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History of Impeachment: महाभियोग क्या है? भारत में राष्ट्रपति और जज को कैसे हटाया जाता है
History of Impeachment: महाभियोग क्या होता है और इसकी शुरुआत कब हुई? जानिए 1376 के इंग्लैंड से लेकर भारत के संविधान तक महाभियोग का इतिहास, राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की पूरी प्रक्रिया।
History of Impeachment: लोकतंत्र में जनता सरकार चुनती है, संसद कानून बनाती है, कोर्ट उनकी व्याख्या करता है। पर अगर सबसे ऊँचे पद पर बैठा आदमी ही संविधान तोड़ने लगे, तो उसे कौन रोकेगा? क्या राष्ट्रपति को हटाया जा सकता है? क्या संसद सुप्रीम कोर्ट के जज को हटा सकती है?
इसी सवाल का जवाब है महाभियोग (अंग्रेज़ी में इम्पीचमेंट - impeachment)। भारत में इसे लेकर एक बड़ी गलतफहमी है। संविधान में 'महाभियोग' शब्द तकनीकी तौर पर सिर्फ राष्ट्रपति के लिए है। जजों को हटाने की प्रक्रिया अलग है, पर आम बोलचाल में उसे भी महाभियोग कह दिया जाता है। प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल और बाकी पदों के लिए तो बिल्कुल अलग-अलग नियम हैं।
महाभियोग असल में है क्या?
यह कोई आम क्रिमिनल केस नहीं है। पुलिस FIR नहीं लिखती, कोर्ट सज़ा नहीं सुनाता। यहाँ संसद आरोप सुनती है, जाँच होती है और संविधान में तय बहुमत से फैसला होता है।
महाभियोग का उद्देश्य हर छोटी गलती के लिए किसी पदाधिकारी को दंडित करना नहीं है। इसका मूल विचार है कि अत्यंत शक्तिशाली पद पर बैठा व्यक्ति भी संविधान तथा सार्वजनिक जवाबदेही से ऊपर नहीं होना चाहिए। अमेरिकी सीनेट इस प्रक्रिया को सरकारी अधिकारियों के आचरण की संवैधानिक जाँच मानती है। इंग्लैंड की संसद के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार यह प्रक्रिया विशेष रूप से ऐसे प्रभावशाली अधिकारियों के विरुद्ध विकसित हुई थी जिनके आचरण पर सामान्य सत्ता संरचना में प्रभावी कार्रवाई करना कठिन था। हालाँकि हर देश में महाभियोग के आरोप, प्रक्रिया और परिणाम समान नहीं हैं। भारत में राष्ट्रपति का महाभियोग और अमेरिका में राष्ट्रपति का महाभियोग अलग संवैधानिक व्यवस्थाएँ हैं।
'इम्पीचमेंट' शब्द कहाँ से आया
अंग्रेजी शब्द 'इम्पीचमेंट' का इतिहास मध्यकालीन अंग्रेजी और फ्रांसीसी शब्द-परंपराओं से संबंधित है। यह शब्द किसी व्यक्ति पर आरोप लगाने या उसके आचरण को औपचारिक चुनौती देने की अवधारणा से विकसित हुआ।
भारतीय संविधान में इसके लिए 'महाभियोग' शब्द अपनाया गया। 'महा' अर्थात बड़ा या विशेष और 'अभियोग' अर्थात आरोप। हालाँकि महाभियोग का अर्थ केवल बहुत बड़ा आरोप नहीं है। आधुनिक संवैधानिक संदर्भ में यह एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया है।
उदाहरण के लिए यदि हजारों लोग किसी नेता के विरुद्ध प्रदर्शन करते हुए 'जन महाभियोग' आयोजित करते हैं, तो वह राजनीतिक या प्रतीकात्मक कार्रवाई हो सकती है। उससे संविधान के अंतर्गत औपचारिक महाभियोग स्वतः शुरू नहीं हो जाता।
इसी प्रकार किसी राजनीतिक दल के नेता का यह कहना कि वह किसी पदाधिकारी के विरुद्ध महाभियोग लाएगा, वास्तविक संवैधानिक प्रस्ताव प्रस्तुत हो जाने के बराबर नहीं है। औपचारिक महाभियोग के लिए संविधान और कानून में निर्धारित पात्रता, प्रस्ताव, बहुमत तथा जाँच की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
महाभियोग की परंपरा पहली बार कब शुरू हुई?
