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Juvenile Crime Law in India: 18 साल तक नाबालिग क्यों? जानिए कानून, उम्र और किशोर न्याय की पूरी कहानी
Juvenile Crime Law in India: 18 साल की उम्र को नाबालिग की सीमा क्यों माना गया? जानिए भारत के किशोर न्याय कानून और 18 वर्ष की सीमा के पीछे की पूरी कहानी।
Juvenile Crime Law in India
Juvenile Crime Law in India: किसी गंभीर अपराध के बाद जब यह पता चलता है कि आरोपी की उम्र 17 वर्ष 11 महीने है, तो आम लोगों के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है—यदि वही व्यक्ति कुछ सप्ताह बाद 18 वर्ष का होकर वही अपराध करता तो उसे वयस्क माना जाता। लेकिन कुछ दिन पहले किए अपराध में कानून उसे बच्चा क्यों मानता है? क्या 18वें जन्मदिन की आधी रात को अचानक उसके मस्तिष्क में कोई ऐसा परिवर्तन हो जाता है कि वह पूर्णतः परिपक्व हो जाए? बिल्कुल नहीं। कानून की 18 वर्ष की सीमा किसी जैविक स्विच की तरह नहीं है। यह मानव विकास, सामाजिक परंपरा, शिक्षा, नागरिक अधिकारों, अंतरराष्ट्रीय बाल-अधिकार व्यवस्था और न्याय नीति के बीच बनाया गया एक कानूनी कट-ऑफ है। आधुनिक विज्ञान बताता है कि निर्णय लेने, भविष्य के परिणाम समझने, आवेग नियंत्रित करने और जोखिम का मूल्यांकन करने में महत्वपूर्ण प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सहित मस्तिष्क के कई हिस्सों का विकास किशोरावस्था के बाद भी जारी रहता है और सामान्यतः बीसवें दशक के मध्य से उत्तरार्ध तक परिपक्वता विकसित होती रहती है। इसलिए विज्ञान यह नहीं कहता कि 17 वर्ष 364 दिन का व्यक्ति अपरिपक्व है और 18 वर्ष का होते ही पूर्ण वयस्क मस्तिष्क पा लेता है। 18 का चुनाव मुख्यतः एक व्यावहारिक और अधिकार-आधारित कानूनी सीमा है, जिसके पीछे यह स्वीकार है कि किशोरों की निर्णय क्षमता, आवेग नियंत्रण, सामाजिक दबाव के प्रति संवेदनशीलता और सुधार की संभावना औसतन वयस्कों से अलग होती है। अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ भी बताता है कि मस्तिष्क की परिपक्वता मध्य से उत्तर बीसवें दशक तक चल सकती है और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स अंतिम विकसित होने वाले क्षेत्रों में है।
18 वर्ष की आधुनिक अंतरराष्ट्रीय स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण आधार संयुक्त राष्ट्र का Convention on the Rights of the Child, यानी बाल अधिकार अभिसमय है। इस अभिसमय के अनुच्छेद 1 में सामान्य सिद्धांत है कि 18 वर्ष से कम उम्र का प्रत्येक व्यक्ति बच्चा है, जब तक किसी देश के लागू कानून में उससे पहले वयस्कता प्राप्त न हो जाती हो। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार समिति ने बाद में स्पष्ट रूप से कहा कि किशोर न्याय व्यवस्था उन सभी बच्चों पर लागू होनी चाहिए जो अपराध करने के समय न्यूनतम आपराधिक जिम्मेदारी की उम्र से ऊपर लेकिन 18 वर्ष से नीचे थे। यही वह अंतरराष्ट्रीय मानक है जिसने पिछले तीन दशकों में अनेक देशों को 18 वर्ष से कम आरोपियों को अलग किशोर न्याय व्यवस्था में रखने के लिए प्रेरित किया। भारत ने इस अभिसमय को 11 दिसंबर, 1992 को स्वीकार किया था और भारत के 2015 के किशोर न्याय कानून की प्रस्तावना स्वयं इस तथ्य तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय किशोर न्याय नियमों का उल्लेख करती है।
लेकिन ‘18 वर्ष से कम बच्चा’ और “किस उम्र से अपराध के लिए कानूनी जिम्मेदारी शुरू होती है”—ये दो बिल्कुल अलग प्रश्न हैं और इन्हें अक्सर मिला दिया जाता है। उदाहरण के लिए भारत में 17 वर्ष का व्यक्ति बच्चा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसके द्वारा किया गया अपराध कानून की नजर में कोई अपराध ही नहीं रहेगा। भारतीय न्याय व्यवस्था में आपराधिक जिम्मेदारी की निचली सीमा बहुत कम उम्र से शुरू होती है। मौजूदा भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 20 कहती है कि सात वर्ष से कम बच्चे द्वारा किया गया कोई कार्य अपराध नहीं है। धारा 21 कहती है कि सात वर्ष से अधिक और बारह वर्ष से कम बच्चे का कृत्य भी अपराध नहीं होगा। यदि उस समय उसमें अपने आचरण की प्रकृति और परिणाम समझने की पर्याप्त परिपक्वता नहीं थी। इसका अर्थ यह है कि सात से बारह वर्ष के बीच अदालत या सक्षम प्राधिकरण को मानसिक समझ का प्रश्न देखना पड़ सकता है। बारह वर्ष के बाद ऐसी पूर्ण सामान्य प्रतिरक्षा नहीं रहती। लेकिन 18 वर्ष तक बच्चे को अलग किशोर न्याय व्यवस्था के अधीन रखा जाता है।
