बेहतरीन और बेदाग मुख्यमंत्री माना जाता है।

प्रफुल्ल चंद्र सेन (1962-1967) (West Bengal 3rd CM Prafulla Chandra Sen)

डॉ. बी.सी. रॉय के निधन के बाद प्रफुल्ल चंद्र सेन मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल लगभग 5 साल चला, लेकिन यह समय आर्थिक संकट और राजनीतिक असंतोष से भरा रहा। राज्य में खाद्यान्न संकट गहराने लगा। महंगाई बढ़ रही थी और बेरोजगारी भी बड़ी समस्या बन चुकी थी।


जनता में कांग्रेस सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ने लगी। इसी दौरान वामपंथी दलों ने मजदूरों और किसानों के मुद्दों को लेकर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी। कानून-व्यवस्था पर दबाव बढ़ने लगा था। छात्र आंदोलनों और सड़क पर संघर्ष की राजनीति तेज हो रही थी। कांग्रेस की पकड़ कमजोर पड़ रही थी और बंगाल धीरे-धीरे राजनीतिक उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा था।

अजय मुखर्जी (1967-1970 और 1971) (West Bengal 4th CM Ajoy Kumar Mukherjee)

1967 में बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ। कांग्रेस पहली बार सत्ता से बाहर हुई और संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनका कार्यकाल स्थिर नहीं रहा।


1967 से 1970 और फिर 1971 में मिलाकर उनका कुल कार्यकाल लगभग 3 साल का रहा। इस दौरान सरकारें लगातार गिरती रहीं। राजनीतिक अस्थिरता इतनी बढ़ गई कि प्रशासन कमजोर पड़ने लगा। इसी दौर में नक्सल आंदोलन तेजी से उभरा। युवाओं और छात्रों का एक बड़ा वर्ग उग्र वामपंथ की ओर आकर्षित होने लगा। कोलकाता और दूसरे इलाकों में हिंसा बढ़ने लगी। पुलिस और उग्रवादियों के बीच लगातार टकराव होते रहे। यह दौर बंगाल की राजनीति में अराजकता और हिंसा के शुरुआती बड़े चरण के रूप में देखा जाता है।

सिद्धार्थ शंकर रे (1972-1977) (West Bengal 5th CM Siddhartha Shankar Ray)

1972 में कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल करीब 5 साल चला और इसे बंगाल के सबसे विवादित राजनीतिक दौरों में गिना जाता है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नक्सल हिंसा को रोकने की थी। रे ने बेहद सख्त रवैया अपनाया।


पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को खुली कार्रवाई की छूट दी गई। सरकार का दावा था कि राज्य में कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए यह जरूरी था। लेकिन विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों ने इसे दमनकारी शासन बताया। पुलिस एनकाउंटर, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी और राजनीतिक हिंसा के आरोप लगातार लगते रहे। कई विश्लेषकों का मानना है कि इसी दौर में बंगाल की राजनीति में संस्थागत हिंसा की संस्कृति गहराई। हालांकि रे को एक मजबूत प्रशासक माना जाता है, लेकिन उनका शासन लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और राजनीतिक दमन के आरोपों के कारण आज भी विवादों में याद किया जाता है।

ज्योति बसु (1977-2000) (West Bengal 6th CM Jyoti Basu)

1977 में वाम मोर्चा सरकार सत्ता में आई और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीतिक दिशा बदलने वाला ऐतिहासिक मोड़ था। ज्योति बसु करीब 23 साल तक मुख्यमंत्री रहे, जो पश्चिम बंगाल के इतिहास का सबसे लंबा कार्यकाल है।


शुरुआती वर्षों में उनकी सरकार ने भूमि सुधार और पंचायत व्यवस्था पर जोर दिया। ऑपरेशन बर्गा योजना के जरिए किसानों को जमीन पर अधिकार दिलाने की कोशिश हुई। ग्रामीण इलाकों में वाम मोर्चा बेहद मजबूत हो गया। लेकिन समय के साथ वाम शासन पर कई आरोप लगने लगे। ट्रेड यूनियन राजनीति इतनी मजबूत हो गई कि उद्योगपति बंगाल छोड़ने लगे। लगातार हड़तालों और मजदूर आंदोलनों ने राज्य की औद्योगिक छवि को नुकसान पहुंचाया। कोलकाता, जो कभी देश का औद्योगिक केंद्र माना जाता था, आर्थिक रूप से कमजोर पड़ने लगा। विपक्ष ने वाम सरकार पर 'कैडर राज' का आरोप लगाया। पंचायतों और गांवों में पार्टी कार्यकर्ताओं का प्रभाव इतना मजबूत हो गया कि प्रशासनिक संस्थाएं भी उनके दबाव में दिखने लगीं। हालांकि ज्योति बसु की व्यक्तिगत छवि ईमानदार और सादगीपूर्ण रही, लेकिन उनके लंबे शासनकाल में राजनीतिक हिंसा और औद्योगिक पतन बड़े मुद्दे बन गए।

बुद्धदेव भट्टाचार्य (2000-2011) (West Bengal 7th CM Buddhadeb Bhattacharjee)

2000 में बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने। वे वाम सरकार का आधुनिक चेहरा माने गए। उनका कार्यकाल लगभग 11 साल चला।

उन्होंने महसूस किया कि केवल वामपंथी राजनीति के सहारे बंगाल आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए उन्होंने आईटी सेक्टर, निवेश और उद्योगों को बढ़ावा देने की कोशिश शुरू की। कोलकाता में नई कंपनियों के आने की शुरुआत हुई।