आधुनिक संसदीय महाभियोग का सबसे पुराना दर्ज उदाहरण 1376 में इंग्लैंड की संसद से मिलता है। उस समय इंग्लैंड में राजा एडवर्ड तृतीय का शासन था। संसद का वह अधिवेशन इतिहास में 'गुड पार्लियामेंट' अर्थात अच्छी संसद के नाम से जाना जाता है। इस दौरान हाउस ऑफ कॉमन्स ने राजा के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों और उनसे जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार तथा सत्ता के दुरुपयोग से संबंधित आरोप उठाए।
आरोपों को उच्च सदन अर्थात हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सामने प्रस्तुत किया गया।
यही व्यवस्था आगे चलकर महाभियोग की पहचान बनी।निचला सदन आरोप प्रस्तुत करे और उच्च सदन उनकी जाँच तथा निर्णय में भूमिका निभाए। ब्रिटिश संसद की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार पहला दर्ज महाभियोग 1376 में हुआ था। इस ऐतिहासिक घटना का विशेष महत्त्व है। उस समय इंग्लैंड आज जैसा लोकतंत्र नहीं था। राजा की शक्ति अत्यंत व्यापक थी। संसद स्वयं राजसत्ता के साथ अधिकारों के संघर्ष से गुजर रही थी। ऐसे समय में राजा के निकटवर्ती अधिकारियों को संसद के सामने जवाबदेह बनाने की कोशिश एक असाधारण राजनीतिक विकास था।
आखिर राजा के बजाय उसके मंत्रियों पर महाभियोग क्यों चलाया गया?
मध्यकालीन इंग्लैंड में राजा की स्थिति सामान्य अधिकारियों से अलग थी। राजसत्ता की वैधता और राजा की व्यक्तिगत जवाबदेही को लेकर उस समय की राजनीतिक मान्यताएँ आज के लोकतांत्रिक सिद्धांतों से भिन्न थीं। संसद के लिए सीधे राजा को चुनौती देना अत्यंत कठिन था। लेकिन उसके मंत्रियों, सलाहकारों और प्रभावशाली अधिकारियों के आचरण पर प्रश्न उठाकर संसद राजकीय शक्ति को सीमित करने की कोशिश कर सकती थी।
महाभियोग इसी संघर्ष का एक साधन बना। संसद यह संदेश देना चाहती थी कि राजा की सेवा करने वाला कोई अधिकारी केवल राजकीय संरक्षण के कारण जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता। इस तरह महाभियोग की शुरुआती परंपरा का उद्देश्य निर्वाचित राष्ट्रपति को हटाना नहीं था, क्योंकि उस समय आधुनिक राष्ट्रपति पद की अवधारणा ही मौजूद नहीं थी। उसका उद्देश्य शाही सत्ता से जुड़े प्रभावशाली अधिकारियों की जवाबदेही स्थापित करना था। यह ऐतिहासिक अंतर इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और भारत में महाभियोग की आधुनिक व्यवस्था बाद में विकसित हुई।
क्या 1376 के बाद महाभियोग लगातार चलता रहा?