इसलिए यह कहना कि “भारत में 18 साल से कम व्यक्ति अपराधी नहीं हो सकता” गलत है। कानून “juvenile in conflict with law” या अब अधिक संवेदनशील भाषा में “child in conflict with law” कहता है—अर्थात् ऐसा बच्चा जिस पर अपराध करने का आरोप है या जो अपराध में दोषी पाया गया है। अंतर केवल यह है कि कानून उसके साथ वयस्क आरोपी जैसा व्यवहार करने के बजाय सुधार, पुनर्वास, शिक्षा और पुनर्समाजीकरण पर अधिक जोर देता है। 2015 का किशोर न्याय अधिनियम इसी उद्देश्य को अपने लंबे शीर्षक में स्पष्ट करता है—बच्चों की देखभाल, संरक्षण, विकास, उपचार, सामाजिक पुनर्समावेश और उनके सर्वोत्तम हित में बाल-अनुकूल न्याय प्रक्रिया।
भारत में किशोर न्याय कानून की आधुनिक यात्रा स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों से दिखाई देती है। Children Act, 1960 में child की परिभाषा लड़कों और लड़कियों के लिए अलग थी—16 वर्ष से कम लड़का और 18 वर्ष से कम लड़की। उस समय यह लैंगिक अंतर सामान्य कानूनी सोच का हिस्सा था। इसके बाद Juvenile Justice Act, 1986 आया, जिसने पूरे देश में किशोर न्याय व्यवस्था को अधिक एकरूप रूप दिया। लेकिन उसमें भी वही विभाजन रहा—16 वर्ष से कम लड़का और 18 वर्ष से कम लड़की juvenile था। इसलिए आज जो 18 वर्ष की समान सीमा हमें स्वाभाविक लगती है, वह भारत में हमेशा से नहीं थी।
बड़ा परिवर्तन Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2000 से आया। भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय स्वीकार किए जाने के बाद नए कानून ने लड़के और लड़की दोनों के लिए 18 वर्ष की समान सीमा स्वीकार की। इसका अर्थ यह हुआ कि अपराध करने के समय 18 वर्ष से कम आयु का लड़का भी किशोर न्याय व्यवस्था के संरक्षण में आने लगा। 2000 का कानून 30 दिसंबर, 2000 को अधिनियमित हुआ। बाद में इसमें 2006 में संशोधन भी हुआ। 2000 की व्यवस्था की मूल सोच यह थी कि 18 वर्ष से कम बच्चा चाहे कितना गंभीर अपराध करे, उसे वयस्क आपराधिक अदालत में सामान्य अपराधी की तरह दंडित नहीं किया जाएगा। किशोर न्याय बोर्ड के माध्यम से पुनर्वासात्मक व्यवस्था लागू होगी।
यही व्यवस्था दिसंबर, 2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद अभूतपूर्व राष्ट्रीय बहस का विषय बनी। 16 दिसंबर, 2012 के निर्भया मामले के आरोपियों में एक आरोपी अपराध के समय 18 वर्ष से कुछ कम था। इसलिए उसके साथ 2000 के किशोर न्याय कानून के तहत व्यवहार किया गया। उस समय के कानून में उसे वयस्क अदालत में भेजने का प्रावधान नहीं था। किशोर न्याय व्यवस्था के अंतर्गत संस्थागत पुनर्वास की अधिकतम अवधि तीन वर्ष थी। घटना की क्रूरता और उस आरोपी की भूमिका को लेकर व्यापक जनाक्रोश के बीच यह सवाल उठा कि यदि कोई 16 या 17 वर्ष का किशोर हत्या, बलात्कार या अत्यंत क्रूर अपराध की प्रकृति और परिणाम समझता है, तो क्या केवल जन्मतिथि के आधार पर उसे हमेशा वही संरक्षण मिलना चाहिए, जो छोटे बच्चे को मिलता है? इसी सामाजिक और राजनीतिक दबाव की पृष्ठभूमि में नया कानून तैयार हुआ, हालांकि इस बदलाव का बाल अधिकार विशेषज्ञों और संसद की स्थायी समिति के एक हिस्से ने विरोध भी किया था। PRS के विधायी विश्लेषण और संसदीय समिति के दस्तावेज दिखाते हैं कि 16–18 आयु वर्ग द्वारा जघन्य अपराधों के लिए विशेष व्यवस्था नए कानून की सबसे विवादास्पद विशेषताओं में थी।
इसके बाद Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 पारित हुआ। इसे 31 दिसंबर, 2015 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 15 जनवरी, 2016 से लागू हुआ। इसने 2000 के कानून को निरस्त कर दिया, लेकिन 18 वर्ष की मूल बाल सीमा को बनाए रखा। सबसे बड़ा परिवर्तन यह था कि 16 से 18 वर्ष की उम्र में कथित रूप से किए गए ‘जघन्य अपराध’ के मामले में कुछ परिस्थितियों में बच्चे को वयस्क की तरह मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है। कानून heinous offence को सामान्यतः ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित करता है जिसमें न्यूनतम सजा सात वर्ष या उससे अधिक हो। लेकिन यह स्वचालित व्यवस्था नहीं है कि 16 वर्ष का हर गंभीर अपराधी सीधे वयस्क अदालत में भेज दिया जाएगा। पहले Juvenile Justice Board को प्रारंभिक मूल्यांकन करना होता है।
