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क्या है रोहित एक्ट ? जिसे लागू करने की उठ रही है मांग...UGC नियमों पर रोक के बाद भी छात्र क्यों कर रहे हैं विरोध?
What Is Rohit Act: सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी JNU-DU में छात्र प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? जानिए UGC नियम, रोहित एक्ट और कैंपस भेदभाव की असली वजह।
What Is Rohit Act
What Is Rohit Act: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने UGC के इक्विटी नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी। इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में जाति, लिंग और विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना था। लेकिन कोर्ट के फैसले के बावजूद JNU और DU जैसे बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों का विरोध थमा नहीं। सवाल उठता है कि जब नियमों पर रोक लग गई है, तो छात्र प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?
छात्रों की नाराज़गी सिर्फ नियमों से नहीं
छात्रों का कहना है कि समस्या केवल UGC के इक्विटी नियमों की नहीं है, बल्कि कैंपस के भीतर गहराई तक फैले उस भेदभाव की है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनका मानना है कि नियमों पर रोक लगने से भेदभाव से जुड़ी शिकायतें और दब जाएंगी, जबकि ज़मीनी हकीकत पहले से ही चिंताजनक है।
‘रोहित एक्ट’ क्या है?
‘रोहित एक्ट’ कोई मौजूदा कानून नहीं, बल्कि एक प्रस्तावित केंद्रीय कानून है। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, पहचान, लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना है। इस प्रस्तावित कानून का नाम दलित शोध छात्र रोहित वेमुला के नाम पर रखा गया है, जिनकी 2016 में हुई मौत ने देशभर में कैंपस डिस्क्रिमिनेशन पर बहस छेड़ दी थी।
JNU और DU में विरोध क्यों तेज हुआ?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ ही घंटों के भीतर JNU और DU में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। छात्रों ने पुतले जलाए, नारे लगाए और मांग की कि UGC के इक्विटी नियमों को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत किया जाए। JNUSU, AISA और अन्य छात्र संगठनों का कहना है कि बिना सख्त कानून के विश्वविद्यालय प्रशासन जवाबदेह नहीं बनता।
क्या सिर्फ कोर्ट का फैसला काफी है?
छात्रों और शिक्षकों का मानना है कि कानूनी रोक से समस्या का समाधान नहीं होगा। JNUTA जैसे शिक्षक संगठनों ने भी कहा कि मौजूदा नियम जाति और पहचान आधारित असमानता की जड़ों तक नहीं पहुंचते। इसी वजह से रोहित एक्ट जैसे सख्त और स्पष्ट कानून की मांग तेज हो रही है।
रोहित वेमुला का मुद्दा आज भी ज़िंदा क्यों है?
रोहित वेमुला की मौत सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल थी, जो हाशिए पर खड़े छात्रों को बराबरी का अवसर नहीं देती। आज भी छात्र उनका नाम लेकर न्याय, सम्मान और समानता की मांग कर रहे हैं।
असली लड़ाई क्या है?
यह लड़ाई सिर्फ UGC नियमों या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ है जो कैंपस में भेदभाव को सामान्य मान लेती है। छात्र चाहते हैं कि शिक्षा के संस्थानों में बराबरी सिर्फ नीतियों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अनुभव में भी दिखे।