इंग्लैंड में महाभियोग का इतिहास निरंतर और एक जैसा नहीं रहा। 1376 के बाद चौदहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में इसका प्रयोग हुआ। वर्ष 1386 की 'वंडरफुल पार्लियामेंट' में राजा रिचर्ड द्वितीय के लॉर्ड चांसलर माइकल डी ला पोल के विरुद्ध महाभियोग की कार्रवाई हुई। इसके बाद के काल में इस प्रक्रिया का प्रयोग घट गया।
सत्रहवीं शताब्दी में जब राजसत्ता और संसद के बीच संघर्ष तेज हुआ, तब महाभियोग फिर महत्त्वपूर्ण हुआ। संसद ने प्रभावशाली राजकीय अधिकारियों पर जवाबदेही लागू करने के लिए इस प्रक्रिया का सहारा लिया। अंग्रेजी राजसत्ता, संसद और न्यायिक अधिकारों के बीच संघर्ष ने आधुनिक संवैधानिक शासन की अनेक अवधारणाओं को जन्म दिया।
समय के साथ ब्रिटेन में मंत्रियों की संसदीय जवाबदेही, अविश्वास प्रस्ताव और आधुनिक न्यायिक प्रक्रियाएँ विकसित हुईं। इनके बाद महाभियोग की उपयोगिता घटती गई। ब्रिटिश संसद के अनुसार वहाँ अंतिम महाभियोग 1806 में हुआ था। आज यह प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से अप्रचलित मानी जाती है। इस प्रकार जिस देश में महाभियोग की परंपरा शुरू हुई, उसी देश में आधुनिक संसदीय संस्थाओं ने उसकी जगह जवाबदेही के दूसरे साधन विकसित कर दिए।
भारत से जुड़ा एक अंग्रेजी महाभियोग : वॉरेन हेस्टिंग्स पर सात साल तक क्यों चला मुकदमा?
भारत का संबंध अमेरिकी संविधान बनने से पहले ही महाभियोग के इतिहास से जुड़ चुका था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी वॉरेन हेस्टिंग्स वर्ष 1773 से 1785 तक बंगाल के गवर्नर जनरल रहे। उनके शासन और कंपनी की नीतियों को लेकर ब्रिटेन में गंभीर विवाद पैदा हुए।
ब्रिटिश राजनेता एडमंड बर्क ने हेस्टिंग्स के विरुद्ध अभियान चलाया। आरोपों में भारत में शासन संबंधी दुरुपयोग, भ्रष्टाचार और अन्य गंभीर अनियमितताएँ शामिल थीं। वर्ष 1787 में हाउस ऑफ कॉमन्स ने हेस्टिंग्स पर महाभियोग चलाने का निर्णय लिया। फरवरी 1788 में वेस्टमिंस्टर हॉल में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। यह सुनवाई कई वर्षों तक चली और अप्रैल 1795 में हेस्टिंग्स सभी आरोपों से बरी कर दिए गए।
ब्रिटिश संसद के इतिहास में यह सबसे लंबे महाभियोग मुकदमों में से एक था। विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण यह था कि ब्रिटेन की संसद के सामने भारत में किए गए औपनिवेशिक शासन के कार्यों की जवाबदेही का प्रश्न उठ रहा था। इस घटना में एक ऐतिहासिक विरोधाभास था। भारत के लोगों को ब्रिटिश संसद में समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं था, लेकिन उनके ऊपर शासन करने वाले कंपनी अधिकारी के आचरण पर ब्रिटिश संसद में मुकदमा चल रहा था। इस मुकदमे ने महाभियोग के उस व्यापक सिद्धांत को चर्चित किया कि सार्वजनिक अधिकारों का उपयोग करने वाला अधिकारी अपने पद से बाहर आने के बाद भी अपने आचरण के बारे में जवाबदेह हो सकता है।
विडंबना देखिए: जिन भारतीयों पर वे राज करते थे, उनका ब्रिटिश संसद में कोई प्रतिनिधि नहीं था, फिर भी उन्हीं के नाम पर वहाँ मुकदमा चल रहा था।
अमेरिका ने इसे क्यों अपनाया?