इस प्रारंभिक मूल्यांकन में बोर्ड यह देखता है कि बच्चे की मानसिक और शारीरिक क्षमता अपराध करने की कैसी थी, क्या वह अपराध के परिणाम समझ सकता था और किन परिस्थितियों में कथित अपराध किया गया। आवश्यकता होने पर अनुभवी मनोवैज्ञानिक, मनोसामाजिक कार्यकर्ता या अन्य विशेषज्ञ की सहायता ली जा सकती है। कानून स्वयं स्पष्ट करता है कि यह प्रारंभिक मूल्यांकन ‘ट्रायल’ नहीं है। इसका उद्देश्य यह तय करना है कि बच्चे की क्षमता और समझ कैसी थी। यदि बोर्ड निष्कर्ष निकालता है कि मामला वयस्क जैसी सुनवाई योग्य हो सकता है, तो उसे बाल अदालत भेजा जा सकता है। वहाँ भी न्यायालय स्वतंत्र रूप से यह तय कर सकता है कि वास्तव में वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की आवश्यकता है या मामले को किशोर न्याय पद्धति से ही निपटाना बेहतर होगा। इसलिए 2015 के बाद भी “16 साल होते ही बच्चा वयस्क अपराधी बन जाता है” कहना गलत है।
यहीं 18 वर्ष की सीमा का असली कानूनी दर्शन दिखाई देता है। कानून यह स्वीकार करता है कि 16–18 वर्ष का व्यक्ति गंभीर अपराध के लिए काफी हद तक समझदार हो सकता है। लेकिन उसकी परिपक्वता को स्वचालित रूप से वयस्क के बराबर मानना उचित नहीं। इसलिए 2015 का कानून दो सिद्धांतों के बीच समझौता करता है—बाल अधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा। एक तरफ 18 वर्ष तक बच्चे की मूल पहचान बनी रहती है। दूसरी तरफ कुछ जघन्य अपराधों में उसकी वास्तविक मानसिक क्षमता का परीक्षण करके कठोर न्यायिक प्रक्रिया का रास्ता खुलता है। यही व्यवस्था आज भारत के किशोर न्याय कानून की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद विशेषता है।
इसके बावजूद ऐसा बच्चा जिसे वयस्क जैसी सुनवाई के लिए भेजा जाता है, पूरी तरह सामान्य वयस्क आरोपी नहीं बन जाता। Juvenile Justice Act की धारा 21 के अनुसार किसी भी बच्चे को मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता और ऐसी आजीवन कैद भी नहीं दी जा सकती जिसमें रिहाई की कोई संभावना न हो। 16–18 वर्ष के जघन्य अपराध आरोपी को सुनवाई के दौरान सामान्य जेल के बजाय “place of safety” में रखने की व्यवस्था है। यदि वह 21 वर्ष का हो जाता है और सजा की अवधि बाकी है, तो बाल अदालत उसके सुधार और प्रगति का मूल्यांकन करके यह तय कर सकती है कि उसे शर्तों पर छोड़ा जाए या शेष अवधि पूरी करने के लिए जेल भेजा जाए। इस प्रकार कानून कठोर अपराध के बावजूद किशोर अवस्था की विकासात्मक विशिष्टता पूरी तरह समाप्त नहीं करता।
यहाँ “नाबालिग को कानूनन क्या-क्या फायदे मिलते हैं?” प्रश्न की भाषा को थोड़ा सुधारना उपयोगी होगा। कानून इन्हें अपराध करने के ‘फायदे’सके रूप में नहीं देता। इन्हें विशेष कानूनी सुरक्षा और पुनर्वास के अधिकार माना जाता है। इनका आधार यह सोच है कि बच्चे का व्यक्तित्व अभी विकसित हो रहा है और उसके सुधार की संभावना वयस्क की तुलना में अधिक हो सकती है। इसका अर्थ पीड़ित के दर्द या अपराध की गंभीरता को कम करना नहीं है। यह केवल दंड के उद्देश्य में अंतर है। वयस्क व्यवस्था में प्रतिकार, निरोध और कारावास का महत्व अधिक हो सकता है, जबकि बाल न्याय व्यवस्था पुनर्वास, शिक्षा और समाज में वापसी को अधिक महत्व देती है।
सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा गिरफ्तारी और हिरासत से शुरू होती है। 2015 का कानून स्पष्ट कहता है कि किसी बच्चे को कथित अपराध के मामले में पुलिस लॉकअप या सामान्य जेल में नहीं रखा जाना चाहिए। उसे विशेष किशोर पुलिस इकाई या बाल कल्याण पुलिस अधिकारी के माध्यम से संभाला जाता है और उसे सामान्यतः 24 घंटे के भीतर Juvenile Justice Board के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। आवश्यकता होने पर उसे Observation Home में रखा जाता है। यह व्यवस्था इसलिए है कि छोटा या किशोर आरोपी वयस्क अपराधियों के साथ जेल वातावरण में जाकर हिंसा, शोषण या अधिक गंभीर आपराधिक प्रभाव का शिकार न हो।
दूसरी बड़ी सुरक्षा जमानत की है। Juvenile Justice Act की धारा 12 में बच्चे के मामले में जमानत सामान्य नियम के रूप में रखी गई है, चाहे कथित अपराध जमानती हो या गैर-जमानती। जमानत रोकी जा सकती है यदि यह उचित आधार हो कि रिहाई से वह किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में आ जाएगा। उसे नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरा होगा। या न्याय का उद्देश्य विफल हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर नाबालिग अपराध करते ही तुरंत घर भेज दिया जाता है। बल्कि कानून का शुरुआती दृष्टिकोण वयस्क की तरह लंबी पूर्व-विचारण हिरासत के बजाय सुरक्षित संरक्षण और निगरानी है।
