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WMO की 'महा चेतावनी'! 2026 में मजबूत होगा अल-नीनो, बढ़ सकती है भीषण गर्मी, सूखा और बेतरतीब मौसम का खतरा
WMO El Nino Warning 2026: विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल-नीनो मजबूत हुआ तो देश में मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे कृषि, जल संसाधनों और आम जनजीवन पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ सकता है।
WMO El Nino Warning 2026
WMO El Nino Warning 2026: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने साल 2026 को लेकर बड़ी चेतावनी जारी की है। संगठन के मुताबिक, इस साल अल-नीनो (El Nino) तेजी से मजबूत हो सकता है, जिसका बड़ा प्रभाव पूरे विश्व भर के मौसम पर स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा। इससे कई देशों में भयंकर गर्मी, सूखा, अनियमित रूप से वर्षा, बाढ़ और Heatwave जैसी चरम मौसम से जुड़ी घटनाओं की आशंका बढ़ गई है। लेकिन भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा।
इसे लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल-नीनो मजबूत हुआ तो देश में मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे कृषि, जल संसाधनों और आम जनजीवन पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ सकता है।
क्या है अल-नीनो और कैसे बदलता है मौसम?
अल-नीनो एक प्रकार का प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जो सामान्यतः पर हर 2-7 साल के बीच विकसित होती है। इस दौरान प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है।
साधारण परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत महासागर से पश्चिम की तरफ से चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेल देती हैं। लेकिन जब अल-नीनो सक्रिय होता है, तो ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं। इसके कारण समुद्र की सतह का तापमान लगभग 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ सकता है।
WMO के मुताबिक, जुलाई से सितंबर 2026 के बीच अल-नीनो के मजबूत होने की संभावना बेहद ज्यादा है। यह सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे विश्व के तापमान, वर्षा के पैटर्न और वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है।
विश्व भर में बढ़ सकता है 'चरम' मौसम का खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि अल-नीनो के प्रभाव से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का संतुलन ख़राब हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य से ज्यादा वर्षा और बाढ़ की स्थिति बन सकती है, जबकि कई देशों में सूखा और जल संकट गहरा सकता है। जो कि गौर किया जाए तो मुंबई महाराष्ट में इस वक़्त भारी वर्षा से तबाही मची हुई है, और बाढ़ का संकट भी बढ़ता जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में भारी वर्षा होने की संभावना है। वहीं भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, उत्तरी दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कई हिस्सों में कम बारिश और सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। कुछ क्षेत्रों में हीटवेव की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं, जिससे जनस्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
भारत में मानसून और खेती पर पड़ सकता है प्रभाव
भारत के लिए अल-नीनो सबसे बड़ी चुनौती मानसून को लेकर पैदा करता है। इतिहास बताता है कि कई अल-नीनो सालों में देश में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। अगर इस बार भी मानसून कमजोर रहता है, तो खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, सोयाबीन और दालों के उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
कम वर्षा के कारण जलाशयों का जलस्तर कम हो सकता है, सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और कई राज्यों में पेयजल संकट भी गहरा सकता है। इसके अलावा जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
बढ़ सकती हैं हीटवेव और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें
अल-नीनो के दौरान तापमान बढ़ने से हीटवेव की घटनाओं में भी इजाफा हो सकता है। लगातार ज्यादा गर्मी रहने से हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, पानी की कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और खुले में काम करने वाले मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। वहीं बड़े शहरों में अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव के कारण तापमान और ज्यादा महसूस हो सकता है, जिससे लोगों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता होगी।
खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है प्रभाव
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के मुताबिक, अगर अल-नीनो लंबे समय तक सक्रिय रहता है तो कृषि उत्पादन प्रभावित होने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा पर भी संकट गहरा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि साल 2015-16 के अल-नीनो के दौरान विश्व के कई हिस्सों में गंभीर सूखा पड़ा था और लाखों लोग खाद्य संकट से प्रभावित हुए थे। एयर अगर अब 2026 में भी अल-नीनो अत्यधिक मजबूत हुआ तो अनाज उत्पादन कम हो सकता है, खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
WMO ने तैयार रहने की दी सलाह
WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा है कि अल-नीनो पहले ही विकसित होना शुरू हो चुका है और आगामी महीनों में इसके और मजबूत होने की संभावना है। उन्होंने सरकारों, मौसम एजेंसियों और आपदा प्रबंधन संस्थाओं से वक़्त रहते तैयारी करने की अपील की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वक़्त पर मौसम पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, जल संरक्षण, सूखा-रोधी फसलों का प्रयोग और बेहतर आपदा प्रबंधन रणनीतियां संभावित नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन से और बढ़ रही चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, लेकिन मानव-जनित जलवायु परिवर्तन इसके प्रभाव को और ज्यादा गंभीर बना रहा है। समुद्र और वातावरण के लगातार गर्म होने से चरम मौसम की घटनाएं पहले की तुलना में ज्यादा तीव्र हो सकती हैं।
ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि सिर्फ तात्कालिक तैयारी ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन रणनीतियों पर भी जोर देना होगा। किसानों, नीति-निर्माताओं और आम लोगों को वक़्त रहते जागरूक होकर ज़रूरी कदम उठाने होंगे, ताकि संभावित जोखिमों और आर्थिक नुकसान को कम किया जा सके।