1787 में अमेरिकी संविधान बनाने वाले दो डर के बीच फँसे थे। उन्हें ब्रिटिश राजा जैसा बेलगाम राष्ट्रपति नहीं चाहिए था, पर इतना कमज़ोर भी नहीं कि संकट में फैसला न ले सके। तो सवाल था कि अगर राष्ट्रपति सत्ता का गंभीर दुरुपयोग करे तो हटाया कैसे जाए? हर बार अगले चुनाव का इंतज़ार काफी नहीं था, और संसद को मामूली राजनीतिक नाराज़गी पर हटाने का हक देना भी खतरनाक था।
इसीलिए बीच का रास्ता निकला: आरोप लगाने का काम प्रतिनिधि सभा (हाउस) का है, साधारण बहुमत से।सुनवाई और फैसला सीनेट में होता है, जिसकी अध्यक्षता राष्ट्रपति के मामले में चीफ जस्टिस करते हैं। पद से हटाने के लिए सीनेट में कम से कम दो-तिहाई मत चाहिए। यानी महाभियोग लग जाना और पद से हट जाना एक बात नहीं है।
अब तक तीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों पर महाभियोग लगा, और सब बच निकले:
एंड्रयू जॉनसन (1868): सिर्फ एक वोट से बचे।
बिल क्लिंटन (1998-99): शपथ के तहत दिए बयान और न्याय में बाधा के आरोप, सीनेट ने बरी किया।
डोनाल्ड ट्रंप (2019 और 2021): दो बार महाभियोग झेलने वाले पहले राष्ट्रपति। 2021 में 6 जनवरी के कैपिटल हमले के मामले में सीनेट में 57 वोट दोषी ठहराने के पक्ष में पड़े और 43 विरोध में, पर दो-तिहाई नहीं जुटा।
आज तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को महाभियोग से हटाया नहीं गया। (रिचर्ड निक्सन ने इस्तीफा तब दिया जब हटना लगभग तय था।) हाँ, आठ संघीय जज इस रास्ते से ज़रूर हटाए जा चुके हैं।
भारत में राष्ट्रपति पर महाभियोग कैसे चलेगा?
यह अनुच्छेद 61 में है, और इसका एकमात्र आधार है "संविधान का उल्लंघन"। सिर्फ यह कि कोई दल राष्ट्रपति के फैसले से नाराज़ है, काफी नहीं। संविधान में उल्लंघन की कोई सूची भी नहीं दी गई, इसलिए मामला-दर-मामला देखा जाएगा।
कदम-दर-कदम प्रक्रिया:
1. प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा, किसी में भी शुरू हो सकता है।
2. उस सदन के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों को लिखित नोटिस पर दस्तखत करने होते हैं।
3. नोटिस के बाद कम से कम 14 दिन रुकना पड़ता है।
4. सदन की कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई वोट से प्रस्ताव पास होना चाहिए।
5. फिर दूसरा सदन आरोपों की जाँच करता है या करवाता है। इसमें राष्ट्रपति खुद हाज़िर होकर या अपने प्रतिनिधि के ज़रिए अपना पक्ष रख सकते हैं।
6. दूसरा सदन भी कुल सदस्य-संख्या के दो-तिहाई बहुमत से आरोप सही ठहराए, तो राष्ट्रपति पद से हट जाते हैं।
दो-तिहाई का हिसाब: मान लीजिए सदन में कुल 240 सदस्य हैं। तब 160 वोट चाहिए। भले ही वोटिंग के दिन सिर्फ 180 लोग आएँ, ज़रूरत 120 की नहीं हो जाती। गिनती हमेशा कुल सदस्यों से होती है, आने वालों से नहीं। इसे जान-बूझकर कठिन रखा गया है, ताकि राष्ट्रपति का पद किसी एक पार्टी या अस्थायी गठबंधन की मर्ज़ी पर न टिके। उलटा पहलू यह है कि ताकतवर राजनीतिक समर्थन वाले राष्ट्रपति पर गंभीर आरोप हों, तब भी इतना बहुमत जुटाना मुश्किल हो सकता है।
अब तक का रिकॉर्ड: भारत में आज तक किसी राष्ट्रपति पर अनुच्छेद 61 की पूरी प्रक्रिया नहीं चली और न ही कोई हटाया गया।
जज को हटाना इतना मुश्किल क्यों?