तीसरी सुरक्षा यह है कि बच्चे का मामला सामान्य मजिस्ट्रेट अदालत के बजाय Juvenile Justice Board के सामने चलता है। बोर्ड में न्यायिक अधिकारी के साथ ऐसे सामाजिक सदस्य भी होते हैं य, जिन्हें बच्चों से संबंधित विषयों का अनुभव होना चाहिए। उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं होता कि अपराध हुआ या नहीं। बल्कि बच्चे की पारिवारिक परिस्थिति, शिक्षा, सामाजिक वातावरण, मानसिक स्थिति और सुधार की संभावना को भी देखना होता है। बोर्ड चेतावनी, परामर्श, सामुदायिक सेवा, माता-पिता या अभिभावक की निगरानी, परिवीक्षा और विशेष गृह में भेजने जैसे अलग-अलग आदेश दे सकता है। सामान्य किशोर न्याय प्रक्रिया में संस्थागत अवधि अधिकतम तीन वर्ष तक हो सकती है।
चौथी महत्वपूर्ण सुरक्षा है कि बच्चे पर सामान्यतः वयस्क आरोपी के साथ संयुक्त मुकदमा नहीं चलाया जाता। कानून स्पष्ट रूप से बच्चे और वयस्क की संयुक्त कार्यवाही रोकता है। यदि एक अपराध में 17 वर्षीय और 25 वर्षीय व्यक्ति दोनों आरोपी हों, तो वयस्क के खिलाफ सामान्य आपराधिक न्याय व्यवस्था और बच्चे के खिलाफ किशोर न्याय व्यवस्था अलग चलेगी। इसका उद्देश्य बच्चे को वयस्क आपराधिक प्रक्रिया के प्रतिकूल प्रभाव से अलग रखना है।
पाँचवीं महत्वपूर्ण सुरक्षा उसकी पहचान की गोपनीयता है। Juvenile Justice Act की धारा 74 समाचारपत्र, पत्रिका, समाचार-पत्रिका, दृश्य-श्रव्य माध्यम या अन्य माध्यमों में ऐसी जानकारी प्रकाशित करने पर रोक लगाती है जिससे किसी बच्चे की पहचान सामने आ सके—नाम, पता, स्कूल या कोई अन्य पहचान योग्य विवरण। कुछ विशेष परिस्थितियों में सक्षम प्राधिकारी बच्चे के हित में सीमित खुलासा अनुमति दे सकता है। लेकिन सामान्य सिद्धांत पहचान की रक्षा है। यही कारण है कि गंभीर अपराध में भी मीडिया को 18 वर्ष से कम आरोपी की पहचान प्रकाशित करने से बचना होता है। इस सुरक्षा का उद्देश्य यह है कि एक किशोर की गलती जीवनभर उसके नाम से चिपक न जाए और पुनर्वास के बाद उसके सामाजिक जीवन, शिक्षा और रोजगार पर स्थायी दाग न बने।
छठी सुरक्षा भविष्य के जीवन से जुड़ी है। धारा 24 के अनुसार किशोर न्याय कानून के तहत अपराधी पाए गए बच्चे को सामान्यतः उस दोषसिद्धि से जुड़ी कानूनी अयोग्यताओं का सामना नहीं करना पड़ता जो वयस्क अपराधी को हो सकती हैं। निर्धारित अवधि के बाद उसके रिकॉर्ड नष्ट किए जाने का आदेश भी दिया जा सकता है। हालांकि 16–18 वर्ष के जघन्य अपराध में बाल अदालत द्वारा वयस्क प्रक्रिया में दोषी पाए गए बच्चे के लिए यह पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध नहीं रहती और संबंधित रिकॉर्ड रखा जा सकता है। कानून का मूल विचार “fresh start” यानी नई शुरुआत का है—बचपन की गलती, विशेषकर छोटे या कम गंभीर अपराध में, व्यक्ति के पूरे वयस्क जीवन को हमेशा के लिए नष्ट न करे।
यही “fresh start” सिद्धांत 2015 के कानून के सामान्य सिद्धांतों में भी दिखाई देता है। कानून बच्चे के प्रति गरिमा, निजता, निर्दोषता की धारणा, संस्थागतकरण को अंतिम उपाय मानने और परिवार तथा समाज में पुनःस्थापना को महत्व देता है। कानून में 18 वर्ष तक बच्चे के लिए दुर्भावनापूर्ण या आपराधिक मंशा न मानने का एक सामान्य सिद्धांत भी रखा गया है। लेकिन इसका अर्थ कानूनी उत्तरदायित्व शून्य होना नहीं है।यह पूरी प्रक्रिया को बाल-अनुकूल दृष्टिकोण से चलाने का सिद्धांत है।
उम्र का निर्धारण इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि किसी हत्या के आरोपी की उम्र 17 वर्ष 11 महीने है तो पूरा न्यायिक रास्ता बदल सकता है। किशोर न्याय कानून में महत्वपूर्ण उम्र अपराध करने की तारीख की उम्र है, गिरफ्तारी या मुकदमे के समय की उम्र नहीं। यदि कोई व्यक्ति 20 वर्ष की उम्र में पकड़ा गया। लेकिन प्रमाणित हो जाए कि कथित अपराध करते समय वह 17 वर्ष का था, तो उसके किशोर होने के दावे पर विचार किया जा सकता है। कानून यह भी अनुमति देता है कि किशोर होने का दावा न्यायिक कार्यवाही के किसी भी चरण में उठाया जा सकता है, यहाँ तक कि मामला पहले निपट चुका हो, यदि व्यक्ति अपराध की तारीख पर बच्चा था।