शहरी मध्यम वर्ग और युवाओं में उनकी अच्छी छवि बनी। लेकिन यही दौर वामपंथ के पतन की शुरुआत भी बना। सिंगूर में टाटा नैनो परियोजना और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ भारी आंदोलन हुए। किसानों ने सरकार पर जमीन छीनने का आरोप लगाया। नंदीग्राम हिंसा में हुई मौतों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। लोगों को लगने लगा कि वाम सरकार अब गरीबों की नहीं, बल्कि उद्योगपतियों की राजनीति कर रही है। यही असंतोष आगे चलकर 2011 में वाम शासन के अंत का कारण बना।

ममता बनर्जी (2011-2026) (West Bengal 8th CM Mamata Banerjee)

2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल पुरानी वाम सरकार को हराकर इतिहास रच दिया। उनका कार्यकाल करीब 15 साल चला।


उन्होंने खुद को गरीबों, महिलाओं और आम लोगों की नेता के रूप में पेश किया। कन्याश्री, रूपश्री और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं और गरीब परिवारों के बीच उनकी पकड़ मजबूत कर दी। शुरुआत में लोगों को लगा कि बंगाल अब कैडर राजनीति और हिंसा से बाहर निकलेगा। लेकिन समय के साथ उनकी सरकार पर भी वही आरोप लगने लगे जो कभी वाम शासन पर लगते थे।

सिंडिकेट राज, चुनावी हिंसा और राजनीतिक टकराव

ममता सरकार पर सबसे बड़ा आरोप 'सिंडिकेट राज' का लगा। विपक्ष का कहना था कि स्थानीय स्तर पर तृणमूल समर्थित समूहों का दबदबा बढ़ गया है। पंचायत चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों तक हिंसा की खबरें लगातार आती रहीं। भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों ने आरोप लगाया कि विपक्षी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है।

हालांकि तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताती रही, लेकिन राज्य की कानून-व्यवस्था लगातार चर्चा में रही।

संदेशखाली और महिला सुरक्षा का बड़ा मुद्दा

संदेशखाली विवाद ने ममता सरकार को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। महिलाओं के उत्पीड़न और स्थानीय नेताओं पर लगे गंभीर आरोपों ने पूरे राज्य में राजनीतिक माहौल बदल दिया। भाजपा ने इसे महिला सुरक्षा का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। जनता के बीच यह संदेश गया कि राज्य सरकार कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण खो रही है।

शारदा, नारदा और SSC घोटाला

ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि आज भी सादगीपूर्ण मानी जाती है। लेकिन उनकी सरकार कई बड़े घोटालों में फंस गई।

शारदा चिटफंड घोटाले में हजारों लोगों की जमा पूंजी डूब गई। नारदा स्टिंग ऑपरेशन में नेताओं पर रिश्वत लेने के आरोप लगे।

सबसे ज्यादा असर शिक्षक भर्ती घोटाले यानी SSC Scam ने डाला। नौकरी के बदले पैसे लेने के आरोपों ने बंगाल की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।

2026 भाजपा का उदय और बंगाल में नया राजनीतिक अध्याय

शुभेंदु अधिकारी (West Bengal 9th CM Suvendu Adhikari)

2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 200 से ज्यादा सीटें जीतकर बंगाल की राजनीति में नया इतिहास रच दिया। 15 साल बाद ममता सरकार सत्ता से बाहर हो गई। भाजपा की जीत के पीछे महिला सुरक्षा, संदेशखाली, भ्रष्टाचार और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बड़े कारण माने गए। जनता बदलाव चाहती थी और भाजपा ने 'सोनार बांग्ला' का नारा दिया।


'सोनार बांग्ला' का मतलब केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि ऐसा बंगाल बनाने का दावा था जहां कानून-व्यवस्था मजबूत हो, राजनीतिक हिंसा कम हो, उद्योग वापस आएं और युवाओं को रोजगार मिले। भाजपा ने अपने अभियान में आरोप लगाया कि लंबे समय से बंगाल की राजनीति कैडर राज, भ्रष्टाचार और चुनावी हिंसा में फंसी रही है। पार्टी ने कहा कि राज्य को फिर से उस दौर में ले जाने की जरूरत है जब बंगाल शिक्षा, उद्योग, संस्कृति और व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था। अब इस नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है... राजनीतिक हिंसा रोकना, निवेश बढ़ाना और कानून-व्यवस्था को मजबूत करना।

आखिर कौन रहा सबसे बेहतरीन और कौन सबसे विवादित?

अगर विकास, प्रशासन और ईमानदारी के आधार पर देखा जाए तो डॉ. बिधान चंद्र रॉय को पश्चिम बंगाल का सबसे बेहतरीन मुख्यमंत्री माना जाता है।

ज्योति बसु ने लंबे समय तक स्थिर सरकार चलाई, लेकिन उनके दौर में उद्योगों का पतन और कैडर राजनीति बड़ी समस्या बनी।

सिद्धार्थ शंकर रे का दौर राजनीतिक हिंसा और दमन के आरोपों के कारण सबसे विवादित माना जाता है। ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि सादगीपूर्ण रही, लेकिन उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज और चुनावी हिंसा के आरोप लगातार लगते रहे। पश्चिम बंगाल की राजनीति लगातार बदलावों से गुजरती रही है। कांग्रेस ने राज्य को शुरुआती स्थिरता दी, वामपंथ ने ग्रामीण राजनीति को मजबूत किया, ममता बनर्जी ने वाम किले को तोड़ा और भाजपा ने 2026 में नया राजनीतिक अध्याय शुरू किया। लेकिन एक बात हर दौर में समान रही, बंगाल की जनता हमेशा बदलाव चाहती रही है। अब जनता केवल विचारधारा नहीं, बल्कि बेहतर कानून-व्यवस्था, रोजगार, महिला सुरक्षा और विकास चाहती है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी।

Admin 2

Admin 2

Next Story