सोचिए, किसी जज ने सरकार की बड़ी नीति को असंवैधानिक ठहरा दिया। अगर सरकार साधारण बहुमत से उसे हटा सकती, तो कोई जज सरकार के खिलाफ फैसला देने की हिम्मत कैसे करता? इसीलिए संविधान (अनुच्छेद 124(4), 217, 218) ने जज को सिर्फ "सिद्ध कदाचार" या "असमर्थता" के आधार पर हटाने की इजाज़त दी है, और रास्ता कठिन रखा है।
शुरुआत: लोकसभा के कम से कम 100 या राज्यसभा के कम से कम 50 सांसद नोटिस देते हैं। स्पीकर या सभापति तय करते हैं कि नोटिस मंज़ूर होगा या नहीं। मंज़ूर होने पर 3 सदस्यों की जाँच कमेटी बनती है: सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक जाने-माने कानूनविद। यह प्रक्रिया न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 में है।
फैसला: आरोप साबित हो जाएँ तो दोनों सदनों को प्रस्ताव पास करना होता है। हर सदन में दो शर्तें साथ-साथ पूरी होनी चाहिए: कुल सदस्यों का बहुमत और मौजूद व वोट देने वालों का दो-तिहाई। फिर राष्ट्रपति आदेश जारी करते हैं।
राष्ट्रपति और जज के नियम अलग क्यों समझें? उसी 240 सदस्यों वाले सदन में 180 लोग वोट दें, तो राष्ट्रपति के लिए 160 वोट चाहिए, पर जज के लिए 121 (कुल 240 का बहुमत) काफी हैं, क्योंकि 180 का दो-तिहाई 120 बनता है और दोनों शर्तों में बड़ी संख्या मानी जाती है। इसलिए दोनों को "एक जैसा महाभियोग" कहना गलत है।
भारत के चर्चित मामले
जस्टिस वी. रामास्वामी (1993): वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप जाँच कमेटी में सही पाए गए। फिर भी लोकसभा में प्रस्ताव को ज़रूरी समर्थन नहीं मिला, क्योंकि कांग्रेस के कई सांसदों ने वोटिंग से दूरी बना ली। वे पद पर बने रहे। सवाल यह उठा कि आरोप साबित हो जाएँ और पार्टियाँ साथ न दें, तो जवाबदेही का क्या होगा?
जस्टिस सौमित्र सेन (2011): राज्यसभा ने अगस्त 2011 में प्रस्ताव पास कर दिया, पर लोकसभा में वोट से पहले उन्होंने सितंबर में इस्तीफा दे दिया। यानी वे पूरी प्रक्रिया से हटाए नहीं गए।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा (2018): विपक्ष के सांसदों ने नोटिस दिया, पर राज्यसभा के सभापति ने उसे मंज़ूर ही नहीं किया।
जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला
मार्च 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद कथित तौर पर नकदी मिलने का मामला चर्चा में आया। बताया गया कि जुलाई 2025 में सांसदों ने नोटिस दिया, 12 अगस्त 2025 को स्पीकर ने तीन सदस्यीय कमेटी बनाई, और 18 मई 2026 को कमेटी ने रिपोर्ट सौंपी, जिसमें प्रतिकूल निष्कर्ष बताए गए हैं।
प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति और बाकी पदों का क्या?