अब इस सवाल पर आएँ कि पूरी दुनिया में 18 वर्ष की एक ही व्यवस्था क्यों नहीं है। इसका कारण यह है कि ‘वयस्कता की उम्र’, ‘किशोर न्याय व्यवस्था की ऊपरी सीमा’ और ‘न्यूनतम आपराधिक जिम्मेदारी की उम्र’ तीन अलग कानूनी अवधारणाएँ हैं। अधिकांश देशों में संयुक्त राष्ट्र मानक के प्रभाव से 18 वर्ष से कम व्यक्ति को बाल अधिकार के संदर्भ में बच्चा माना जाता है। लेकिन वह किस उम्र से अपराध के लिए जिम्मेदार हो सकता है। यह देश-दर-देश बहुत अलग है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति की वर्तमान सिफारिश है कि न्यूनतम आपराधिक जिम्मेदारी 14 वर्ष से कम न रखी जाए और देशों को इससे भी अधिक आयु की दिशा में बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। फिर भी अनेक देशों के कानून इससे नीचे हैं।
उदाहरण के लिए इंग्लैंड और वेल्स में आपराधिक जिम्मेदारी की उम्र केवल 10 वर्ष है। दस से कम वर्ष से बच्चे को गिरफ्तार या अपराध के लिए आरोपित नहीं किया जा सकता। लेकिन दस वर्ष पूरा करते ही वह अपराध के लिए जिम्मेदार हो सकता है। हालांकि 10 से 17 वर्ष के बच्चों के लिए अलग Youth Justice व्यवस्था और अलग सजा नियम होते हैं। ब्रिटिश सरकार स्वयं इसकी पुष्टि करती है। इसलिए वहाँ 18 वर्ष से कम बच्चा होना और 10 वर्ष से अपराध के लिए जिम्मेदार होना एक साथ संभव है।
इसी यूनाइटेड किंगडम के भीतर स्कॉटलैंड में न्यूनतम आपराधिक जिम्मेदारी 12 वर्ष है। दिलचस्प बात यह है कि वहाँ यह सीमा पहले केवल आठ वर्ष थी। Age of Criminal Responsibility (Scotland) Act 2019 के बाद इसे बढ़ाकर 12 किया गया। यह नया नियम दिसंबर 2021 से पूरी तरह लागू हुआ। इससे एक ही संप्रभु देश के भीतर अलग न्यायिक क्षेत्रों में अलग उम्र की सीमा होने का उदाहरण मिलता है। स्कॉटिश सरकार स्वयं इस बदलाव को छोटे बच्चों को अपराधीकरण के हानिकारक प्रभाव से बचाने की नीति के रूप में प्रस्तुत करती है।
जर्मनी का मॉडल और अलग है। वहाँ 14 वर्ष से कम व्यक्ति आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं होता। 14 से 17 वर्ष के किशोरों पर Youth Courts Act लागू होता है। लेकिन कानून उनकी नैतिक और बौद्धिक परिपक्वता को भी महत्व देता है। जर्मन किशोर कानून का उद्देश्य दंड से अधिक शिक्षा और सुधार पर केंद्रित है। कुछ 18 से 20 वर्ष के “young adults” पर भी परिस्थितियों के आधार पर किशोर कानून लागू किया जा सकता है। यदि उनकी परिपक्वता या अपराध का चरित्र किशोर जैसा पाया जाए। इससे यह साफ होता है कि 18 कोई प्राकृतिक वैज्ञानिक सीमा नहीं है। अलग समाज एक ही विकास विज्ञान को अलग कानूनी संरचना में बदल सकते हैं।
अमेरिका में स्थिति और अधिक जटिल है क्योंकि संघीय कानून और अलग-अलग राज्यों के अपने कानून हैं। संघीय व्यवस्था सामान्यतः 18 वर्ष से पहले किए अपराध के आरोपी को juvenile मानती है। लेकिन राज्य स्तर पर न्यूनतम जिम्मेदारी, बाल अदालत की सीमा और गंभीर अपराध में adult court transfer के नियम बहुत भिन्न हो सकते हैं। संघीय न्याय विभाग की परिभाषा में 18 वर्ष से कम व्यक्ति juvenile है और यदि अपराध 18 वर्ष से पहले हुआ हो तो कुछ परिस्थितियों में बाद की उम्र में भी juvenile प्रक्रिया लागू हो सकती है। यह विविधता अमेरिकी संघीय व्यवस्था और प्रत्येक राज्य की अलग अपराध नीति का परिणाम है।
दुनिया भर में अंतर इसलिए भी है क्योंकि किशोर अपराध के बारे में समाजों की दार्शनिक सोच अलग रही है। कुछ देश छोटी उम्र से ही व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर जोर देते हैं। उनका तर्क है कि दस या बारह वर्ष का बच्चा भी हत्या या चोरी का बुनियादी गलत-सही समझ सकता है। दूसरी व्यवस्था कहती है कि ‘गलत पता होना’ और वयस्क स्तर की आपराधिक जिम्मेदारी दो अलग बातें हैं। बच्चा यह जान सकता है कि हत्या गलत है। लेकिन उसकी आवेग-नियंत्रण क्षमता, साथी दबाव से बचने की शक्ति, दीर्घकालीन परिणामों का मूल्यांकन और भावनात्मक परिपक्वता अभी विकसित हो रही हो सकती है। आधुनिक बाल-विकास विज्ञान दूसरी बात को काफी समर्थन देता है। लेकिन कानून को पीड़ित अधिकार, सार्वजनिक सुरक्षा और सामाजिक अपेक्षा भी संतुलित करनी होती है।
