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बंगाल चुनाव में 40% विजेताओं को अपने क्षेत्र में आधे से कम वोट मिले, एडीआर ने प्रतिनिधित्व पर उठाये
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर एडीआर की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 40 प्रतिशत विजेता उम्मीदवार 50% से कम वोट शेयर पर जीते।
West Bengal Election 2026 (Image Credit-Social Media)
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों पर आई एक नई रिपोर्ट ने चुनावी प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक वैधता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव सुधार संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और वेस्ट बंगाल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 40 प्रतिशत विजेता उम्मीदवार अपने निर्वाचन क्षेत्र में कुल पड़े वोटों के आधे से भी कम वोट हासिल कर जीत गए।
एडीआर ने इन विधानसभा चुनाव में राज्य की 294 में से 293 सीटों का विश्लेषण किया है। फलता सीट का डेटा उपलब्ध न होने के कारण उसे अध्ययन में शामिल नहीं किया गया।
औसतन 50.43% वोट शेयर के साथ जीते उम्मीदवार
एडीआर के अनुसार, पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में विजेता उम्मीदवारों को औसतन 50.43 प्रतिशत वोट मिले। 2021 में यह औसत 50.16 प्रतिशत था। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि 118 विधायक ऐसे हैं जिन्हें अपने क्षेत्र में 50 प्रतिशत से कम वोट मिले, यानी बहुसंख्यक मतदाता उनके साथ नहीं थे।
रिपोर्ट के अनुसार, 175 विजेताओं (60%) को 50% या उससे अधिक वोट मिले। जबकि 118 विजेताओं (40%) को 50% से कम वोट मिले।
एडीआर ने उठाया बड़ा सवाल
रिपोर्ट में चुनावी प्रतिनिधित्व की अवधारणा पर विशेष जोर दिया गया है। इसमें यह देखा गया कि विजेता उम्मीदवार अपने क्षेत्र के कुल पंजीकृत मतदाताओं में से कितने लोगों का वास्तविक प्रतिनिधित्व करते हैं।
एडीआर के मुताबिक, 2026 में विजेता उम्मीदवार औसतन केवल 47.20 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि यह आंकड़ा 2021 के 41.29 प्रतिशत से बेहतर है, फिर भी इसका अर्थ यह है कि आधे से अधिक मतदाता विजेता के पक्ष में नहीं थे।
रिपोर्ट बताती है कि कई सीटों पर मुकाबला बेहद कांटे का रहा। 5 उम्मीदवार 1000 से कम वोटों के अंतर से जीते। वहीं 3 उम्मीदवारों ने 40 प्रतिशत से अधिक के भारी अंतर से जीत दर्ज की।
कुछ सीटों पर बड़े अंतर की जीत ने राजनीतिक संदेश भी दिया। मिसाल के लिए, शंकर घोष ने सिलीगुड़ी सीट पर 40% मार्जिन से जीत हासिल की। पारितोष दास ने अलीपुरद्वार में 30% मार्जिन से जीत दर्ज की। अब्दुल खलीक मुल्ला ने मेटियाब्रुज सीट पर 49% के बड़े अंतर से जीत हासिल की।
आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की मजबूत पकड़
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की सफलता को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक, 191 विजेता उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए थे। इनमें से 121 उम्मीदवारों ने 50% से अधिक वोट शेयर के साथ जीत हासिल की। 107 ऐसे उम्मीदवार थे जिन्होंने साफ छवि वाले प्रतिद्वंद्वियों को हराया।
यह संकेत देता है कि मतदाता कई क्षेत्रों में आपराधिक छवि के बावजूद उम्मीदवारों को समर्थन दे रहे हैं।
करोड़पति उम्मीदवारों का दबदबा कायम
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव जीतने वाले 179 उम्मीदवार करोड़पति हैं। इनमें से 104 उम्मीदवारों ने 50 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर हासिल किया।
हालांकि गैर-करोड़पति उम्मीदवारों ने भी कई जगह मजबूत प्रदर्शन किया। 114 गैर-करोड़पति विजेताओं में से 70 ने 50% से अधिक वोट शेयर हासिल किया। 63 गैर-करोड़पति उम्मीदवारों ने करोड़पति प्रतिद्वंद्वियों को हराया।
महिला उम्मीदवारों का बढ़िया प्रदर्शन
293 विजेताओं में 37 महिलाएं हैं और सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों में 35% से अधिक वोट शेयर हासिल किया।इनमें शिखा चटर्जी का प्रदर्शन सबसे उल्लेखनीय रहा। उन्होंने 66% वोट शेयर के साथ जीत दर्ज की और 39% के बड़े अंतर से चुनाव जीता।
नोटा को भी मिले लाखों वोट
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल चुनाव में कुल 6.37 करोड़ वोट पड़े, जिनमें से 4.94 लाख मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना। यह कुल वोटों का 0.78 प्रतिशत है।
एडीआर की यह रिपोर्ट सिर्फ चुनावी आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बदलते स्वरूप का संकेत भी है। एक ओर भारी मतदान प्रतिशत और बड़े जनादेश की तस्वीर है, तो दूसरी ओर ऐसे सवाल भी हैं कि क्या सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार वास्तव में बहुसंख्यक जनता का प्रतिनिधि माना जा सकता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में यह स्थिति आम है, लेकिन जब बड़ी संख्या में विधायक आधे से कम वोटों पर जीतते हैं, तो चुनावी सुधार और वैकल्पिक प्रणालियों पर बहस तेज हो सकती है।