प्रधानमंत्री और मंत्री: उन पर महाभियोग नहीं चलता, क्योंकि भारत में मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से जवाबदेह है (अनुच्छेद 75(3))। लोकसभा में बहुमत खोते ही अविश्वास प्रस्ताव से सरकार गिर सकती है, इसके लिए संविधान तोड़ना साबित करने की ज़रूरत नहीं। अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल कांग्रेस के भरोसे पर नहीं टिका होता, इसलिए वहाँ महाभियोग चाहिए। हाँ, किसी मंत्री पर अपराध का आरोप हो तो सामान्य कानून के तहत आपराधिक मुकदमा अलग से चल सकता है।
उपराष्ट्रपति: अनुच्छेद 67(ख) के तहत प्रस्ताव राज्यसभा में आता है, कम से कम 14 दिन का नोटिस चाहिए। राज्यसभा के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पास होना चाहिए और फिर लोकसभा की सहमति चाहिए। यहाँ दो-तिहाई की शर्त नहीं है और "संविधान उल्लंघन" जैसा आधार भी तय नहीं।
स्पीकर, राज्यपाल, चुनाव आयोग के सदस्य और बाकी: सबके लिए अलग-अलग नियम हैं। यानी भारत में सब उच्च पदों के लिए एक ही महाभियोग व्यवस्था नहीं है।
महाभियोग बनाम अविश्वास प्रस्ताव
अविश्वास प्रस्ताव राजनीतिक समर्थन का इम्तिहान है। बहुमत गया तो सरकार गई। गलती साबित नहीं करनी पड़ती। वहीं, राष्ट्रपति का महाभियोग के तहत संविधान के उल्लंघन का आरोप होता है। इसमें विशेष नोटिस, जाँच और दोनों सदनों में सख्त बहुमत का प्रावधान है।जज की पदच्युति में सिद्ध कदाचार या असमर्थता पर, न्यायिक स्वतंत्रता बचाते हुए किया जाता है।
क्या महाभियोग बदले का हथियार बन सकता है?
यही इसकी सबसे बड़ी उलझन है। प्रक्रिया में संसद है, तो पार्टियों के हित, गठबंधन और संख्याएँ नतीजे पर असर डालेंगी। प्रक्रिया आसान हुई तो ध्रुवीकृत माहौल में इसका राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है। बहुत कठिन हुई तो ताकतवर समर्थन वाले आदमी पर गंभीर आरोप भी टिक नहीं पाएँगे। भारत और अमेरिका दोनों ने दो-चरण और बड़ा बहुमत रखकर पद की स्थिरता को तरजीह दी है। पर इसका दूसरा पहलू वही है: जवाबदेही अधूरी रह सकती है।
क्या जनता सीधे महाभियोग चला सकती है?
अनुच्छेद 61 के तहत महाभियोग संसद की प्रक्रिया है। जनता, संगठन और पार्टियाँ विरोध कर सकती हैं, ज्ञापन दे सकती हैं, कोर्ट जा सकती हैं और सांसदों से कार्रवाई माँग सकती हैं। पर इनसे किसी का पद अपने-आप खत्म नहीं होता।
कुलमिलाकर, महाभियोग ताकत और संविधान की सर्वोच्चता के बीच बना संतुलन है। इसका सफर 1376 के इंग्लैंड से हेस्टिंग्स के सात साल लंबे मुकदमे और 1787 के अमेरिका से होकर भारत के अनुच्छेद 61 तक आया है।
दो बातें साथ चलती हैं। पहली, पद कितना भी ऊँचा हो, संविधान उससे ऊँचा है। दूसरी, जिनसे स्वतंत्र और निष्पक्ष फैसलों की उम्मीद है, उन्हें किसी अस्थायी राजनीतिक बहुमत की नाराज़गी पर नहीं हटाया जाना चाहिए। इसकी असली ताकत शायद इस्तेमाल में नहीं, बल्कि इस भरोसे में है कि सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठे इंसान को भी गंभीर गलती पर जवाब देना पड़ सकता है।