यही कारण है कि दुनिया में गंभीर अपराध करने वाले 16–17 वर्ष के बच्चों को लेकर नीति सबसे विवादित रहती है। एक पक्ष कहता है कि यदि 17 वर्ष का युवक सुनियोजित हत्या, आतंकवादी हिंसा या अत्यंत क्रूर बलात्कार करता है और उसे परिणामों की पूरी समझ थी, तो उसे केवल उम्र के कारण तीन वर्ष के सुधार गृह तक सीमित करना पीड़ित और समाज के साथ अन्याय है। दूसरा पक्ष कहता है कि अपराध की क्रूरता बच्चे की जैविक उम्र नहीं बदलती।यदि 18 से कम को बच्चा मानने का सिद्धांत स्वीकार किया गया है तो सबसे कठिन मामलों में ही उस सिद्धांत की असली परीक्षा होती है। भारत के 2015 कानून ने इन दोनों विचारों के बीच प्रारंभिक मानसिक-क्षमता मूल्यांकन वाला मॉडल चुना। संसद की स्थायी समिति ने उस समय यह चिंता भी जताई थी कि 16–18 वर्ष के बच्चों को वयस्क व्यवस्था में भेजना भारत की बाल अधिकार संधि की प्रतिबद्धताओं से टकरा सकता है।
यह बहस neuroscience के कारण और जटिल होती है। आधुनिक मस्तिष्क विज्ञान यह बताता है कि किशोर मस्तिष्क केवल ‘छोटा वयस्क मस्तिष्क’ नहीं है। पुरस्कार, नवीनता और सामाजिक स्वीकृति के प्रति संवेदनशील तंत्र किशोरावस्था में बहुत सक्रिय हो सकते हैं, जबकि योजना, रोक-थाम और दूरगामी निर्णय के लिए जिम्मेदार प्रीफ्रंटल प्रणालियाँ अभी विकसित हो रही होती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि किशोर को सही-गलत पता नहीं होता। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि जानना और तनाव, गुस्से, मित्र-दबाव या त्वरित पुरस्कार के क्षण में उसी ज्ञान के अनुसार व्यवहार करना अलग क्षमताएँ हैं। यही कारण है कि कानून में परिपक्वता को एकसमान नहीं माना जाता। NIMH के अनुसार प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स मस्तिष्क के अंतिम परिपक्व होने वाले हिस्सों में है और योजना, प्राथमिकता तथा अच्छे निर्णय जैसी क्षमताओं में उसकी भूमिका होती है।
यदि विज्ञान कहता है कि मस्तिष्क 25 वर्ष तक विकसित होता है तो फिर कानूनी वयस्कता 25 क्यों नहीं? इसका उत्तर यह है कि कानून को एक ऐसी रेखा चाहिए जिसके दूसरी ओर व्यक्ति को मतदान, अनुबंध, स्वतंत्र निवास, संपत्ति, विवाह और अनेक नागरिक अधिकारों की जिम्मेदारी दी जा सके। न्यूरोविकास क्रमिक है। कोई एक जन्मदिन वैज्ञानिक रूप से निर्णायक नहीं। यदि पूर्ण मस्तिष्क परिपक्वता को ही वयस्कता की शर्त बनाया जाए तो 20–24 वर्ष के लोगों को भी अनेक नागरिक अधिकारों से वंचित करना पड़ेगा। इसलिए 18 एक सामाजिक-कानूनी समझौता है। यह परिपक्वता की पूर्ण वैज्ञानिक समाप्ति नहीं। बल्कि वह उम्र है जहाँ दुनिया की अधिकांश आधुनिक व्यवस्थाएँ व्यापक नागरिक वयस्कता और बाल अधिकार के बीच रेखा खींचती हैं।
नाबालिग की विशेष सुरक्षा का एक और कारण अपराध-विज्ञान में सुधार की संभावना है। किशोर का व्यक्तित्व और सामाजिक पहचान अभी बन रही होती है। शिक्षा, परिवार, मनोचिकित्सा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और सुरक्षित सामाजिक वातावरण उसके भविष्य को बहुत बदल सकते हैं। यदि किसी 15 वर्षीय बच्चे को छोटे अपराध के लिए वयस्क जेल में भेज दिया जाए, जहाँ वह वर्षों तक पेशेवर अपराधियों के बीच रहे, तो कानून उसे सुधारने के बजाय अपराध की दुनिया में और गहरा धकेल सकता है। इसी कारण आधुनिक juvenile justice का मूल सिद्धांत ‘कम दंड’ नहीं। बल्कि अलग प्रकार का उत्तरदायित्व है। बच्चे को उसके काम के परिणाम का सामना कराया जाए।लेकिन ऐसी प्रक्रिया में जिससे भविष्य में अपराध कम हो और वह समाज में वापस लौट सके।
फिर भी यह धारणा भी गलत है कि नाबालिग को ‘सजा नहीं होती।’ Juvenile Justice Board बच्चे को परामर्श, समूह चिकित्सा, सामुदायिक सेवा, परिवीक्षा, माता-पिता की निगरानी या विशेष गृह में भेजने का आदेश दे सकता है। गंभीर मामलों में संस्थागत पुनर्वास हो सकता है और 16–18 वर्ष के जघन्य अपराध में बाल अदालत के माध्यम से वयस्क जैसी सुनवाई भी संभव है। इसलिए कानून अपराध को नजरअंदाज नहीं करता। वह जवाबदेही की भाषा बदलता है।
पीड़ित के दृष्टिकोण से यह व्यवस्था कभी-कभी बहुत कठोर प्रश्न पैदा करती है। यदि किसी परिवार के सदस्य की हत्या हुई हो तो आरोपी की उम्र 17 वर्ष 10 महीने होने से पीड़ित का नुकसान छोटा नहीं हो जाता। इसलिए किशोर न्याय व्यवस्था को केवल आरोपी के अधिकार से देखना भी अधूरा है। कानून को पीड़ित की न्याय की अपेक्षा, समाज की सुरक्षा और बच्चे के सुधार—तीनों को संतुलित करना होता है। भारत का 2015 संशोधन इसी सामाजिक तनाव की उपज था। लेकिन साथ ही प्रत्येक गंभीर अपराध के बाद ‘18 घटाकर 16 कर दें’ जैसी मांग वैज्ञानिक रूप से सरल समाधान नहीं है, क्योंकि अधिकांश किशोर अपराधी जघन्य अपराधी नहीं होते और कानून में सामान्य सीमा बदलने का प्रभाव लाखों बच्चों की न्याय व्यवस्था पर पड़ता है।
भारत के कानून में बाद में Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Act, 2021 भी आया। इस संशोधन ने खासकर गोद लेने की प्रक्रिया, जिला मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारियों, बाल कल्याण समितियों और अपराधों की कुछ श्रेणियों में बदलाव किए। यह 1 सितंबर 2022 से कई महत्वपूर्ण हिस्सों में प्रभावी हुआ। लेकिन इसने न तो 18 वर्ष की सामान्य बाल सीमा घटाई और न 16–18 वर्ष के जघन्य अपराध वाले मूल 2015 मॉडल को समाप्त किया। इसलिए आज भी भारतीय किशोर न्याय व्यवस्था की मुख्य उम्र-रचना वही है—18 वर्ष से कम बच्चा, लेकिन 16–18 में जघन्य अपराध के लिए विशेष मूल्यांकन।
भारत में पास्को कानून भी 18 वर्ष को बच्चे की सीमा मानता है। Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 में child किसी भी 18 वर्ष से कम व्यक्ति को कहा गया है। इसका एक महत्वपूर्ण कानूनी परिणाम यह है कि किशोर न्याय में 16–18 वर्ष का आरोपी कुछ जघन्य परिस्थितियों में adult trial के लिए भेजा जा सकता है। लेकिन बाल यौन संरक्षण कानून में 18 से कम पीड़ित फिर भी बच्चा ही रहता है। इससे यह फिर स्पष्ट होता है कि कानून में ‘उम्र’ अलग संदर्भों में अलग भूमिका निभाती है।
कानून की 18 वर्ष सीमा इसलिए केवल अपराधी को सुविधा देने वाला प्रावधान नहीं, पूरी बाल-अधिकार प्रणाली का हिस्सा है। यही उम्र शिक्षा, संरक्षण, यौन शोषण से सुरक्षा, अभिभावकीय जिम्मेदारी और कई दूसरे क्षेत्रों में बच्चे की स्थिति से जुड़ती है। यदि केवल एक अत्यंत क्रूर अपराध के कारण पूरी बाल सीमा 18 से घटाकर 16 कर दी जाए तो उसका प्रभाव केवल आरोपी किशोरों पर नहीं, बाल अधिकार की व्यापक कानूनी अवधारणा पर पड़ सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ सामान्यतः गंभीर अपराधों के आधार पर व्यापक बाल सीमा कम करने का विरोध करती हैं और न्याय व्यवस्था के भीतर विशेष उपायों को प्राथमिकता देती हैं।
लेकिन दुनिया में न्यूनतम आपराधिक जिम्मेदारी की उम्र इतनी अलग क्यों है—कहीं 10, कहीं 12, कहीं 14 इसका कारण इतिहास है। इंग्लैंड का common law बहुत छोटी उम्र से अपराधी मंशा की अवधारणा विकसित करता रहा, जबकि महाद्वीपीय यूरोप के कई देशों ने बाद में किशोर संरक्षण की उच्च सीमाएँ स्वीकार कीं। समाज की अपराध नीति, जनमत, बाल अधिकार आंदोलन, धार्मिक और कानूनी परंपरा, जेल व्यवस्था और राजनीतिक घटनाएँ इन सीमाओं को बदलती रही हैं। स्कॉटलैंड का आठ से बारह वर्ष तक पहुँचना इसका स्पष्ट उदाहरण है। कानून इसलिए स्थिर वैज्ञानिक समीकरण नहीं, बदलती सामाजिक सहमति है।
संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान सोच देशों को न्यूनतम आपराधिक जिम्मेदारी की उम्र कम से कम 14 वर्ष रखने की दिशा में प्रोत्साहित करती है। यह भी कहा गया है कि यदि किसी देश की सीमा पहले से 15 या 16 है तो उसे घटाया नहीं जाना चाहिए। इसके पीछे विकास मनोविज्ञान और यह चिंता है कि बहुत छोटे बच्चों को औपचारिक आपराधिक व्यवस्था में डालने से उनके पुनर्वास के बजाय पुनः अपराध की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन यह संयुक्त राष्ट्र की सिफारिश है। प्रत्येक संप्रभु देश का आपराधिक कानून स्वतः इससे नहीं बदल जाता। इसी कारण इंग्लैंड-वेल्स आज भी दस वर्ष की सीमा रखते हैं, जबकि जर्मनी 14 रखता है। भारत सात से नीचे पूर्ण प्रतिरक्षा, सात से बारह में परिपक्वता परीक्षण और उसके बाद किशोर न्याय का मिश्रित मॉडल अपनाता है।
18 वर्ष की सीमा पर एक और प्रश्न अक्सर उठता है—यदि आरोपी अपनी उम्र के दस्तावेज बदलकर खुद को नाबालिग बताए तो क्या होगा? इसीलिए Juvenile Justice Act में आयु निर्धारण की अलग प्रक्रिया है। बोर्ड या समिति उपलब्ध स्कूल/मैट्रिक प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र आदि प्रमाणों को प्राथमिकता देती है और आवश्यक स्थिति में चिकित्सा आयु परीक्षण का सहारा लिया जा सकता है। आयु विवाद गंभीर मामलों में अक्सर मुकदमे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है, क्योंकि कुछ महीने का अंतर भी पूरी न्यायिक प्रक्रिया बदल सकता है। कानून इसीलिए आरोपी के बाहरी रूप या पुलिस की धारणा पर ही उम्र तय नहीं करता।
सार्वजनिक बहस में ‘नाबालिग को फायदा’ कहे जाने वाले मुख्य बिंदु इसलिए असल में ये हैं। वयस्क लॉकअप और जेल से सुरक्षा, विशेष किशोर न्याय बोर्ड, जमानत का अपेक्षाकृत उदार सिद्धांत, पहचान गोपनीय रखना, वयस्क सह-आरोपी से अलग प्रक्रिया, सुधार और पुनर्वास आधारित आदेश, सामान्य मामलों में सीमित संस्थागत अवधि, भविष्य में दोषसिद्धि से जुड़ी अयोग्यता हटना और रिकॉर्ड नष्ट होने की संभावना, मृत्युदंड तथा बिना रिहाई की संभावना वाली उम्रकैद से पूर्ण सुरक्षा। लेकिन इनमें से कोई भी नियम यह नहीं कहता कि नाबालिग मनचाहा अपराध करके ‘बच’ सकता है। 2015 के बाद 16–18 वर्ष के कुछ जघन्य अपराधों में adult trial की संभावना इसी धारणा के जवाब में जोड़ी गई।
इस व्यवस्था का सबसे गहरा दर्शन यह है कि कानून बच्चे और उसके अपराध को अलग-अलग देखने की कोशिश करता है। अपराध गंभीर हो सकता है। पीड़ित का नुकसान अपरिवर्तनीय हो सकता है। लेकिन कानून यह पूछता है कि अपराध करने वाला व्यक्ति विकास की किस अवस्था में था और क्या उसे ऐसा अवसर दिया जा सकता है कि वह जीवनभर अपराधी न रहे। वयस्क आपराधिक व्यवस्था में भी सुधार एक उद्देश्य है, लेकिन किशोर न्याय में यह केंद्रीय उद्देश्य बन जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर में juvenile court, observation home, rehabilitation और sealed record जैसी व्यवस्थाएँ विकसित हुईं।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि 18 वर्ष ‘सही’ और कोई दूसरी उम्र ‘वैज्ञानिक रूप से गलत’ है। जैविक विकास क्रमिक है। 15 वर्षीय और 17 वर्षीय में फर्क हो सकता है, जैसे दो 17 वर्षीय बच्चों की परिपक्वता भी बिल्कुल समान नहीं होगी। कानून प्रत्येक व्यक्ति की पूर्ण न्यूरोलॉजिकल जांच करके वयस्कता तय नहीं कर सकता, इसलिए उसे एक सामान्य सीमा चाहिए। 18 की सीमा इसलिए चुनी और व्यापक रूप से स्वीकार हुई क्योंकि यह विद्यालयी शिक्षा समाप्त होने, नागरिक स्वतंत्रता शुरू होने और अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार अवधारणा के साथ सुविधाजनक रूप से मेल खाती है। लेकिन गंभीर मामलों में व्यक्तिगत परिपक्वता जांच की अनुमति—जैसी भारत ने 16–18 के लिए बनाई—इसी कठोर संख्या की सीमा को कुछ लचीलापन देती है।
भारत की यात्रा को देखें तो कानून लगातार कठोर या नरम एक ही दिशा में नहीं चला। 1960 और 1986 में लड़कों के लिए सीमा 16 और लड़कियों के लिए 18 थी। 2000 में दोनों के लिए समान 18 कर दी गई। 2015 में 18 की सामान्य सीमा बनाए रखते हुए 16–18 के जघन्य अपराधों में adult trial का विशेष द्वार खोला गया; 2021 के संशोधन ने प्रशासनिक और अपराध-वर्गीकरण संबंधी अन्य सुधार किए लेकिन मूल आयु ढाँचा कायम रखा। यानी भारतीय कानून ने लगभग छह दशकों में लैंगिक भेद वाली कम सीमा से सार्वभौमिक बाल अधिकार और फिर गंभीर अपराध के लिए नियंत्रित अपवाद तक यात्रा की है।
अंततः किसी अपराधी को “18 तक नाबालिग” कहने का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि कानून मानता है कि 17 वर्षीय व्यक्ति सही-गलत नहीं जानता। इसका अर्थ है कि कानून मानता है कि जानकारी, निर्णय क्षमता, आवेग नियंत्रण और व्यक्तित्व निर्माण अभी विकासशील हो सकते हैं और सुधार की संभावना अधिक है। इसलिए बच्चे को अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, लेकिन उसी प्रक्रिया और उसी दंड से नहीं जिस तरह पूर्ण वयस्क को। भारत में सात वर्ष से कम पर पूर्ण आपराधिक प्रतिरक्षा, सात से बारह में परिपक्वता का परीक्षण, 18 तक किशोर न्याय और 16–18 के जघन्य मामलों में सीमित adult-trial व्यवस्था—ये चार स्तर इस जटिलता को पकड़ने की कोशिश करते हैं।
और शायद इस कानून की सबसे सही समझ “नाबालिग को क्या फायदा मिलता है?” से थोड़ा आगे जाकर बनती है। यह अपराध पर छूट नहीं, बल्कि इस सिद्धांत की स्वीकृति है कि न्याय केवल बदला नहीं है; न्याय को यह भी देखना है कि अपराध करने वाला बच्चा बीस वर्ष बाद किस प्रकार का मनुष्य बनेगा। पीड़ित को न्याय देना अनिवार्य है, समाज की सुरक्षा अनिवार्य है, लेकिन यदि किशोर को सुधारकर जिम्मेदार नागरिक बनाया जा सकता है तो कानून उसे वह अवसर भी देना चाहता है। इसी कारण 18 वर्ष की रेखा मौजूद है—पूर्ण वैज्ञानिक सत्य के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता द्वारा बाल्यावस्था, जिम्मेदारी और पुनर्वास के बीच खींची गई एक व्यावहारिक और नैतिक कानूनी सीमा के रूप में।


